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गुरुवार, 2 मई 2024

हिंदी बाल कहानियों में गाँव/ डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’

आलेख

हिंदी बाल कहानियों में गाँव

डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’

भारत गाँवों का देश है। कहते हैं कि राष्ट्र की आत्मा गाँव में बसती है। ऐसा शायद इसलिए भी कहते हैं क्योंकि राष्ट्र की प्रगति का हर रास्ता गाँवों से होकर जाता है। यदि किसान फसलें न उगाए तो? अन्न, दूध, दही, घी सारी चीजें हमें गाँव के भोले-भाले लोगों की मेहनत के बदौलत ही मिलती है। बावजूद इसके गाँव के लोगों के समक्ष बड़ी समस्याएँ हैं। जब बड़ों के साथ समस्याएँ हैं तो उनके बच्चे भी उनसे रूबरू होते ही हैं। इसके बाद भी गाँव के बच्चे अपनी लगन, अपने उत्साह, और अपने परिश्रम के बल पर बढ़ रहे हैं। नाम कमा रहे हैं l

 अनेक महापुरुष मूल रूप से गाँव के ही थे किन्तु उन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में अद्भुत सफलता प्राप्त की। सच बात तो यह है कि गाँव का विस्तृत और विकसित रूप ही शहर है। यहां पर एक बात और, एक शब्द है 'गँवार', हम उसे इस अर्थ में लेते हैं कि कोई अशिक्षित, असभ्य या असंस्कारी व्यक्ति। ऐसा नहीं है, गँवार शब्द 'ग्राम्यार' शब्द का परिवर्तित रूप है, जिसका अर्थ है गाँव में रहने वाला। खैर... बात तो गाँव की हो रही थी तो हमें गाँव और उसके लोगों के प्रति आभारी होना चाहिए जिनकी अनुकंपा से हम फलीभूत होते हैं। 

हिंदी में आज ऐसी ढेरों बाल कहानियाँ हैं जिनमें गाँव की उल्लेखनीय उपस्थिति है l यह अलग बात है कि अधिसंख्य अर्थात गाँव के बच्चों के लिए अलग से साहित्य, लिखने की कोई व्यवस्थित परम्परा कभी नहीं रही l  पत्र-पत्रिकाओं ने भी इस दिशा में अलग से चिंतन का परिवेश निर्मित करने की दिशा में कोई पहल नहीं की l पत्र पत्रिकाओ में भी गाँव के बच्चों की जो कहानियाँ प्रकाशित हुईं, प्राय : उनके लेखक ग्रामीण परिवेश से अनभिज्ञ थे l उनके लिए कहानी में गाँव की उपस्थिति का अर्थ बस इतना भर था कि गाँव का कोई बालक शहर जाकर, किताबों की दुनिया से जुड़कर या वहा की भौतिक प्रगति से परिचित होकर सफल और सभ्य हो गया l जबकि ऐसा नहीं है, गाँव संस्कारों की धरा है l प्रो. वासुदेव शरण अग्रवाल राष्ट्र के स्वरुप की कल्पना करते हुए जिस जन, भूमि और संस्कृति की बात करते हैं, वह संस्कृति गाँव की अधिवासिनी है l शहर के बच्चों को भी गाँव से बहुत कुछ सीखना हैl 

बहरहाल अभी भी, जब शहर गाँव की ओर अपने पैर तेजी से बढ़ा रहा है, बहुतेरे गाँव हैं जिन्हें शहरीकरण की जरा भी हवा नहीं लगी हैl उन बच्चो के लिए लिखते समय बाल कथाकार ग्राम्य संवेदना से जुड़ना होगा l जिस प्रकार पानी का चित्र देखकर प्यास नहीं बुझ  सकती, वैसे गाँव के गलियारों और खेतो की पगडंडियों पर विचरण किए बिना, वहां के बच्चो से मिले और बतियाए बिना एक रोचक और सफल ग्रामीण बाल कहानी की सर्जना असंभव है l अनुभूति और सहानुभूति में अंतर होता है l लमही गाँव के कथा सम्राट प्रेमचंद की कहानी ईदगाह में हामिद के चिमटे के बहाने ग्राम्य परिवेश की पूरी अनुभूति विद्यमान है l छायावाद के चर्चित शिकार कथा लेखक श्रीराम शर्मा की स्मृति कहानी को याद कीजिए जिसमें मक्खनपुर गाँव के डाकघर में बड़े भाई की चिट्ठी डालने गए लेखक की सांप से मुठभेड़ की रोमांचक आपबीती को पढ़ते हुए रोंगटे खड़े हो जाते हैं l  

हिंदी में ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियों के अभाव और उसकी आवश्यकता को देखते हुए मैंने एक संकलन सम्पादित किया था : ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियां (2016) l उस संकलन में डॉ० उषा यादव (दादी अम्मा का खजाना, अगिया बैताल की कथा), गोविंद शर्मा (अपना काम करेंगे, मेहनत का मंत्र), डॉ० जाकिर अली रजनीश (सेमरा का शेर, सपनों का गाँव), डॉ० दिविक रमेश (किस्स्सा चाचा तरकीबू राम का), डॉ० नागेश पांडेय 'संजय' (गौतर, मन का डर), प्रकाश मनु (तुम भी पढ़ोगे जस्सू, जमुना दादी), मुरलीधर वैष्णव (हबपब टोली), डॉ० मोहम्मद अरशद खान (हजार आँखों की प्रतीक्षा, बुद्ध काका और मनफेर ताऊ), डॉ० मोहम्मद साजिद खान (बैल खुल गए, बरगदी गाँव), रमाशंकर (शर्तों के सहारे-आई बहारें, कायाकल्प), रावेंद्र कुमार 'रवि' (मिल गई माँ), डॉ० श्रीप्रसाद (काला हाथ, यह सच है), संजीव जायसवाल 'संजय' (लोहार का बेटा), डॉ० सुनीता (सींक वाली ताई, करमू चाचा का ताँगा), डॉ० हेमन्त कुमार (आलस्य का फल) जैसे समकालीन लेखकों की गाँव के इर्द गिर्द घूमती बाल कहानियाँ थीं l गाँव के बच्चों की सोच, उनके जीवन और चिंतन को उद्घाटित करने का प्रयास इन कहानियों में था । शहर के नजरिए से भी गाँव को देखने-समझने की कोशिश थी। मेरी भावना थी कि गाँव और शहर के बच्चे परस्पर जुड़ें l गाँव के बच्चे तो शहर और उसके बच्चों के बारे में जानते हैं लेकिन शहर के बच्चे भी गाँव को समझें l इस तरह से दोनों में एक संवाद स्थापित करने की चेष्टा इसमें थी। 

समकालीन बाल साहित्य लेखकों की कहानियों में गाँव की बहुरंगी छवियां मिल ही जाती हैं l कुछ रचनाकारों ने तो शहर में बसकर भी अपने भीतर का गंवईपन बचाकर रखा है l उनकी कहानियों में ग्राम्य संवेदनाएं उफान मारती चलती हैं l ऐसा उफान कि पाठक का मन भीग जाएl मोहम्मद अरशद खान की एक लाजवाब और बेमिसाल कहानी है ‘गुल्लक’, इसे जरुर पढ़ा जाना चाहिए l मैने न जाने कितनी बार उसे पढ़ा है और जब भी पढ़ा, आँसू रोक नहीं पाया हूँ। आत्मा को छू लेने वाली अद्भुत कहानी। अरशद का नाम आते ही यह कहानी मेरे मस्तिष्क में तैर उठती है। मेरा मन भीग जाता है। गाँव में निलमिया जैसी कितनी ही कर्मठ और माँ-बाप के लिए त्याग से लबरेज बेटियाँ हैं जिनका सच्चा प्रतिनिधित्व इस कहानी में देखा जा सकता है। (बालिकाओं की श्रेष्ठ कहानियां, पृ. 114)

पद्मश्री प्रो. उषा यादव की ‘दादी अम्मा का खजाना’ कहानी में गाँव के हर व्यक्ति को कुतूहल है कि उस खजाने में क्या है ? एक ठग उनके खजाने की फ़िराक में नकली परपोता बनकर उनसे मिलने आता हैl भोली दादी उसकी खूब खातिर करती हैं l ठग जब मीठी-मीठी बातों से उनके खजाने की जानकारी कर लेता है तो उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है l इस कहानी में पुरानी चीजों को सहेज कर रखने की बुजुर्गों की आदत का बड़ा ही संवेदनशील वर्णन है l (ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियाँ, पृ.9 )

मुझे याद है अपनी माता जी के निधन के बहुत दिनों के बाद, जब उनका बक्सा खोलकर देखा गया था तो उसमे मेरे जन्मकाल से दो-तीन वर्ष तक की अवस्था के वर्षों पुराने कपड़े रखे मिले थे l मेरी करधनी, कड़ा, गले की माला सब कुछ उस खजाने में सुरक्षित था जिसे देख, मैं फूट-फूटकर रोया था और तब अवचेतन में उषा जी की इस कहानी की दादी भी मुझे उद्वेलित कर रही थींl 

डॉ. दिविक रमेश की कहानी ‘किस्सा चाचा तरकीबूराम का’ बच्चों में लोकप्रिय चाचा की कहानी है जिनके किस्से बड़े ही मजेदार हैं और उससे भी मजेदार है लेखक की कहन शैली l कहानी का अंत देखिए, ‘मुझे एक और किस्सा याद हो आया तुम भी क्या कहोगे कि चाचा तरकीबूराम के ही किस्से सुनाने पर लग गएl अब तुम अपने कोर्स की किताब पढ़ लो l शायद तुम्हें यह नहीं मालूम कि चाचा तरकीबूराम यह कभी नहीं चाहते कि उनके किस्से सुनने पढ़ने वाले बच्चे अपने स्कूल की पढ़ाई में फिसड्डी रहें l उन्होंने खास तौर पर कहा था कि उनके किस्से उन्हीं बच्चों को बताए जाएँ जो खूब मन लगाकर पढ़ते हो l (ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियाँ, पृ. 46)

डॉ. श्रीप्रसाद की कहानी ‘यह सच है’ के पंडित रामदीन पूरे गांव में लोकप्रिय हैं l वे अचानक गायब हो जाते हैं l उनके वापस न आने पर गांव में उन्हें मृत मानकर, उनकी आत्मा की शांति के लिए तेरहवी की दावत रखी जाती है लेकिन अनायास रामदीन पंडित प्रकट हो जाते हैं l लोग उन्हें भूत समझकर भयभीत होते हैं l सच, अगर वह अकेले में किसी को मिलते तो शायद उसकी हृदय गति भी बंद हो जाती l मजेदार बात यह कि हारे थके रामदीन जब यह कहते हैं, ‘मेरे मरने की बात कैसे सोच ली ? .... मुझे भी भूख लगी है l मैं भी बैठता हूँ l’ तो खुद की तेरहवी की दावत खाने की यह सच्ची घटना पाठक को हंसाती ही नहीं, चमत्कृत भी कर देती है l  ((ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियाँ, पृ. 123)

मौन साधक विनायक जी वैसे तो वन्य जीवन के विशेषज्ञ लेखक हैं लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से उनकी कहानियों में गाँव की जीती-जागती तस्वीर देख सकते हैं l हाल ही में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘माँ की महक तथा अन्य कहानियाँ’ में मानवेतर पात्र सियारू का गाँव-कसबे और उसके वाशिंदों को लेकर किया गया चिंतन तो बाल साहित्य में एकदम नया है l विनायक जी की चित्रोपम शैली भी ताजगी भरी होती है l पाठक जैसे पढ़ नहीं, कोई फिल्म सी देख रहा होता है l उनकी कलम से सियारू का वर्णन देखिए : और अब समय आगे बढ़ गया है। माँ के चुंबन तथा उसके पीछे लगे रहने वाला सान्निध्य, सब वक्त के प्रवाह में बह गए हैं। सियारू अब जंगल में हैं। एकदम अकेले। लेकिन कस्बे के साए में बिताए हुए दिनों में उन्हें जो खट्टे-मीठे व जीभ जला देने वाले, तिक्त, अनुभव हुए हैं, उन्हें वे भूले नहीं हैं। वे आज भी उनकी दुम पकड़े लटके हुए हैं। एक तो सियारू का कोमल मन आज तक इस गुत्थी को सुलझा नहीं पाया कि मनुष्य क्यों कुछ जानवरों को इतना लाड़ देता है और क्यों कुछ के पीछे ही पड़ा रहता है। कभी-कभी तो जान ले लेने तक। और कुछ नहीं तो पीछे कुत्ते ही छोड़ देता है। जानवर के पीछे जानवर। खूँखार। पक्के दुश्मन बनाए हुए। आखिर ऐसा क्यों? और इसी भारी-भरकम 'क्यों' का उत्तर सियारू आज तक नहीं खोज पाए। अब इसी दो मुँहे इंसानी व्यवहार से ही तो आजिज आ कर सियारू इतने परेशान हुए कि वयस्कता की दहलीज चूमते ही वानप्रस्थी हो गए। कस्बे के आस-पास पल रहे मोटे चूहों तथा इधर-उधर पड़े, मनलुभावने खाद्य-पदार्थों का मोह त्याग उन्होंने जंगल का रुख कर लिया। और अब उन्होंने कस्बे के मुर्गे-मुर्गी चुराने और हर समय जान जोखिम में डालने वाले जीवन से मुक्ति पा ली थी।

भगवती प्रसाद द्विवेदी की पुस्तक ‘मेरी प्रिय बाल कहानियां’ की कहानियाँ किसी-न-किसी रूप से गांव से जुड़ी हुई हैं। इनके कथानक और परिवेश तो ग्रामीण जीवन के हैं ही,लोक की खुशबू भी इनमें महसूस की जा सकती है।  'नकली महात्मा',जिसका नायक सीतू गांव की मित्र-मंडली के साथ कबड्डी खेल रहा होता है, तभी मैदान में एक मजमा लगाए महात्मा को देख सभी वहां जा पहुंचते हैं। महात्मा जब पानी पर तैरते चमत्कारी पत्थर को दिखाकर ग्रामीणों को मूर्ख बना रुपये ऐंठना चाहते हैं तो सीतू आगे बढ़कर वैज्ञानिक तरीके से सच का पर्दाफाश करता है और नकली महात्मा की पोल खोलता हैl

गाँव में अशिक्षा के चलते अनेकानेक अन्धविश्वास प्रभावी रहते हैं l भोले भाले गाँव के लोग इस कारण धूर्तों की चालबाजी के भी शिकार हो जाते हैं l अखिलेश श्रीवास्तव चमन की  ‘जंतर मंतर’ कहानी में लुटेरे ज्योतिषी बनकर आते हैं और गृह नक्षत्रों का भय दिखाकर तंत्र मंत्र की बात करते हैंl (बाल किलकारी,  जून 2019)

इन पंक्तियों के लेखक (डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’) की कहानी ‘गौंतर’ में गाँव का परिवेश ही नहीं, भाषा भी रची-पगी है l मेहुल एक विशेष कारण से मामा के गाँव नहीं जाता l मामा पूछ पूछ कर थक जाते है तब जाकर अंत में रहस्य खुलता है कि उनके यहाँ शौचालय नहीं है l सब  खुले में जाते हैं l मामा का जवाब देखिए : 'बचुआ, अब बहु जमाना गओ। गाँव मां हर बखरी... मतलब मकान के सामने सरकार ने शउचालय बनवाय दय हयिं।... हमने तउ खुदइ बनवाइ लओ रहयि। अब तुम्हई कोई दिक्कत नाहि हुयहयि। तुमने पहिले काहि नाहिं कही ?' (बाल वाणी, जुलाई 2016, पृ. 18 )

मनोहर चमोली मनु की सच्ची हास्य कहानी  ‘कहीं संतला न आ जाए’ की नायिका संतला पहाड़ी गाँव में रहती है जिसका मुर्गा चोरी हो जाता है l वह एक हाथ में लानटेन और चिमटा लिए हर घर के चूल्हों पर चढ़े बर्तन चेक करती है l वह जिस घर से निकलती, कोई न कोई बच्चा उसके साथ हो लेता l इससे एक रेल सी बन गई और इस रेल का स्टेशन था हर घर की रसोई l उसे विश्वास है कि वह खुशबू से ही अपने मुर्गे को पहचान लेगी l मजा तो तब आता है जब मुर्गा उसके ही घर में छिपा मिलता है (साइकिल दिसंबर-जनवरी 2020, पृ. 51)

बाल साहित्य आलोचना को आगे बढाने वाले डॉ. प्रकाश मनु की कहानी ‘जमुना दादी’ के भी क्या कहने l वे बच्चों को कहानियां सुनाती हैं l जामुन खिलाती हैं लेकिन उनके जाने के बाद वह जामुन का पेड़ बहुत उदास नजर आता थाl जैसे जमुना दादी को याद कर वह पेड़ भी रो रहा हो l जामुन तोड़कर खाने का ख्याल मन में नहीं आता था l  (ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियाँ, पृ.67)

इन दिनों बालगीत के क्षेत्र में महारत प्राप्त प्रभुदयाल श्रीवास्तव ने अच्छी बाल कहानियां भी लिखी हैं l गाँव से जुडी उनकी कहानी बिजली या विज्ञान के अन्य चमत्कारों से सतर्क और सावधान रहने की प्रेरणा देती हैl (दादाजी का पद्दू,पृ. 46)

नए रचनाकार निश्चल की ‘कंचों की चमक’ विक्कू और उसके आनंद सर की मनोवैज्ञानिक कहानी है l सरल-सहज और स्वाभाविक भाषा में लेखक ने एक बालक के जीवन में परामर्श और निर्देशन की ज़रूरत को उकेरा हैं l गाँव में तो इसकी विशेष रूप से आवश्यकता है l (कंचों की चमक, पृष्ठ 27)

डॉ. राकेश चक्र की कहानी ‘कुटवारिन दादी’ में गाँव में विद्यमान अस्पृश्यता के निवारण में दादी की प्रणम्य भूमिका का वर्णन है l सामाजिक समरसता की दृष्टि से ऐसी रचनाओं की सदैव आवश्यकता है l (लजीज पुलाव, पृष्ठ 8) 

राजा चौरसिया ग्रामीण अंचल में जीवन यापन करने वाले समर्थ कवि हैं l उनकी कहानी ‘श्यामू की सोच’ नवीनता के साथ साथ पुरातनता के संरक्षण का भी पक्ष उद्घाटित करती है l यह प्रतीकात्मक कहानी हैl नया भी कभी पुराना होगा इसलिए हमें अपने बुजुर्गों के प्रति भी निष्ठावान रहना चाहिएl (गाँव की पूजा, पृष्ठ 18)

रजनीकांत शुक्ल ने वीर बच्चों की सच्ची कहानियां लिखी हैं l उनकी पुस्तक बहादुरी की प्रेरक घटनाएँ (2015) में ज्यादातर गाँव के ही बच्चे हैं l गाँव के बच्चों का अदम्य साहस देखने के लिए शुक्ल जी की ये कहानियाँ सदैव अपना महत्त्व परिलक्षित करती रहेंगी l 

दयाराम मौर्य रतन की कहानी ‘भूत’ गाँव में प्राय: विद्यमान अंधविश्वास पर केन्द्रित हैl इसमें शिक्षा का महत्त्व भी सरलता से वर्णित है l (परीलोक का भ्रमण, पृ. 29)

डॉ. बानो सरताज की गीतों भरी कहानी की पुस्तक ‘कुछ तुम बोलो कुछ हम’ में संकलित शिक्षाप्रद कहानी ‘अब काहे के सौ’, में गांव के गोविंदा के संवाद रीझ लेते हैं : दस  में खरीदी आल्टी-बाल्टी, दस में खरीदी रस्सीl  अब काहे के अस्सी ? (पृ. 64)

डॉ. शशि गोयल की कहानी ‘सलोनी’ में दादी के प्रति बच्चों के संवेदित प्रेम की झलक है और गांव की अलमस्ती का आनंद भी l  (सींग वाले शैतान, पृ. 24)

शुभदा पांडे की कहानी ‘जोडागाछ के सहचर’ में तूफान के बाद गांव में मची तबाही का क्या मार्मिक वर्णन है ! ऐसी कहानियाँ रोमांचक तो होती ही हैं, विषम परिस्थितियों से जूझने का जज्बा भी परोसती हैंl पुस्तक (इंदुपरी का पत्र, पृ. 27)

डॉ. अमिता दुबे की कहानी ‘अनोखी छुट्टियां’ में दादी के बीमार होने की सूचना पर पापा के साथ गांव पहुंचे क्षितिज का वापस आने का मन ही नहीं करता l बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ने और उन्हें अपनी थाती से परिचित कराने का भी जिम्मा हमारा ही है l शहर में बस चुके महानुभावों को इस दिशा में सोचना होगा (नंदन, मई 2016 , पृष्ठ 48)

बाल साहित्य आलोचना के क्षेत्र में विशेष सक्रिय डॉ. शकुंतला कालरा की कहानी ‘नंदू की सूझबूझ’ में नंदू गांव से अपने मां के साथ दिल्ली का विश्व पुस्तक मेला देखने आता हैl कहानी का विषय एकदम नया है l बच्चों को अधुनातन जानकारी दिलाना भी लेखकों का दायित्व है और इस दृष्टि से यह कहानी अत्यंत उपयोगी हैl ( (माँ का उपहार, पृ. 29)

प्रभात गुप्त की एक कहानी ‘बंदरों की निर्मम हत्या’ मे गाँव बेला के लोग बंदरों के आतंक से पीड़ित होने के कारण उन्हें पीट-पीट कर मारना शुरू कर देते हैं l यह कहानी वन्यजीवों के प्रति दया भाव  के सन्देश के साथ साथ ऐसे अमानुषिक लोगों पर वैधानिक प्रक्रिया की भी शिक्षा देती है (पृ. 46)

डॉ. सत्य नारायण सत्य की कहानी काले काले तेज उजाले  कस्बानुमा गांव की कहानी है जिसमें अंधेरे में रहने वाले बच्चों की परिस्थितियों का वर्णन हैl कहानी में सहज हास्य भी विद्यमान है : अँधेरा कायम रहे l (शिविरा, सितंबर 2023, पृ. 69) 

डॉ. मोहम्मद साजिद खान ने ग्राम्य परिवेश के अनुभवी और परिपक्व लेखक हैं l उनकी ‘होली कुछ ऐसी भी’ कहानी साम्प्रदायिक सद्भाव की प्रेरक कहानी है l गाँवों के डेलखेड़ा भवानीपुर, कल्यानपुर, चमकनी, पैदापुर और गिरगिचा जैसे नाम कहानी को यथार्थ से जोड़ देते हैं l कहानी का अभीष्ट हमारे धर्म निरपेक्ष देश की असली ताकत को बयां करता है l दृष्टव्य : मियाँ को सारी वस्तु- स्थिति समझने में देर न लगी। उन्होंने बात संभालते हुए धीरे से मिट्ठू के कान में कहा -"गुलाल है रे l मिट्टू यह बात सुन अचरज से बोल उठा- "मियाँ तुम और गुलाल...??" 

मियाँ ने जमीला चाची की ओर देखा। जमीला चची ने उनकी आँखें पढ़ लीं- "हाँ-हाँ, क्यों नहीं! रंगों की कोई जाति या धर्म नहीं होता...!" उनके इतना कहते ही मुट्ठी-मुट्ठी गुलाल से पूरा आसमान रंग गया। सभी सराबोर हो गए। वातावरण फिर से चुहल, हुल्लड़ और उल्लास में बदल गया।  (बाल वाटिका, मार्च 2022, पृष्ठ 22)

गाँव से जुडी कहानियाँ तो इतनी हैं कि अनेक शोध प्रबंध लिखे जा सकते हैं l शोधकर्ताओं के लिए यह एक नया विषय होगा तथापि गाँव में शहर (डॉ. राष्ट्रबंधु), घमंडी बढई (डॉ. रोहिताश्व अस्थाना), हीरा मुझे माफ़ करना (डॉ. भैरूंलाल गर्ग ), बल्दू का छोटा भाई किशन (इंदरमन साहू), जंगल का भूत (हूंदराज बलवाणी), एक था गोलू (रूप सिंह चंदेल), मदन का भाई नंदू (कमल चोपड़ा), सुक्खो का भूत (कमलेश भट्ट कमल), गांव की सैर (दिनेश पाठक शशि), जल उठे दिए (नीलम राकेश), बैक वार्ड या स्मार्ट (शिखरचन्द्र जैन), तीन शिकारी (चित्रेश), लाट साहबों का पानी (गोविन्द शर्मा), बात की कीमत (रतन सिंह किरमोलिया), मिट्ठू चाचा (पवन कुमार वर्मा), कला का सम्मान (रमेश चन्द्र पन्त) जैसी ढेर सारी कहानियाँ हैं, जहाँ गाँव का पसारा है l जहाँ गाँव के विविध स्वरूप हैं l जी हाँ, उस प्रणम्य गाँव के, जहाँ सहजता है, सरलता है, मौलिकता है l नैसर्गिकता है l प्रकृति का वैभव है l जिजीविषा है l आस है l आत्मविश्वास है l ...और सबसे बड़ी बात कि हमारी थाती है जो याद दिलाती है कि हम कितने भी अधुनातन क्यों न हो जाएँ, हमारी जड़ें गाँव में हैं क्योंकि हमारे पुरखों ने यहीँ अपना जीवन बिताया है l यहां के खेतो की मिटटी में उनका पसीना बरसा है और अंत में उनके शरीर की राख भी इसी मिटटी में मिल खप गई है l इस मिटटी का ऋण कभी चुकता न होगा l अपने गाँव की इस मिटटी को नमन करने के लिए हम इससे जुड़े रहें और अपने बच्चों को जोड़े रहें l

बाल कहानियों में जब गाँव ध्वनित होता है तो वह बच्चों में संवेदनाएं भी जगाता है l इस बहाने अपनों लगाव बना रहेगा l रिश्ते बचे रहेंगे l प्रेम बचा रहेगा l प्रेम है तो वास्तविक जीवन है अन्यथा हम मशीन तो बनते ही जा रहे हैं l  

आइए, जीवन की तलाश में गाँव की सोंधी महक वाली बाल कहानियों का स्वागत करें l 

■ डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’, 237, सुभाष नगर, शाहजहांपुर-242 001 (उत्तर प्रदेश) 

(बाल वाटिका, मई 2024 अंक में प्रकाशित)

शनिवार, 20 जनवरी 2024

आलेख 'बाल साहित्य के भगीरथ' : निरंकारदेव सेवक

बाल साहित्य के भगीरथ : निरंकारदेव सेवक
- डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
30 मई 2002 को भारतीय पत्रकारिता संस्थान द्वारा बरेली में मुझे निरंकारदेव सेवक बाल साहित्य सम्मान मिला था। मैंने प्रशस्तिपत्र देखा तो चौंक कर रह गया। मेरे नाम के साथ बरेली मुद्रित था। मैंने आयोजकों से कहा कि मैं तो शाहजहाँपुर का हूँ। मेरा पता तो गलत छप गया? आयोजक सुरेंद्र सिन्हा जी ने हँसकर कहा था- "आप निश्चिंत होकर प्रशस्तिपत्र स्वीकारिए। संभव है कि समय इस त्रुटि को ठीक कर दे और आप बरेली के हो जाएँ।"
बात मजाक की थी किंतु सत्य सिद्ध हुई। वर्ष 2007 से बरेली मेरी कर्मभूमि हो गई। शाहजहाँपुर से आते जाते बरेली में जब कचहरी से होकर गुजरता हूँ तो अनायास माथा झुक जाता है। यह कचहरी कभी निरंकार देव सेवक की कर्मभूमि रही है। वहीं से उनके घर की ओर जानेवाले रास्ते के भी दर्शन हो जाते हैं। इस रास्ते का नाम निरंकार देव सेवक मार्ग रखा गया है। मैं उस पथ से गुजरते हुए यह सोचकर बहुत रोमांचित होता हूँ कि बालसाहित्य के लिए राजमार्ग तैयार करने वाले सेवकजी कभी इसी मार्ग से गुजरा करते होंगे। इसी मार्ग से गुजरते हुए कितने विचार बिंदु उनके मन में उपजे होंगे। कितनी योजनाओं की परिकल्पनाएँ इसी मार्ग पर गतिमय हुई होंगी। मैं उन सबके भाग्य को सराहता हूँ, जिन्हें सेवकजी का साथ मिला होगा। एक देवदूत का साथ। बालसाहित्य के सच्चे सेवक का साथ। सही मायनों में बालसाहित्य के भगीरथ का साथ।


यह सच है कि यदि बालसाहित्य आलोचना के क्षेत्र में सेवकजी का पदार्पण न हुआ होता तो बालसाहित्य के कितने मौन साधक काल के प्रवाह में गुम गए होते। बच्चों को तो लेखक के नाम से कोई मतलब नहीं होता। ... और यदि समीक्षक निष्पक्ष भाव से उन लेखकों के विषय में न लिखे तो भला एक समय के बाद कौन उनको जानेगा ?
सेवकजी ने सर्वप्रथम बालगीत साहित्य का इतिहास लिखा। बालसाहित्य के भूले बिसरे हस्ताक्षरों को जैसे पुनर्जीवन दिया।
बरेली महानगर में 19 जनवरी 1919 को जन्में सेवकजी ने एम.ए. हिंदी, एल-एल.बी., और बी.टी. की शिक्षा प्राप्त की। वे प्रारंभ में शिक्षक रहे और फिर अधिवक्ता हो गए। बाल कविताओं के उनके दर्जनों संकलन प्रकाशित हुए। उनकी बाल कविताएँ स्वयं ही 'बाल कविताओं के लिए मानदंड' जैसी हैं।
उनका पहला लेख 'बाल साहित्य रचना' वीणा मासिक के नवंबर 1954 अंक में प्रकाशित हुआ था। उस आलेख में उन्होंने लिखा था-'बड़ों को लिखना है तो उन्हें स्वयं बच्चा बनकर बच्चों के संसार में रह बस कर लिखना होगा।' यह एक तरह से बाल साहित्य पर आलोचनात्मक निबंध लिखने का शुभारंभ था। डॉ. हरिकृष्ण देवसरे के अनुसार सेवकजी ने अपने इस लेख में बाल साहित्य रचना के कई आवश्यक तथ्यों को उद्घाटित करते हुए हिंदी में बाल साहित्य आलोचना को जन्म दिया। (हिंदी बाल साहित्य एक अध्ययन, पृ. 32) बाल साहित्य समीक्षा की प्रथम व्यवस्थित कृति उन्होंने ही लिखी बालगीत साहित्य। इसकी पांडुलिपि को देखकर उनके मित्र डॉ. राकेश गुप्त ने कहा भी था- "यह तुमने बिल्कुल नए विषय पर इतना काम किया है। इस पर तो तुम्हें किसी विश्वविद्यालय से डॉक्टरेट मिल सकती है।" सेवकजी ने उक्त प्रसंग को हँसकर टाल दिया था कि ऐसा होने से भला कौन मुझ वकील को ज्यादा फीस दे देगा। 1966 में इस कृति का प्रकाशन किताब महल, इलाहाबाद से हुआ था। इस कृति से केवल बाल साहित्य समीक्षा के क्षेत्र में ही नहीं, वरन् विश्वविद्यालयों में भी बाल साहित्य आलोचना तथा अनुसंधान की दिशा में संभावनाओं का सूत्रपात हुआ। बाल साहित्य के प्रारंभिक शोधार्थियों के लिए यह कृति गहन अंधकार में प्रखर प्रकाश जैसी सिद्ध हुई। डॉ. हरिकृष्ण देवसरे ने इसे हिंदी बालसाहित्य में पहली आलोचनात्मक पुस्तक माना है। बाल साहित्य में तात्विक समीक्षा का कार्य हो या इतिहास-लेखन, शोध-कार्य हो या तुलनात्मक सदैव आधार-रूप में विद्यमान रहा है। प्रथम संस्करण की भूमिका में संवक जी ने लिखा था-'जिस भाषा में बालसाहित्य का सृजन नहीं होता उसकी स्थिति उस स्त्री के समान है जिसके संतान नहीं होती।' सेवकजी बालसाहित्य के पहले इतिहासकार थे। जैसे अंधेरी गुफाओं में भटकते हुए, महार्णव में गोते लगाते हुए उन्होने कैसे यह दुरूह कार्य संपन्न किया होगा, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। उन्होंने लिखा भी है- 'हिंदी बालगीत साहित्य का इतिहास लिखने में बहुत कठिनाई हुई है। भाषा या साहित्य के किसी इतिहास में बालसाहित्य पर कुछ भी लिखा हुआ मुझे नहीं मिला।' (बालगीत साहित्य,पृष्ठ 5)
सेवक जी के इस ग्रंथ में अन्य भाषाओं में रचित बाल साहित्य का तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत किया गया और बड़ी बात यह कि पूरी निष्पक्षता के साथ कवियों और उनकी रचनाओं की चर्चा की गई। सेवकजी की कृति बालगीत साहित्य बालसाहित्य के क्षेत्र में एक ऐसी अनोखी और अकेली किताब है जो अब तक तीन बार अलग-अलग रूप और अंदाज में प्रकाशित हो चुकी है। दूसरी बार यह कृति 1983 में बालगीत साहित्यः इतिहास एवं समीक्षा नाम से स्वयं सेवकजी के द्वारा ही संशोधित और परिवर्द्धित होकर उ.प्र. हिंदी संस्थान से प्रकाशित हुई थी। उक्त संस्करण में तो कवियों के दुर्लभ चित्र भी उपलब्ध हैं। ग्रंथ में इतिहास के लिए अपेक्षित संदर्भ ग्रंथों का भी ईमानदारी से उल्लेख किया गया है। तीसरी बार इसका प्रकाशन उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से ही द्वितीय संस्करण के रुप में प्रो. उषा यादव के कुशल संपादन में हुआ।
बहरहाल, बाल कविता के समूचे परिदृश्य को संजीदगी से समझने के लिए बालगीत साहित्य बहुत ही जरूरी पुस्तक है। सेवकजी एक ऐसे समर्थ रचनाकार थे, जिनकी कविताएँ स्वयं मानक हैं। उनके कथन परिभाषा हैं। उनका मत था कि बाल साहित्य बच्चों के मनोभावों, जिज्ञासाओं और कल्पनाओं के अनुरूप हो। उनकी सोच व्यापक थी, यही कारण है कि बालगीत साहित्य ग्रंथ की रचना करते समय उन्होंने बाल कविता के विस्तृत फलक को अपने अध्ययन का विषय बनाया। कविताओं की चचर्चा करते समय किसी मित्रवाद या क्षेत्रवाद के वशीभूत नहीं हुए। न जाने कितने लोगों से पत्राचार किया। दिग्गज से दिग्गज, नए से नए और गुमनाम सभी से उनका संपर्क था। इसीलिए चाहे बालक अमिताभ बच्चन के लिए उनके कवि पिता हरिवंशराय बच्चन द्वारा बाल कविता लिखने की बात हो या स्वर्ण सहोदर की प्रकाशन समस्या की पीड़ा। सब कुछ उनकी किताब में सहज मुखरित हुआ। यही कारण था कि उनकी यह कृति केवल बाल कविताओं का ही नहीं, बाल कवियों के अनुभवों और रचना प्रक्रिया का भी दस्तावेज बनी।
सेवकजी ने काव्य रचना सात-आठ साल की अवस्था में ही प्रारंभ कर दी थी। अपने अनुज परोपकार देव के साथ खेल-खेल में रचित उनकी तुकबंदी देखिए-मिर्चा, तेल, खटाई, इसको छोड़ो सब भाई। वैसे सेवकजी मूलतः प्रगतिवादी कवि थे। दुर्भाग्य कि उनके इस रूप की जितनी चर्चा होनी चाहिए थी, नहीं हुई। 1943 में प्रकाशित उनकी पुस्तक चिनगारी तत्कालीन समय में बहुत चर्चित रही थी। सेवकजी मंचों पर भी खूब जाते थे। उनकी कविता विहगकुमार इतनी लोकप्रिय थी कि सेवकजी ही विहग कुमार कहे जाने लगे थे। उनके प्रौढ़ कवि के रूप को जानने समझने के लिए वर्ष 2002 में बरेली से प्रकाशित 'संदर्श' के निरंकार देव सेवक विशेषांक को अवश्य देखना चहिए। सेवकजी का विवाह 1940 में हुआ लेकिन दंपति ने एक अनोखी प्रतिज्ञा की थी कि गुलाम देश में गुलाम संतान पैदा नहीं करेंगे। फलतः सेवकजी सहज ही दूसरों के बच्चों के प्रति आकर्षित हुए फिर उनके साथ खेल-खेल में कविताएँ लिखीं। इस बात की स्वीकारोक्ति सेवकजी ने स्वयं आत्मकथ्य में की है। उस दौर की उनकी एक कविता दृष्टव्य है-तेरे पापा हैं शरमाते, तुझको गोद नहीं ले पाते। पर मैं चाचा, क्यों शरमाऊँ, तुझको चाहे जहाँ घुमाऊँ। चल मैं तुझको पहनाऊँगा दो सौ गुब्बारों का हार। (बाल काव्य की अविरल यात्रा, सं. विनोद चंद्र पांडेय, पृ.35)
सेवकजी की पुस्तक मुन्ना के गीत में उन दिनों की अनेक कविताएँ संकलित हैं। उनकी कविता 'मुन्ना और दवाई' में प्रयुक्त शब्द आले तो शायद आज के बच्चे जानते भी न हों। बाल कौतूहल और कौतुक का अत्यंत मनोरम वर्णन इस कविता में है-मुन्ना ने आले पर रक्खी, शीसी तोड़ गिराई। हाथ पड़ा शीसी पर आधा, खींचा उसे पकड़कर। वहीं गिरी वह आले पर से, इधर उधर खड़‌बड़ कर। (महके सारी गली गली, 1996, पृ. 18)
उन्होंने लोरियाँ भी खूब लिखीं। यद्यपि वे मानते थे कि श्रेष्ठ लोरियाँ लिखने की सर्वाधिक क्षमता तो माताओं में ही होती है। उनकी एक लोरी का अंश प्रस्तुत है-मेरा मुना बड़ा सवाना, शाम हुए सो जाता है, ऊधम नहीं मचाता है। बिल्ली रानी, यहाँ न आना अब तुम शोर मचाने को, चूहे, वह बैठी है बिल्ली, तुझे पकड़ ले जाने को। मेरा मुना तुम दोनों के झगड़े से घबराता है, साँझ हुए सो जाता है।
ऐसे अभिभावक और शिक्षक जो बालकों के भावात्मक विकास के पक्षधर हैं, उनके लिए सेवकजी की कविताएँ सर्वोत्तम उपहार सरीखी है। सेवकजी बाल मन के मर्मज्ञ थे। बालसाहित्य के क्षेत्र में कुछ नया करने की चाह रखने बालों को तो उनकी कविताएँ अवश्य पढ़नी चाहिए। कविताएँ ही नहीं, सेवकजी के कथन भी बालसाहित्य के रचनाधर्मियों के लिए प्रकाश स्तंभ जैसे हैं।
शंभूप्रसाद श्रीवास्तव, व्यक्तित्व कृतित्व पुस्तक के पृ. 2 पर प्रकाशित अपने आलेख में वह कहते हैं-'बच्चों के लिए साहित्य की कसौटी यही है कि वह बच्चों द्वारा अपनाया जाए। केवल लेखक की आत्माभिव्यक्ति या आत्मतुष्टि के लिए वह नहीं होता।'
अपनी पुस्तक बालगीत साहित्य में उन्होंने बाल स्वभाव की सविस्तार चर्चा की है। डा. देवसरे द्वारा संपादित बाल साहित्य रचना और समीक्षा (1979) में प्रकाशित आलेख में भी वे कहते हैं-'बच्चे जिस दृष्टि से सूरज, चाँद तारों, आकाश, बादल.... को देखते हैं, बड़े उन्हें हजार बार देख चुकने के बाद भी उस दृष्टि से नहीं देख पाते। .... बाल स्वभाव के इस प्रकाश में यदि हम बालसाहित्य को देखें तो सोचना पड़ेगा कि जो बाल साहित्य हम बच्चों को देते हैं, उससे उन्हें कितना संतुष्ट कर पाते हैं।' (पृ. 54)
बाल साहित्य को लेकर निरंकार देव सेवक की इस लोकप्रिय परिभाषा के आलोक में सिद्धांतों की एक स्पष्ट तस्वीर उभरती है- "बाल साहित्य बच्चों के मनोभावों, जिज्ञासाओं और कल्पनाओं के अनुरूप हो, जो बच्चो का मनोरंजन कर सके और मनोरंजन भी वह जो स्वस्थ और स्वाभाविक हो, जो बच्चों को बड़ों जैसा बनाने के लिए नहीं, अपने अनुसार बनने में सहायक होने के लिए रचा गया हो।" (बाल साहित्य के प्रतिमान, पृ.12)
बच्चों के लिए वास्तविक लेखन तभी संभव है, जब रचनाकार के समक्ष सुस्पष्ट प्रतिमान हों। मासिक उत्तर प्रदेश के नवंबर 1987 अंक में प्राथमिक स्तर पर बालगीतों की उपयोगिता आलेख में सेवकजी ने कविता और गीत के अंतर को स्पष्ट करते हुए, गीत रचना के लिए आंतरिक अनुभूति को अनिवार्य तत्व माना था। उन्होंने लिखा था- 'गीत और कविता में आकाश पाताल का अंतर होता है। जिन बातों का अनुभव उन्हें (बच्चों को) वास्तव में नहीं होता, उनका भी अनुभव वह कल्पना में कर लेते हैं। किसी ऊँची गद्दीदार जगह पर बैठकर वह अनुभव करने लगते हैं कि हाथी की पीठ पर बैठकर कहीं जा रहे हों। बादलों में हाथी, घोड़े, भालू, खरगोश और महल बनते देख लेना उन्हीं का काम है।' (पृ. 5)
निःसंदेह सेवकजी का लेखन अनुभवसिद्ध लेखन था। बच्चों और बाल साहित्य को लेकर उनके मन में गहरी चिंता थी। अनेकानेक प्रयोगों से उन्होंने बाल साहित्य को समृद्ध किया। बाल साहित्य में नयी शैलियों का भी प्रवर्तन किया। बाल साहित्य जगत में बाल गजल लेखन का शुभारंभ भी उन्होंने ही किया। बाल गजल को परिभाषित करते हुए सेवकजी ने लिखा है- "गजल कोई नज्म नहीं होती, जो किसी एक विषय पर आदि से अंत तक लिखी जाए। गजल का प्रत्येक शेर एक दूसरे से सर्वथा अलग एक भाव लिए होता है और इस दृष्टि से सर्वथा पूर्ण होता है।' मानक बाल गजल के रूप में सेवकजी की यह रचना उदाहरणीय है- हमको लड्डू कचौड़ी गरम चाहिए और सोने को बिस्तर नरमे चाहिए/ पढ़ने लिखने को कहती तो है माँ, मगर/पहले कापी, किताबें, कलम चाहिए / एक चींटी के बच्चे ने मुझसे कहा-नन्हें मुनों पे करना रहम चाहिए / पापा बोले कि बेटा! बड़े अब हुए करना शैतानियां तुमको कम चाहिए। (अभ्यंतर,
अप्रैल 1991, पृ.14)
निरंकार देव सेवक बाल काव्य के युग पुरुष थे। एक से एक नगीने जड़े उन्होंने बाल साहित्य के मुकुट में। किशोर मानसिकता के बच्चे के मन की बात कहती उनकी यह बेजोड़ कविता देखिए-तुम बनो किताबों के कीड़े/हम खेल रहे मैदानों में/तुम घुसे रहो घर के अंदर / तुमको है
पंडित जी का डर हम सखा तितलियों के बन कर उड़ते फिरते उद्यानों में/ तुम रटो रात- दिन अँगरेजी/कह ए बी सी डी ई एफ जी/ हम तान मिलाते हैं कू कू/करती कोयल की तानों में (प्रतिनिधि बालगीत, 1994, सं. श्रीप्रसाद, पृ. 12)। इस कविता की रचना की कहानी भी अद्भुत है। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के टीचर्स टेनिंग कालेज में बी. टी. परीक्षा के दौरान वे इसे उत्तर पुस्तिका पर लिख रहे थे। परीक्षा भवन में काव्यरचना करते देख प्रिंसिपल मलकानी सर ने कहा था, "मैं तुम्हारी सारी कविता भुला दूँगा।" निःसंदेह सेवकजी में बाल काव्य सृजन का जैसे जुनून सा था और इसी के चलते वे बाल साहित्य के भीष्म पितामह बने।
टमाटर पर संवाद शैली में लिखा उनका एक बाल गीत अनुपमेय है। हिंदी में टमाटर पर तो वैसी प्रस्तुति दूसरी है ही नहीं। यह बच्चों की अंतरंग कविता है। बच्चा इसे चाहे गाये, गाकर झूमे और चाहे अभिनय के माध्यम से इसको जीवंत करे, उसके पास अवसर ही अवसर हैं-लाल टमाटर, लाल टमाटर/मैं तो तुमको खाऊँगा /अभी न खाओ, मैं कुछ दिन में/ और अधिक पक जाऊँगा/लाल टमाटर - लाल टमाटर/मुझको भूख लगी भारी/भूख लगी है तो तुम खा लो/ये गाजर मूली सारी/लाल टमाटर - लाल टमाटर / मुझको तो तुम भाते हो/जो तुमको भाता है भैया/ उसको तुम क्यों खाते हो? (बाल साहित्य सृजन और समीक्षा, पृ. 30)
यहां पर यह भी बताते चलें कि मैंने 2012 में प्रकाशित अपनी आलोचना पुस्तक 'बाल साहित्य सृजन और समीक्षा' श्रद्धेय सेवकजी को ही समर्पित की थी।
उनकी कविता 'अगर मगर' भी लाख टके की है। एकदम सहज विन्यास लेकिन आनुप्रासिक शब्दों के बहाने उसका चामत्कारिक वैभव देखते ही बनता है-अगर मगर दो भाई थे, लड़ते खूब लड़ाई थे। अगर मगर से छोटा था, मगर अगर से खोटा था। अगर मगर कुछ कहता था, मगर नहीं चुप रहता था। बोल बीच में पड़ता था, और अगर से लड़ता था। दोनों के झगड़े के बाद का दृश्य भी गजब का है-माँ यह सुनकर घबराई, बेलन ले बाहर आई! दोनों के दो-दो जड़कर, अलग दिए कर अगर-मगर।
खबरदार जो कभी लड़े, बंद करो यह सब झगड़े। एक ओर था अगर पड़ा, मगर दूसरी ओर खड़ा। (बालसखा, मई, 1946, पृ. 169) सेवकजी की बहुचर्चित रचनाओं में शिशुगीत 'हाथी राजा' तो विश्व के श्रेष्ठतम शिशुगीत की अग्रिम पंक्ति में रखा जा सकता है। बच्चो की जबान पर चढ़ने वाले ऐसे अमर गीत कभी-कभार ही जन्म लेते हैं- हाथी राजा, कहाँ चले? सूंड हिलाते कहाँ चले? पूँछ हिलाते कहाँ चले? मेरे घर आ जाओ ना, हलुआ-पूरी खाओ ना! आओ, बैठो कुर्सी पर,कुर्सी बोली चर चर चर
उनके शिशुगीत खासे मजेदार हैं।
कानावाती कुर्र या और नन्हीं चिड़िया की फुर्र जैसे। तितली पर उनकी कविता तो बहुचर्चित है ही, यह शिशुगीत भी लाजबाव है- मैं अपने घर से निकली, तभी एक पीली तितली। पीछे से आई उड़कर, बैठ गई मेरे सिर पर। तितली रानी बहुत भली, में क्या कोई फूल-कली ?
"ऐसे ही 'मच्छर का ब्याह' अत्यंत मनोरंजक शिशुगीत है। मक्खी का दो टूक उत्तर बरबस ही प्रफुल्लित करता है-मच्छर बोला ब्याह करूंगा, मैं तो मक्खी रानी से। मक्खी बोली-'जा-जा पहले, मुँह तो धो आ पानी से! व्याह करूँगी मैं बेटे से, धूमामल हलवाई के, जो दिन-रात मुझे खाने को, भर-भर थाल मिठाई दें।' रानी बिटिया भी निरंकार देव सेवक की विशिष्ट कविताओं में से है। बच्चों के लिए ही नहीं, बड़ों के लिए भी यह कविता जैसे चिंतन का नया आकाश खोलती प्रतीत होती है। रानी बिटिया दिल्ली, चंडीगढ़, जयपुर, रामेश्वर घूमते हुए जब घर लौटती है तो माँ को दिया गया उसका अप्रत्याशित उत्तर मन की पतों को छू-छू जाता है- माँ ने पूछा- 'रानी बिटिया ! कहाँ गई थी बाहर?' बिटिया बोली-'कहीं नहीं माँ, में भी घर के अंदर।' 'घर के अंदर ? रानी बिटिया, ऐसा झूठ सरासर ?' 'झूठ नहीं माँ! सच कहती हूँ, भारत है मेरा घर।' (प्रतिनिधि बालगीत, 1994, सं. श्रीप्रसाद, पू, 14)
विभिन्न पाठ्यक्रमों में उनकी सरस कविताएँ वर्षों से पढ़ाई जा रही हैं। चंदा मामा दूर के! कविता को तो हमने भी छुटपन में उछल-उछल गाया है, तारों की उपमा कपूर के दीपकों से, अंगूर के गुच्छों से और मोतीचूर के बिखरे लड्डुओं से करना तो जैसे सेवकजी के ही बस की बात थी -साथ लिए आए तारे, चमक रहे कितने सारे, राजमहल में जैसे जगमग, जलते दीप कपूर के ! चंदा मामा दूर के! दूर-दूर बिखरे तारे, लगते हैं कैसे प्यारे, गिरकर फैल गए हों जैसे, , लड्डू मोतीचूर के! चंदा मामा दूर के! 'दूर देश से आई तितली' कविता भी उत्तर प्रदेश के पाठ्यक्रम के बहाने न जाने कितने बच्चों का कंठहार रही दूर देश से आई तितली, चंचल पंख हिलाती, फूल-फूल पर, कली-कली पर इतराती-इठलाती ।
उनकी 'पैसा पास होता' कविता में गजब की कल्पनाशीलता है। तोते और घोड़े के बाद चूहे को चना खिलाने से संभावित परिणाम में कितना चुलबुलापन पैसा पास होता तो चार चने लाते, चार में से एक चना को खिलाते, चूहे को खिलाते तो दाँत टूट जाता, दाँत जाता तो बड़ा मजा आता!
बच्चों में निर्भयता के संस्कार जगाती उनकी एक अनूठी कविता नंदन के जून, 1988 अंक में पढ़ी थी- चींटी डरती नहीं कि हाथी, कुचल पाँव से देगा। जुगनू डरता नहीं कि कोई पकड़ हाथ में लेगा। चिड़ियाँ डरती नहीं कि पेड़ों से टकरा जाएगी। मछली डरती नहीं कि मोटी मछली खा जाएगी। तब फिर हम क्यों डरें किसी से, कुत्ता बंदर हो। चूहा, बिल्ली, बकरा बकरी, चाहें शेर बबर हो। (पृ.47) वास्तव में बच्चों को ऐसी ही प्रेरक कविताएँ दी जानी चाहिए।
सेवकजी ने किशोर मानसिकता की कविताएँ भी खूब रचीं। डॉ. रोहिताश्व अस्थाना द्वारा संपादित चुने हुए बालगीत में उनकी कविता में किशोरों के मन की सफल अभिव्यक्ति देखते ही बनती है- पंडित मोहनलाल तिवारी, हिंदी हमें पढ़ाते हैं। लेकिन वह सीधे शब्दों के, उलटे अर्थ बताते हैं।... मैं जब कहता इन शब्दों का, यह तो अर्थ नहीं होता। तब वह कहते तेरी क्या है, तू तो है रट्टू तोता।
(पृ.147)
सेवकजी की बहुतेरी कविताएँ कथात्मक शैली में हैं। उनकी एक कविता पर तो एक युवा रचनाकार ने अपने नाम से पूरी कहानी ही लिख दी थी। उसके प्रकाशित होने पर मैंने आपत्ति की थी कि इस कहानी के साथ मूल लेखक निरंकारदेव सेवकजी का भी उल्लेख होना चाहिए था। बहरहाल आप उस कविता की अलमस्ती देखिए, जहाँ दो चिड़ियों के रोचक बार्तालाप को चंचल छटाएँ हैं- बच्चा एक बहुत ही सुंदर, रहता है इस घर के अंदर ! मुझे बड़ा प्यारा लगता है, नाम न जाने उसका क्या है। मैं तो उससे ब्याह करूँगी, उसको टॉफी-बिस्कुट दूँगी! कहा दूसरी ने मुसका कर, 'यह घर अच्छा तो लगता है, पर। चिड़ियाँ कहीं ब्याह करती हैं, वह तो बच्चों से डरती हैं। तू यदि उससे ब्याह करेगी, पिंजड़े में बेमौत मरेगी।'
सेवकजी ने पद्य कथाएँ खूब लिखीं। उनकी गीत कथाएँ तो खासी चर्चित हुई। हाँ, उन्होंने जीकहानियाँ भी लिखीं। नंदन, अप्रैल, 1988 पू. 61 पर प्रकाशित उनकी कहानी उपवास किशोरोपयोगी है। अभिमानी श्वेतकेतु की रोचक कथा के बहाने किशोरों में अप्रत्यक्ष रूप से संस्कार जगाने की भी कोशिश है।
सेवकजी का संपर्क देश के विभिन्न प्रांतों के बाल साहित्यकारों से था। उन्होंने अनुवाद कार्य भी किया है। सुनिर्मल बसु की बंगला कविता का यह अनुवाद देखिए- बना रहे हैं दाल पकौड़ी तलकर चंदा मामा। पास गए खाने को हम सब, शंकर मोहन, श्यामा। बहुत कड़ा उनका मिजाज है मोढ़े पर बैठे हैं। देखो कैसा बना रहे मुँह मन ही मन ऐंठे हैं। (बाल साहित्य समीक्षा, जनवरी 1979) अलिखित बालगीतों पर लिखे अपने एक आलेख में उन्होने अलिखित बाल साहित्य के खजाने को खोजने का आवाहन किया है- 'आवश्यकता है कि हम उस अलिखित बाल साहित्य का उसी प्रकार संकलन कर अध्ययन करें जैसे हमने लोकगीत साहित्य का किया है। इसके बिना हमारा बालगीत साहित्य अधूरा ही रहेगा।' (त्रिविधा, 1994, बाल भवन, पृ. 57) इस दिशा में काम होना चाहिए।
सेवकजी के बालसाहित्य पर पी-एच.डी . उपाधि हेतु कुछ शोधकार्य भी हुए। यद्यपि यह संख्या अत्यल्प है। रुहेलखंड वि.वि. से डॉ. अवधेश कुमार शुक्ल ने 1987 में निरंकारदेव सेवक के काव्य का समीक्षात्मक अध्ययन, डॉ. नृपेंद्र कुमार ने 1994 में निरंकारदेव सेवक की बाल कविताओं का मनोवैज्ञानिक अध्ययन और आगरा वि. वि. से 2002 में डॉ. चिरौंजी लाल ने निरंकार देव सेवक के बाल साहित्य का समालोचनात्मक अध्ययन विषय पर शोधकार्य किया हैं। उन जैसे बालसाहित्य के सच्चे रचनाकार पर जमकर काम होना चाहिए। शोध निर्देशकों और शोधार्थियों का ध्यान इस ओर जाना चाहिए। ... और उन बालसाहित्यकारों का भी जो अपने निजी संबंधों के आधार पर बस अपने ही ऊपर शोध कार्य की फिराक में रहते हैं। सेवकजी समर्पित बालसाहित्य सेवक थे। बालसाहित्य के लिए जिये। पत्नी और पुत्र के निधन की त्रासदी झेलते हुए भी उन्होंने बाल साहित्य के समर्पण को कम नहीं होने दिया।

उनकी पुत्रवधू पूनम सेवक के पास उनसे जुड़े ढेरों किस्से हैं। समय रहते उन्हें सहेज लेना चाहिए। सेवकजी से मेरा पत्राचार रहा। उनके लिखे अनेक पोस्टकार्ड मेरी धरोहर हैं। 21 दिसंबर 1990 के उनके एक पत्र को प्रस्तुत करने का लोभ में संवरण नहीं कर पा रहा, जिसे मैं प्रायः अपने माथे पर रख लेता हूँ। तब ऐसा लगता है कि सेवकजी आशीर्वाद दे रहे हैं-
प्रिय छोटे भाई,
आपका उत्तर दो महीने बाद दे पा रहा हूँ। लिखने पढ़ने का काम बहुत है और अकेला मैं करने वाला हूँ।
आपने नया लिखना प्रारंभ किया है, खूब लिखें और खूब पढ़ें। पढ़ें वह जो वैचारिकता का विकास करने वाला हो। आप साहित्य के क्षेत्र में आगे बढ़ें, यही कामना करता हूँ।
सस्नेह, निरंकार देव सेवक
सेवकजी का एक और पत्र जो कानपुर से प्रकाशित होने वाली पत्रिका सामाजिक कल्याण संदेश के अक्टूबर 1990 अंक के पृ. 26 पर रामसिंहासन सहाय मधुर के देहांत पर लिखा गया था, भी इसलिए प्रस्तुत कर रहा हूँ, क्योंकि उसमें कहीं न कहीं सेवकजी की अंतर्व्यथा उजागर होती है। दृष्टव्य-यह जानकर बहुत दुख हुआ कि बलिया एक ऐसी गौरवमयी विभूति से वंचित हो गया जिस पर हिंदी बालसाहित्य जगत को गर्व था। यह हम हिंदी वालों की दरिद्रता ही है कि उनके जीवन काल में उनका समुचित सम्मान नहीं कर सके। राजनीति सामाजिक जीवन पर ऐसी छाई है कि साहित्यकार और बुद्धिजीवी सब पिछड़कर रह गए हैं। मधुरजी के पीछे अब अपने नंबर की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। स्वास्थ्य ठीक नहीं रहता। -निरंकार देव सेवक
सेवकजी के जन्म शताब्दी वर्ष पर उनकी चुनिंदा कविताएँ प्रकाश मनु के संपादन में आई हैं। बालवाटिका का विशेषांक आया है। अन्य पत्रिकाओं को भी यह
पुनीत कार्य करना चाहिए।
एक समय था जब बरेली में प्रतिवर्ष सेवक जी की स्मृति में राष्ट्रीय स्तर की संगोष्ठी होती थीं। मैं भी उनमें सम्मिलित हुआ हूँ। हम सब सेवकजी के घर पर ठहरते थे। डॉ. श्रीप्रसाद, डॉ. प्रतीक मिश्र, कृष्ण शलभ, सूर्यकुमार पांडेय, पूनम सेवक, निर्मला सिंह, फहीम करार इत्यादि और मैं (नागेश पांडेय संजय) कितनी बार सारी सारी रात जागकर कितना बतियाते थे। सेवक जी की बातो को याद कर भावुक होते हुए रो पड़ते थे। उन दिनों रुहेलखंड विश्वविद्यालय में निरंकारदेव सेवक शोधपीठ की स्थापना की माँग ने जोर पकड़ा था। तत्कालीन कुलपति और जिलाधिकारी महोदय ने आश्वस्त भी किया था लेकिन बात आगे नहीं बढ़ सकी।
विनोद चंद्र पांडेय द्वारा संपादित ग्रंथ 'बाल काव्य की अविरल यात्रा' में पृ. 41 पर प्रकाशित निरंकारदेव सेवकजी के आत्मकथ्य में प्रस्तुत उनकी अधूरी इच्छाएँ विगलित करती हैं। खासकर केंद्र सरकार द्वारा बाल साहित्य अकादमी की स्थापना की उनकी चाह पर विशेष रूप से काम होना चाहिए। यह उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी
डॉ. नागेश पांडेय संजय

रविवार, 29 अगस्त 2021

बच्चों के अमर कवि : द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी


 बच्चों के अमर कवि : द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

डॉ. नागेश पाण्डेय 'संजय'

'वीर तुम बढ़े चलो', 'जिसने सूरज चांद बनाया', 'हम सब सुमन एक उपवन के', 'लाया हूं जी मैं गुब्बारे' और 'इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है' जैसी न जाने कितनी अमर कविताओं के रचयिता द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी पाँच दशकों से भी अधिक समय तक  बाल साहित्य की सेवा में निरंतर संलग्न रहे। उन्होने वह लिखा, जैसा कोई नहीं लिख सका। उनकी कोई भी रचना हो, बच्चे उसे पढ़कर भाव-विभोर हो जाते हैं। चहक उठते हैं। थिरक उठते हैं। सच, वे सही मायनों में बच्चों के अपने कवि थे।

उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के रोहता गाँव में श्री प्रेमसुख के घर में १ दिसम्बर १९१६ को उनका जन्म हुआ। भारत और लंदन में शिक्षा ग्रहण करने के उपरान्त उन्होंने जीविका के लिए शिक्षा का क्षेत्र चुना और शिक्षक, शिक्षा प्रसार अधिकारी, पाठ्य पुस्तक अधिकारी, उप शिक्षा निदेशक जैसे महत्वपूर्ण पदों के माध्यम से अपनी सेवाएँ अर्पित की। सेवा निवृति के पश्चात वे साक्षरता निकेतन के निदेशक के रूप में अपना अवदान देते रहे। 

माहेश्वरी जी ने बड़ों के लिए लिखना प्रारम्भ किया था।  उनका पहला काव्य संग्रह 'दीपक' १९४६ में छपा था। इसके बाद उन्हे आभास हुआ कि बच्चों के लिए स्तरीय साहित्य का अभाव है तो उन्होंने बाल साहित्य सृजन को प्रमुखता से अपना लिया | यह जानते हुए भी कि इस क्षेत्र में न तो प्रतिष्ठा मे है और न पुरस्कार। उन दिनों बाल साहित्य में समीक्षा का कार्य न के बराबर था। बच्चों के लिए उनका पहला कविता संग्रह १९४७ में आया।

 'कातो और गाओ'नामक इस कृति के पश्चात उनकी ढेरो पुस्तक प्रकाश में आईं। ये पुस्तकें हैं :  लहरें (१९५२), बढ़े चलो, अपने काम से काम, बुद्धि बड़ी या बल, माखन-मिसरी (सभी १९५९), हाथी घोड़ा पालकी, सोने की कुल्हाड़ी (दोनों १९६३), 'अंजन (१९६४), सोच समझ कर दोस्ती करो (१९६५), सूरज सा चमकूं मैं, हम सब सुमन एक उपवन के (दोनों १९७०), सतरंगा पुल ( १९७३), गुब्बारे प्यारे (१९७४), हाथी आया झूम के, बाल गीतायन ( १९७५), सीढ़ी-सीढ़ी चढ़ते है (१९७६), हम है सूरज चाँद सितारे, जल्दी सोना, जल्दी जगना, मेरा वंदन है (१९८१), कुशल मछुआरा, नीम और गि लहरी (१९८४), चांदी की डोरी, ना मौसी ना, चरखे और चूहे ( १९९०) ।

द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी रचनावली" के खण्ड दो और तीन में उपरोक्त पुस्तकों की कविताएं संग्रहीत हैं। यह ग्रन्थ ४ फरवरी १९९७ को तत्कालीन राष्ट्रपति डा० शंकरदयाल शर्मा को भेंट किया गया था। माहेश्वरी जी ने बच्चों के लिए कहानियाँ भी लिखीं और नवसाक्षरों के लिए कविताएं भी। उनकी तीन कथा पुस्तकें छपीं-श्रम के सुमन ( १९७१), बाल रामायण ( १९८१), शेर भी डर गया (१९९२) नवसाक्षरों के लिए उनकी पुस्तके हैं :  एक रहें, नेक रहें ( १९८९), घर की उजियारी, नई कलम, नए कदम ( १९९१) लोकतन्त्र है यही (१९९२), भारत प्यारा देश हमारा (१९९३)

  "बालगीतायन" कृति के लिए उन्हें वर्ष १९७७ में बाल साहित्य का सर्वोच्च पुरस्कार मिला था। तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उन्हें सम्मान राशि और ताम्रपत्र प्रदान किया था। शायद ही कोई ऐसी संस्था हो, जो बाल साहित्य के विकास में संलग्न हो और उसने माहेश्वरी जी को सम्मानित करने का गौरव न प्राप्त किया हो।

८६ वर्ष की अवस्था में भी उनकी साहित्यिक सक्रियता देखते ही बनती थी। अन्तिम समय तक उनकी रचनाएँ पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहीं। यहीं नहीं साहित्यिक समारोहों में भी उनकी सक्रियता जीवन के अंत तक बनी रही। मृत्यु से एक घण्टा पूर्व उन्होंने एक साहित्यिक संगोष्ठी में कविता पाठ किया था। बाथरूम में फिसलकर गिरने से उन्हें ब्रेन हेमरेज हो गया था।

वे स्वभाव के बड़े सरल थे। बड़ा स्नेह देते थे। अपने लेखन के प्रारम्भिक काल से ही मेरा उनसे जुड़ाव हो गया था। वे हर पत्र का बड़ा आत्मीय उत्तर देते थे। २३-४-९१ को उन्होंने लिखा था "बस लिखते रहिए | रचनाएँ न भी छपें तो दुखी न होइये। मैंने यही मार्ग अपनाया था। सरकारी सेवा के अनेक बंधन भी थे।"

मेरी पहली बाल कथा पुस्तक 'नेहा ने माफी मांगी' प्रेस में जाने को थी। उन्होंने ११-९-९३ के पत्र द्वारा पुस्तक के लिए आशीर्वाद पंक्तियाँ लिख भेजीं। खूब प्रोत्साहित भी किया "तुम्हारी उम्र के एक बीस वर्षीय युवक के लिए लेखन की प्रेरणा की दृष्टि से यह बहुत ही सराहनीय उपलब्धि है। बहुत कम ही को यह सौभाग्य मिल पाता है।"

नेहा ने माफी मांगी" पुस्तक पर उन्होंने समीक्षा भी लिखी थी । इसे यू० यस० यम० पत्रिका (गाजियाबाद) और अभिषेक श्री' ( इलाहाबाद) ने अपने बाल साहित्य विशेषांकों में प्रकाशित किया।

माहेश्वरी जी से मेरी पहली और आखिरी भेंट कानपुर में हुई। सहसा विश्वास नहीं हुआ था कि बाल साहित्य के आधार स्तंभ माहेश्वरी जी यही हैं। अत्यंत स्नेही और सादगी से परिपूर्ण। कानपुर के  बी० एन० एस० डी० शिक्षा निकेतन के अखिल भारतीय बाल साहित्य रचनाकार सम्मेलन में उन्होंने मेरी पुस्तक 'आधुनिक बाल कहानियाँ' का विमोचन किया। मेरे लिए यह जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि है। 

दूसरी बार कानपुर के आयोजन में मैं दूसरे दिन विलम्ब से पहुँचा। इसीलिए उनसे मिलना न हो सका।  वे श्री शम्भूनाथ टण्डन के यहाँ थे। ९ बजे उनकी ट्रेन थी। राष्ट्रबन्धु जी, सम्पादक' बालसाहित्य समीक्षा' के घर से उनसे फोन से ही बात कर पाया। मिलने के लिए समय शेष न था। आज वह दुर्भाग्य मन को कचोटता है।

हमने खुटार में बाल साहित्य प्रसार संस्थान की स्थापना की तो उन्होंने परामर्शदाता के रूप में अपनी सहर्ष स्वीकृति भेजी। उन्होंने ११-२-९७ के पत्र में किया "अच्छे बाल साहित्य के सृजन, संवर्धन और प्रसार की आज जितनी महती आवश्यकता है, उतनी पहले नहीं थी। मेरा संपूर्ण सहयोग आपके साथ रहेगा।" वे बराबर प्रोत्साहन देते रहे। उन्होंने कभी किसी आयोजन में शाहजहाँपुर जाने का भी आश्वासन दिया था।

दिनांक ५-२-९८ को उन्होंने लिखा था मेरा स्वास्थ्य ऐसे ही चल रहा है। ८२ में तो आ ही गया। देखो....... ..उनसे पत्राचार निरन्तर रहा किन्तु ऐसा पत्र उन्होंने पहली बार लिखा था। इस 'देखो' ने मेरे मन को भीतर तक हिला दिया। मैंने उनके दीर्घायु जीवन की कामना की। 

जीवन के 'सत्य' को स्वीकारना पड़ता है लेकिन बालसाहित्य अभी इसके लिए तैयार नहीं था। उनसे बड़ी अपेक्षाएँ थीं। वे विशाल वट वृक्ष थे। न जाने कितने पौध-पात उनकी छाया में पल्लवित हो रहे थे ।

२९ अगस्त १९९८ को वे चले गए। मृत्यु से दो घण्टे पूर्व उन्होंने आत्मकथा "सीधी राह चलता रहा" पूर्ण की थी। 

उनके अनायास इस तरह चले जाने की किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। उनके अभाव की क्षति बहुत गहरी है। इसकी पूर्ति कभी नहीं हो सकती। उनकी प्रेरणा और उनकी रचनाएँ बालसाहित्य के लिए सदैव सम्बल बनी रहेंगी। 

उनकी स्मृति को शत-शत नमन!

(आलेख : 'बच्चों के अमर कवि द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी', बाल साहित्य समीक्षा, मासिक के मई 2000 अंक में पृ.27 पर प्रकाशित हुआ था।)



शनिवार, 26 जून 2021

आलेख : रामानुज त्रिपाठी: अनूठे अंदाज के बाल कवि -डा. नागेश पांडेय संजय

 
रामानुज त्रिपाठी: अनूठे अंदाज के बाल कवि  

आलेख : डा. नागेश पांडेय संजय   

रामानुज त्रिपाठी बाल साहित्य के मौन साधक थे किंतु उनकी साधना मुखर थी। जब तक रहे, बाल साहित्य में छाए रहे। पत्र-पत्रिकाओं में धुआंधार छपे। नवें दशक की पत्रिकाओं को उठाइए, आपको कई पत्र-पत्रिकाओं के एक-एक अंक में उनकी दो-दो कविताएं तक पढ़ने को मिलेंगी। बहुत लिखते थे। बहुत अच्छा लिखते थे। अच्छा क्या लिखते थे, वे तो एक लकीर बनाते जा रहे थे। एक पथ आलोकित कर रहे थे जिस पर चलने का प्रयास यद्यपिआगे चलकर बहुतों ने किया लेकिन वैसी सफलता किसी को न मिली। उन्होंने बाल कविता को नई आभा दी। एक अलग रंग-ढंग और तरंग की कविताएं उन्होंने रचीं। कहें कि बाल कविता को नई रवानी दी। नया शिल्प दिया। नयी रूपाकृति दी। नवगीत विधान में कम ही लोग हैं जो बाल साहित्य को कुछ परोस पाए और त्रिपाठी जी तो इस विधा के जैसे मास्टर थे। कविता को गढ़ने का उनका अंदाज अनूठा था। सामान्य विषय पर असामान्य ढंग की कविता लिखने में उनको बड़ी सफलता मिली। विषय की बात करें तो वे बहुधा सामयिक ही होते थे, जैसे कैलेंडर देख के वे बिल्कुल मुस्तैद रहते हों कि हां, अब रक्षाबंधन है, अब बसंत है। अब जाड़े पर-गरमी पर-बरसात पर लिखना है। लिखना क्या है, माल तैयार करना है। किसी हलवाई की तरह त्रिपाठी जी को ग्राहक के स्वाद की परख थी। या मौसम की मांग वे जानते थे तो ये लीजिए मालपुए। ये लीजिए बालूशाही। ये लीजिए गुझियां। ये लीजिए गाजर का हलवा और हां, ये उनकी रसभीनी कविताएं स्वाद में बेजोड़ होती थीं। यही कारण था कि हर दूकान पर ...माफ कीजिए, पत्र-पत्रिकाओं में उनकी कविताएं सजी-धजी मिलती थीं। वे संपादकों के चहेते थे। न कोई जान, न पहचान, न जुगाड। पर वे छा गए थे। ...और इसलिए छा गए थे कि वे बाल मन को भा गए थे। लुभा गए थे। बतरस लालच लाल की मुरली धरी लुकाइ की तर्ज पर उन दिनों बच्चे पत्रिकाओं को छुपा कर रखते थे कि पहले-पहल पत्रिका की सामग्री का आनंद उनको ही लेना है। 

मैं बहुधा सोचता हूं कि यदि पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित रचनाओं के आधार पर भी हिंदी बाल साहित्य में पुरस्कार-सम्मान की परंपरा होती तो कदाचित् रामानुज त्रिपाठी जी के खाते में ढेरों पुरस्कार होते। अफसोस...उनकी ओर संस्थाओं का ध्यान नहीं गया। जाता भी कैसे क्योंकि वे किताब छपवाने के गणित से पूरी तरह अनभिज्ञ थे। और हिंदी बाल साहित्य के क्षेत्र में पुरस्कार पाने की पहली सीढ़ी पुस्तक है। पुस्तक लकदक हो तो सोने पर सुहागा या कहें कि पुरस्कार की पक्की गारंटी। भले ही अंदर कूड़ा हो लेकिन भारी-भरकम बायोडाटा और किताब के नाम पर जाने कितने बाल साहित्य के सर्वोच्च सम्मान हथिया ले गए। भारती से उनकी आरती उतारी गई। और आज भी बाल साहित्य के जिज्ञासु यह जानने को आकुल-व्याकुल हैं कि अमुक सम्मानित का बाल साहित्य में योगदान क्या था? मगर रामानुज त्रिपाठी जैसे मौन आराधकों की ओर संस्थाओं का ध्यान नहीं गया। डा. राष्ट्रबंधु जी का नमन जिन्होंने 1995 में संस्था भारतीय बाल कल्याण संस्थान की ओर से उन्हें सम्मानित कर जैसे अपनी संस्था को ही सम्मानित किया। उनके इस सुनिर्णय के प्रति मैं स्वयं को कृतज्ञ अनुभव करता हूं और आभारी भी कि इसी बहाने उनसे प्रथम भेंट भी मयस्सर  हुई। 1995 में जिन नौ बालसाहित्यकारों का सम्मान हुआ था उनमें त्रिपाठी जी के साथ मैं भी था। संयोग कि हम लोग ठहरे भी एक साथ और उनकी सादगी के चलते उनसे ऐसी गहरी छनी कि साथ-साथ खूब घूमें। इस बहाने उनको बहुत करीब से जानने का अवसर भी मिला। उनकी स्थिति-परिस्थिति से भी अवगत हुआ।   


लगता है जैसे कल की ही बात हो लेकिन नहीं, दो दशक से ऊपर हो चुके हैं। कानपुर में 29 जुलाई 1995 को कृष्णविनायक फड़के जयंती समारोह था। कितने दिग्गज उसमें पधारे थे। डा. देवसरे, शकुंतला सिरोठिया, सरोजिनी कुलश्रेष्ठ, अनंत कुशवाहा, रामवचन सिंह आनंद, पद्मश्री लक्ष्मीनारायण दुबे, पद्मश्री श्याम सिंह शशि और यही नहीं डा. मुरलीमनोहर जोशी (बाद में गृह मंत्री, भारत सरकार) भी उस आयोजन में सहज उपस्थित थे। जोशी जी ने बच्चों के लिए अलग से बाल मंत्रालय की मांग रखी थी और समाचारपत्रों ने इसे मेन हेडिंग बनाया था। तीन दिन के इस समारोह में पहली बार मैं रामानुज त्रिपाठी जी से मिला था। कानपुर के वैशाली होटल में हम दोनों एक साथ ही ठहरे थे। देर रात में उनका जब आगमन हुआ तो मैं गहरी नींद में था। आंखे मिचमिचाते दरवाजा खोला तो धोती-कुर्ता पहने एक लंबी श्यामवर्ण काया सामने थी। ...मैं रामानुज त्रिपाठी, सुल्तानपुर से। 

मैं विस्मय से भर उठा और तपाक से बोला-जी, और मैं रामानुजानुज, शाहजहांपुर से।

अच्छा। अच्छा नागेश जी। और त्रिपाठी जी ने मुझे गले से लगा लिया था। 

उनसे मेरा पत्राचार था। मैंने एक बार स्वयं को भवदीय में रामानुजानुज (रामानुज का अनुज) क्या लिखा कि फिर तो यह सहज संबोधन हमारे पत्राचार का अंग हो गया था। 

तो हम तीन दिन साथ रहे। आयोजन कई जगह पर थे तो हम लोग जाते भी एक साथ। मजेदार किस्सा बताऊँ कि इसी यात्रा में उनकी अटैची एक रिक्शेवाले ने पार कर दी थी। हम दोनों एक ही रिक्शे पर थे। जब बेनाझाबर पहुंचे तो आगे वाले रिक्शे पर बैठे वयोवृद्ध रामस्वरूप दुबे जी को उतारने के लिए मैं आगे बढ़ गया। बेचारे त्रिपाठी जी भी सहयोग के लिए पीछे-पीछे आ गए और इतनी देर में रिक्शा वाला चंपत। अटैची गायब। मैंने जब ये बात राष्ट्रबंधु जी को बताई तो उन्होंने नई अटैची और उसमें रखा सारा नया सामान मंगवाया। जब साहित्यकारों का सम्मान हुआ तो त्रिपाठी जी को साथ में नयी अटैची भी दी गई। 

कई मित्रों ने बाद में उनसे मजाक भी किया था-त्रिपाठी जी, ऐसा पता होता तो हम तो अपना सामान जानबूझकर गायब करा देते।खैर... इस भेंट के बहाने हमारी आत्मीयता और प्रगाढ़ हो गई। उन दिनों फोन का चलन तो था नहीं। तब आज की तरह मेल और फेसबुक भी नहीं थे। केवल डाक या बुकस्टाल का ही सहारा था। मेरी न जाने कितनी अनुपलब्ध रचनाएं त्रिपाठी जी ने मुझे डाक से भिजवाई। मैं निःसंकोच उनसे आग्रह कर लेता था। इसलिए भी कि उनके कालेज के पुस्तकालय में कई पत्रिकाएं आती थीं। एक बार साप्ताहिक हिंदुस्तान में मेरा बालगीत दादी अम्मा छपा। पेमेंट तो आ गया, पर प्रति न मिली। भला ये कैसे गंवारा होता। मैंने उन्हें याद किया और फिर ये देखिए 1 नवंबर 1992 का उनका पत्रोत्तर-  

भैया संजय जी, आपका पत्र मिला था। आपने अपनी कविता से संबंधित साप्ताहिक हिंदुस्तान का अंक मुझे सुरक्षित रख लेने और वह अंक मुझसे ही प्राप्त करने का निर्देश दिया था। साप्ताहिक हिंदुस्तान मेरे कालेज के वाचनालय में नियमित आता है। यदि वह अंक न मिला हो ओर उसे चाहते हों तो मुझे अविलंब सूचित करें। यदि अंक मिल गया हो तो मैं उसे पुनः वाचनालय में वापस कर दूं। यथाआवष्यक समझिएगा लिखिएगा। 

इधर बाल भारती के अक्टूबर अंक में भी आपका एक गीत दीवाली षीर्षक से छपा है। उसी पृष्ठ पर मेरा भी आई है दीवाली षीर्षक गीत प्रकाषित हुआ है किंतु मेरे गीत में छपाई की त्रुटि है। जाने क्यों बाल भारती में हर बार कुछ न कुछ गलत ही छपता है, जिससे रचना में अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं। सस्नेह, रामानुज

तो आप देखिए कि किस तरह से पत्राचार के बहाने पर बाल साहित्य की दषा-दिषा पर भी विमर्ष चलता रहता था। बाल साहित्य के प्रति उनके मन में चिंता थी। मैंने जब राष्ट्रीय सहारा में बाल साहित्य स्तरीय परख की जरूरत विषय पर एक परिचर्चा आयोजित की तो तत्कालीन दिग्गज बाल साहित्यकारों के साथ-साथ उनके भी विचार आमंत्रित किए। 12 दिसंबर 1994 को इस परिचर्चा में प्रकाषित उनके विचार द्रष्टव्य हैं -हम बच्चों को कविताओं के नाम पर बे सिर पैर की तुकबन्दियाँ परोस रहे हैं। उत्कृष्ट बाल साहित्य का अकाल सा पड़ रहा है और लेखन में मौलिकता  में कमी आई है।

अभिभावक भी बच्चों को साधन सम्पन्न बनाने की सनक में शीघ्र अधिकाधिक ज्ञान सम्पन्न कम्प्यूटर बनाना चाहता है। स्कूली शिक्षा बच्चों पर पुस्तकों का भारी बोझ लादकर उन्हें अनेक स्तर से अधिक ऊँची प्रतियोगिताओं में झोंक रही है, फलतः सांस्कृतिक तृप्ति देने वाले साहित्य से बच्चा परे रह जाता है।

बाल साहित्य की समस्त विधाओं में सृजन स्तर पर संप्रति बाल मनोवृत्ति की स्तरीय परख की जरूरत है, उसके अभाव में बाल साहित्य कभी तृप्ति देने वाला नही होगा।

मैंने इस परिचर्चा से प्राप्त पारिश्रमिक सभी बाल साहित्यकारों को समान रूप से भेजने के लिए प्रारंभ में ही निवेदन कर दिया था। त्रिपाठी जी को यह स्वीकार न था, केवल इसलिए कि वे मुझे अपने अनुज की भांति देखते थे। इस संदर्भ में उनका 22 दिसंबर 1994 का यह अपनत्व उड़ेलता पत्र मैं कभी भुला नहीं सकता-

 प्रिय भाई

आपका स्नेह पत्र मिला। आभार। 12 दिसंबर का राष्ट्रीय सहारा यहां तलाषने पर मुझे मिल गया। आपकी प्रस्तुति अच्छी और स्तरीय है। तदर्थ मेरी ओर से बधाई स्वीकारें। चक्रधर नलिन जी गत 22 नवंबर को मेरे घर आए थे। तो आपकी सहारा हेतु परिचर्चा पर उनसे चर्चा हुई थी। 

आपने परिचर्चा के प्रति मिलने वाले पारिश्रमिक में से उचित अंष जो मेरे लिए भेजने को लिखा, यह मुझे अच्छा न लगा। आप मेरे लघु भ्राता हैं-अतः इसी बहाने अपने लिए कुछ टाफी, बिस्कुट, खिलौने और गुब्बारे खरीद लें। इसी में मुझे अतिषय प्रसन्नता मिलेगी। इत्यलं।

सस्नेह, रामानुज

रामानुज जी के पास भाषा की अपार सामर्थ्य थी और गुणग्राहकता भी। उनके पत्रों को मैं धरोहर मानकर अपने संग्रह में सजाए हूं। किसी छोटे को भी बड़प्पन का अहसास देने का प्रोत्साहनमयी ऐसा व्यवहार दुर्लभ है। उनके पत्र भी किसी साहित्य से कम न होते थे। देखिए 30 मई 1995 का उनका एक पत्र-

भाई संजय जी 

स्नेह पत्र मिला। आप द्वारा प्रदत्त स्नेह, सौहार्द, दाक्षिण्य, कृतज्ञता और आत्मीयता का पंचरत्न निरंतर संभाल कर रखता जा रहा हूं ताकि इतिहास पुरुष भामाषाह की तरह कदाचित प्रयोजन पर बहुजन हिताय वितरित कर सकूं। 

बाल कविता को नया षिल्प और नया कलेवर प्रदान करने में उनकी वरेण्य भूमिका है। नवगीत षैली  में रचित उनकी कविताएं अपनी सहजता के चलते मन छूती हैं। रोचकता का नया ताना बाना प्रभावित करता है। शब्द भंडार के चलते विन्यास में स्वाभाविकता स्वतः आती जाती है। ...और फिर एक षिक्षक होने के नाते कुछ न कुछ सीख भी गाहे बगाहे वे दे ही डालते हैं।  

उपमाओं से रची-पगी रक्षा बंधन पर लिखी उनकी यह कविता मैं कभी नहीं भूलता-

स्नेह की धरती

ममता का 

आकाश है रक्षाबंधन। 

रक्षाबंधन केवल 

राखी का त्योहार 

नहीं है,

कुछ धागों में ही 

बंध जाने 

का व्यवहार 

नहीं है।

भाई बहन के रिश्ते

का इतिहास है रक्षाबंधन।

अब आप खुद ही देखिए, कि किस सजीले अंदाज में बातों ही बातों में वे एक परिभाषा भी गढ़ गए और त्योहार के सांस्कृतिक वैभव को बिना किसी आरोपण के सहज रूप से बाल मन पर आच्छादित कर दिया। यही खूबी उन्हें बाल कवियों की भीड़ से अलग एक महनीय स्थान प्रदान करती है। 

वर्षा के नयनाभिराम परिदृष्य को जैसे आंखों के समक्ष उतारती उनकी यह कविता भी अनोखी है, जिसमें एक नयी शुरुआत को अभिव्यक्त करने की अभिव्यक्ति देखते ही बनती है- 

आए बादल 

बरसा पानी।

कभी दिवस में

कभी निशा में 

उमड़ घुमड़ कर

 दिषा दिशा में 

घिर घिर आई 

घटा सुहानी।

मेंढक झिल्ली 

झींगुर वाली

एक राग 

एक सुर वाली

षुरू हो गई

 राम कहानी।

प्राकृतिक चित्रण को लेकर उनकी कहन क्षमता का मैं मुरीद रहा। नवगीत से इतर उनके दोहे भी क्या खूब बन पड़े हैं। सर्दी पर कुछ बेहतरीन दोहों का आनंद आप भी लीजिए-

घिर आया कुहरा घना,

खूब पड़ रही ठंड।

सूरज का भी हो गया,

शायद चूर घमंड।

फैल गया है चौतरफ, 

जाड़े का आतंक। 

ठंडा पानी हो गया, 

ज्यों बिच्छू का डंक। 

तन है थर थर कांपता,

किट किट करते दांत।

ओढ़ रजाई कट रही है,

जाड़े की रात।

ऐसे ही बसंत पर उनकी यह नवगीत षैली की रचना भी उनकी कुशल अभिव्यक्ति को ही सुप्रस्तुत करती है।  

फूलों में 

रंग इठलाया

बसंत आया।

घर आंगन उठीं किलकारियां

पीने लगीं रंग पिचकारियां

हाथों में

गुलाल मुसकाया

बसंत आया।

कुंकुम अबीर मले बिन

बीतें न ए रस भरे दिन

मन में फिर नया मोद छाया

बसंत आया।


उनकी कविताएं नयी ताजगी से सराबोर हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि शब्द शब्द नाच रहे हों। ऐसी लयात्मकता कदाचित् अन्यत्र दुर्लभ है। कारण यह भी कि छोटे-छोटे षब्दों को उचित यति-गति के साथ जैसे किसी फ्रेम में जड़ने का हुनर या कहें कि जादुई कला उनके पास थी। 

चिड़िया जैसे पुराने विषय पर सहसा उनकी दो कविताएं मुझे याद आ रही हैं। इनका भाषाई चमत्कार देखते ही बनता है-  

पेंड़ो की हर

डाल डाल पर

नाच रहीं चिड़ियां ।

नए नए कोमल 

किसलय पर 

नए राग नव 

सुर नव लय पर 

थिरक थिरक कर 

नए ताल पर 

नाच रहीं चिड़ियां ।

छोड़ टहनियां 

पुष्प दलों की 

लह लह 

लहराती फसलों की 

हरी सुनहरी 

बाल बाल पर 

नाच रहीं चिड़ियां ।

दूसरी कविता आशावाद की प्रतिच्छाया है जो बाल मन में वविश्वास और आस के अंकुर उपजाती है और वह भी प्रतीकात्मक रूप से एक भोली चिड़िया के माध्यम से-

मत होना तुम भोली चिड़िया 

अपने मन में कभी उदास।

चुगने को हैं पंख तुम्हारे

दो पंजे हैं प्यारे प्यारे

उड़ने को हैं रंग बिरंगे 

सुंदर पंख तुम्हारे पास।

तेरी है ये सारी धरती

चुगकर जहां पेट तुम भरती

और फुदकने को है विस्तृत 

तेरे लिए खुला आकाश।

हरे भरे पेड़ जंगल के 

झूम झूम के मचल मचल के 

बुला रहे हैं तुमको देखो

अपने फल में भरे मिठास।


कह सकते हैं कि उन्हें कविता की गहरी समझ थी। कवि ही नहीं, आचार्य भी थे मान्यवर। काष! कि उनकी यत्र-तत्र बिखरी निखरी कविताओं का संचयन हो तो बाल कविता के एक अद्भुत लोक में विहार करने और उसको समझने का आनंद बहुतों को प्राप्त हो सकेगा।

कविताओं में रोचकता के लिए उनके प्रयोग भी अनूठे थे। जैसे एक स्थान पर उन्होंने मच्छर के डंक की तुलना सूंड़ से की है। इससे हास्य की सृष्टि तो हुई ही, साथ ही एक विस्मयकारी आनंद की भी वृष्टि होती है। बालमन उत्फुल्ल होकर उमगता है। विस्मित होता है और कहीं न कहीं एक काल्पनिक संसार में जाकर नई परिकल्पनाओं के निर्माण में भी समर्थ होने की ओर अग्रसर होता है। ...अरे! मच्छर की सूंड़...यह अद्भुत कल्पना तो बड़ों के भी कान खड़े कर देती है-

मच्छर मामा डटे हुए हैं 

लेकर अपनी एक जमात

भली नहीं गरमी की रात।

तन ढकने में चूक अगर हो 

हाथ पैर मुंह जब बाहर हो

सूंड़ चुभोकर खून चूस लें 

मिलकर खूब लगाएं घात।

कविताएं बहुतेरी हैं जिनकी चर्चा विस्तार भय से यहां संभव नहीं। उन पर अलग से अनुशीलन अपेक्षित है। अनुसंधान अपेक्षित है। फिर एक लीक निश्चय ही निर्मित होगी जिस पर चलकर बाल साहित्य के राजपथ पर पहुंचा जा समता है। 

अभी तो यही कहूंगा। बार-बार कहूंगा कि रामानुज त्रिपाठी जी को उनका प्राप्य नहीं मिला। जिस सम्मान के वे सुपात्र थे, वह उनको मिले तो यह उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी और बाल साहित्य के लिए भी इससे बेहतर और सम्मानजनक बात हो नहीं सकती। 

(यह आलेख 'बाल वाटिका' मासिक, अक्तूबर 2016 अंक में पृष्ठ 51 पर प्रकाशित हुआ था।)



मंगलवार, 22 जून 2021

संस्मरणात्मक आलेख : 'बाल कविताओं के समंदर' के कुशल गोताखोर कृष्ण शलभ -डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

कृष्ण शलभ जी के साथ डॉ. नागेश
पकड़ सको तो पकड़ो, मेरे लगे हवा के पर...
'बाल कविताओं के समंदर' के कुशल गोताखोर कृष्ण शलभ
आलेख- डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
    दिखा अँगूठा, बोला मुन्ना टिली लिली झर। पकड़ सको तो पकड़ो, मेरे लगे हवा के पर।
कृष्ण शलभ जी की यह बेजोड़ कविता  मुझे चिढाती सी लग रही है। हवा के पंख लगाकर वे उड़ गए। हमारी पकड़ से बाहर बहुत दूर चले गए। बहुत ही दूर..., जहाँ से वे क्या, कोई भी नहीं लौटता। 
ज्यादा दिन तो नहीं हुए। जैसे कल ही की बात लगती है। हम लोग साहित्य अकादमी, नई दिल्ली की ओर से बाल साहित्य कार्यशाला (21-22 जून, 2017) में भाग लेने राजसमन्द गए थे। दिल्ली से  सभी के टिकिट एक साथ थे। सहारनपुर से मेरे लिए खाना लेकर आए थे। वापसी का टिकिट भी साथ था लेकिन गुर्जर आंदोलन के चलते हमारी ट्रेन कैंसिल हो गयी। एक ही कार से से हम लोग स्टेशन की ओर जा रहे थे। आदतन मैंने ट्रेन चेक की तो पता चला कि कैंसिल। उनसे सटकर ही तो बैठा था। साथ में उनकी पत्नी हेम जी भी थी। बाल साहित्य के ऐसे बहुत कम आयोजन मुझे याद आते हैं, जिनमें वे अकेले गए हों। यह जोड़ी अटूट थी जो टूट गई। हम लोग उनके बिछोह को दिल से महसूस रहे हैं तो पत्नी के कलेजे पर क्या बीत रही होगी, इसकी तो कल्पना ही की जा सकती है।
जब उनसे बीच राह में विदा ली थी तो सपने में भी न सोचा था कि यह हमारी अंतिम भेंट है। यों राजसमन्द में उनके साथ घूमते फिरते जाने कब उनके मुख से निकल गया था कि जिंदगी का क्या भरोसा।
राजस्थान में अंतिम भेंट 
मैंने बेहिचक कहा था नहीं, अभी तो आप को 1000 शिशुगीतों का काम पूरा करना है और उनके चेहरे पर चमक आ गयी थी। बड़ी तन्मयता से वे इस काम में लगे थे। ठीक वैसे ही, जैसे बचपन एक समंदर ग्रन्थ का भागीरथी प्रयत्न उन्होंने किया था। भगीरथ जी पूर्वजों के उद्धार हेतु गंगा उतारकर लाए थे और शलभ जी तो जैसे बाल साहित्य के उद्धार हेतु सागर ही उतार लाए। सच, उनके इस बड़े काम के बाद छाती चौड़ी हो गयी थी। हम गर्व से इस ग्रन्थ का उल्लेख्य करते थे। 
जो कहते थे कि बाल साहित्य में गम्भीर काम देखने को नहीं मिलता, उन्हें निस्सकोंच परामर्श देते थे कि बचपन एक समंदर देखिए, सब पता चल जाएगा। लोग हास्यास्पद डिग्रियों के बल पर खुद को डॉक्टर लिखने में बड़ा गर्व महसूस करते हैं। इस ग्रन्थ में शलभ जी की भूमिका देखकर लगता है कि डॉक्टरेट की उपाधि के असली हकदार तो ये लोग है।  ...तो ऐसी ही तन्मयता से वे लगे थे। हजार शिशुगीतों का संकलन करने के लिए वे कितना दौड़े। कितना भागे। शायद ही इसका सहज अनुमान किया जा सके। कितनी दुर्लभ पांडुलिपियां उन्होंने एकत्र कीं। वर्ष 2016 में 12 जून को मैं डॉ. आर. पी. सारस्वत की पुस्तक विमोचन के लिए सहारनपुर गया था। गया क्या था, उन्होंने ही बुला लिया था। बिलकुल आदेश के स्वर में वे मेरे घर पर पत्नी से भी कह गए थे कि समीक्षा तुम्हें भी आना है। फिर हम सब साथ साथ शाकुम्भरी देवी के दर्शन को चलेंगे। और फिर ऐसा ही हुआ। पत्नी और बेटी सृष्टि के साथ मैं गया। एक दिन पूरा उनके घर बिताया। बच्चे तो उनके परिवार के साथ मस्त हो गए और मैं बेड पर बैठा उनके साथ इसी पाण्डुलिपि पर चर्चा करता रहा। मैं उनका श्रम देख चकित था। कहीं न कहीं शर्म भी महसूस कर रहा था। हजार शिशुगीतों की तैयार हो रही पांडुलिपि का अधिकांश उन्होंने स्वयं तैयार किया था। छोटे-छोटे मोती जैसे अक्षर  चिढा रहे थे। इसे कहते हैं काम।
 मैं तो प्रतिदिन की अपनी यात्राओं की थकन में कुछ नहीं कर पाता। कितनी बार उन्होंने मुझे कहा कि शिशुगीत भेजो। अपने भी और  जिन्हें तुम श्रेष्ठ समझते हो वे भी। कितने आग्रहों के बाद मैं उन्हें कुछ भेज पाया था और वे कि सैकड़ों रचनाओं को खोजकर खुद हाथ से लिखने का मशक्कत भरा काम कितनी सहजता से निबटाने में लगे थे।
 मैंने कहा -दादा, ये काम आप ही कर सकते थे। कुछ साहित्यकार हैं जिनके पास सामर्थ्य है लेकिन समय नहीं। कुछ हैं जिनके पास समय है लेकिन सामर्थ्य नहीं। आप ऐसे बिरले हैं कि समय और सामर्थ्य दोनों के ही स्वामी हो। 
वे हँस भर दिए थे। 
तो यह बड़ा काम उन्होंने कर दिखाया। फोन पर बताया था कि इसकी पांडुलिपि प्रकाश मनु जी की परामर्श के लिए भेज रहा हूँ। वे देख लें और समय दें तो फरीदाबाद जाऊँ। दुर्भाग्य कि ऐसा हो न सका। उनके निधन की सूचना मनु जी को दी तो वे कुछ पल के लिए निशब्द रह गए थे।
 नियति को यही स्वीकार था। पर जाने क्यों आज भी मन उनका जाना स्वीकार नहीं कर रहा। बार बार लगता है कि अभी उनका रहना बहुत जरूरी था। ऐसे लोग हैं ही कितने? जिनके दिलों में बाल साहित्य धड़कन बन धड़कता है। 
वे अकेले नहीं गए, बहुतेरे सपने साथ चले गए। 
मेरा उनसे पुराना नाता था। 1995 में पहली बार मिले थे।  उनके मुख से टिली लिली झर गीत क्या सुना, उनका दीवाना हो गया था। इस कदर कि एक आलेख में ही मैंने लिखा था कि यदि हिंदी के दस अलमस्ती में गाए जानेवाले बालगीतों का चयन मुझे करना हो तो उनमें से एक शलभ जी का गीत टिली लिली झर होगा। 
यह गीत नन्दन में छपा था। 
इसकी भी गजब कहानी है। तत्कालीन सम्पादक जयप्रकाश भारती ने इसे औपबंधिक स्वीकृति दी थी। लिखा था कि मुखड़ा बहुत सुंदर है लेकिन आगे के बंद और तराशिए। फिर तीन बार की कोशिश में यह मुकम्मल गीत बना। बार बार सोचता हूँ कि ऐसे सम्पादक और कवि भला कितने है जो एक सम्पूर्ण रचना को तैयार करने के लिए इतना यत्न करें।
तो जिस तरह आँख बंद कर वे इसे गाते थे और अनूठे अंदाज में कहते कि वो देखो वो चिड़ी चिड़े के ले गयी कान कतर। तो कभी न गानेवाले मुझ जैसे बेसुरे के कंठ से भी सुर फूट पड़ते थे। 
कभी ऐसा हुआ नहीं कि वे मिले हों और कविता पाठ के वक्त मैंने उनसे इस गजब गीत की फरमाइश न की हो। 
 प्रभा बाल साहित्य सम्मान समारोह की अध्यक्षता के लिए वे 8 मई 2016 को शाहजहांपुर आए थे। संयोजक अजय गुप्त ने उन्हें बुलाया था। सबने खूब उन्हें सुना था। कन्नड़ मूल के जिलाधिकारी विजय किरन आनंद भी देर तक बैठे रहे थे। जब उन्होंने कहा कि अंतिम रचना पढ़ रहा हूँ तो मैं तपाक से खड़ा हो गया, न दादा। टिली लिली के बिना तो काव्य पाठ पूरा न होगा। (यह वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करें)
फिर ...राजसमन्द में आखिरी बार उनके मुख से यह गीत सूना। अंतिम बार यह गीत सुन रहा हूँ, मैंने न सोचा था। 
खुटार में 1996 में मैंने बाल साहित्य प्रसार संस्थान की ओर से बाल साहित्यकार सम्मेलन किया था। वे आए तो अतिथि के रूप में थे लेकिन भूमिका संयोजक की निभाई। डायस से लेकर माइक तक सब कुछ व्यवस्थित कराया। वे एक कुशल आयोजक थे। जिन्होंने समन्वय, सहारनपुर के आयोजन देखे हों, वे मेरी बात से सहज सहमत होंगे।
1.इंदौर 2.भीलवाडा 3.कोलकाता और 4.मसूरी के स्मृति चित्र 
    इलाहाबाद, इंदौर, दिल्ली, कोलकाता, मसूरी, भीलवाड़ा : न जाने कितनी यात्राएं मैंने उनके साथ कीं। बाल साहित्य के विमर्श में मेरी उनसे खूब छनती थी। भीमताल में हिंदी बाल कहानी पर मेरा व्याख्यान था। बाद में बोले, एक बात कहूँ नागेश? तुम बख्शते किसी को भी नहीं। और इससे पहले कि मैं कुछ कहता, खिलखिलाकर हँस पड़े थे। 
फोन पर  जब भी उनसे बात होती थी तो लम्बी बात होती थी। कई बार जब उनका फोन न लगता तो साधिकार भाव से मैं उनकी पत्नी को फोन मिला देता। वे कबहुँक अंब अवसर पाइ, मेरी सुधि ध्याइबो, कछु करुण कथा चलाइ की तर्ज पर मेरी बात करा ही देतीं थीं। 
शलभ जी से अक्सर मैं एक चुटकी लेता था और वे मुस्कुरा उठते थे। मैं पूछता कि बताओ दादा, आपके ऊपर जुलम किसने किया?
शुरू में तो दो चार बार उन्होंने सहसा चौंक कर पूछा कि कैसा जुलम ? मगर बाद में यह प्रसंग हम लोगों के आनन्द लेने का हेतु बन गया। 
बात कोलकाता की है। 2003 की। पुष्करलाल केडिया जी द्वारा आयोजित मनीषिका के बाल साहित्यकार सम्मेलन के बाद, हम लोग गंगासागर से लौटे थे। वापसी की ट्रेन एक ही थी। हावड़ा पहुंचे तो कोच देखने के लिए अपने-अपने टिकट निकाले। मगर उनका टिकट तो गुम।
 प्लेटफार्म पर बैग खोला फिर अटैंची। सारा सामान बिखेर दिया। मगर टिकट की समस्या विकट। बेचारे बार-बार माथा पकड़ते। 
पत्नी पर झुंझलाते-हेम, आज तुमने बड़ा जुलम किया। 
मैंने कहा, दादा । अब ट्रेन का टाइम हो रहा है। सारा सामान समेटिए। 
क्या होगा नागेश ?
मैंने कहा-दादा अब जो होगा। ट्रेन में होगा। फ़िलहाल टेंशन छोड़िए। 
अचानक मैंने उनकी डायरी खंगाली और वाह ! टिकट महाशय तो वहीं छुपे बैठे थे। 
दोनों को जो सुख मिला, उसकी व्याख्या कठिन है।
    शलभ जी बड़े कद के बालकवि थे। बाल कवि क्या, बालगीतकार थे। बाल कविता और बालगीत में अंतर है। वे इसे बखूबी समझते और समझाते थे। उनके बालगीत बाल साहित्य की अनमोल थाती है। पिछले दिनों उनका एक बहुत ही प्यारा बाल गीत बाल वाटिका में छपा था -खिड़की खुली मकान की। खिड़की खुलने के बाद के अलबेले दृश्यों को एक बच्चे के नटखट अंदाज से देखते हुए उनकी यह रचना स्वयं में अद्भुत और अपूर्व है जो घिसे-पिटे विषयों पर लिखने वाले छपास के रोगियों के लिए एक आमंत्रण जैसी है। लिखो, लिखो ऐसे बहुतेरे विषय आपके इर्द गिर्द बिखरे पड़े हैं। लिखो, उन पर लिखो।
शलभ जी का सृजन ही उनका सबसे बड़ा पुरस्कार सम्मान था। यों शलभ जी को बहुतेरे पुरस्कार सम्मान मिले। 
स्तुत्य समर्पण के लिए बाल वाटिका ने भी शलभ जी का सारस्वत सम्मान किया था। वे इस सम्मान से अभिभूत थे। उनका प्रशस्ति पत्र मैंने ही तैयार किया था। जब उन्होंने प्रशस्तिपत्र की प्रशंसा की तो डॉ. भैरूंलाल गर्ग ने विनम्रतापूर्वक उनको बता दिया कि इसे तो डॉ. नागेश ने लिखा है। 
वे गदगद थे । मुझे धन्यवाद कहने से न चूके, यह उनका बड़प्पन था। 
आज उस प्रशस्ति पत्र का सहज स्मरण स्वाभाविक है-
बाल साहित्य सृजन और संपादन के क्षेत्र में प्रण-प्राण से समर्पित कृष्ण शलभ हिंदी के सर्वाधिक सक्रिय बाल साहित्यकारों में से हैं. उन्होंने बाल साहित्य की अलख जगाई है और एक तरह से हिंदी बाल साहित्य का परचम राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्सरित किया है. बाल साहित्य के प्रति उनके मन में चिंतन भी है और चिंता भी . यही कारण है कि अनवरत सृजनरत रहते हुए उन्होंने जहाँ स्वयं बाल कविता के क्षेत्र में उच्च कोटि का प्रचुर लेखन किया , वहीँ इसकी सर्जना की दिशा में भी निरंतर परिवेश का निर्माण करने की दिशा में तन्मयतापूर्वक सजग रहे हैं .ओ मेरी मछली , टिली लिली झर सूरज को चिट्ठी, 51 बाल कविताएँ आदि कृतियाँ बाल साहित्य के क्षेत्र में उनके अनवरत सृजन को रेखांकित करती हैं . 
बाल साहित्य में शोध कार्य के प्रति उनके मन में सहज अनुराग है वे स्वभाव से ही खोजी और शोधी प्रवृत्ति के हैं . यही कारण है कि उनके द्वारा बचपन एक समंदर जैसे मानक और भारतीय भाषाओं में इस प्रकार के एक मात्र ग्रन्थ का संपादन प्रकाशन संभव हो सका। इस वृहदाकार ग्रन्थ से बाल साहित्य के प्रति समाज में विमर्श और सम्मान को प्रोत्साहन मिला है और इसने बाल साहित्य में शोध और समालोचना को भी आधारभूमि प्रदान की है।
बचपन एक समंदर जैसा चमत्कारी कार्य करने वाले शलभ जी की रचनाओं में भी समंदर जैसी गहराई है। और फिर उनकी रचना यदि समंदर पर हो तो कहने ही क्या, बाल सुलभ जिज्ञासाएँ देखते ही बनती हैं- मोती की खेती की मौलिक कल्पना और किसी चिड़ियाघर या सर्कस के तम्बू का आभास तो वास्तव मे कृष्ण शलभ की ही तूलिका से सम्भव था- बोल समंदर सच्ची-सच्ची, तेरे अंदर क्या, जैसा पानी बाहर, वैसा ही है अंदर क्या? रहती जो मछलियाँ बता तो कैसा उनका घर है? उन्हें रात में आते-जाते, लगे नहीं क्या डर है?
तुम सूरज को बुलवाते हो, भेज कलंदर क्या?
बाबा जो कहते क्या सच है, तुझमें होते मोती, मोती वाली खेती तुझमें, बोलो कैसे होती! मुझको भी कुछ मोती देगा, बोल समंदर क्या?
जो मोती देगा, गुड़िया का, हार बनाऊँगी मैं, डाल गले में उसके, झटपट ब्याह रचाऊँगी मैं!
दे जवाब ऐसे चुप क्यों है, ऐसा भी डर क्या?
इस पानी के नीचे बोलो, लगा हुआ क्या मेला, चिड़ियाघर या सर्कस वाला, कोई तंबू फैला- जिसमें रह-रह नाच दिखाते, भालू-बंदर क्या?
शलभ जी के अनूठे सृजन में कथाओं जैसा आनन्द भी है- मेढक बोला- ‘टर्रम-टूँ, जरा इधर तो आना तू, खाज़ लगी मेरे सिर में, जरा देखना कितनी जूँ!’ कहा मेढकी ने इतरा- ‘चश्मा जाने कहाँ धरा, बिन चश्मे के क्या देखूँ , कहाँ कहाँ है कितनी जूँ!
 बहुत सी उनकी रचनाएँ बतकही शैली में है। भोला संवाद और चुटीली जिज्ञासाएँ। 
सूरज पर उनके बालगीत की श्रेष्ठता का अनुमान इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इसे एक छद्म कविराज ने चुराकर अपने नाम से एक प्रतिष्ठित पत्रिका में छपवा लिया था। शलभ जी ने उन कविराज को ऐसा नोटिस दिया कि फिर किसी अन्य कवि को उन्होंने वैसा सौभाग्य न दिया। बहरहाल आप उस बालगीत से रूबरू होइए -सूरज जी, तुम इतनी जल्दी क्यों आ जाते हो! लगता तुमको नींद न आती और न कोई काम तुम्हें, ज़रा नहीं भाता क्या मेरा, बिस्तर पर आराम तुम्हें। खुद तो जल्दी उठते ही हो, मुझे उठाते हो!
कब सोते हो, कब उठते हो, कहाँ नहाते-धोते हो, तुम तैयार बताओ हमको, कैसे झटपट होते हो। लाते नहीं टिफिन, क्या खाना खाकर आते हो?
 कृष्ण शलभ जी ने बहुत पहले चिड़िया पर एक संकलन सम्पादित किया था। यह एक छोटी सी पुस्तक थी। पर थी गागर में सागर सी। चिड़िया पर बहुत ही सुंदर कविताएँ उसमे थीं। 
शलभ जी का भी एक बाल गीत चिड़िया पर है, जो मुझे विशेष प्रिय है। इसलिए भी कि चिड़िया से बातें करते करते वे उसे सलाह भी देते हैं और कविता के मर्म तक जा पहुँचते हैं -
जहाँ कहूँ मैं बोल बता दे, क्या जाएगी, ओ री चिड़िया। उड़ करके क्या चन्दा के घर
हो आएगी, ओ री चिड़िया।
चन्दा मामा के घर जाना, वहाँ पूछ कर इतना आना। आ करके सच-सच बतलाना, कब होगा धरती पर आना।
कब जाएगी, बोल लौट कर, कब आएगी, ओ री चिड़िया।
उड़ करके क्या चन्दा के घर, हो आएगी, ओ री चिड़िया।
शलभ जी सूरज से भी किरणों का बटुआ लाने की फरमाइश करने से नहीं चूकते-
पास देख सूरज के जाना, जा कर कुछ थोड़ा सुस्ताना, दुबकी रहती धूप रात-भर, कहाँ? पूछना, मत घबराना। सूरज से किरणों का बटुआ, कब लाएगी, ओ री चिड़िया।
उड़ करके क्या चन्दा के घर हो आएगी, ओ री चिड़िया।
और कविता का अंत तो जैसे बड़ों से भी सवाल करता प्रतीत होता है। टेक्नलॉजी के इस युग में भले ही हम अंतरिक्ष के कोनों को खंगालने में जुटे हैं। हर हाथ में मोबाइल और टेब हो और हर आँख में आकाश को छूने की ललक लेकिन अपनी धरती से भी जुड़े रहने की दमक और उसकी सोंधी गन्ध की महक तो उनकी रचनाओं में गाहे बगाहे आ ही जाती है, जिसमे सन्देश और सवाल दोनों ही अपनी चिरपरिचित शैली में अभिव्यक्त होते हैं- चुन-चुन-चुन-चुन गाते गाना। पास बादलों के हो आना, हाँ, इतना पानी ले आना। उग जाए खेतों में दाना। उगा न दाना, बोल बता फिर क्या खाएगी, ओ री चिड़िया?
उड़ करके क्या चन्दा के घर हो आएगी, ओ री चिड़िया
    ऐसी न जाने कितनी रचनाएँ हैं जो याद आती है। जो याद आएँगी और याद आते रहेंगे शलभ जी। 
शलभ जी अक्सर घर बदलते थे। उनका पता बदल जाता था। ...इस बार तो उन्होंने दुनिया ही बदल दी। उनका नया पता किसी को नहीं पता। 
काश ! ऐसी कोई चिड़िया होती जो उनका पता खोज लाती। 
काश ! ऐसा कोई वाहक होता जो उन तक सन्देश पहुंचाता। 
शब्दों के जादूगर शलभ जी, आपके अचानक चले जाने से बहुत दुःखी हैं सब। आपसे नाराज भी हैं। 
31 अक्टूबर 2017 को आप तो घर को लौट रहे थे। आ ही गए थे घर तक। घर के मोड़ तक।  कोई अबुद्धि आपको बाइक से टक्कर मार गया। 
उसे नहीं पता कि क्या छिन गया। 
जिन्हें पता है, वे बहुत बेबस और बेकल हैं। 
भीगे नयनों में बस...आपका मुस्कुराता हुआ चेहरा तैर रहा है, जो कुछ बोलता नहीं। ....

फिर कानों में ये आवाज कहाँ से गूँज रही है ....पकड़ सको तो पकड़ो मेरे लगे हवा के पर।
(यह आलेख 'बाल वाटिका' मासिक के दिसम्बर,2017 अंक के पृष्ठ 8 पर प्रकाशित हुआ था।)