समीक्षा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
समीक्षा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 5 मई 2024

भारतीय बाल साहित्य का एक और इतिहास

ग्रंथ : भारतीय बाल साहित्य का इतिहास

लेखक : प्रोफेसर (डॉ.) त्रिभुवननाथ शुक्ल

प्रकाशक : कश्यप पब्लिकेशन बी-15/जी-1, दिलशाद एक्सटेंशन-2, डीएलएफ, गाजियाबाद-05 (उ.प्र.)

 फोन: 09868778438 

संस्करण: 2021

मूल्य: 350/- रुपए

समीक्षक : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

प्रोफेसर (डॉ.) त्रिभुवननाथ शुक्ल, डी. लिट्. ,रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर (मध्यप्रदेश) के हिंदी एवं भाषाविज्ञान विभाग में आचार्य एवं अध्यक्ष पद पर कार्यरत रहे हैं। उनकी समर्थ लेखनी और अनथक श्रम से 'भारतीय बाल साहित्य का इतिहास' जन सामान्य के लिए सुलभ हुआ है। 

एक समय था,जब विभिन्न मंचों पर बार-बार बाल साहित्य के इतिहास लेखन की आवश्यकता उदघाटित की जाती थी। प्रसन्नता और गर्व का विषय है कि अब इस दिशा में निरंतर सक्रियता देखते ही बनती है। यद्यपि बाल साहित्य के पूर्ण और प्रामाणिक इतिहास लिखे जाने की जरूरत हमेशा रहेगी। बाल साहित्य का पहला इतिहास रुहेलखंड की धरती से 1966 में निरंकार देव सेवक जी ने लिखा था बाल गीत साहित्य इतिहास एवं समीक्षा। इसके बाद काफी लम्बे समय तक इस दिशा में सन्नाटा रहा। बहुतों ने गाल बजाए लेकिन किसी ने पहल नहीं की। भला हो जयप्रकाश भारती का जिन्होंने भारतीय बाल साहित्य का इतिहास 2002 में संपादित किया। प्रकाश मनु ने बहुत मेहनत करते हुए, अपने दम पर हिंदी बाल साहित्य का इतिहास (2015) लिखा। शकुंतला कालरा ने हिंदी बाल साहित्य विधा विवेचन ग्रंथ का संपादन किया, उसमे भी इतिहास की झलक है।

वर्ष 2021 में प्रकाशित भारतीय बाल साहित्य का इतिहास के लेखक प्रो. शुक्ल हिंदी साहित्य के उद्भट विद्वान हैं। उनका व्यक्तित्व जलनिधि-सा है। भीतर कितने रत्न मणियां समेटे हैं लेकिन कोई प्रदर्शन नहीं। मौन साधक हैं। गंभीर कार्य करते हैं। शोर शराबे में तो उनका कभी भी विश्वास नहीं रहा ।

उन्होंने पहले भी सन 2009 में डॉ. राष्ट्रबंधु जी के साथ मिलकर भारतीय बाल साहित्य की भूमिका पुस्तक का सहलेखन किया था। यह ग्रंथ उन्होंने राष्ट्रबंधु जी और प्रतीक मिश्र जी को समर्पित किया है। 39 अध्यायों में विभक्त इस इतिहास में बाल पत्रकारिता और बाल साहित्य समीक्षा पर भी बात की गई है। ग्रंथ में 1. असमिया 2. उड़िया 3. उर्दू 4. अँगरेज़ी 5. कन्नड़ 6. कश्मीरी 7. कोंकणी 8. गुजराती 9. डोगरी10. तमिल 11. तेलुगु 12. नेपाली 13. पंजाबी 14. बंगला 15. मणिपुरी 16. मैथिली 17. मराठी 18. मलयालम 19. राजस्थानी 20. सिंधी 21. संस्कृत और 22. हिंदी भाषाओं के बाल साहित्य की विवेचना की गई है। 

 इस इतिहास में हिंदी बालकाव्य और बाल कथा साहित्य में राष्ट्रीय एकता की अनुगूँज, कहानियों की कहानी, बालनाटक, बालोपन्यास, बाल जीवनियाँ, बाल साहित्य समीक्षा और बालसाहित्य में लघु रचना को लेकर सारगर्भित चर्चा है।

भूमिका में प्रो. शुक्ल जी लिखते हैं : 

"बालविकास में शारीरिक और मानसिक स्वस्थता को अन्योन्याश्रित मानना चाहिए। केवल पौष्टिक आहार के आधार पर बालकल्याण की योजना एकांगी और आधी अधूरी है। बाल कल्याण में बालशिक्षा और बाल साहित्य अपरोक्ष रूप से बालविकास को संचालित करते हैं। बालसाहित्य, बालकल्याण का मेरुदंड है।आधुनिक समस्त संदर्भों में बालक उपेक्षित और असहाय है। गरीबों के बच्चे अपने माता-पिता के स्नेह-पोषण से वचित हैं, क्योंकि माता-पिता आजीविका के लिए जो विवश हैं। शहरों में जब माता-पिता काम के लिए घर छोड़ते हैं तो बच्चा सोता रहता है और जब पिता देर रात में घर लौटता है तो भी बच्चा सोता मिलता है। देहातों में निम्न आर्थिक स्तर के माता-पिता, खेती किसानी या मजदूरी के काम से निकल जाते हैं तो बड़े बच्चे के ऊपर जिम्मेदारी आती है, अपने छोटे-भाई-बहिन को संभालने की।मध्यम श्रेणी के अभिभावक चाहे शहरों में रहते हों या देहातों में, अपने ही कामों में, घर से बाहर निकल जाते हैं और बच्चे उपेक्षित अनुभव करते हैं।उच्च श्रेणी के अर्थ संपन्न लोग खर्च कर सकते हैं लेकिन देखभाल नहीं करते। व्यवसाय, कार्यालय, क्लब, सभा अथवा संपन्न समाज में जाने में लोग अपना सम्मान मानते हैं। बच्चों की देखभाल, परिवरिश और शिक्षा की जिम्मेदारी के लिए दूसरों को ही नियोजित करते हैं। बच्चे उनके हैं, जिम्मेदारी दूसरों पर थोपते हैं।आधुनिक संदर्भ में आर्थिक, सामाजिक और अन्य कालों से पारिवारिक विघटन बहुत हो रहे हैं। बाबा-दादी, नाना-नानी, विशेष परिस्थितियों में ही, बच्चों के साथ अपने दिन बिताते हैं। 'माँ' कह एक कहानी जैसी परिस्थितियाँ आती हैं लेकिन आधुनिक माताएँ कैसेट या कामिक्स के विकल्प तैयार कर लेती हैं जिनमें लोरियाँ और प्रभावी गीत बच्चों के लिए सतही पूर्ति करते हैं। बड़ों के साथ का अभाव उन्हें सालता है।"

प्रो. शुक्ल ने बालक को लेकर विभिन्न परिस्थितियों के संदर्भ में चिंतन करते हुए भारतीय भाषाओं के बाल साहित्य के महत्त्व और उसके इतिहास को विश्लेषित किया है। वे बाल साहित्य की उपेक्षा से चिंतित भी हैं ; "आधुनिकता बनाम आर्थिकता ने जब बच्चों को अपने मौलिक अधिकारों से वंचित और उपेक्षित कर दिया है तो बालसाहित्य भी उपेक्षित और वंचित है। अतः समाज में बाल साहित्यकार अनादृत हैं। साहित्यकारों में बालसाहित्यकार दूसरी श्रेणी में परिगणित किए जाते हैं। साहित्य के इतिहास में बालसाहित्य के संदर्भ नहीं मिलते। भारत में शताधिक शोधग्रंथ बालसाहित्य पर उपलब्ध हैं, लेकिन उनका महत्व नहीं। इसका मुख्य कारण है कि बच्चा बेचारा है, बेसहारा है। बच्चे की जिम्मेदारी गरीब निभा नहीं पाता है जबकि अमीर उस जिम्मेदारी को दूसरों पर डालना चाहता है। मध्यम श्रेणी के लोग जिम्मेदारी जानते हैं लेकिन निभाने में मजबूर हैं।

यह विचारणीय विडंबना है कि हमारे धर्मग्रंथों में बालक की संज्ञा 'ईश्वर' दी गई है। बालक को ईश्वर का अवतार कहा जाता है। सूरदास हों या तुलसीदास, कंबन हों या सुब्रहमण्यम भारती, रवीन्द्रनाथ ठाकुर हों या गोपबंधु सभी बालवर्णन का गुणगान करते रहे हैं, लेकिन तालाब के किनारे नवजात शिशु को त्यागने के लिए बाध्य हैं। ऐसे अनेक अभिभावक हैं, जो जिम्मेदारी भगवान भरोसे छोड़ देते हैं। और 'दादर पुल के बच्चे' उपन्यास के राजीव पात्र बनकर असामाजिक तत्त्वों की आमदनी के माध्यम के लिए लूले लंगड़े बना दिए जाते हैं। अथवा अनैतिक धंधों में नियोजित कर दिए जाते हैं।

बच्चे के प्रति दायित्व निभाने वाले, न तो माता पिता समर्थ और योग्य हैं और न समाज के अन्य लोग। प्रवेश निषेध की चेतावनियाँ विद्यालयों में बच्चों के मौलिक अधिकारों का उपहास करती हैं। न अभिभावक कुछ कर पाते हैं, न समाज के लोग, न धर्माचार्य, न शासन के प्रतिष्ठित अधिकारी। इन सबकी दृष्टि में बच्चा समाज या देश का नहीं व्यक्ति का होता है।

जैसे जैसे किंडर गार्टन या मांटेसरी विद्यालय में अँगरेज़ी माध्यम से पढ़नेवाले बच्चे, प्राथमिक कक्षाएँ देखकर बाहर निकल जाते हैं माध्यमिक विद्यालयों में पढ़ने वालों की संख्या घट जाती है। उच्चतर कक्षाओं में और घट जाती है। महाविद्यालयों में सामर्थ्यवान लोगों को भाग्यशाली बच्चे ही पढ़ते हैं और कैरियर कक्षाओं की जानकारी न पाकर क्लर्कों की नौकरी तलाश करते हैं। कितने संगठन हैं, जो देहातों से शहरों तक फैल कर बच्चों को निर्देश देते हैं। कला, साहित्य, खेल, विज्ञान, अनुसंध गान आदि के आयोजनों की जानकारी देते हैं। कितने पुस्तकालय बच्चों के लिए हैं। साक्षरता की मंथर गति के रहते बालसाहित्य का विकास हो ही नहीं सकता। बच्चों के कार्यक्रमों को प्रोत्साहन मीडिया भी नहीं देता। प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया, बच्चों में वर्ग भेद उत्पन्न करते हैं। अमीरों के बच्चे उनकी प्रचार-प्रसार की परिधि में आते हैं, जो इंडियट बाक्स छोड़ना ही नहीं चाहते। गरीबों के बच्चों के कार्यक्रम बतौर फैशन प्रस्तुत होते हैं। ऐसे कार्यक्रम शायद ही जीवंत होते हैं। बालहित की चेतना से शून्य आज के बहुत से लेखक बालसाहित्य को कमाई का धंधा मानकर कार्य संपन्न करते हैं तथा घिसीपिटी शैली, बाबाआदम से चले चलाए घिसे पिटे विषय, व्याकरण और संस्कृति से पृथक सभ्य लोगों की भाषा में वे बालसाहित्य तैयार कर रहे हैं। इन लोगों की पांडुलिपियाँ सस्ते दामों में खरीद कर प्रकाशक अपना व्यापार चलाते हैं। रायल्टी की जगह कॉपीराइट में सौदा करते हैं और संस्करण में सन् लिखकर आवृत्तियाँ करते जाते हैं।"

प्रो. शुक्ल ने बड़े ही खुले शब्दों में बाल साहित्य के घुसपैठियों को बेनकाब करते हुए लिखा है,"बालसाहित्य के वे प्रतिष्ठित लेखक माने जाते हैं, जो सरकारी खरीद को प्रभावित करते हैं और थोक में बिक्री कराने की पात्रता रखते हैं। प्रकाशक भी बालसाहित्य छापकर रखना नहीं चाहता वह कामिक्स लेखक खोजता है। ऐसी पांडुलिपि अनुबंधित करना चाहता है जिसके लिए बाजार न खोजना पड़े जो इडली, कचौरी या समोसे की तरह हाथों-हाथ बिक जाए।

प्रकाशक जानता है कि बालसाहित्य केवल बच्चे नहीं पढ़ते। बच्चों की पुस्तकें, बड़े लोगों की पसंद पर ही खरीदी जाती हैं। इसलिए प्रकाशक आधुनिक संदर्भों में सेक्स, हत्या, मारधाड़ आदि से पूर्ण पुस्तकें तैयार करता है। प्रकाशक जानता है कि बड़े लोग तो इन्हें पढ़ेगे ही, बच्चे भी छुप छुप कर पढ़ेंगे और फिल्म शो जैसा लुत्फ हासिल करेंगे। किराए पर दूकानों से पुस्तकों की माँग खड़ी होगी, इसलिए वह अपने आर्थिक लाभ को ही देखता है सिद्धांतों से उसका कोई सरोकार नहीं होता। वर्तनी भाषा या संपादन से शून्य, बालसाहित्य का प्रकाशक बच्चों से कोई मतलब नहीं रखता। जो लोग बच्चों की पुस्तकें शौक में खरीदते हैं, उनके आगे पीछे घूमता है।

बड़ों द्वारा खरीदकर देने की आदत को प्रकाशक भुनाना चाहता है। अतः वह बालसाहित्य के नाम पर अविश्वसनीय वर्णन को कल्पना के नाम पर प्रस्तुत करता है। परी कथाओं, पौराणिक कथाओं और प्रेम गाथाओं की पुस्तकों को वह बालसाहित्य के खाते में रखकर धंधा करता है। ऐसा प्रकाशक एक ही पुस्तक को बालसाहित्य और प्रौढ़ साहित्य की पुस्तक बना देता है।

प्रकाशक बिकने के लिए छापता है अतः उसे कमाई चाहिए भले ही बच्चों के लिए तैयार की गई किताबें बच्चों तक न पहुँचे। बच्चों की किताबें कमीशन देकर भी बिकें तो बिकनी चाहिए। इन किताबों की बिक्री के लिए कमीशन में कार देनी पड़े तो दी जाएगी। प्रकाशक को इससे कोई मतलब नहीं कि दाम बच्चों की क्रयक्षमता का है या नहीं अथवा बालसाहित्य अलमारी या बक्से में बंद रहता है। उसे प्रौढ़ साक्षर पढ़ते है या कोई और प्रकाशकीय दृष्टि से आधुनिक बालसाहित्य का संदर्भ शुद्ध व्यावसायिक आर्थिक और स्वार्थपूर्ण रहता है। बच्चे की पसंद उसकी क्रयक्षमता और उसके हित की उपेक्षा करके प्रभूत बालसाहित्य प्रतिवर्ष छापा जाता है लेकिन भविष्य की बजाय वह भूतकाल का इतिहास तक नहीं बनाता और न अपनी देहरी से बाहर निकल पाता है।"

प्रो. शुक्ल ने हिंदी बाल साहित्य की दीर्घ कालीन यात्रा पर अपनी दृष्टि डालते हुए कहा है, "बालपत्रकारिता सन 1882 से बालदर्पण के रूप में हिंदी में उद्भूत हुई। 1917 में बालसखा और शिशु के माध्यम से पल्लवित और लक्ष्यगामी बनी। जनसंख्या वृद्धि के हिसाब से हिंदी में जितने पत्र प्रकाशित होने चाहिए, उतने हैं नहीं। बालभारती, बालवाणी, बालवाटिका, चकमक आदि बालपत्र विविध लक्ष्य लेकर प्रकाशित हो रहे हैं लेकिन बच्चों की आवश्यकताओं के अनुरूप हैं नहीं। अतः उपलब्धियाँ सीमित हैं। विद्यालयीन पत्रिकाओं की संख्या निराशाजनक हैं। प्रोत्साहन के क्षेत्र में सभी प्रकार के बालकों का कार्य ऊँट के मुंह में जीरा के समान है-एक अनार सौ बीमार।दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक आदि पत्र-पत्रिकाओं में बच्चों के स्तंभ बहुत लोकप्रिय हुए हैं। कला, चित्रकारी, प्रहेलिकाओं, नन्हीं कलम आदि स्तंभों से बाल स्तंभों तक में इनका समावेश किया गया है लेकिन जब कभी विज्ञापन मिल जाते हैं तो बच्चों के लिए निर्धारित स्थान पर ही अतिक्रमण किया जाता है। अखबारों के मालिक यह नहीं सोचते कि बच्चों के भविष्य के साथ उनका गाज गिरा देना, कालांतर में उनके अपने लिए ही नुकसान पहुँचाने वाला सिद्ध होगा। बच्चे जब सड़क पर बैटिंग करने को मजबूर होंगे तो कोई न कोई गैर खिलाड़ी आहत होगा ही।

प्रकाशन की इन विषम परिस्थितियों में बालसाहित्य का लेखन चल तो रहा है, यही क्या कम है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया और प्रिंट मीडिया ने बालक के मौखिक और लिखित बाल साहित्य को बहुत प्रभावित किया है। व्यावसायिकता ने सिद्धांतों का गला घोटना शुरू कर दिया है। फिल्मों और दूरदर्शन ने सभ्यता को भले ही अभिव्यक्ति दी हो लेकिन हमारे संस्कारों पर लगातार प्रहार किए हैं।"

शुक्ल जी वर्तमान बाल साहित्य में हो रहे जबरदस्ती के लेखन पर भी निर्भीक होकर अपनी बात रखना नहीं भूलते। "आज की कविता बालसाहित्य में विषयों की दृष्टि से चूहे, बिल्ली, हाथी, कुत्ते की अनाकर्षक ऐसी प्रस्तुति है जिसमें छंद और लय के दोष उसे निष्प्रभावी बना रहे हैं। अंग्रेजियत की फैशनपरस्ती में शुद्ध भाषा तिरोहित होती जा रही है। भारतीय भाषाएँ, भँवरजाल से अपना मार्ग नहीं बना पा रही है। मात्र 50-60 नर्सरी गीतों की अंग्रेजियत ने सहस्त्राधिक अच्छे शिशुगीतों के चलन में गत्यावरोध खड़े कर दिए है।

फैंटेसी के नाम पर बालकहानियों में बालसाहित्य बहुत उन्नत और समृद्ध है। फकीरमोहन सेनापति, साने गुरू जी, गिजूभाई, रवीन्द्रनाथ ठाकुर, सुकुमारन आदि से बालकहानियों का निर्झर सतत प्रवाहशील है। बालसाहित्य की खदान में बहुत सा संचित धन है जिसका उपयोग ही नहीं किया गया है।

बालनाटक, बालोपन्यास के क्षेत्र में आधुनिक बालसाहित्य इसलिए अधिक प्रभावशाली सिद्ध नहीं हुआ है क्योंकि इलेक्ट्रानिक मीडिया ने उसके प्रचार प्रसार पर अपना खूनी पंजा फैला दिया है। विदेशी फिल्में अपनी चकाचौंध से इन्हें बाहर फेकने लगी हैं।

फिल्मगीतों की कालकोठरी से अन्त्याक्षरी बाहर निकल नहीं पा रही है। इसने सूक्तियों और अच्छा सुभाषित पंक्तियों को बिसार दिया है। प्रतियोगिता और पुरस्कारों ने अश्लीलता को घर में जगह दे दी है फिर भी बालसाहित्य की हस्ती किन्हीं विशेषताओं के कारण नहीं मिटी।

प्रजातंत्र की दुहाई देने वाले प्रशासकों को बताना होगा कि प्रौढ़ शिक्षा चलाने की बजाय बच्चों की शिक्षा और बालसाहित्य पर पूरा ध्यान दें ताकि प्रौढ़ आंशकितों की संख्या अपने मूल में ही पनप न सके।

कुल मिलाकर इस ग्रंथ में बालसाहित्य के इतिहास के साथ साथ उसकी आवश्यकता को लेकर प्रबल तर्कों के साथ सविस्तार चर्चा की गई है। 

प्रोफेसर (डॉ.) त्रिभुवनाथ शुक्ल द्वारा प्रस्तुत यह भारतीय बाल साहित्य का इतिहास अपनी कुछ सीमाओं के बावजूद अत्यंत उपयोगी और महत्वपूर्ण है।

इस अच्छे काम के लिए प्रो. शुक्ल जी को बहुत बहुत बधाई !

आशा की जानी चाहिए कि बाल साहित्य इतिहास लेखन के गंभीर कार्य की दिशा में अन्य विद्वान भी प्रवृत्त होंगे और सतत चलने वाली यह धारा प्रवहमान रहेगी।

समीक्षक : डॉ. नागेश पांडेय संजय 

शुक्रवार, 24 नवंबर 2023

प्रतिनिधि बाल कविता संचयन


'प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन': एक शानदार कोशिश
•डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

पिछले दिनों हिंदी के सुप्रसिद्ध लेखक डा. दिविक रमेश के संपादन में एक महत्वपूर्ण संकलन 'प्रतिनिधि बाल कविता-संचयन' शीर्षक से प्रकाशित हुआ है। यह एक शानदार कोशिश है जिसके लिए साहित्य अकादमी की भरपूर सराहना की जानी चाहिए और अपेक्षा भी कि अन्य विधाओं में भी ऐसे अनुष्ठान भविष्य में निष्पादित होते रहेंगे। संकलन में नए-पुराने 195 रचनाकारों की अलग-अलग शेड्स की बाल कविताएँ हैं। संकलन में उन्हीं बाल कविताओं को चयनित किया गया है, जो आज के बालक की कविताए कही जा सकतीं हैं। इस दृष्टि से संपादक के श्रम और कौशल की प्रशंसा करनी होगी। बकौल संपादकः मेरी निगाह में कविताएँ वैज्ञानिक सोच, प्रतिकूल मूल्यों और अंधविश्वासों से मुक्त, कल्पना और जिज्ञासा को प्रेरित करने वाली लेकिन शैली में विश्वसनीयता की बुनियाद पर टिकी, नये प्रयोगों और नये ट्रीटमेंट से समृद्ध हों। कविताएँ पहले की तरह सीधे-सीधे उपदेशात्मक शैली की न हों। समझ पिरोयी हुई हो सकती है। (पृ. 7)

दिविक जी धुन के धनी और अत्यंत अनुभवी रचनाकार हैं। उन्होंने न केवल श्रेष्ठ बाल कहानियाँ और कविताएँ लिखी हैं बल्कि बाल साहित्य की आलोचना की दिशा में भी गंभीर कार्य किया है। अनुवाद की दृष्टि से भी उनका अवदान उल्लेखनीय है। आज के बच्चे की बदली हुई सोच और परिपक्व मानसिकता की ओर संकेत करते हुए वे संपादकीय में लिखते हैं: आज उसके (बालक के) सामने संसार भर की सूचनाओं का अच्छा खासा भण्डार है और उसका मानसिक विकास पहले के बालक से कहीं ज़्यादा है। वह बड़ों के बीच उन बातों तक में हिस्सा लेने का आत्मविश्वास रखता है जो कभी प्रतिबंधित मानी जाती रही हैं। आज का बच्चा प्रश्न भी करता है और उसका विश्वसनीय समाधान भी चाहता है। आज के सजग बच्चे की मानसिकता पुरानी मानसिकता नहीं है जो प्रश्न के उत्तर में 'डाँट' या 'टाल मटोल' स्वीकार कर ले। वह जानता है कि बच्चा माँ के पेट से आता है चिड़िया के घोंसले से नहीं। दूसरे, हमें बच्चे को पलायनवादी नहीं बल्कि स्थितियों से दो-दो हाथ करने की क्षमता से भरपूर होने की समझ देनी होगी। अहंकारी, उपदेश या अंध आज्ञापालन का जमाना अब लद चुका है। बात का ग्राह्य होना आवश्यक है। और बात को ग्राह्य बनाना, यह साहित्यकार की तैयारी और क्षमता पर निर्भर करता है। (पृ. 13)

संकलन की भूमिका अत्यंत विचारोत्तेजक और शोधपूर्ण है। दिविकजी ने न केवल बाल कविता के बदलते मिजाज को लेकर गंभीर विमर्श परोसा है अपितु बाल कविता जो कि बाल साहित्य का मूल भी है, के परिप्रेक्ष्य में बाल साहित्य के विविध आयामों की भी तात्विक चर्चा की है। बाल साहित्य में व्याप्त विसंगतियों को लेकर भी वे चिंतित दिखे हैं और बाल साहित्य लेखकों के यथोचित सम्मान हेतु भी उन्होंने तार्किक ढंग से अपनी बात रखी है। संकलन को उन्होंने चयन के रूप में प्रस्तुत किया है और कहा जा सकता है कि यह चयन अभूतपूर्व है। बाल साहित्य की अपनी शास्त्रीयता है। बाल कविता के सौंदर्यशास्त्र की आवष्यकता की ओर भी दिविकजी ने संकेत किया है।

हिंदी में जबरदस्त बाल कविताओं का अभाव तो नहीं है किंतु जबरदस्ती लिखी बाल कविताओं की खासी भरमार है। छपास के मोह में बहुत से लिक्खाड़ उत्तम साहित्य की सर्जना से बेफिक्र... बस पुस्तकों की संख्या बढ़ाने में लगे रहते हैं। येन केन प्रकारेण पुस्तक आनी चाहिए और उसके लिए कहीं न कहीं से पुरस्कार भी प्राप्त हो जाए, बस यही लक्ष्य रहता है। पिष्टपेषण और पुनरावृत्ति के शिकार रचनाकारों की यात्रा बहुत लंबी नहीं होती।

दिविक जी ने जहाँ इस संकलन में पुराने रचनाकारों की भी कालजयी रचनाओं को आज के संदर्भ में उपयुक्तता के आधार पर ससम्मान प्रस्तुत किया है, वहीं नए (और कुछ नवसिखुए) रचनाकारों की भी प्रतिनिधि बाल कविताएँ प्रोत्साहन और बाल कविता की वर्तमान स्थिति को जताने के उद्देश्य से संकलित की हैं।

बकौल संपादकः कहीं न कहीं मन में अधिक से अधिक नये रचनाकारों और उनकी सुयोग्य रचनाओं को स्थान देने की प्रबल इच्छा मन में थी ताकि बाल साहित्य के वर्तमान परिदृश्य के बारे में आकलन हो सके कि वह कितना समृद्ध है अथवा कितना कमजोर है। (पृ. 5)

बहरहाल बाल काव्य के क्षेत्र में आए नए कवियों में शादाब आलम की तरह कम ही लोग हैं, जिनकी बाल कविताएँ, नवीनता और छंद: दोनों ही दृष्टि से मुकम्मल बाल कविताएँ हों। सृजन अभ्यास चाहता है। कविता केवल तुकबंदी नहीं है। विषय की दृष्टि से अत्युत्कृष्ट कविताओं पर यदि शिल्प की दृष्टि से थोड़ा-सा श्रम कर लिया जाय तो इनका स्वरूप ही कुछ और हो जाता। बाल कविताओं में छद का बड़ा महत्व है, ऐसी कविताएँ बच्चे उछल उछल कर गाते और गुनगुनाते हैं। ऐसी कविताएँ उनके मन में बैठ जाती हैं। जबकि पद्म के रूप में गद्य जैसी कविताएँ बच्चे पढ़ तो लेते हैं किंतु वे उनके स्मृति पटल पर अंकित नहीं हो पातीं। लयहीन कविताओं की स्थिति स्वादिष्ट खीर में कंकड़ की भांति होती है। बच्चा कविताएँ क्यों नहीं पढ़ता ? अन्यथा लेने की बात नहीं है, मछली जल की रानी है जैसी कविताएँ पीढ़ियों से बच्चे की जुबान पर क्यों चढ़ी हैं? नवसृजन करते हुए इसका चिंतन अवष्य करना चाहिए। बच्चों की अदालत में हमारी कविता का हश्र क्या होगा, इस दिशा में लेखकीय जिज्ञासा-तत्परता जरूरी है।

706 पृष्ठों के इस ग्रंथाकार संकलन को देखकर किसी समुद्र-सा आभास होता है। हालाकि समुद्र में रत्न, मोती, शंख, मणियों के साथ-साथ घोंघे भी होते हैं। यह संकलन भी उस परिस्थिति से पृथक नहीं है।

यह चयन यह सिद्ध करता है कि बाल कविताओं का फलक अत्यंत व्यापक है। बच्चे की सोच आज पूरी तरह बाल कविताओं में मौजूद होनी चाहिए। यही नहीं, पुराने रचनाकारों की जो बाल कविताएँ बच्चे के मन को समझ कर लिखी गई थी, वे आज भी अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए हैं। समय के अनुसार यदि अन्य पुरानी बाल कविताओं में किंचित संशोधन और संपादन कर लिया जाए तो वे भी अपनी प्रासंगिकता सहज ही सिद्ध कर सकती हैं। यह चयन बाल कविता के क्षेत्र में मील के पत्थर की भांति है। बाल साहित्य में सदैव इसकी अनुगूँज बनी रहेगी और भविष्य के उच्चतम संकलनों के लिए यह चयन दिशा बोधक के रूप में कार्य करेगा, इसमें संदेह नहीं।

संकलन की शुरुआत श्रीनाथ सिंह (जन्म 1901) की कविता 'मुन्नी की हैरानी' से हुई है और संकलन की अंतिम कविता 'बड़ा' चन्द्रदत्त इंदु (जन्म 1935) की है। यानी की रचनाकारों का कोई प्रचलित क्रम (जन्म या अकारादि) नहीं है। संपादक के अनुसार रचनाएँ मिलने का क्रम अनुक्रम का आधार बना है।

काश! इस महत्त्वपूर्ण संकलन में जन्मतिथि का क्रम अपनाया जाता तो बाल कविता के विकास क्रम को समझने में सहायता मिलती। संकलन में न तो रचनाकारों का परिचय है और न ही पते । कविताओं के साथ कवियों के चित्रों का भी सामंजस्य किया जा सकता था। आगामी संस्करण में यह कार्य हो सके तो यह संकलन दुर्लभ और ऐतिहासिक महत्त्व प्राप्त करेगा। साथ ही इसे बालोपयोगी बनाने के लिए कविताओं के साथ खाली स्थान पर संबंधित चित्र भी दिए जाने पर विचार करना चाहिए।

...और अब संकलन की कुछ कविताओं पर चर्चा करने से पूर्व बाल कविता के प्रतिमानों पर दिविक जी की यह टिप्पणी अवश्य पढ़ ली जाए जो कि खासी विचारणीय है। रचनाकार के जेहन में उनका यह अभिकथन रहेगा तो बाल कविता के कदम निश्चय ही वैभवोन्मुखी रहेंगे। वे कहते हैं-जब मैं बालक की बात कर रहा हूँ तो मेरे ध्यान में शहरी, कस्बाई, ग्रामीण, आदिवासी, गरीब, अमीर, लड़की, लड़का आदि सब बालक हैं। भारतीय बच्चों का परिवेश केवल कम्प्यूटर, सड़कें, मॉल्ज, आधुनिक तकनीक से सम्पन्न शहरी स्कूल, अंतर-राष्ट्रीय परिवेश ही नहीं है (वह तो आज के साहित्यकार की निगाह में होना ही चाहिए), गांव-देहात तक फैली पाठशालाएँ भी है, कच्चे पक्के मकान-झोंपड़ियाँ भी हैं, उन के माता-पिता भी हैं, उनकी गाय-भैंस-बकरियाँ भी हैं। प्रकृति का संसर्ग भी है। वे भी आज के ही बच्चे हैं। उनकी भी उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।

इस संकलन में ऐसे ही बच्चों की उत्तमोत्तम बाल कविताएँ हैं। शिशु, बालक और किशोर: सभी आयु वर्ग के बालकों के लिए रचनाएँ चयनित की गई हैं।

हरिवंशराय बच्चन की आनंदित बच्चे के स्वाभाविक मनोभावों से पगी इस कविता का अंदाज देखिए। कोई सीख भी नहीं, फिर भी अंतः प्रेरणा और उत्सुकता जगाने का कैसा कौशल इसमें विद्यमान है-आज उठा में सबसे पहले, सबसे कहता आज फिरूँगा, कैसे पहला पत्ता डोला, कैसे पहला पंछी बोला, कैसे कलियों ने मुंह खोला, कैसे पूरब ने फैलाए बादल पीले, लाल, सुनहले। (पृ. 74)

भारतभूषण अगवाल की कविता तो जैसे किसी कुलगीत का आनंद देती है-हम पहाड़ पर रहते हैं। देवदार की बांह यहां, करती शीतल छांह यहां। भेड़ें चरती हैं घाटी में, झर झर झरने बहते हैं। हम पहाड़ पर रहते हैं। (पृ. 79) बाल काव्य में प्रकृति लेखकों का प्रिय विषय रहा है। देवेंद्र कुमार ने इस क्षेत्र में दस कदम आगे बढ़कर क्या खूब रचा है-कूड़े पर एक फूल खिला। सुंदर पीला फूल खिला। पृ.196

मधु पंत पेड़ का मानवीकरण करते हुए पेड़ के चलने की कल्पना करती हैं-यदि पेड़ों के होते पैर, सारा दिन वे करते सैर। (पृ.143) तो गोपाल राज गोपाल ने अगर कहीं जो चलते पेड़, बच्चों जैसे पलते पेड़। बेसुध माता लगती कहने, कहीं नीम को देखा तुमने? चार घड़ी से वह गायब है, वस्त्र हरे थे पहने उसने। (पृ.562) लिखकर बालकविता को किस ऊँचाई पर पहुँचा दिया है!

निरंकारदेव सेवक की चर्चित कविता: रोटी अगर पेड़ पर लगती, तोड़ तोड़ कर खाते। तो पापा क्यों गेहूँ लाते, और उन्हें पिसवाते। रोज़ सवेरे उठकर हम, रोटी का पेड़ हिलाते। रोटी गिरती टप टप टप टप, उठा-उठा कर खाते। (पृ. 42) यह जताती है कि बालकाव्य का सृजन कितना आह्लादकारी है। महादेवी वर्मा की घर में पेड़ कहाँ से लाएँ, कैसे यह घोंसला बनाएँ। किससे यह सब बात कहेगी। अब यह चिड़िया कहाँ रहेगी। (पृ. 700) कविता बाल संवेदनाओं से उपजी मार्मिक रचना है। बाल कविता में करुणा का समावेष भावी पीढ़ी में रागात्मक संबंधों की संभावनाएँ निरूपित करता है।
जल संकट और संचय को लेकर इस संचयन में प्रकाश मनु की बेजोड़ कविता है, जिसमें खिलंदड़ापन कूट-कूट कर भरा है- देखो पानी की शैतानी, ओहो चला गया है पानी। अभी बहुत हैं काम अधूरे, घर-भर को अभी नहाना था। छुटकू कूद रहा है कब से, उसको पिकनिक पर जाना था। पृ. 218 प्रभुदयाल श्रीवास्तव की अगर हमारे वश में होता, नदी उठाकर घर ले आते (पृ. 133) कविता की कल्पना भी गजब की है। ... और सुशील शुक्ल की इस नन्हीं कविता के तो कहने ही क्या एक पत्ते पर धूप रखी थी, एक पत्ते पर पानी। धूप ने सारा पानी सूखा, हो गई खतम कहानी। (पृ. 684)

वर्षा आई-वर्षा आई जैसी सामयिक कविताओं का ढेर लगानेवाले लिक्खाड़ों को सुभद्राकुमारी चौहान की यह कविता अवश्य पढ़नी चाहिए-अभी अभी थी धूप, बरसने लगा कहाँ से यह पानी? किसने फोड़ घड़े बादल के, की है इतनी शैतानी। (पृ. 698) इस तरह की अलग अंदाज की सामयिक कविताएँ कम ही
देखने को मिलती हैं। कृष्ण शलभ का सूरज से संवाद भी बहुत सरस और खिलंदड़ा है-रविवार ऑफिस बंद रहता, मंगल को बाजार भी। कभी-कभी छुट्टी कर लेता, पापा का अख़बार भी। ये क्या बात तुम्हीं बस छुट्टी नहीं मनाते हो? सूरज जी तुम इतनी जल्दी क्यों आ जाते हो? पृ. 243
नई रचनाकार दिशा ग्रोवर की कविता प्राकृतिक उपादानों की अभिलाषा जैसा एकदम नवीन विषय सृजित करती है-हम बच्चों के झूले खातिर, टहनी सदा झुकाएँ। कुछ पीड़ा सहकर भी वे तो, किलकारी फैलाएँ। लिख दे कविता 'पेड़ों पर हम, पेड़ चाहते होंगे। पृ. 434 सृष्टि पांडेय की कविता चिरों देवी सुनो सुनो, पंख नहीं है मेरे पास, बोलो कैसे करूँ प्रयास? क्या जहाज का टिकट कटाऊँ, तुम से भी ऊँचे हो आऊँ। (पृ. 507) चपल बच्चो में उपजती मौलिक युक्तियों की अभिव्यक्ति है।
प्रयाग शुक्ल की बढ़ती जाती नाव, कहाँ नाव के पांव! वह पानी पर चलती. चलती और मचलती। (पृ. 126) प्रयोगधर्मी रचना है।

संकलन में ऐसी भी कविताएँ हैं जिनमें शिक्षण के अनेकानेक आयाम समाहित हैं। जैसे रमेश कौशिक की पहेलीनुमाँ कविता बताती है कि पेड़ कहां-कहाँ नहीं है- तुम्हारी मेज कुर्सी, जिस पर तुम पढ़ते हो, मैं हूँ। मेले में, काठ का घोड़ा, जिस पर तुम चढ़ते हो, मैं हूँ। पतला सा कागज, जिस पर तुम लिखते हो, मैं हूँ। पृ.101

बाल कविताएँ बाल चिंतन से अनुप्राणित होनी चाहिए। बाल संदर्भित वयस्क चिंतन से युक्त कविताओं को बाल कविता नहीं कह सकते। ऐसी कविताओं से बड़े तो साहित्यिक आनंद पाते हैं, बच्चे नहीं। वात्सल्य रस के अंतर्गत आनेवाली रचनाएँ भी बाल साहित्य नहीं होतीं। वहाँ बाल क्रीडाओं से वयस्क प्रमुदित होते हैं। इस संकलन के प्रश्न 366 पर प्रकाशित इस वयस्क कविता का अंश देखिए-मुंह अंधेरे, साइकिल पर बस्ते की जगह होता था डीजल का जरीकेन। कभी होती ओस भरी पतली मेंड़ पर, डगमगाती साइकिल के कैरियर में, पुराने रबर ट्यूब से कसी गेहूँ की बोरी। रविवार को ही लगता था साप्ताहिक बाजार, लाना होता था पूरे हफ्ते की सब्जी, डालडा, भैंस के लिए खली, लालटेन का षीषा। यह कविता अच्छी होते हुए भी बाल कविता तो कतई नहीं है।
शिशुगीतों के उस्ताद शेरजंग गर्ग चुटीले अंदाज में लेखन के लिए समाद्भुत हैं। गुड़िया पर हिंदी में ऐसी रचना शायद ही दूसरी हो-गुड़िया है आफत की पुड़िया, बोले हिंदी, कन्नड़, उड़िया। नानी के संग भी खेली थी, किंतु अभी तक हुई न बुढ़िया। पृ. 99
संकलन में मनोरंजन जो बालसाहित्य का अनिवार्य तत्व है, से युक्त अनगिनत कविताएँ हैं। बानगी के तौर पर कुछ कवितांश देखिए आधी सच्ची आधी झूठी, सुनो कहानी। चींटे ने हाथी को काटा, हाथी ने गुस्से में आकर चींटे को जो मारा चांटा। चिल्लाया वो नानी नानी दामोदर अग्रवाल, पृ. 92

आठ फीट की टांगे होती, चार फीट के हाथ बड़े। तो मैं आम तोड़कर खाता, धरती से ही खड़े-खड़े। कान बड़े होते दोनों ही, दो केले के पत्री से। ती मैं सुन लेता मामा की, बातें सब कलकत्ते से-श्रीप्रसाद, पृ. 62

घ्एक था राजा एक थी रानी, दोनों करते थे मनमानी। राजा का तो पेट बड़ा था, रानी का भी पेट घड़ा था। काम यही था बक बक-बक बक। नौकर से बस झक झक झक झक-जयप्रकाश भारती पृ. 56

योगेंद्रदत्त शर्मा रचित सुनो पप्पू! मियाँ गप्पू । उड़ाते हो बिना पर की, सदा बातें अललटप्पू। (पृ. 327) और शादाब आलम की अगर हंसी का चूरन बिकता, खिला-खिला हर मुखड़ा दिखता। घर में कोई मुझे डाँटता, तो लाकर मैं इसे चाटता। (पृ. 390) कविताएँ भी प्रचुर मनोरंजन करती हैं।

संकलन का आकर्षण एक नए ढंग की लोरी भी है जो रमेश तैलंग ने लिखी है। सच, किताब को थपथपाते हुए बच्चे के सुमधुर स्वर की कल्पना कितनी रोमांचक है-रात हो गई तू भी सो जा, मेरे साथ किताब मेरी। सपनों की दुनिया में खोजा, मेरे हिसाब किताब मेरी। पृ.208

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की कविता-अगर कहीं मिलती बंदूक, उसको मैं करता दो टूक। नली निकाल बना पिचकारी, रंग देता यह दुनिया सारी। (पृ. 50) यह सिद्ध करती है कि बालसाहित्य केवल बालको के लिए ही नहीं होता। बड़ों के लिए भी इसके बड़े निहितार्थ हो सकते हैं।

कुसुम अग्रवाल और परशुराम शुक्ल की कविताएँ बच्चों को बड़ों के बचपन से जोड़ती हैं। साथ ही संवाद की दिषा में भी बच्चों के स्वर में स्वर मिलाती हैं-दादी जब तुम बच्ची थी, क्या हम सबसे अच्छी थी। शैतानी ना करती थीं, सभी बड़ों से डरती थी? कैसी थी तुम पढ़ने में? लड़ने और झगड़ने में? (पृ. 579) कुसुमजी की ही तरह षुक्लजी भी बाल संवाद को स्वर देते हैं-पापा सच-सच मुझे बताना, कुछ भी मुझसे नहीं छिपाना। मेरे जैसे जब बच्चे थे, तब के अपने हाल सुनाना। (पृ. 274)

पुष्पलता शर्मा की रचना कामकाजी माताओं की संतानों की अपेक्षा का सच्चा प्रतिनिधित्व करती है-आज न दफ्तर जाओ मम्मी। कुछ पल साथ बिताओ मम्मी। (पृ. 611)

दरअसल बाल अपेक्षा और बाल समस्या पर कलम चलाने की अपार संभावनाएँ हैं। पुताई की स्थिति में घर के हाल और बालक की प्रतिक्रिया इस कविता में देखी जा सकती है-मेरे घर में हुई पुताई, भैया समझो शामत आई। पूरे घर में मचा झमेला, बच्चे बड़े सभी ने झेला। कैसे बाहर हो अलमारी, कहाँ रखें ये चीजे सारी। बाहर सब सामान निकाला, घर लगता था गड़बड़झाला। नागेश पांडेय 'संजय', पृ. 346

लक्ष्मीशंकर बाजपेई का शहरी बालक गांव देखने की अपेक्षा रखता है-अबकी बार किसी छुट्टी में गांव अगर जाना पापा, कैसा होता गांव, मुझे भी गांव दिखा लाना पापा। पृ. 312

बालिका प्रधान साहित्य की बड़ी जरूरत है। हिंदी में इसकी मात्रा अत्यल्प है। उषा यादव की कविता में एक बच्ची अपने पुस्तक प्रेम की अभिव्यक्ति कुछ यों करती है-मम्मी मैं भी संग आपके, पुस्तक मेला जाऊँगी। ढेर किताबें छांट छांट कर, रंग बिरंगी लाऊँगी। पृ.185

अपेक्षाओं के क्रम में योगेंद्र कुमार लल्ला का यह शरारती अंदाज भी बच्चों को खास लुभाएगा-कर दो जी, कर दो हड़ताल। पढ़ने लिखने की हो टाल। बच्चे घर पर मौज उड़ाए, पापा मम्मी पढ़ने जाएँ। पृ.168

घर का सही पारिभाषीकरण अजय जनमेजय की कविता करती है। बच्चे आधुनिकता में फेर में बड़े होकर माँ-बाप को भूल जाते हैं। काष! उनके मन में बचपन से ही यह भाव घर कर जाए तो वृद्धाश्रम की कल्पना ही समाप्त हो जाएगी-लकड़ी, पत्थर, ईंटों से, नहीं कभी घर बनता है। मम्मी से ही घर है घर, पापा से ही दर है दर। पृ.249

फोन पर कविताएँ भी मजेदार है। कभी पापा के मोबाइल में बिजी रहने से त्रस्त बच्चे आज कितने चालाक हो गए हैं, मौका पाते ही वे पापा का फोन लपक लेते हैं। दो अलग अलग जमाने के बच्चों की कविताओं में यह परिदृश्य देखा जा सकता है-बूझो मेरा दुश्मन कौन, पापा का मोबाइल फोन-फहीम अहमद (पृ.429) मेरे पापा का मोबाइल, कितना सुंदर कवर है भाई। धीरे से सरकाया मैंने, पापा को जब नींद है आई-संगीता सेठी, पृ. 443

दिविक रमेश की चर्चित कविता मैं भी माँ दीदी को अब तो, बांधूगा प्यारी-सी राखी। कितना प्यार करेंगी दीदी, जब बांधुंगा उनको राखी। (पृ. 204) बताती है कि जमाना अब बदल गया है। बच्चा अब रुटीन से हटकर कुछ नया और तार्किक सोचता है। यही सोच आज की बाल कविता में ध्वनित होनी चाहिए।

चिट्ठी और ईमेल पर दो अपनी तरह की अनूठी कविताएँ यहाँ पढ़ सकते हैं। यद्यपि बालकृष्ण गर्ग की इस कविता में बालजीवन भी रचा बसा है, यह जरूरी बात विवरणात्मक बाल कविताएँ लिखने वाले नए लेखकों को समझनी होगी-पापाजी की आई चिट्ठी, समझी मीठी, निकली खट्टी। लंबे लंबे बाल कटेंगे, जेब खर्च भी सभी घटेंगे। (पृ. 140) मन को भाती है ईमेल। कुरियर या स्पीड पोस्ट हो, इसके आगे हैं सब फेल-निशांत जैन, पृ. 457

हठ कर बैठा चाँद जैसी अमोल कविता के सर्जक रामधारी सिंह दिनकर की केवल एक ही कविता इस संकलन में है-टेसू राजा अड़े खड़े, माँग रहे हैं दही बड़े। बड़े कहाँ से लाऊँ मैं, पहले खेत खुदाऊँ मैं। (पृ. 701) यही कविता पृष्ठ 46 पर निरंकार देव सेवक जी के नाम से भी प्रकाशित है। दोनों एक-सी कविताएँ एक ही संचयन में कैसे चयनित हो गईं? और मूल रचनाकार कौन है, यह आश्चर्य का विषय है।

समोसे पर बहुत से रचनाकारों ने लिखा किंतु शिवचरण चौहान की तिरकोतीन समोसे भाई, तुमने सारी चीजें खाई। आलू और खटाई खाई, खाया सारा मिर्च मसाला। मुंह तो छोटा-सा है लेकिन, तेल कढ़ाई भर पी डाला। गरम-गरम खाया है सब कुछ, चाय माँगते लाज न आई। (पृ. 630) कविता तो अन्यतम है। ऐसी कविताएँ शायद लिखी नहीं जातीं... लिख जाती हैं।

संदेश त्यागी की कविता डिस्कवरी पर हमने देखा, एक तमाशा ऐसा। जंगल के राजा के पीछे, लगा जंगली भैंसा। नवीन और पुरातन संदर्भों को जोड़ते हुए चलती है। हां, कविता का आरंभ जिस रिद्म में चला था, वह अंत में बदल गया है-शेरों को भी कभी-कभी तो, सवा शेर मिल जाते हैं। अगर हौसला हो जाए तो तख्त ताज हिल जाते हैं। पृ. 600

शिवचरण सरोहा की दाल कमाल की है। छोटे मीटर की ऐसी कविताएँ कम ही देखने में आती हैं-खाई, दाल। मिर्च, लाल। पीटे, गाल। नोचे, बाल। बुरा, हाल। पृ. 481

चाँद पर बाल संवेदना से युक्त यह कविता भी संपादक के श्रेष्ठ चयन और कवि के सृजन कौशल को इंगित करती है-चंदा भैया संभल के सोना, तुम बादल के बिस्तर पर। कहीं नींद में लुढ़क न जाना, तुम धड़ाम से धरती पर-गोपाल महेश्वरी 467
विविध विषयक ऐसी ही एक से बढ़कर एक कविताएँ इस संकलन में भोजूद हैं। विस्तार भय से उनकी चर्चा यहाँ संभव नहीं।

ग्रंथ का मुद्रण और मुखपृष्ठ आकर्षक है। कागज और बाइंडिंग मजबूत। प्रूफ (त्यौहार-त्योहार, बस-वष, शाबाद-शादाब) की दो चार ही त्रुटियाँ हैं। 706 पृष्ठों के इस अमूल्य संकलन का मूल्य मात्र 550 रुपये है। हर पुस्तकालय में तो इसे स्थान मिलना ही चाहिए। अभिभावकों, अध्यापकों, आलोचकों, संपादकों और शोधार्थियों के निजी संग्रह में भी इसका होना ज़रूरी है। जन्मदिन पर बच्चों को यह अद्वितीय उपहार मिले तो यह भावी पीढ़ी में साहित्यिक संस्कारों के पल्लवन और हस्तांतरण की दिशा  में सार्थक कदम होगा।

अन्य प्रांतों के शासकीय संस्थानों को भी बाल कविताओं तथा अन्य विधाओं के ऐसे ही श्रेष्ठ संकलनों के प्रकाशन को लेकर विचार करना चाहिए। साथ ही,... क्या अच्छा हो कि हिंदी की चयनित इन बाल कविताओं का अनुवाद और प्रकाशन संविधान द्वारा स्वीकृत अन्य भारतीय भाषाओं में भी प्रादेशिक अकादमियों के द्वारा कराया जाए। भावात्मक ऐक्य की दृष्टि से यह बड़ी पहल होगी।

बाल कविता के क्षेत्र में साहित्य अकादमी का यह प्रयास अविस्मरणीय और अनुकरणीय है।
डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'


 

गुरुवार, 20 मई 2021

पुस्तक समीक्षा : राष्ट्रीय फलक पर स्वातंत्र्योतर बाल कविता का अनुशीलन मध्यप्रदेश के विशेष संदर्भ में

पुस्तक : राष्ट्रीय फलक पर स्वातंत्र्योतर बाल कविता का अनुशीलन 
(मध्यप्रदेश के विशेष संदर्भ में)
लेखक : डॉ सुधा गुप्ता अमृता 
प्रकाशक : नमन प्रकाशन नई दिल्ली
 मूल्य : 650 ₹
समीक्षक : डॉ नागेश पांडेय संजय

    हिंदी बालसाहित्य के विकास में मध्यप्रदेश का महत्वपूर्ण योगदान है। बालसाहित्य के क्षेत्र में एक अभिनव क्रांति का सूत्रपात करने वाले कीर्तिशेष हस्ताक्षर डॉ. हरिकृष्ण देवसरे मध्यप्रदेश के ही थे जिन्होंने न केवल बालसाहित्य के क्षेत्र में युगांतरकारी परिवर्तन किए, अपितु हिंदी में बालसाहित्य पर सर्वप्रथम शोध प्रबंध लिखकर पी एच. डी. उपाधि भी प्राप्त की । डॉ. सुधा गुप्ता 'अमृता' भी मध्यप्रदेश की हैं, जो मूलत: अध्यापन से जुड़ी हैं और बालसाहित्य के प्रति उनके मन में असीम अनुराग है। उन्होंने उत्कृष्ट बाल साहित्य का प्रणयन तो किया ही है; बालसाहित्य को मान्यता दिलाने के प्रति भी सजग और सचेत रही हैं।
समीक्ष्य कृति इस तथ्य का सहज प्रमाण है, जिसके माध्यम से मध्यप्रदेश में स्वातंत्र्योत्तर बालकविता की दशा और दिशा को अत्यंत श्रम एवं विद्वता के साथ उकेरने की कोशिश की गई है। हिंदी बालसाहित्य के क्षेत्र में संपन्न अधिकांश शोध प्रबंध प्राय: आधे और अधूरे होते हैं । इसका मूल कारण यह भी है किबाल साहित्य की सही स्थिति का ज्ञान न तो निर्देशक को होता है और न ही उस बेचारे शोधकर्ता को जिसका उद्देश्य येन–केन प्रकारेण महज उपाधि प्राप्त करना होता है । इस दृष्टि से डॉ. सुधा की प्रशंसा करनी होगी क्योंकि स्वयं बालसाहित्य की लेखिका होने के नाते जहाँ उन्होंने बाल साहित्य के महत्वपूर्ण ग्रंथों का अनुशीलन किया है, वहीँ अपने वृहद संपर्क के बल पर जो मानक शोध सन्दर्भ सामग्री जुटाई है, वह अभूतपूर्व है।
    बालकवि बैरागी जी ने उनके विषय में ठीक ही लिखा है कि उन्होंने अगले शोधार्थियों के लिए इस आँगन को बुहार दिया है। निःसंदेह शोध एक अनंत परंपरा है, यह पुस्तक इस तथ्य को भी बखूबी प्रमाणित करती है कि बाल साहित्य पर उत्कृष्ट सामग्री का अब अभाव नहीं है। अभाव है तो मनोयोग से समर्पित उन जिज्ञासुओं का जो अपने अध्ययन, अनुशीलन से काल के कपाल पर अपने स्वर्णिम हस्ताक्षर कर सकें।
    डॉ. सुधा गुप्ता का यह शोध प्रबंध नौ विशिष्ट अध्यायों में विभक्त है। यद्यपि अपने प्राक्कथन से ही उन्होंने बालसाहित्य के अभिनव सरोकारों की बाँकी- बाँकी झांकी प्रस्तुत कर दी है जिसकी रम्यता पाठक को सहज, उत्सुक और उत्साहित कर देती है। उनकी यह परिभाषा मैं विशेष रूप से उद्धृत करना चाहूंगा कि, 'बालसाहित्य ही वह जीवन घूंटी है जो बालमन को पुष्ट कर उसे जीवन जीने की कला सिखाता हुआ समस्याओं से जूझकर निकल आने की कला सिखाता है।' डॉ. सुधा गुप्ता 'अमृता' की यह पंक्ति जैसे बालसाहित्य के समग्र स्वरूप को सहज रेखांकित कर देती है और बालसाहित्य के चिरस्थायी महत्त्व और उसकी गरिमा का बोध जनमानस को बड़ी ही संजीदगी के साथ कराने में जैसे किसी वकालतनामे सी प्रतीत होती है। प्रथम अध्याय में बालसाहित्य की अवधारणा को स्पष्ट करने में उन्हें पूर्ण सफलता मिली है। बालसाहित्य की चर्चित सुचर्चित परिभाषाओं को उद्धृत कर उन्होंने इस अध्याय को विशेष प्रामाणिक बना दिया है । दूसरे अध्याय का शीर्षक थोड़ा अटपटा है। क्योंकि तीन बिंदुओं और भी लम्बे-लम्बे वाक्यों में विभक्त है किन्तु, यह अध्याय 'गागर में सागर' से कम भी नहीं है।
    लेखिका ने चर्चित हस्ताक्षरों के माध्यम से बालसाहित्य की सामयिक स्थिति का आकलन उसकी महत्ता को निरूपित करते हुए किया है। अगले अध्यायों में बालसाहित्य की लोकप्रिय विधा कविता के विविध सोपानों की चर्चा है। खासकर पांचवें और छठे अध्यायों के बहाने बालसाहित्य के भाषायी अभिलक्षणों का गहन और विशद विवेचन करने के लिए सुधा जी की भूरि भूरि प्रशंसा करनी होगी स बुंदेली, बघेली, निमाड़ी और मालवी जैसी विभाषाओं में लुप्तप्राय: साहित्य को याद करते हुए उन्होंने जिस शास्त्रीयता के साथ सृजित साहित्य पर दृष्टिपात किया है, वह तत्वाभिनिवेशी दृष्टि उन्हें एक गंभीर समीक्षक भी सिद्ध करने में समर्थ है। अच्छी बात यह भी है कि इन अध्यायों के बहाने बालसाहित्य पूर्व निर्धारित प्रतिमानों की भी सविस्तार चर्चा हुई है जिसका अध्ययन हर उस बालसाहित्यकार हेतु आवश्यक है जो बालसाहित्य के क्षेत्र में समर्थ लेखनी का हिमायती है।
    सातवें और आठवें अध्याय का सम्बन्ध बालसाहित्य के व्यावहारिक पक्ष से है। बाल साहित्य और बालक की रुचि की उपेक्षा के दुष्परिणामों की ओर संकेत करते हुए बालसाहित्य की अनिवार्यता उदघाटित की गई है। आठवें अध्याय में मीडिया के दोनों अर्थात इलेक्ट्रानिक और प्रिंट पक्षों में बालसाहित्य की जरूरत को विशिष्ट तर्कों के साथ उद्घाटित किया गया है।
    नवें अर्थात अंतिम अध्याय में मध्यप्रदेश के बाल साहित्यकारों पर चर्चा की गई है। नि:संदेह मध्यप्रदेश की पावन माटी में बाल साहित्य के समर्थ रचनाधर्मियों का वर्चस्व है। यह अध्याय शोध की नवीन संभावनाओं की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है । स्वतंत्र रूप से भी मध्यप्रदेश के अन्यान्य बाल साहित्यकारों के कृतित्व पर कार्य की संभावनाएं अभी शेष हैं।
    परिशिष्ट के रूप में बालसाहित्य के यायावर साधक डॉ. राष्ट्रबन्धु और बालकवि बैरागी के साक्षात्कार भी संकलित हैं जिनसे पुस्तक को गरिमा मिली है। डॉ. राष्ट्रबंधु ने विश्वविद्यालयों में बाल साहित्य के पठन-पाठन की जिस जरूरत की ओर संकेत किया, वह विचारणीय है। भावी माता पिता को यदि बाल साहित्य का ज्ञान नहीं होगा तो निश्चय ही बालकों में बाल साहित्य के प्रति रुचि कैसे जाग्रत हो सकेगी ?
    बाल साहित्यकारों को बहुभाषाविद होने का भी उनका सुझाव गौरतलब है क्योंकि अभी भी बहुतेरा उत्कृष्ट बालसाहित्य अनुवाद की बाट जोह रहा है। और इसकी कमी के चलते भारत के नौनिहालों को बालसाहित्य अप्राप्य है। भारत विविध संस्कृतियों का देश है अस्तु बालकों को भी विविध क्षेत्रों के बालसाहित्य से परिचित कराना सामाजिक दायित्व है।
    कुल मिलकर यह शोध प्रबंध पुस्तक रूप में अपनी महत्ता सदैव सिद्ध करता रहेगा स डॉ. सुधा गुप्ता को उनके अनथक श्रम और सार्थक प्रयत्न के लिए बधाई दी। जानी चाहिये और उनके लिए सर्वोत्तम बधाई यही होगी कि इस पुस्तक का व्यापक प्रचार प्रसार हो। यह पुस्तक बालसाहित्य से जुड़े हर अनुरागी तक पहुंचे, यही इसकी सार्थकता है ।
    आकर्षक आवरण और सुरुचिपूर्ण मुद्रण से सुसज्जित इस पुस्तक का मूल्य किंचित अधिक है, किन्तु श्रेष्ठ सामग्री और मंहगाई के युग में प्रयुक्त अच्छे कागज को देखते हुए यह ज्यादा गौरतलब नहीं है । डॉ. सुधा गुप्ता का अत्यंत समर्पण एवं मनोयोग से किया गया बालकविता का यह अनुशीलन बाल साहित्य की श्रीवृद्धि में अपनी उल्लेखनीय भूमिका का निर्वाह करेगा, इसमें संदेह नहीं । लेखिका के साथ-साथ उनके निर्देशक और प्रकाशक को भी हार्दिक बधाई

 • डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
(शाश्वत सृजन,मासिक, उज्जैन, पृष्ठ :7, ISSN : 2455-1201)



रविवार, 19 अप्रैल 2020

किशोरों के लिए कहानी संग्रह 'यस सर! नो सर' के कन्नड़ अनुवाद की समीक्षा

यस सर ! नो सर !(किशोरों के लिए कहानी संग्रह)  के कन्नड़ अनुवाद की समीक्षा
समीक्षक : आनन्द पाटिल
Yes Sir, No Sir
A story collection in Hindi, by a noted writer Dr. nagesh pandey ‘Sanjay’ is now in kannada. It has been brought into Kannada  by  D. Sujaladevi, an enthusiastic writer, being head of a school(she herself runs the school)she is with children most of the time, takes lot of interest in children’s literature. This is her first translation, got published.
Dr. nagesh Pandey is a wellknown name in Hindi belt. Along with a creative writer, he is scholar in chidlren’s literature. He has done Ph. D on principles that guide the genor of children’s literature. An essay collection on different aspects of chidlren’s literature has also been at his credit. He has brought seven story collections and two poetry works. He has edited three collections of stories also. Such an active person is being introduced into kannada with a bundle of his stories.
    As for as translation is considered, sujaladevi has rendered sincere work and brought in a easy flowing, with all weightyness, with required disposition and involvement. The stories are made to reach the kannada children, retaining the cultural background of Uttarpradesh, which the original writer hails from.  As such a new rendering of stories for children, in some aspects definitely has been to view here. So to say an encouraging effort has been here by Sujaladevi.
    All these stories show a trend of getting relieved of old stuff of imaginative folk world and more and more getting  revolved around the present situations of chidren. In all the stories voices of children are heard prominently and all the plots go around the child psychology, that too evolved at the background of  cultural set up. Of cource middle class atmosphere is predominantly seen here. Situations get plotted with rural and semi urban areas. Children with poor economic background, or with less resources are usually visualized. It seems the usual trend in modern children stories in India, as along with English, most of the regional languages carry such a stuff , might it be the begining face in children literature towards with modern concepts. As such the writers with middle class background, as they predominate, naturally  bring fourth the stuff of their experience, of cource with  all modern days’ progressive thoughts.  Nagesh Pandey’s stories are to be placed inveriably among this kind.
    Usually a sort of Satvika Bhava, an atmosphere of virtuous conduct prevails in all the stories. It does not go in any situation, so to say to fall in the  track of preaching. Children go with all distracts, bad influences, undesired ways, but they themselves come to  repentance, or realising  of the right conducts. They will be put into ambiguity in a number of situations, and fell prey to false attractions, but one or the other situation brings a turn in their life and set them into progress. This is inverialbly found in all his stories, not a single story ends in dismay. Of cource as these children come from almost middle class background, or little less to it, never experience hard truths of life, that are found in downtrodden, cast based, discriminative social situations. In Kannada such situations were brought to children stories by Dr. R. V. Bhandari , in his two novels. Both the novels chose protagonist characters from scheduled casts and brought out all the traumas they face, to make up their ways of life, but to be arriving at an contended end was sort at. Being a teacher by profession, he use to say it should be in children stories as a positive motivation. It is to be informed here that he use to be in the front line of rebelling  leftist movements, and he himself came from such social condition. But this is not the situation with upcoming new writers like Ganesh Nador in Kannada, who are earnestly desiring to bring prevailing truths as they are.
    Nagesh’s stories are marked with simple narrative in all naturalistic way, bringing the situation in a very usual manner, as to be one among our daytoday happenings. His narration always goes with some sort of conversation with the readers, connecting them with the plot as if it is one in their surroundings. Almost every time he stands with elderly eyes and sets his plots before the children. We may say it is an extension of story telling tradition with new requirements, with new approaches. We come across a veriety of behaviors put in different situations. A boy with hesitation in all his approaches, lags behind in many ways. Once during holidays hesitantly he goes to village area trying to avoide swimming in the pool. But when he is going riding behind his elder brother he puts to astonish, when his brother , listening to a cry from the midst of waters below a bridge, at once stops the two wheeler and jumps into the water without any second thought and rushes to the rescue of a lady, fallen in the river. The boy experiences this with all awe and wonder, and decides he should also make his mind to do something, to learn swimming, riding and should come over his secured mindedness., and thus returns into a new born boy. In another story a boy, a son of  police, feels short when his classmates talk of corrupt practices of police. He even falls suspicious, observing a situation of his father, receiving some amount from an unknowing person. But to his surprise he comes to realize that his father has not at all involved in any untoward act and is a sinscere person, and feels proud of him. He tells before his mother that he will also become a police like father . Another boy named shamkrishna, who is known for his studiousness, sinscerity, good behavior, once gets  caught  by the examiner while copying. It becomes a big issue whether he should be punished or not. Nobody feels taking risk at it. But at last the headmaster takes bold step and debars him of that year’s exams. A poor boy who is very fond of games, faces every time hinderances from his father and gets reduced mentally, but stops not in his efforts, tries to push himself in whatever possible way, and gets shined as a painter. Father realizes his earnestness  and he himself gets changed and sets his mind for providing all facility whatever possible. A group of poor children once plan to steal fire crackers from a rich house during Deepavali, as they were unable to purchase, and enjoy the festival. But at the time of escaping during night time they hit the watchman with a sizable stone in night dark. But very next day when they hear the news that he is admitted to hospital, they fell in duality and start repenting, by the evening they decide to appolizise.  Neha a girl, every time finds inferior listening to the deeds of her elder sister. But when, during her marriage, she gets astonished to see her sister, boldly resisting the money demanding goonda group, in the form of dowry, and shots at them without hesitation. Then the little mind realizes what really is her sister and tears into sobs as she is departing from her. In all such stories we find a realization is reached at the end a progressive thinking, guided by morality  is channalised.
Anand Patil

बुधवार, 2 मई 2018

समीक्षा : बाल साहित्य के पहले इतिहास का संशोधित संस्करण : बालगीत साहित्य (निरंकार देव सेवक)


    निरंकार देव सेवक लिखित  बाल गीत साहित्य इतिहास और समीक्षा अकेला ऐसा ग्रंथ  है जो तीन बार अलग-अलग कलेवर में संशोधित-सम्पादित होकर छपा।
    1966 में सर्वप्रथम इसका प्रकाशन किताब महल, इलाहबाद से हुआ था। इसके पश्चात ही बाल साहित्य में पी-एच.डी. और समीक्षा स्तर के कार्यों की शुरुआत हुई। सेवक जी के इस ग्रंथ  में अन्य भाषाओं में रचित बाल साहित्य का  तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत किया गया था और बड़ी बात यह कि पूरी निष्पक्षता के साथ कवियों और उनकी रचनाओं की चर्चा की गयी। 
    कालांतर में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान  से प्रकाशित संशोधित संस्करण  (1983) में तो कवियों के दुर्लभ चित्र भी उपलब्ध हैं। ग्रन्थ में इतिहास के लिए अपेक्षित सन्दर्भ ग्रंथों  का भी ईमानदारी से उल्लेख्य किया गया है। 
    तृतीय संस्करण 2013 में डॉ. उषा यादव के सम्पादन में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान  से ही आया है, जिसकी समीक्षा यहाँ प्रस्तुत है :-




पुस्तक : बाल गीत साहित्य इतिहास और समीक्षा
लेखक: निरंकार देव सेवक, संपादक: प्रो. उषा यादव
प्रकाशक : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान
6, महात्मा गांधी मार्ग, लखनऊ-226001 (0522-2614470,2614471)
संस्करण (संशोधित) 2013 
मूल्य: 245 रुपये,  
समीक्षकः डा. नागेश पांडेय संजय


हिंदी में बाल-साहित्य आलोचना की परंपरा को लगभग सात दशकों का समय व्यतीत हो चुका है। इस कालावधि में बाल साहित्य और उसके विविध पक्षों पर बहुत महत्त्वपूर्ण कृतियां और शोध प्रबंध लिखे गए हैं। इधर कुछ वर्षों में तो बालसाहित्य की ढेरों समीक्षा पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और इनसे बाल साहित्य का मानवर्द्धन हुआ है किंतु जब ध्यान जब एकदम शुरुआत की तरफ जाता है तो निःसंदेह निरंकार देव सेवक किसी देवदूत की तरह नजर आते हैं जिन्होंने उस जमाने में, जबकि बाल साहित्य पर आधार सामग्री थी ही नहीं या थोड़ा बहुत यदि कुछ था भी तो न के बराबर, ऐसे में 1966 में किताब महल, इलाहाबाद से प्रकाशित अनेक राहों को खोजता और बनाता ग्रंथ बालगीत साहित्यलिखा जो परवर्ती बाल साहित्य लेखकों तथा समीक्षकों के लिए प्रकाश स्तंभ सिद्ध हुआ है। विभिन्न परंपराओं का सूत्रपात करने की दृष्टि से इस बेजोड़ ग्रंथ की कालजयी महत्ता है। बाल साहित्य में तात्विक समीक्षा का कार्य हो या इतिहास-लेखन, शोध-कार्य हो या तुलनात्मक अध्ययन, इन सभी के मूल में सेवक जी का ग्रंथ ही आधार-रूप में विद्यमान रहा है।

1966 में जबकि कृष्ण विनायक फड़के की पुस्तक बालदर्शन’ (1946), श्रीमती ज्योत्स्ना द्विवेदी की कृति हिंदी किशोर साहित्य’ (1952) और डाॅ. देवेंद्रदत्त तिवारी द्वारा संपादित बाल साहित्य की मान्यताएं एवं आदर्श’ (1962)  के सिवाय कोई और समीक्षा कृति थी ही नहीं, ऐसे में उन्होंने बाल साहित्य की महत्वपूर्ण विधा कविता के स्वरूप और प्रयोजन की चर्चा करते हुए उसके मूल्यांकन की दिशा में अपनी तरह का यह पहला काम किया।  
प्रथम संस्करण 1966 
   सेवक जी की इस कृति से केवल बाल साहित्य समीक्षा के क्षेत्र में ही नहीं, वरन् विश्वविद्यालयों में भी बाल साहित्य आलोचना तथा अनुसंधान की दिशा में संभावनाओं का सूत्रपात हुआ। प्रारंभिक बाल साहित्य शोधार्थियों के लिए यह कृति गहन अंधकार में प्रखर प्रकाश जैसी सिद्ध हुई। वर्तमान शोधार्थियों तथा समीक्षकों हेतु भी यह कृति एक अपरिहार्य संदर्भ ग्रंथ की भांति अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है। 
किसी भी पी-एच.डी. स्तर के शोध से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण इस ग्रंथ की पांडुलिपि को देखकर उनके एक मित्र ने कहा भी था- यह तुमने बिल्कुल नए विषय पर इतना काम किया है। इस पर तो तुम्हें किसी विश्वविद्यालय से डाॅक्टरेट मिल सकती है। सेवक जी ने उक्त प्रसंग को हँसकर टाल दिया था। 
फिलहाल उनकी कृति ने हिंदी बाल साहित्य में आलोचना और अनुसंधान को दिशा दी और बहुतों को डाक्टरेटकी उपाधि मिली।

सेवक जी की कृति बालगीत साहित्य बाल साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसी अनोखी और अकेली किताब है जो अब तक तीन बार अलग-अलग रुप और अंदाज में प्रकाशित हो चुकी है।
संशोधित संस्करण (1983)
दूसरी बार यह कृति
1983 में बालगीत साहित्य: इतिहास एवं समीक्षा नाम से स्वयं सेवक जी के द्वारा ही संशोधित और परिवर्द्धित होकर उ.प्र. हिंदी संस्थान से प्रकाशित हुई थी. खास बात यह कि इस संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण में प्रो. उषा यादव ने भरपूर श्रम किया है और इस ग्रंथ को अद्यतन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, इसके बाद भी पुस्तक की मूल भावना या संवेदना कहीं पर से प्रभावित नहीं हुई है। बड़ी बात यह भी कि उषा  जी ने बिना किसी पूर्वाग्रह या पक्षपात के उच्चकोटि की बाल कविताओं को ससम्मान उद्धृत किया है, वहीं बाल कविताओं के नाम पर खिलबाड़ जैसी लचर रचनाओं को आड़े हाथों लेकर अभूतपूर्व साहस का परिचय भी दिया है। 
प्रो. उषा यादव द्वारा संपादित यह ग्रंथ 524 पृष्ठों में कुल 14 अध्याय स्वयं में समेटे है जो कि इस प्रकार हैं-1. बाल स्वभव 2. बडों की कविता और बाल गीत 3. अलिखित बालगीत 4. शिशु गीत साहित्य 5. चांद तारों के बाल गीत 6. लोरियां, प्रभाती और पालने के गीत 7. हिंदी बालगीतो  का वर्गीकरण 8. हिंदी बालगीत साहित्य के इतिहास की भूमिका 9. हिंदी बालगीत साहित्य का इतिहास 10. हिंदी के राष्ट्रीय बालगीत 11. बालगीतो की शिक्षा एवं रचना  शिक्षा 12. लोकगीतों में बालगीत 13. हिंदी और अंग्रेजी बालगीत 14. भारती भाषाओं में बालगीत साहित्य 
उपर्युक्त अध्यायों के शीर्षकों से एक बात मोेटे तौर पर स्पष्ट हो जाती है कि बाल कविता के समूचे परिदृश्य को संजीदगी से समझनें के लिए यह एक बहुत ही जरुरी पुस्तक है। सेवक जी एक ऐसे समर्थ रचनाकार थे जिनकी कविताएं स्वयं मानक हैं। उनके कथन परिभाषा हैं। वे मानते थे कि बाल साहित्य बच्चों के मनोभावों, जिज्ञासाओं और कल्पनाओं के अनुरूप हो। जो बच्चों का मनोरंजन कर सके और  मनोरंजन भी वह जो स्वस्थ और स्वाभाविक हो। जो बच्चों को बड़ों जैसा बनाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें अपने अनुसार-अपने जैसा बनाने में सहायक हो।
उनकी सोच व्यापक थी, यही कारण है कि उक्त ग्रंथ की रचना करते समय उन्होंने बाल कविता के विस्तृत फलक को अपने अध्ययन का विषय बनाया। कविताओं की चर्चा करते समय किसी मित्रवाद या क्षेत्रवाद के वशीभूत नहीं हुए। न जाने कितने लोंगों से पत्राचार किया। दिग्गज से दिग्गज, नए से नए और गुमनाम: सभी से उनका  संपर्क था। इसीलिए चाहे बालक अमिताभ बच्चन के लिए उनके कवि पिता हरिवंश  राय द्वारा बाल कविता लिखने की बात हो या स्वर्ण सहोदर की प्रकाशन समस्या की पीड़ा। सब कुछ उनकी किताब में सहज मुखरित हुआ। यही कारण था कि उनकी यह कृति केवल बाल कविताओं का ही नहीं, बाल कवियों के अनुभवों और रचना प्रक्रिया का भी दस्तावेज बनी।  
 बता दें कि सेवक जी द्वारा पुनर्प्रस्तुत तथा संस्थान से 1983 में प्रकाशित संस्करण में 17 अध्याय थे लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि नए संस्करण में उषा जी ने किसी अध्याय को समाप्त किया गया हो। हां, आवश्यकतानुसार उन्हें कम-ज्यादा अवश्य  किया गया है। जैसे सेवक जी ने सूरदास पर अलग से सातवां अध्याय लिखा था जिसे उषा जी ने आठवें अध्याय में बहुत ही संक्षेप में लिया है। ऐसे ही सेवक जी ने बालगीतो की  शिक्षा और बालगीत रचना शिक्षा दो अलग अध्याय शामिल किए थे जिन्हें उषा जी ने एक ही अध्याय में समाहित कर दिया है। सेवक जी द्वारा अंग्रेजी की तरह बंगाली बालगीत पर भी अलग से अध्याय था किंतु उषा जी ने इसे अंतिम अध्याय भारती भाषाओं में बालगीत साहित्य में स्थान दिया है। साथ ही पूर्णता की दृष्टि से राजस्थानी, वोडो, मणिपुरी, कोंकणी के बालगीतों पर भी यथासंभव चर्चा की है। 
हां, एक प्रश्न बार-बार  अवश्य  मन में कौंधता है कि द्वितीय संस्करण की भांति इस बार कवियों के दुर्लभ चित्रों को प्रकाशित क्यों नहीं किया गया ? क्योंकि सेवक जी के जमाने में, जबकि आफसेट प्रिंटिग की व्यवस्था नहीं थी, तब कितनी कठिनाइयों के साथ कवियों के चित्र एकत्र किए गए होंगे। उनके ब्लाक बनवाए गए होंगे। अब तो यह सब सहज संभव है। गए और नए जमाने के कवियों के चित्रों को एक स्थान पर देखना पाठकों के लिए प्रभावकारी तो होता ही, यह ग्रंथ पहले की भांति एक सचित्र कोश का भी काम करता। एक बात और ग्रंथ को अद्यतन बनाने की कोशिस में संपादक ने कदाचित लेखकों से उनके बायोडाटा मंगाकर भी काम चलाया होगा या किसी परिचय कोश का सहारा लिया होगा, जो कि स्वाभाविक था किंतु इससे कुछ एक कवियों के बारे में भ्रामक सूचनाएं संकलित हो गई हैं। जैसे एक कवि ने कई बाल कवियों के संकलन 'मूछे ताने पहुचे थाने' को अपनी ही निजी पुस्तक बता दिया है। निश्चय ही इस दिशा में अतिरिक्त सतर्कता अपेक्षित थी।  
बहरहाल अमीर खुसरो से लेकर भारतेंदु और फिर स्वतंत्रता से पूर्व तथा पश्चात की बाल कविताओं का यह श्रमसाध्य इतिहास अनुपमेय है। प्रो. उषा यादव की आधुनिक समीक्षा दृष्टि ने पुनः इसे एक लंबे समय के लिए संग्रहणीय और पठनीय बना दिया है। बाल साहित्य को ऐसी अनमोल कृति देने वाले सेवक जी की पुण्यात्मा को बारंबार नमन करते हुए सफल संपादक प्रो. उषा यादव के साथ-साथ  संशोधित संस्करण के प्रकाशन हेतु उ.प्र. हिंदी संस्थान को भी हार्दिक बधाई। 
 (यह समीक्षा बाल वाटिका,मासिक, जून 2014 के पृष्ठ :51 पर प्रकाशित हुई थी।)