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रविवार, 5 मई 2024

भारतीय बाल साहित्य का एक और इतिहास

ग्रंथ : भारतीय बाल साहित्य का इतिहास

लेखक : प्रोफेसर (डॉ.) त्रिभुवननाथ शुक्ल

प्रकाशक : कश्यप पब्लिकेशन बी-15/जी-1, दिलशाद एक्सटेंशन-2, डीएलएफ, गाजियाबाद-05 (उ.प्र.)

 फोन: 09868778438 

संस्करण: 2021

मूल्य: 350/- रुपए

समीक्षक : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

प्रोफेसर (डॉ.) त्रिभुवननाथ शुक्ल, डी. लिट्. ,रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर (मध्यप्रदेश) के हिंदी एवं भाषाविज्ञान विभाग में आचार्य एवं अध्यक्ष पद पर कार्यरत रहे हैं। उनकी समर्थ लेखनी और अनथक श्रम से 'भारतीय बाल साहित्य का इतिहास' जन सामान्य के लिए सुलभ हुआ है। 

एक समय था,जब विभिन्न मंचों पर बार-बार बाल साहित्य के इतिहास लेखन की आवश्यकता उदघाटित की जाती थी। प्रसन्नता और गर्व का विषय है कि अब इस दिशा में निरंतर सक्रियता देखते ही बनती है। यद्यपि बाल साहित्य के पूर्ण और प्रामाणिक इतिहास लिखे जाने की जरूरत हमेशा रहेगी। बाल साहित्य का पहला इतिहास रुहेलखंड की धरती से 1966 में निरंकार देव सेवक जी ने लिखा था बाल गीत साहित्य इतिहास एवं समीक्षा। इसके बाद काफी लम्बे समय तक इस दिशा में सन्नाटा रहा। बहुतों ने गाल बजाए लेकिन किसी ने पहल नहीं की। भला हो जयप्रकाश भारती का जिन्होंने भारतीय बाल साहित्य का इतिहास 2002 में संपादित किया। प्रकाश मनु ने बहुत मेहनत करते हुए, अपने दम पर हिंदी बाल साहित्य का इतिहास (2015) लिखा। शकुंतला कालरा ने हिंदी बाल साहित्य विधा विवेचन ग्रंथ का संपादन किया, उसमे भी इतिहास की झलक है।

वर्ष 2021 में प्रकाशित भारतीय बाल साहित्य का इतिहास के लेखक प्रो. शुक्ल हिंदी साहित्य के उद्भट विद्वान हैं। उनका व्यक्तित्व जलनिधि-सा है। भीतर कितने रत्न मणियां समेटे हैं लेकिन कोई प्रदर्शन नहीं। मौन साधक हैं। गंभीर कार्य करते हैं। शोर शराबे में तो उनका कभी भी विश्वास नहीं रहा ।

उन्होंने पहले भी सन 2009 में डॉ. राष्ट्रबंधु जी के साथ मिलकर भारतीय बाल साहित्य की भूमिका पुस्तक का सहलेखन किया था। यह ग्रंथ उन्होंने राष्ट्रबंधु जी और प्रतीक मिश्र जी को समर्पित किया है। 39 अध्यायों में विभक्त इस इतिहास में बाल पत्रकारिता और बाल साहित्य समीक्षा पर भी बात की गई है। ग्रंथ में 1. असमिया 2. उड़िया 3. उर्दू 4. अँगरेज़ी 5. कन्नड़ 6. कश्मीरी 7. कोंकणी 8. गुजराती 9. डोगरी10. तमिल 11. तेलुगु 12. नेपाली 13. पंजाबी 14. बंगला 15. मणिपुरी 16. मैथिली 17. मराठी 18. मलयालम 19. राजस्थानी 20. सिंधी 21. संस्कृत और 22. हिंदी भाषाओं के बाल साहित्य की विवेचना की गई है। 

 इस इतिहास में हिंदी बालकाव्य और बाल कथा साहित्य में राष्ट्रीय एकता की अनुगूँज, कहानियों की कहानी, बालनाटक, बालोपन्यास, बाल जीवनियाँ, बाल साहित्य समीक्षा और बालसाहित्य में लघु रचना को लेकर सारगर्भित चर्चा है।

भूमिका में प्रो. शुक्ल जी लिखते हैं : 

"बालविकास में शारीरिक और मानसिक स्वस्थता को अन्योन्याश्रित मानना चाहिए। केवल पौष्टिक आहार के आधार पर बालकल्याण की योजना एकांगी और आधी अधूरी है। बाल कल्याण में बालशिक्षा और बाल साहित्य अपरोक्ष रूप से बालविकास को संचालित करते हैं। बालसाहित्य, बालकल्याण का मेरुदंड है।आधुनिक समस्त संदर्भों में बालक उपेक्षित और असहाय है। गरीबों के बच्चे अपने माता-पिता के स्नेह-पोषण से वचित हैं, क्योंकि माता-पिता आजीविका के लिए जो विवश हैं। शहरों में जब माता-पिता काम के लिए घर छोड़ते हैं तो बच्चा सोता रहता है और जब पिता देर रात में घर लौटता है तो भी बच्चा सोता मिलता है। देहातों में निम्न आर्थिक स्तर के माता-पिता, खेती किसानी या मजदूरी के काम से निकल जाते हैं तो बड़े बच्चे के ऊपर जिम्मेदारी आती है, अपने छोटे-भाई-बहिन को संभालने की।मध्यम श्रेणी के अभिभावक चाहे शहरों में रहते हों या देहातों में, अपने ही कामों में, घर से बाहर निकल जाते हैं और बच्चे उपेक्षित अनुभव करते हैं।उच्च श्रेणी के अर्थ संपन्न लोग खर्च कर सकते हैं लेकिन देखभाल नहीं करते। व्यवसाय, कार्यालय, क्लब, सभा अथवा संपन्न समाज में जाने में लोग अपना सम्मान मानते हैं। बच्चों की देखभाल, परिवरिश और शिक्षा की जिम्मेदारी के लिए दूसरों को ही नियोजित करते हैं। बच्चे उनके हैं, जिम्मेदारी दूसरों पर थोपते हैं।आधुनिक संदर्भ में आर्थिक, सामाजिक और अन्य कालों से पारिवारिक विघटन बहुत हो रहे हैं। बाबा-दादी, नाना-नानी, विशेष परिस्थितियों में ही, बच्चों के साथ अपने दिन बिताते हैं। 'माँ' कह एक कहानी जैसी परिस्थितियाँ आती हैं लेकिन आधुनिक माताएँ कैसेट या कामिक्स के विकल्प तैयार कर लेती हैं जिनमें लोरियाँ और प्रभावी गीत बच्चों के लिए सतही पूर्ति करते हैं। बड़ों के साथ का अभाव उन्हें सालता है।"

प्रो. शुक्ल ने बालक को लेकर विभिन्न परिस्थितियों के संदर्भ में चिंतन करते हुए भारतीय भाषाओं के बाल साहित्य के महत्त्व और उसके इतिहास को विश्लेषित किया है। वे बाल साहित्य की उपेक्षा से चिंतित भी हैं ; "आधुनिकता बनाम आर्थिकता ने जब बच्चों को अपने मौलिक अधिकारों से वंचित और उपेक्षित कर दिया है तो बालसाहित्य भी उपेक्षित और वंचित है। अतः समाज में बाल साहित्यकार अनादृत हैं। साहित्यकारों में बालसाहित्यकार दूसरी श्रेणी में परिगणित किए जाते हैं। साहित्य के इतिहास में बालसाहित्य के संदर्भ नहीं मिलते। भारत में शताधिक शोधग्रंथ बालसाहित्य पर उपलब्ध हैं, लेकिन उनका महत्व नहीं। इसका मुख्य कारण है कि बच्चा बेचारा है, बेसहारा है। बच्चे की जिम्मेदारी गरीब निभा नहीं पाता है जबकि अमीर उस जिम्मेदारी को दूसरों पर डालना चाहता है। मध्यम श्रेणी के लोग जिम्मेदारी जानते हैं लेकिन निभाने में मजबूर हैं।

यह विचारणीय विडंबना है कि हमारे धर्मग्रंथों में बालक की संज्ञा 'ईश्वर' दी गई है। बालक को ईश्वर का अवतार कहा जाता है। सूरदास हों या तुलसीदास, कंबन हों या सुब्रहमण्यम भारती, रवीन्द्रनाथ ठाकुर हों या गोपबंधु सभी बालवर्णन का गुणगान करते रहे हैं, लेकिन तालाब के किनारे नवजात शिशु को त्यागने के लिए बाध्य हैं। ऐसे अनेक अभिभावक हैं, जो जिम्मेदारी भगवान भरोसे छोड़ देते हैं। और 'दादर पुल के बच्चे' उपन्यास के राजीव पात्र बनकर असामाजिक तत्त्वों की आमदनी के माध्यम के लिए लूले लंगड़े बना दिए जाते हैं। अथवा अनैतिक धंधों में नियोजित कर दिए जाते हैं।

बच्चे के प्रति दायित्व निभाने वाले, न तो माता पिता समर्थ और योग्य हैं और न समाज के अन्य लोग। प्रवेश निषेध की चेतावनियाँ विद्यालयों में बच्चों के मौलिक अधिकारों का उपहास करती हैं। न अभिभावक कुछ कर पाते हैं, न समाज के लोग, न धर्माचार्य, न शासन के प्रतिष्ठित अधिकारी। इन सबकी दृष्टि में बच्चा समाज या देश का नहीं व्यक्ति का होता है।

जैसे जैसे किंडर गार्टन या मांटेसरी विद्यालय में अँगरेज़ी माध्यम से पढ़नेवाले बच्चे, प्राथमिक कक्षाएँ देखकर बाहर निकल जाते हैं माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ने वालों की संख्या घट जाती है। उच्चतर कक्षाओं में और घट जाती है। महाविद्यालयों में सामर्थ्यवान लोगों को भाग्यशाली बच्चे ही पढ़ते हैं और कैरियर कक्षाओं की जानकारी न पाकर क्लर्कों की नौकरी तलाश करते हैं। कितने संगठन हैं, जो देहातों से शहरों तक फैल कर बच्चों को निर्देश देते हैं। कला, साहित्य, खेल, विज्ञान, अनुसंध गान आदि के आयोजनों की जानकारी देते हैं। कितने पुस्तकालय बच्चों के लिए हैं। साक्षरता की मंथर गति के रहते बालसाहित्य का विकास हो ही नहीं सकता। बच्चों के कार्यक्रमों को प्रोत्साहन मीडिया भी नहीं देता। प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, बच्चों में वर्ग भेद उत्पन्न करते हैं। अमीरों के बच्चे उनकी प्रचार-प्रसार की परिधि में आते हैं, जो इंडियट बाक्स छोड़ना ही नहीं चाहते। गरीबों के बच्चों के कार्यक्रम बतौर फैशन प्रस्तुत होते हैं। ऐसे कार्यक्रम शायद ही जीवंत होते हैं। बालहित की चेतना से शून्य आज के बहुत से लेखक बालसाहित्य को कमाई का धंधा मानकर कार्य संपन्न करते हैं तथा घिसीपिटी शैली, बाबाआदम से चले चलाए घिसे पिटे विषय, व्याकरण और संस्कृति से पृथक सभ्य लोगों की भाषा में वे बालसाहित्य तैयार कर रहे हैं। इन लोगों की पांडुलिपियाँ सस्ते दामों में खरीद कर प्रकाशक अपना व्यापार चलाते हैं। रायल्टी की जगह कॉपीराइट में सौदा करते हैं और संस्करण में सन् लिखकर आवृत्तियाँ करते जाते हैं।"

प्रो. शुक्ल ने बड़े ही खुले शब्दों में बाल साहित्य के घुसपैठियों को बेनकाब करते हुए लिखा है,"बालसाहित्य के वे प्रतिष्ठित लेखक माने जाते हैं, जो सरकारी खरीद को प्रभावित करते हैं और थोक में बिक्री कराने की पात्रता रखते हैं। प्रकाशक भी बालसाहित्य छापकर रखना नहीं चाहता वह कामिक्स लेखक खोजता है। ऐसी पांडुलिपि अनुबंधित करना चाहता है जिसके लिए बाजार न खोजना पड़े जो इडली, कचौरी या समोसे की तरह हाथों-हाथ बिक जाए।

प्रकाशक जानता है कि बालसाहित्य केवल बच्चे नहीं पढ़ते। बच्चों की पुस्तकें, बड़े लोगों की पसंद पर ही खरीदी जाती हैं। इसलिए प्रकाशक आधुनिक संदर्भों में सेक्स, हत्या, मारधाड़ आदि से पूर्ण पुस्तकें तैयार करता है। प्रकाशक जानता है कि बड़े लोग तो इन्हें पढ़ेगे ही, बच्चे भी छुप छुप कर पढ़ेंगे और फिल्म शो जैसा लुत्फ हासिल करेंगे। किराए पर दूकानों से पुस्तकों की माँग खड़ी होगी, इसलिए वह अपने आर्थिक लाभ को ही देखता है सिद्धांतों से उसका कोई सरोकार नहीं होता। वर्तनी भाषा या संपादन से शून्य, बालसाहित्य का प्रकाशक बच्चों से कोई मतलब नहीं रखता। जो लोग बच्चों की पुस्तकें शौक में खरीदते हैं, उनके आगे पीछे घूमता है।

बड़ों द्वारा खरीदकर देने की आदत को प्रकाशक भुनाना चाहता है। अतः वह बालसाहित्य के नाम पर अविश्वसनीय वर्णन को कल्पना के नाम पर प्रस्तुत करता है। परी कथाओं, पौराणिक कथाओं और प्रेम गाथाओं की पुस्तकों को वह बालसाहित्य के खाते में रखकर धंधा करता है। ऐसा प्रकाशक एक ही पुस्तक को बालसाहित्य और प्रौढ़ साहित्य की पुस्तक बना देता है।

प्रकाशक बिकने के लिए छापता है अतः उसे कमाई चाहिए भले ही बच्चों के लिए तैयार की गई किताबें बच्चों तक न पहुँचे। बच्चों की किताबें कमीशन देकर भी बिकें तो बिकनी चाहिए। इन किताबों की बिक्री के लिए कमीशन में कार देनी पड़े तो दी जाएगी। प्रकाशक को इससे कोई मतलब नहीं कि दाम बच्चों की क्रयक्षमता का है या नहीं अथवा बालसाहित्य अलमारी या बक्से में बंद रहता है। उसे प्रौढ़ साक्षर पढ़ते है या कोई और प्रकाशकीय दृष्टि से आधुनिक बालसाहित्य का संदर्भ शुद्ध व्यावसायिक आर्थिक और स्वार्थपूर्ण रहता है। बच्चे की पसंद उसकी क्रयक्षमता और उसके हित की उपेक्षा करके प्रभूत बालसाहित्य प्रतिवर्ष छापा जाता है लेकिन भविष्य की बजाय वह भूतकाल का इतिहास तक नहीं बनाता और न अपनी देहरी से बाहर निकल पाता है।"

प्रो. शुक्ल ने हिंदी बाल साहित्य की दीर्घ कालीन यात्रा पर अपनी दृष्टि डालते हुए कहा है, "बालपत्रकारिता सन 1882 से बालदर्पण के रूप में हिंदी में उद्भूत हुई। 1917 में बालसखा और शिशु के माध्यम से पल्लवित और लक्ष्यगामी बनी। जनसंख्या वृद्धि के हिसाब से हिंदी में जितने पत्र प्रकाशित होने चाहिए, उतने हैं नहीं। बालभारती, बालवाणी, बालवाटिका, चकमक आदि बालपत्र विविध लक्ष्य लेकर प्रकाशित हो रहे हैं लेकिन बच्चों की आवश्यकताओं के अनुरूप हैं नहीं। अतः उपलब्धियाँ सीमित हैं। विद्यालयीन पत्रिकाओं की संख्या निराशाजनक हैं। प्रोत्साहन के क्षेत्र में सभी प्रकार के बालकों का कार्य ऊँट के मुंह में जीरा के समान है-एक अनार सौ बीमार।दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक आदि पत्र-पत्रिकाओं में बच्चों के स्तंभ बहुत लोकप्रिय हुए हैं। कला, चित्रकारी, प्रहेलिकाओं, नन्हीं कलम आदि स्तंभों से बाल स्तंभों तक में इनका समावेश किया गया है लेकिन जब कभी विज्ञापन मिल जाते हैं तो बच्चों के लिए निर्धारित स्थान पर ही अतिक्रमण किया जाता है। अखबारों के मालिक यह नहीं सोचते कि बच्चों के भविष्य के साथ उनका गाज गिरा देना, कालांतर में उनके अपने लिए ही नुकसान पहुँचाने वाला सिद्ध होगा। बच्चे जब सड़क पर बैटिंग करने को मजबूर होंगे तो कोई न कोई गैर खिलाड़ी आहत होगा ही।

प्रकाशन की इन विषम परिस्थितियों में बालसाहित्य का लेखन चल तो रहा है, यही क्या कम है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया ने बालक के मौखिक और लिखित बाल साहित्य को बहुत प्रभावित किया है। व्यावसायिकता ने सिद्धांतों का गला घोटना शुरू कर दिया है। फिल्मों और दूरदर्शन ने सभ्यता को भले ही अभिव्यक्ति दी हो लेकिन हमारे संस्कारों पर लगातार प्रहार किए हैं।"

शुक्ल जी वर्तमान बाल साहित्य में हो रहे जबरदस्ती के लेखन पर भी निर्भीक होकर अपनी बात रखना नहीं भूलते। "आज की कविता बालसाहित्य में विषयों की दृष्टि से चूहे, बिल्ली, हाथी, कुत्ते की अनाकर्षक ऐसी प्रस्तुति है जिसमें छंद और लय के दोष उसे निष्प्रभावी बना रहे हैं। अंग्रेजियत की फैशनपरस्ती में शुद्ध भाषा तिरोहित होती जा रही है। भारतीय भाषाएँ, भँवरजाल से अपना मार्ग नहीं बना पा रही है। मात्र 50-60 नर्सरी गीतों की अंग्रेजियत ने सहस्त्राधिक अच्छे शिशुगीतों के चलन में गत्यावरोध खड़े कर दिए है।

फैंटेसी के नाम पर बालकहानियों में बालसाहित्य बहुत उन्नत और समृद्ध है। फकीरमोहन सेनापति, साने गुरू जी, गिजूभाई, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सुकुमारन आदि से बालकहानियों का निर्झर सतत प्रवाहशील है। बालसाहित्य की खदान में बहुत सा संचित धन है जिसका उपयोग ही नहीं किया गया है।

बालनाटक, बालोपन्यास के क्षेत्र में आधुनिक बालसाहित्य इसलिए अधिक प्रभावशाली सिद्ध नहीं हुआ है क्योंकि इलेक्ट्रानिक मीडिया ने उसके प्रचार प्रसार पर अपना खूनी पंजा फैला दिया है। विदेशी फिल्में अपनी चकाचौंध से इन्हें बाहर फेकने लगी हैं।

फिल्मगीतों की कालकोठरी से अन्त्याक्षरी बाहर निकल नहीं पा रही है। इसने सूक्तियों और अच्छा सुभाषित पंक्तियों को बिसार दिया है। प्रतियोगिता और पुरस्कारों ने अश्लीलता को घर में जगह दे दी है फिर भी बालसाहित्य की हस्ती किन्हीं विशेषताओं के कारण नहीं मिटी।

प्रजातंत्र की दुहाई देने वाले प्रशासकों को बताना होगा कि प्रौढ़ शिक्षा चलाने की बजाय बच्चों की शिक्षा और बालसाहित्य पर पूरा ध्यान दें ताकि प्रौढ़ आंशकितों की संख्या अपने मूल में ही पनप न सके।

कुल मिलाकर इस ग्रंथ में बालसाहित्य के इतिहास के साथ साथ उसकी आवश्यकता को लेकर प्रबल तर्कों के साथ सविस्तार चर्चा की गई है। 

प्रोफेसर (डॉ.) त्रिभुवनाथ शुक्ल द्वारा प्रस्तुत यह भारतीय बाल साहित्य का इतिहास अपनी कुछ सीमाओं के बावजूद अत्यंत उपयोगी और महत्वपूर्ण है।

इस अच्छे काम के लिए प्रो. शुक्ल जी को बहुत बहुत बधाई !

आशा की जानी चाहिए कि बाल साहित्य इतिहास लेखन के गंभीर कार्य की दिशा में अन्य विद्वान भी प्रवृत्त होंगे और सतत चलने वाली यह धारा प्रवहमान रहेगी।

समीक्षक : डॉ. नागेश पांडेय संजय 

गुरुवार, 2 मई 2024

हिंदी बाल कहानियों में गाँव/ डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’

आलेख

हिंदी बाल कहानियों में गाँव

डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’

भारत गाँवों का देश है। कहते हैं कि राष्ट्र की आत्मा गाँव में बसती है। ऐसा शायद इसलिए भी कहते हैं क्योंकि राष्ट्र की प्रगति का हर रास्ता गाँवों से होकर जाता है। यदि किसान फसलें न उगाए तो? अन्न, दूध, दही, घी सारी चीजें हमें गाँव के भोले-भाले लोगों की मेहनत के बदौलत ही मिलती है। बावजूद इसके गाँव के लोगों के समक्ष बड़ी समस्याएँ हैं। जब बड़ों के साथ समस्याएँ हैं तो उनके बच्चे भी उनसे रूबरू होते ही हैं। इसके बाद भी गाँव के बच्चे अपनी लगन, अपने उत्साह, और अपने परिश्रम के बल पर बढ़ रहे हैं। नाम कमा रहे हैं l

 अनेक महापुरुष मूल रूप से गाँव के ही थे किन्तु उन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में अद्भुत सफलता प्राप्त की। सच बात तो यह है कि गाँव का विस्तृत और विकसित रूप ही शहर है। यहां पर एक बात और, एक शब्द है 'गँवार', हम उसे इस अर्थ में लेते हैं कि कोई अशिक्षित, असभ्य या असंस्कारी व्यक्ति। ऐसा नहीं है, गँवार शब्द 'ग्राम्यार' शब्द का परिवर्तित रूप है, जिसका अर्थ है गाँव में रहने वाला। खैर... बात तो गाँव की हो रही थी तो हमें गाँव और उसके लोगों के प्रति आभारी होना चाहिए जिनकी अनुकंपा से हम फलीभूत होते हैं। 

हिंदी में आज ऐसी ढेरों बाल कहानियाँ हैं जिनमें गाँव की उल्लेखनीय उपस्थिति है l यह अलग बात है कि अधिसंख्य अर्थात गाँव के बच्चों के लिए अलग से साहित्य, लिखने की कोई व्यवस्थित परम्परा कभी नहीं रही l  पत्र-पत्रिकाओं ने भी इस दिशा में अलग से चिंतन का परिवेश निर्मित करने की दिशा में कोई पहल नहीं की l पत्र पत्रिकाओ में भी गाँव के बच्चों की जो कहानियाँ प्रकाशित हुईं, प्राय : उनके लेखक ग्रामीण परिवेश से अनभिज्ञ थे l उनके लिए कहानी में गाँव की उपस्थिति का अर्थ बस इतना भर था कि गाँव का कोई बालक शहर जाकर, किताबों की दुनिया से जुड़कर या वहा की भौतिक प्रगति से परिचित होकर सफल और सभ्य हो गया l जबकि ऐसा नहीं है, गाँव संस्कारों की धरा है l प्रो. वासुदेव शरण अग्रवाल राष्ट्र के स्वरुप की कल्पना करते हुए जिस जन, भूमि और संस्कृति की बात करते हैं, वह संस्कृति गाँव की अधिवासिनी है l शहर के बच्चों को भी गाँव से बहुत कुछ सीखना हैl 

बहरहाल अभी भी, जब शहर गाँव की ओर अपने पैर तेजी से बढ़ा रहा है, बहुतेरे गाँव हैं जिन्हें शहरीकरण की जरा भी हवा नहीं लगी हैl उन बच्चो के लिए लिखते समय बाल कथाकार ग्राम्य संवेदना से जुड़ना होगा l जिस प्रकार पानी का चित्र देखकर प्यास नहीं बुझ  सकती, वैसे गाँव के गलियारों और खेतो की पगडंडियों पर विचरण किए बिना, वहां के बच्चो से मिले और बतियाए बिना एक रोचक और सफल ग्रामीण बाल कहानी की सर्जना असंभव है l अनुभूति और सहानुभूति में अंतर होता है l लमही गाँव के कथा सम्राट प्रेमचंद की कहानी ईदगाह में हामिद के चिमटे के बहाने ग्राम्य परिवेश की पूरी अनुभूति विद्यमान है l छायावाद के चर्चित शिकार कथा लेखक श्रीराम शर्मा की स्मृति कहानी को याद कीजिए जिसमें मक्खनपुर गाँव के डाकघर में बड़े भाई की चिट्ठी डालने गए लेखक की सांप से मुठभेड़ की रोमांचक आपबीती को पढ़ते हुए रोंगटे खड़े हो जाते हैं l  

हिंदी में ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियों के अभाव और उसकी आवश्यकता को देखते हुए मैंने एक संकलन सम्पादित किया था : ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियां (2016) l उस संकलन में डॉ० उषा यादव (दादी अम्मा का खजाना, अगिया बैताल की कथा), गोविंद शर्मा (अपना काम करेंगे, मेहनत का मंत्र), डॉ० जाकिर अली रजनीश (सेमरा का शेर, सपनों का गाँव), डॉ० दिविक रमेश (किस्स्सा चाचा तरकीबू राम का), डॉ० नागेश पांडेय 'संजय' (गौतर, मन का डर), प्रकाश मनु (तुम भी पढ़ोगे जस्सू, जमुना दादी), मुरलीधर वैष्णव (हबपब टोली), डॉ० मोहम्मद अरशद खान (हजार आँखों की प्रतीक्षा, बुद्ध काका और मनफेर ताऊ), डॉ० मोहम्मद साजिद खान (बैल खुल गए, बरगदी गाँव), रमाशंकर (शर्तों के सहारे-आई बहारें, कायाकल्प), रावेंद्र कुमार 'रवि' (मिल गई माँ), डॉ० श्रीप्रसाद (काला हाथ, यह सच है), संजीव जायसवाल 'संजय' (लोहार का बेटा), डॉ० सुनीता (सींक वाली ताई, करमू चाचा का ताँगा), डॉ० हेमन्त कुमार (आलस्य का फल) जैसे समकालीन लेखकों की गाँव के इर्द गिर्द घूमती बाल कहानियाँ थीं l गाँव के बच्चों की सोच, उनके जीवन और चिंतन को उद्घाटित करने का प्रयास इन कहानियों में था । शहर के नजरिए से भी गाँव को देखने-समझने की कोशिश थी। मेरी भावना थी कि गाँव और शहर के बच्चे परस्पर जुड़ें l गाँव के बच्चे तो शहर और उसके बच्चों के बारे में जानते हैं लेकिन शहर के बच्चे भी गाँव को समझें l इस तरह से दोनों में एक संवाद स्थापित करने की चेष्टा इसमें थी। 

समकालीन बाल साहित्य लेखकों की कहानियों में गाँव की बहुरंगी छवियां मिल ही जाती हैं l कुछ रचनाकारों ने तो शहर में बसकर भी अपने भीतर का गंवईपन बचाकर रखा है l उनकी कहानियों में ग्राम्य संवेदनाएं उफान मारती चलती हैं l ऐसा उफान कि पाठक का मन भीग जाएl मोहम्मद अरशद खान की एक लाजवाब और बेमिसाल कहानी है ‘गुल्लक’, इसे जरुर पढ़ा जाना चाहिए l मैने न जाने कितनी बार उसे पढ़ा है और जब भी पढ़ा, आँसू रोक नहीं पाया हूँ। आत्मा को छू लेने वाली अद्भुत कहानी। अरशद का नाम आते ही यह कहानी मेरे मस्तिष्क में तैर उठती है। मेरा मन भीग जाता है। गाँव में निलमिया जैसी कितनी ही कर्मठ और माँ-बाप के लिए त्याग से लबरेज बेटियाँ हैं जिनका सच्चा प्रतिनिधित्व इस कहानी में देखा जा सकता है। (बालिकाओं की श्रेष्ठ कहानियां, पृ. 114)

पद्मश्री प्रो. उषा यादव की ‘दादी अम्मा का खजाना’ कहानी में गाँव के हर व्यक्ति को कुतूहल है कि उस खजाने में क्या है ? एक ठग उनके खजाने की फ़िराक में नकली परपोता बनकर उनसे मिलने आता हैl भोली दादी उसकी खूब खातिर करती हैं l ठग जब मीठी-मीठी बातों से उनके खजाने की जानकारी कर लेता है तो उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है l इस कहानी में पुरानी चीजों को सहेज कर रखने की बुजुर्गों की आदत का बड़ा ही संवेदनशील वर्णन है l (ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियाँ, पृ.9 )

मुझे याद है अपनी माता जी के निधन के बहुत दिनों के बाद, जब उनका बक्सा खोलकर देखा गया था तो उसमे मेरे जन्मकाल से दो-तीन वर्ष तक की अवस्था के वर्षों पुराने कपड़े रखे मिले थे l मेरी करधनी, कड़ा, गले की माला सब कुछ उस खजाने में सुरक्षित था जिसे देख, मैं फूट-फूटकर रोया था और तब अवचेतन में उषा जी की इस कहानी की दादी भी मुझे उद्वेलित कर रही थींl 

डॉ. दिविक रमेश की कहानी ‘किस्सा चाचा तरकीबूराम का’ बच्चों में लोकप्रिय चाचा की कहानी है जिनके किस्से बड़े ही मजेदार हैं और उससे भी मजेदार है लेखक की कहन शैली l कहानी का अंत देखिए, ‘मुझे एक और किस्सा याद हो आया तुम भी क्या कहोगे कि चाचा तरकीबूराम के ही किस्से सुनाने पर लग गएl अब तुम अपने कोर्स की किताब पढ़ लो l शायद तुम्हें यह नहीं मालूम कि चाचा तरकीबूराम यह कभी नहीं चाहते कि उनके किस्से सुनने पढ़ने वाले बच्चे अपने स्कूल की पढ़ाई में फिसड्डी रहें l उन्होंने खास तौर पर कहा था कि उनके किस्से उन्हीं बच्चों को बताए जाएँ जो खूब मन लगाकर पढ़ते हो l (ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियाँ, पृ. 46)

डॉ. श्रीप्रसाद की कहानी ‘यह सच है’ के पंडित रामदीन पूरे गांव में लोकप्रिय हैं l वे अचानक गायब हो जाते हैं l उनके वापस न आने पर गांव में उन्हें मृत मानकर, उनकी आत्मा की शांति के लिए तेरहवी की दावत रखी जाती है लेकिन अनायास रामदीन पंडित प्रकट हो जाते हैं l लोग उन्हें भूत समझकर भयभीत होते हैं l सच, अगर वह अकेले में किसी को मिलते तो शायद उसकी हृदय गति भी बंद हो जाती l मजेदार बात यह कि हारे थके रामदीन जब यह कहते हैं, ‘मेरे मरने की बात कैसे सोच ली ? .... मुझे भी भूख लगी है l मैं भी बैठता हूँ l’ तो खुद की तेरहवी की दावत खाने की यह सच्ची घटना पाठक को हंसाती ही नहीं, चमत्कृत भी कर देती है l  ((ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियाँ, पृ. 123)

मौन साधक विनायक जी वैसे तो वन्य जीवन के विशेषज्ञ लेखक हैं लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से उनकी कहानियों में गाँव की जीती-जागती तस्वीर देख सकते हैं l हाल ही में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘माँ की महक तथा अन्य कहानियाँ’ में मानवेतर पात्र सियारू का गाँव-कसबे और उसके वाशिंदों को लेकर किया गया चिंतन तो बाल साहित्य में एकदम नया है l विनायक जी की चित्रोपम शैली भी ताजगी भरी होती है l पाठक जैसे पढ़ नहीं, कोई फिल्म सी देख रहा होता है l उनकी कलम से सियारू का वर्णन देखिए : और अब समय आगे बढ़ गया है। माँ के चुंबन तथा उसके पीछे लगे रहने वाला सान्निध्य, सब वक्त के प्रवाह में बह गए हैं। सियारू अब जंगल में हैं। एकदम अकेले। लेकिन कस्बे के साए में बिताए हुए दिनों में उन्हें जो खट्टे-मीठे व जीभ जला देने वाले, तिक्त, अनुभव हुए हैं, उन्हें वे भूले नहीं हैं। वे आज भी उनकी दुम पकड़े लटके हुए हैं। एक तो सियारू का कोमल मन आज तक इस गुत्थी को सुलझा नहीं पाया कि मनुष्य क्यों कुछ जानवरों को इतना लाड़ देता है और क्यों कुछ के पीछे ही पड़ा रहता है। कभी-कभी तो जान ले लेने तक। और कुछ नहीं तो पीछे कुत्ते ही छोड़ देता है। जानवर के पीछे जानवर। खूँखार। पक्के दुश्मन बनाए हुए। आखिर ऐसा क्यों? और इसी भारी-भरकम 'क्यों' का उत्तर सियारू आज तक नहीं खोज पाए। अब इसी दो मुँहे इंसानी व्यवहार से ही तो आजिज आ कर सियारू इतने परेशान हुए कि वयस्कता की दहलीज चूमते ही वानप्रस्थी हो गए। कस्बे के आस-पास पल रहे मोटे चूहों तथा इधर-उधर पड़े, मनलुभावने खाद्य-पदार्थों का मोह त्याग उन्होंने जंगल का रुख कर लिया। और अब उन्होंने कस्बे के मुर्गे-मुर्गी चुराने और हर समय जान जोखिम में डालने वाले जीवन से मुक्ति पा ली थी।

भगवती प्रसाद द्विवेदी की पुस्तक ‘मेरी प्रिय बाल कहानियां’ की कहानियाँ किसी-न-किसी रूप से गांव से जुड़ी हुई हैं। इनके कथानक और परिवेश तो ग्रामीण जीवन के हैं ही,लोक की खुशबू भी इनमें महसूस की जा सकती है।  'नकली महात्मा',जिसका नायक सीतू गांव की मित्र-मंडली के साथ कबड्डी खेल रहा होता है, तभी मैदान में एक मजमा लगाए महात्मा को देख सभी वहां जा पहुंचते हैं। महात्मा जब पानी पर तैरते चमत्कारी पत्थर को दिखाकर ग्रामीणों को मूर्ख बना रुपये ऐंठना चाहते हैं तो सीतू आगे बढ़कर वैज्ञानिक तरीके से सच का पर्दाफाश करता है और नकली महात्मा की पोल खोलता हैl

गाँव में अशिक्षा के चलते अनेकानेक अन्धविश्वास प्रभावी रहते हैं l भोले भाले गाँव के लोग इस कारण धूर्तों की चालबाजी के भी शिकार हो जाते हैं l अखिलेश श्रीवास्तव चमन की  ‘जंतर मंतर’ कहानी में लुटेरे ज्योतिषी बनकर आते हैं और गृह नक्षत्रों का भय दिखाकर तंत्र मंत्र की बात करते हैंl (बाल किलकारी,  जून 2019)

इन पंक्तियों के लेखक (डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’) की कहानी ‘गौंतर’ में गाँव का परिवेश ही नहीं, भाषा भी रची-पगी है l मेहुल एक विशेष कारण से मामा के गाँव नहीं जाता l मामा पूछ पूछ कर थक जाते है तब जाकर अंत में रहस्य खुलता है कि उनके यहाँ शौचालय नहीं है l सब  खुले में जाते हैं l मामा का जवाब देखिए : 'बचुआ, अब बहु जमाना गओ। गाँव मां हर बखरी... मतलब मकान के सामने सरकार ने शउचालय बनवाय दय हयिं।... हमने तउ खुदइ बनवाइ लओ रहयि। अब तुम्हई कोई दिक्कत नाहि हुयहयि। तुमने पहिले काहि नाहिं कही ?' (बाल वाणी, जुलाई 2016, पृ. 18 )

मनोहर चमोली मनु की सच्ची हास्य कहानी  ‘कहीं संतला न आ जाए’ की नायिका संतला पहाड़ी गाँव में रहती है जिसका मुर्गा चोरी हो जाता है l वह एक हाथ में लानटेन और चिमटा लिए हर घर के चूल्हों पर चढ़े बर्तन चेक करती है l वह जिस घर से निकलती, कोई न कोई बच्चा उसके साथ हो लेता l इससे एक रेल सी बन गई और इस रेल का स्टेशन था हर घर की रसोई l उसे विश्वास है कि वह खुशबू से ही अपने मुर्गे को पहचान लेगी l मजा तो तब आता है जब मुर्गा उसके ही घर में छिपा मिलता है (साइकिल दिसंबर-जनवरी 2020, पृ. 51)

बाल साहित्य आलोचना को आगे बढाने वाले डॉ. प्रकाश मनु की कहानी ‘जमुना दादी’ के भी क्या कहने l वे बच्चों को कहानियां सुनाती हैं l जामुन खिलाती हैं लेकिन उनके जाने के बाद वह जामुन का पेड़ बहुत उदास नजर आता थाl जैसे जमुना दादी को याद कर वह पेड़ भी रो रहा हो l जामुन तोड़कर खाने का ख्याल मन में नहीं आता था l  (ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियाँ, पृ.67)

इन दिनों बालगीत के क्षेत्र में महारत प्राप्त प्रभुदयाल श्रीवास्तव ने अच्छी बाल कहानियां भी लिखी हैं l गाँव से जुडी उनकी कहानी बिजली या विज्ञान के अन्य चमत्कारों से सतर्क और सावधान रहने की प्रेरणा देती हैl (दादाजी का पद्दू,पृ. 46)

नए रचनाकार निश्चल की ‘कंचों की चमक’ विक्कू और उसके आनंद सर की मनोवैज्ञानिक कहानी है l सरल-सहज और स्वाभाविक भाषा में लेखक ने एक बालक के जीवन में परामर्श और निर्देशन की ज़रूरत को उकेरा हैं l गाँव में तो इसकी विशेष रूप से आवश्यकता है l (कंचों की चमक, पृष्ठ 27)

डॉ. राकेश चक्र की कहानी ‘कुटवारिन दादी’ में गाँव में विद्यमान अस्पृश्यता के निवारण में दादी की प्रणम्य भूमिका का वर्णन है l सामाजिक समरसता की दृष्टि से ऐसी रचनाओं की सदैव आवश्यकता है l (लजीज पुलाव, पृष्ठ 8) 

राजा चौरसिया ग्रामीण अंचल में जीवन यापन करने वाले समर्थ कवि हैं l उनकी कहानी ‘श्यामू की सोच’ नवीनता के साथ साथ पुरातनता के संरक्षण का भी पक्ष उद्घाटित करती है l यह प्रतीकात्मक कहानी हैl नया भी कभी पुराना होगा इसलिए हमें अपने बुजुर्गों के प्रति भी निष्ठावान रहना चाहिएl (गाँव की पूजा, पृष्ठ 18)

रजनीकांत शुक्ल ने वीर बच्चों की सच्ची कहानियां लिखी हैं l उनकी पुस्तक बहादुरी की प्रेरक घटनाएँ (2015) में ज्यादातर गाँव के ही बच्चे हैं l गाँव के बच्चों का अदम्य साहस देखने के लिए शुक्ल जी की ये कहानियाँ सदैव अपना महत्त्व परिलक्षित करती रहेंगी l 

दयाराम मौर्य रतन की कहानी ‘भूत’ गाँव में प्राय: विद्यमान अंधविश्वास पर केन्द्रित हैl इसमें शिक्षा का महत्त्व भी सरलता से वर्णित है l (परीलोक का भ्रमण, पृ. 29)

डॉ. बानो सरताज की गीतों भरी कहानी की पुस्तक ‘कुछ तुम बोलो कुछ हम’ में संकलित शिक्षाप्रद कहानी ‘अब काहे के सौ’, में गांव के गोविंदा के संवाद रीझ लेते हैं : दस  में खरीदी आल्टी-बाल्टी, दस में खरीदी रस्सीl  अब काहे के अस्सी ? (पृ. 64)

डॉ. शशि गोयल की कहानी ‘सलोनी’ में दादी के प्रति बच्चों के संवेदित प्रेम की झलक है और गांव की अलमस्ती का आनंद भी l  (सींग वाले शैतान, पृ. 24)

शुभदा पांडे की कहानी ‘जोडागाछ के सहचर’ में तूफान के बाद गांव में मची तबाही का क्या मार्मिक वर्णन है ! ऐसी कहानियाँ रोमांचक तो होती ही हैं, विषम परिस्थितियों से जूझने का जज्बा भी परोसती हैंl पुस्तक (इंदुपरी का पत्र, पृ. 27)

डॉ. अमिता दुबे की कहानी ‘अनोखी छुट्टियां’ में दादी के बीमार होने की सूचना पर पापा के साथ गांव पहुंचे क्षितिज का वापस आने का मन ही नहीं करता l बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ने और उन्हें अपनी थाती से परिचित कराने का भी जिम्मा हमारा ही है l शहर में बस चुके महानुभावों को इस दिशा में सोचना होगा (नंदन, मई 2016 , पृष्ठ 48)

बाल साहित्य आलोचना के क्षेत्र में विशेष सक्रिय डॉ. शकुंतला कालरा की कहानी ‘नंदू की सूझबूझ’ में नंदू गांव से अपने मां के साथ दिल्ली का विश्व पुस्तक मेला देखने आता हैl कहानी का विषय एकदम नया है l बच्चों को अधुनातन जानकारी दिलाना भी लेखकों का दायित्व है और इस दृष्टि से यह कहानी अत्यंत उपयोगी हैl ( (माँ का उपहार, पृ. 29)

प्रभात गुप्त की एक कहानी ‘बंदरों की निर्मम हत्या’ मे गाँव बेला के लोग बंदरों के आतंक से पीड़ित होने के कारण उन्हें पीट-पीट कर मारना शुरू कर देते हैं l यह कहानी वन्यजीवों के प्रति दया भाव  के सन्देश के साथ साथ ऐसे अमानुषिक लोगों पर वैधानिक प्रक्रिया की भी शिक्षा देती है (पृ. 46)

डॉ. सत्य नारायण सत्य की कहानी काले काले तेज उजाले  कस्बानुमा गांव की कहानी है जिसमें अंधेरे में रहने वाले बच्चों की परिस्थितियों का वर्णन हैl कहानी में सहज हास्य भी विद्यमान है : अँधेरा कायम रहे l (शिविरा, सितंबर 2023, पृ. 69) 

डॉ. मोहम्मद साजिद खान ने ग्राम्य परिवेश के अनुभवी और परिपक्व लेखक हैं l उनकी ‘होली कुछ ऐसी भी’ कहानी साम्प्रदायिक सद्भाव की प्रेरक कहानी है l गाँवों के डेलखेड़ा भवानीपुर, कल्यानपुर, चमकनी, पैदापुर और गिरगिचा जैसे नाम कहानी को यथार्थ से जोड़ देते हैं l कहानी का अभीष्ट हमारे धर्म निरपेक्ष देश की असली ताकत को बयां करता है l दृष्टव्य : मियाँ को सारी वस्तु- स्थिति समझने में देर न लगी। उन्होंने बात संभालते हुए धीरे से मिट्ठू के कान में कहा -"गुलाल है रे l मिट्टू यह बात सुन अचरज से बोल उठा- "मियाँ तुम और गुलाल...??" 

मियाँ ने जमीला चाची की ओर देखा। जमीला चची ने उनकी आँखें पढ़ लीं- "हाँ-हाँ, क्यों नहीं! रंगों की कोई जाति या धर्म नहीं होता...!" उनके इतना कहते ही मुट्ठी-मुट्ठी गुलाल से पूरा आसमान रंग गया। सभी सराबोर हो गए। वातावरण फिर से चुहल, हुल्लड़ और उल्लास में बदल गया।  (बाल वाटिका, मार्च 2022, पृष्ठ 22)

गाँव से जुडी कहानियाँ तो इतनी हैं कि अनेक शोध प्रबंध लिखे जा सकते हैं l शोधकर्ताओं के लिए यह एक नया विषय होगा तथापि गाँव में शहर (डॉ. राष्ट्रबंधु), घमंडी बढई (डॉ. रोहिताश्व अस्थाना), हीरा मुझे माफ़ करना (डॉ. भैरूंलाल गर्ग ), बल्दू का छोटा भाई किशन (इंदरमन साहू), जंगल का भूत (हूंदराज बलवाणी), एक था गोलू (रूप सिंह चंदेल), मदन का भाई नंदू (कमल चोपड़ा), सुक्खो का भूत (कमलेश भट्ट कमल), गांव की सैर (दिनेश पाठक शशि), जल उठे दिए (नीलम राकेश), बैक वार्ड या स्मार्ट (शिखरचन्द्र जैन), तीन शिकारी (चित्रेश), लाट साहबों का पानी (गोविन्द शर्मा), बात की कीमत (रतन सिंह किरमोलिया), मिट्ठू चाचा (पवन कुमार वर्मा), कला का सम्मान (रमेश चन्द्र पन्त) जैसी ढेर सारी कहानियाँ हैं, जहाँ गाँव का पसारा है l जहाँ गाँव के विविध स्वरूप हैं l जी हाँ, उस प्रणम्य गाँव के, जहाँ सहजता है, सरलता है, मौलिकता है l नैसर्गिकता है l प्रकृति का वैभव है l जिजीविषा है l आस है l आत्मविश्वास है l ...और सबसे बड़ी बात कि हमारी थाती है जो याद दिलाती है कि हम कितने भी अधुनातन क्यों न हो जाएँ, हमारी जड़ें गाँव में हैं क्योंकि हमारे पुरखों ने यहीँ अपना जीवन बिताया है l यहां के खेतो की मिटटी में उनका पसीना बरसा है और अंत में उनके शरीर की राख भी इसी मिटटी में मिल खप गई है l इस मिटटी का ऋण कभी चुकता न होगा l अपने गाँव की इस मिटटी को नमन करने के लिए हम इससे जुड़े रहें और अपने बच्चों को जोड़े रहें l

बाल कहानियों में जब गाँव ध्वनित होता है तो वह बच्चों में संवेदनाएं भी जगाता है l इस बहाने अपनों लगाव बना रहेगा l रिश्ते बचे रहेंगे l प्रेम बचा रहेगा l प्रेम है तो वास्तविक जीवन है अन्यथा हम मशीन तो बनते ही जा रहे हैं l  

आइए, जीवन की तलाश में गाँव की सोंधी महक वाली बाल कहानियों का स्वागत करें l 

■ डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’, 237, सुभाष नगर, शाहजहांपुर-242 001 (उत्तर प्रदेश) 

(बाल वाटिका, मई 2024 अंक में प्रकाशित)

बुधवार, 2 मई 2018

समीक्षा : बाल साहित्य के पहले इतिहास का संशोधित संस्करण : बालगीत साहित्य (निरंकार देव सेवक)


    निरंकार देव सेवक लिखित  बाल गीत साहित्य इतिहास और समीक्षा अकेला ऐसा ग्रंथ  है जो तीन बार अलग-अलग कलेवर में संशोधित-सम्पादित होकर छपा।
    1966 में सर्वप्रथम इसका प्रकाशन किताब महल, इलाहबाद से हुआ था। इसके पश्चात ही बाल साहित्य में पी-एच.डी. और समीक्षा स्तर के कार्यों की शुरुआत हुई। सेवक जी के इस ग्रंथ  में अन्य भाषाओं में रचित बाल साहित्य का  तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत किया गया था और बड़ी बात यह कि पूरी निष्पक्षता के साथ कवियों और उनकी रचनाओं की चर्चा की गयी। 
    कालांतर में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान  से प्रकाशित संशोधित संस्करण  (1983) में तो कवियों के दुर्लभ चित्र भी उपलब्ध हैं। ग्रन्थ में इतिहास के लिए अपेक्षित सन्दर्भ ग्रंथों  का भी ईमानदारी से उल्लेख्य किया गया है। 
    तृतीय संस्करण 2013 में डॉ. उषा यादव के सम्पादन में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान  से ही आया है, जिसकी समीक्षा यहाँ प्रस्तुत है :-




पुस्तक : बाल गीत साहित्य इतिहास और समीक्षा
लेखक: निरंकार देव सेवक, संपादक: प्रो. उषा यादव
प्रकाशक : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान
6, महात्मा गांधी मार्ग, लखनऊ-226001 (0522-2614470,2614471)
संस्करण (संशोधित) 2013 
मूल्य: 245 रुपये,  
समीक्षकः डा. नागेश पांडेय संजय


हिंदी में बाल-साहित्य आलोचना की परंपरा को लगभग सात दशकों का समय व्यतीत हो चुका है। इस कालावधि में बाल साहित्य और उसके विविध पक्षों पर बहुत महत्त्वपूर्ण कृतियां और शोध प्रबंध लिखे गए हैं। इधर कुछ वर्षों में तो बालसाहित्य की ढेरों समीक्षा पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और इनसे बाल साहित्य का मानवर्द्धन हुआ है किंतु जब ध्यान जब एकदम शुरुआत की तरफ जाता है तो निःसंदेह निरंकार देव सेवक किसी देवदूत की तरह नजर आते हैं जिन्होंने उस जमाने में, जबकि बाल साहित्य पर आधार सामग्री थी ही नहीं या थोड़ा बहुत यदि कुछ था भी तो न के बराबर, ऐसे में 1966 में किताब महल, इलाहाबाद से प्रकाशित अनेक राहों को खोजता और बनाता ग्रंथ बालगीत साहित्यलिखा जो परवर्ती बाल साहित्य लेखकों तथा समीक्षकों के लिए प्रकाश स्तंभ सिद्ध हुआ है। विभिन्न परंपराओं का सूत्रपात करने की दृष्टि से इस बेजोड़ ग्रंथ की कालजयी महत्ता है। बाल साहित्य में तात्विक समीक्षा का कार्य हो या इतिहास-लेखन, शोध-कार्य हो या तुलनात्मक अध्ययन, इन सभी के मूल में सेवक जी का ग्रंथ ही आधार-रूप में विद्यमान रहा है।

1966 में जबकि कृष्ण विनायक फड़के की पुस्तक बालदर्शन’ (1946), श्रीमती ज्योत्स्ना द्विवेदी की कृति हिंदी किशोर साहित्य’ (1952) और डाॅ. देवेंद्रदत्त तिवारी द्वारा संपादित बाल साहित्य की मान्यताएं एवं आदर्श’ (1962)  के सिवाय कोई और समीक्षा कृति थी ही नहीं, ऐसे में उन्होंने बाल साहित्य की महत्वपूर्ण विधा कविता के स्वरूप और प्रयोजन की चर्चा करते हुए उसके मूल्यांकन की दिशा में अपनी तरह का यह पहला काम किया।  
प्रथम संस्करण 1966 
   सेवक जी की इस कृति से केवल बाल साहित्य समीक्षा के क्षेत्र में ही नहीं, वरन् विश्वविद्यालयों में भी बाल साहित्य आलोचना तथा अनुसंधान की दिशा में संभावनाओं का सूत्रपात हुआ। प्रारंभिक बाल साहित्य शोधार्थियों के लिए यह कृति गहन अंधकार में प्रखर प्रकाश जैसी सिद्ध हुई। वर्तमान शोधार्थियों तथा समीक्षकों हेतु भी यह कृति एक अपरिहार्य संदर्भ ग्रंथ की भांति अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है। 
किसी भी पी-एच.डी. स्तर के शोध से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण इस ग्रंथ की पांडुलिपि को देखकर उनके एक मित्र ने कहा भी था- यह तुमने बिल्कुल नए विषय पर इतना काम किया है। इस पर तो तुम्हें किसी विश्वविद्यालय से डाॅक्टरेट मिल सकती है। सेवक जी ने उक्त प्रसंग को हँसकर टाल दिया था। 
फिलहाल उनकी कृति ने हिंदी बाल साहित्य में आलोचना और अनुसंधान को दिशा दी और बहुतों को डाक्टरेटकी उपाधि मिली।

सेवक जी की कृति बालगीत साहित्य बाल साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसी अनोखी और अकेली किताब है जो अब तक तीन बार अलग-अलग रुप और अंदाज में प्रकाशित हो चुकी है।
संशोधित संस्करण (1983)
दूसरी बार यह कृति
1983 में बालगीत साहित्य: इतिहास एवं समीक्षा नाम से स्वयं सेवक जी के द्वारा ही संशोधित और परिवर्द्धित होकर उ.प्र. हिंदी संस्थान से प्रकाशित हुई थी. खास बात यह कि इस संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण में प्रो. उषा यादव ने भरपूर श्रम किया है और इस ग्रंथ को अद्यतन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, इसके बाद भी पुस्तक की मूल भावना या संवेदना कहीं पर से प्रभावित नहीं हुई है। बड़ी बात यह भी कि उषा  जी ने बिना किसी पूर्वाग्रह या पक्षपात के उच्चकोटि की बाल कविताओं को ससम्मान उद्धृत किया है, वहीं बाल कविताओं के नाम पर खिलबाड़ जैसी लचर रचनाओं को आड़े हाथों लेकर अभूतपूर्व साहस का परिचय भी दिया है। 
प्रो. उषा यादव द्वारा संपादित यह ग्रंथ 524 पृष्ठों में कुल 14 अध्याय स्वयं में समेटे है जो कि इस प्रकार हैं-1. बाल स्वभव 2. बडों की कविता और बाल गीत 3. अलिखित बालगीत 4. शिशु गीत साहित्य 5. चांद तारों के बाल गीत 6. लोरियां, प्रभाती और पालने के गीत 7. हिंदी बालगीतो  का वर्गीकरण 8. हिंदी बालगीत साहित्य के इतिहास की भूमिका 9. हिंदी बालगीत साहित्य का इतिहास 10. हिंदी के राष्ट्रीय बालगीत 11. बालगीतो की शिक्षा एवं रचना  शिक्षा 12. लोकगीतों में बालगीत 13. हिंदी और अंग्रेजी बालगीत 14. भारती भाषाओं में बालगीत साहित्य 
उपर्युक्त अध्यायों के शीर्षकों से एक बात मोेटे तौर पर स्पष्ट हो जाती है कि बाल कविता के समूचे परिदृश्य को संजीदगी से समझनें के लिए यह एक बहुत ही जरुरी पुस्तक है। सेवक जी एक ऐसे समर्थ रचनाकार थे जिनकी कविताएं स्वयं मानक हैं। उनके कथन परिभाषा हैं। वे मानते थे कि बाल साहित्य बच्चों के मनोभावों, जिज्ञासाओं और कल्पनाओं के अनुरूप हो। जो बच्चों का मनोरंजन कर सके और  मनोरंजन भी वह जो स्वस्थ और स्वाभाविक हो। जो बच्चों को बड़ों जैसा बनाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें अपने अनुसार-अपने जैसा बनाने में सहायक हो।
उनकी सोच व्यापक थी, यही कारण है कि उक्त ग्रंथ की रचना करते समय उन्होंने बाल कविता के विस्तृत फलक को अपने अध्ययन का विषय बनाया। कविताओं की चर्चा करते समय किसी मित्रवाद या क्षेत्रवाद के वशीभूत नहीं हुए। न जाने कितने लोंगों से पत्राचार किया। दिग्गज से दिग्गज, नए से नए और गुमनाम: सभी से उनका  संपर्क था। इसीलिए चाहे बालक अमिताभ बच्चन के लिए उनके कवि पिता हरिवंश  राय द्वारा बाल कविता लिखने की बात हो या स्वर्ण सहोदर की प्रकाशन समस्या की पीड़ा। सब कुछ उनकी किताब में सहज मुखरित हुआ। यही कारण था कि उनकी यह कृति केवल बाल कविताओं का ही नहीं, बाल कवियों के अनुभवों और रचना प्रक्रिया का भी दस्तावेज बनी।  
 बता दें कि सेवक जी द्वारा पुनर्प्रस्तुत तथा संस्थान से 1983 में प्रकाशित संस्करण में 17 अध्याय थे लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि नए संस्करण में उषा जी ने किसी अध्याय को समाप्त किया गया हो। हां, आवश्यकतानुसार उन्हें कम-ज्यादा अवश्य  किया गया है। जैसे सेवक जी ने सूरदास पर अलग से सातवां अध्याय लिखा था जिसे उषा जी ने आठवें अध्याय में बहुत ही संक्षेप में लिया है। ऐसे ही सेवक जी ने बालगीतो की  शिक्षा और बालगीत रचना शिक्षा दो अलग अध्याय शामिल किए थे जिन्हें उषा जी ने एक ही अध्याय में समाहित कर दिया है। सेवक जी द्वारा अंग्रेजी की तरह बंगाली बालगीत पर भी अलग से अध्याय था किंतु उषा जी ने इसे अंतिम अध्याय भारती भाषाओं में बालगीत साहित्य में स्थान दिया है। साथ ही पूर्णता की दृष्टि से राजस्थानी, वोडो, मणिपुरी, कोंकणी के बालगीतों पर भी यथासंभव चर्चा की है। 
हां, एक प्रश्न बार-बार  अवश्य  मन में कौंधता है कि द्वितीय संस्करण की भांति इस बार कवियों के दुर्लभ चित्रों को प्रकाशित क्यों नहीं किया गया ? क्योंकि सेवक जी के जमाने में, जबकि आफसेट प्रिंटिग की व्यवस्था नहीं थी, तब कितनी कठिनाइयों के साथ कवियों के चित्र एकत्र किए गए होंगे। उनके ब्लाक बनवाए गए होंगे। अब तो यह सब सहज संभव है। गए और नए जमाने के कवियों के चित्रों को एक स्थान पर देखना पाठकों के लिए प्रभावकारी तो होता ही, यह ग्रंथ पहले की भांति एक सचित्र कोश का भी काम करता। एक बात और ग्रंथ को अद्यतन बनाने की कोशिस में संपादक ने कदाचित लेखकों से उनके बायोडाटा मंगाकर भी काम चलाया होगा या किसी परिचय कोश का सहारा लिया होगा, जो कि स्वाभाविक था किंतु इससे कुछ एक कवियों के बारे में भ्रामक सूचनाएं संकलित हो गई हैं। जैसे एक कवि ने कई बाल कवियों के संकलन 'मूछे ताने पहुचे थाने' को अपनी ही निजी पुस्तक बता दिया है। निश्चय ही इस दिशा में अतिरिक्त सतर्कता अपेक्षित थी।  
बहरहाल अमीर खुसरो से लेकर भारतेंदु और फिर स्वतंत्रता से पूर्व तथा पश्चात की बाल कविताओं का यह श्रमसाध्य इतिहास अनुपमेय है। प्रो. उषा यादव की आधुनिक समीक्षा दृष्टि ने पुनः इसे एक लंबे समय के लिए संग्रहणीय और पठनीय बना दिया है। बाल साहित्य को ऐसी अनमोल कृति देने वाले सेवक जी की पुण्यात्मा को बारंबार नमन करते हुए सफल संपादक प्रो. उषा यादव के साथ-साथ  संशोधित संस्करण के प्रकाशन हेतु उ.प्र. हिंदी संस्थान को भी हार्दिक बधाई। 
 (यह समीक्षा बाल वाटिका,मासिक, जून 2014 के पृष्ठ :51 पर प्रकाशित हुई थी।)