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रविवार, 9 मई 2021

'हिंदी के बाल साहित्यकार' : बाल साहित्य लेखकों के पतों की पहली पुस्तक


हिंदी के बाल साहित्यकार

बाल साहित्य लेखकों के पते और विवरण संकलित करने का कार्य सर्वप्रथम डॉ. राष्ट्रबन्धु जी ने किया। उन्होंने अपने शोध प्रबंध 'हिंदी बाल साहित्य का मनोवैज्ञानिक अध्ययन' (1971) के आठवें अध्याय में 75 बाल साहित्य लेखकों का अकारादि विवरण प्रस्तुत किया था। इसके बाद उनकी एक पुस्तक 'हिंदी के बाल साहित्यकार' 1984 में विद्या भूषण प्रकाशन, कानपुर से प्रकाशित हुई। इसमें पौने चार सौ बाल साहित्य लेखकों के पते पहली बार संकलित-प्रकाशित हुए थे। इसके पश्चात चक्रधर नलिन जी ने  तत्कालीन हिंदी बाल साहित्य लेखकों के पते संकलित कर बाल दर्शन मासिक के बाल साहित्यकार विशेषांक, जून 1993 में प्रस्तुत किए।

चक्रधर नलिन जी ने ही कालांतर में त्रैमासिक पत्रिका जिंदगी अखबार होकर रह गई के बाल साहित्य सृजन शोध और आलोचना विशेषांक, सितम्बर 1995 (अतिथि संपादक : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय' ) में 131 बाल साहित्य लेखकों के पते प्रस्तुत किए थे।


जयप्रकाश भारती
जी ने 1995 में अपनी पुस्तक 'बाल साहित्य इक्कीसवीं सदी में' कुछ 
चुने हुए बाल साहित्य लेखकों का परिचय प्रस्तुत किया। 

बाद में देवपुत्र, मासिक पत्रिका ने बाल साहित्य लेखको के सचित्र परिचय अक्टूबर 1996 अंक में प्रकाशित किए। 1998 में डॉ. सुरेंद्र विक्रम ने बाल साहित्यकारों के पतों को अद्यतन करते हुए एक छोटी सी पुस्तिका 'बाल साहित्यकार निर्देशिका' शीर्षक से तैयार की। इसे मासिक देवपुत्र, इंदौर ने ही प्रकाशित किया था ।

निस्संदेह इस दिशा में वृहद स्तर पर उल्लेखनीय कार्य भारतीय बाल साहित्य शोध संस्थान, इंदौर ने किया। वहां से प्रकाशित 560 बाल साहित्य लेखकों का 'वृहद सचित्र बाल साहित्यकार कोश' (संपादक डॉ. राष्ट्रबन्धु, कृष्ण शलभ), बाल साहित्य के क्षेत्र में अभूतपूर्व उपलब्धि है। इसे बाल साहित्य के प्रारंभिक 'इतिहास' के रूप में भी देखा जाना चाहिए, हिंदी साहित्य के प्रारम्भिक इतिहास/कविवृत्त भी परिचयात्मक ही हैं। 
 मैंने भी समकालीन बाल साहित्य लेखकों के सचित्र परिचय डिजिटली उपलब्ध कराने के उद्देश्य से एक ब्लॉग बाल साहित्य लेखक  बनाया था। इस लिंक से उसे देख सकते हैं  बहरहाल, आज भी इस दिशा में अद्यतन कार्य करने की आवश्यकता है। उत्साही लेखकों/प्रकाशकों को इस क्षेत्र में आगे आना चाहिए।

                                                                                                            प्रस्तुति : नागेश पांडेय 'संजय'

बुधवार, 23 अक्टूबर 2019

आलेख : समकालीन बाल कहानियों में मूल्यपरक शिक्षा डा. नागेश पांडेय ‘संजय’

समकालीन बाल कहानियों में मूल्यपरक शिक्षा

डा. नागेश पांडेय ‘संजय’

अत्याधुनिकता के एक ऐसे समय में, जब ऐन केन प्रकारेण अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की होड़ मची हो, मूल्य शिक्षा की बात थोड़ी अजीब भले ही लगती हो किंतु सच बात यह भी है कि कभी विश्वगुरु कहा जाने वाला हमारा देश जब आवहि संतोष धन, सब धन धूरि समान की परंपरा का देश है। राष्ट्र की रक्षा हेतु यह दधीचि के हंसते-हसते अपनी हड्डियां गला देने का देश है। गुरु की आज्ञा पर यह अपना अंगूठा काट कर अर्पित कर देने वाला देश है।  सत्य के नाम पर यह हरिष्चंद्र के अपना राजपाट और सर्वस्व न्योछावर कर देने का देश है।
सच पूछिए तो यह त्याग, दया, उदारता, करुणा, क्षमा, सहनशीलता और समर्पण जैसे अन्यान्य मूल्यों का देष है। इन मूल्यों से रची पगी कितनी कहानियां हमारे चतुर्दिक बिखरी पड़ी हैं। इन्हीं मूल्यपरक कहानियों के बल पर हमारी अक्षुण्ण संस्कृति सदियों से प्रवहमान है। कभी दादी-नानी के द्वारा, जिन्हें अप्रत्यक्ष रूप से मूल्य शिक्षा का जीता जागता विष्वविद्यालय कहा जा सकता है, संस्कारदात्री कहानियां अपनी वरेण्य भूमिका का निर्वाह करती रही हैं। कालांतर में दादी नानी का विकल्प पत्र-पत्रिकाएं और पुस्तकें बन गई तथापि मूल्य षिक्षा उसका अभिन्न अंग बनी रही। रामायण, महाभारत, कथा सरितसागर, सिंहासन बत्तीसी, पंचतंत्र, हितोपदेष की पारंपरिक कहानियों के अतिरिक्त बाल साहित्य लेखकों ने भी ऐसी कहानियों का बहुतायत से सृजन किया है। आज हिंदी बाल साहित्य भले ही कितने भी परिवर्तनों से गुजर रहा हो, नैतिकता की प्राथमिकता उसमें कल भी विद्यमान थी, आज भी है और आगे भी रहेगी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के बिंदु 8.4 में लिखा है कि जीवन के आवश्यक मूल्यों का हृास हो रहा है और लोगों का विश्वास उठ रहा है, अतः शिक्षण क्रम में ऐसे परिवर्तन की जरूरत है कि सामाजिक और नैतिक मूल्य के विकास में शिक्षा एक सशक्त साधन बन सके।
निसंदेह कह सकते हैं कि मूल्यपरक षिक्षा की आज सर्वाधिक आवष्यकता है। हमें यह नहीं भूलना है कि विश्व में जितने भी महान व्यक्ति हुए हैं, उन्होंने बाल्यावस्था में उच्चकोटि का बाल साहित्य पढ़ा था। बाल साहित्य का मूल्य शिक्षा से अंतरंग संबंध है। कौन नहीं जानता कि विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र की रचना उच्छ्रंखल बालकों के परिष्कार हेतु ही की थी। बाल साहित्य बालकों को नई सोच और स्वस्थ दिशा प्रदान करता है। इसके माध्यम से बालकों में नैतिकता, सद्भावना, पारस्परिक प्रेम और एकता के मानवीय अंकुर उपजते हैं। वे राष्ट्र की संस्कृति, उसकी अस्मिता और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए सजग प्रहरी के रूप में तैयार होते हैं।
       हिंदी में मूल्यपरक षिक्षा से ओतप्रोत कहानियां निरंतर लिखी जा रही है। पर पीड़ा सम नहीं अधमाई के उच्च संस्कार को उद्घाटित करती बानो सरताज की कहानी कोयल और कोटर उनकी मौलिक कल्पना का चमत्कार है। हमेशा दूसरे के घोसले को अपने प्रयोग में लाने वाली कोयल को अपना घोंसला बनाते देख बरबस ही मन श्रद्धा से भर उठता है। (पुस्तक: 21 बाल कहानियां,पृष्ठ 49)     
सफलता का भेद फकीरचंद शुक्ल की प्रेरक कहानी है जो करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान संदेष को ध्वनित करती है। (नई सुबह, पृ.19) 
 किरण घोडके की पुस्तक सितारों वाली गुल्लक में संकलित कहानी डिब्बी कछुआ सभी प्राणियों से प्रेम के संदेष के बहाने वसुधैव कुटुंबकम का भाव जगाती है।   
  प्यार की बातें मनोहर चमोली की छोटी सी कहानी है जो प्रेम का वास्तविक अर्थ बताती है। (अंतरिक्ष से आगे बचपन, पृ. 23)
   मुरलीधर वैष्णव ने तो चरित्र विकास की बाल कहानियां नामक एक संकलन ही तैयार किया है जिसके पृ. 43 पर प्रकाषित कहानी सच से बड़ा झूठ सत्यम ब्रूयात प्रियं ब्रूयात मां ब्रूयात सत्यमप्रियम के दार्षनिक पहलू को उजागर करता है। ऐसे सच से वह झूठ ज्यादा बेहतर है जो किसी का दिल न दुखा रहा हो।
ऐसे ही पुस्तक बच्चों को सीख देने वाली 51 कहानियां (2012) प्रकाश मनु की लेखनी का चमत्कार है। इसमें जीवनोपयोगी कहानियां हैं। कहानी चार फुदनों वाली टोपी दूसरों के उपालंभ से व्यथित होकर तात्कालिक निर्णय न लेने की प्रेरणा देती है। ऐसी ही एक चर्चित कहानी गिजूभाई की भी है सात पूछों वाला चूहा, जो इस कहानी के पात्र द्वारा टोपी का एक एक फुंदना कटवाने की तरह एक एक पूछ कटाता जाता है। 
   आत्मविश्वास हो तो रमाशंकर की प्यारी कहानी है,जहां  अपनी लगन और आत्मबल के सहारे दीपक सफलता की सीढ़ियां चढ़ता जाता है। (जस्सी और अन्य कहानियां, 73)   
एकता में बल निर्मला सिंह की छोटी सी कहानी है जो पारस्परिक सद्भाव की प्रेरणा देती है।
रजनीकांत शुक्ल बालसाहित्य साहसिक कहानियों के सृजन हेतु लोकप्रिय हैं। उनकी अनेक कहानियां पुस्तक  साहसी घटनाएं में संग्रहीत हैं। पृ. 63 पर प्रकाषित कहानी आग से मुकाबला में असल जिंदगी का हीरो शुभम बैन में फंसी लड़की को आग से बचाता है। ऐसी ही एक कहानी है लपटों के बीच, जिसमें लेखक रमेश चंद्र पंत ने बालमन में साहस और आत्मबल के साथ साथ प्रत्युत्पन्नमति की मनोरम छटाएं उंकेरी है। (बालमन की प्रतिनिधि कहानियां, पृ. 88) 
 पिछले दिनों पढ़ी राकेश चक्र की श्रेष्ठ कहानियां पुस्तक में पृ. 67 पर छपी कहानी पूरा इंसान भी दिल को छू गई। यह कहानी जातीयता और विद्वेष के भाव से मुक्त कर मानवता की ओर सत्प्रेरित करती है। दो अलग जातियों के इंसानों के खून से प्राण बचने पर पात्र की यह मार्मिक अभिव्यक्ति कि मेरे अंदर आज तीन तरह के इंसानों का खून मिल गया है, मन को ही नहीं, आत्मा को भी विगलित कर देती है। 
पुस्तक बावन गांव इनाम में कर पृ. 58 पर प्रकाषित कहानी फटी शर्ट राष्ट्रबंधु की बहुचर्चित कहानी है, जो परिवार के प्रति बालकों को दायित्वबोध से जोड़ती है। पिछले दिनों देविका फिल्मस्, मुंबई से इस कहानी पर बनी बालफिल्म देखकर आंखे भीग गईं। ऐसी बाल फिल्में और भी बनती रहें और उनका अधिकाधिक प्रसारण भी हो तो जीवन मूल्यों के स्थापन की दृष्टि से यह एक कारगर कदम हो सकता है। दिनेश पाठक शशि की कहानी प्रधानाचार्य की कुर्सी (बालहंस, अक्टूबर द्वितीय 1999, पृष्ठ 53) भी बड़ों के प्रति सम्मान का भाव जागृत करती है और उनकी परिस्थितियों से अवगत रहने की प्रेरणा देती है।
 मां का उपहार पुस्तक में संकलित अपना घर(पृ. 16) डॉक्टर शकुंतला कालरा की मनोवैज्ञानिक कहानी है, जो घर से भागे हुए बच्चे षैल के बहाने पलायनवादी प्रवृत्ति का परिष्कार करती है।
 शेर चिड़िया की दोस्ती गोविंद शर्मा की मजेदार कहानी है। घमंड न करने और पड़ोसी धर्म की शिक्षा से रची पगी यह रचना उनकी चर्चित पुस्तक कांचू की टोपी की श्रेष्ठतम कहानियों में से एक है।
दिविक रमेश की कहानी किस्सा चाचा तरकीबूराम का मजेदार है जो हंसाते गुदगुदाते अचौर्य की सहज षिक्षा भी दे जाती है। 

 जब आवहि संतोष धन, सब धन धूरि समान के आदर्ष से अनुप्राणित अमिता दुबे की कहानी संतुष्टि का सपना भी अनूठी है। (पुस्तक: राह मिल गई, 21)
  वन्य जीवन पर चुटीले लेखन के लिए सुचर्चित विनायक की लंबी कहानी जिंदा अजायबघर, प्राणिमात्र के प्रति बालोत्सुकता को शांत कर उनके प्रति प्रेम भी जागृत करती है।
मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है, इस मूल्य को सुधा भार्गव ने कुषल बुनकर की तरह बुना है अपनी कहानी भग्गू बन गया भगवान में, इसे उनकी पुस्तक अंगूठा चूस के पृ. 23 पर पढ़ा जा सकता है। भूखे को भोजन देना और असहाय की सहायता करने की सहज शिक्षा देने की दृष्टि से भी यह एक अच्छी कहानी है।  खिलौने वाली शंकर सुल्तानपुरी की अप्रतिम रचना है जो लोक ऋण से मुक्ति के भाव से जोड़ती है। एक गरीब बच्चे को मुफ्त में मिट्टी का खिलौना सिपाही देकर खिलौनेवाली उसकी दुनियां ही बदल देती है। वह बच्चा उस खिलौने को देखकर सिपाही बनने की प्रेरणा ही नहीं लेता वरन सिपाही बनकर दिखाता है। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह कि यह ऋण वह भूलता नहीं। कालांतर में एक धर्मपुत्र की भांति वह उस खिलौनेवाली से मिलने आता है। निश्चित रूप से सहृदय पाठक की आंखें उस दृश्य की कल्पना कर बरबस ही भीग जाएंगी।
बाल वाटिका में छपी साजिद खान की षबीना अंकल नए मिजाज की उम्दा कहानी है जो करुणा को विस्तार देते हुए, मार्मिकता की तह तक जाकर बच्चों को नए संस्कारों की ओर मोड़ती है।

नंदन सितंबर 19 में छपी अनिल जायसवाल की कहानी बैकबेंचर सकारात्मक प्रेरणा से ओतप्रोत है। हीन भावना से ग्रस्त बच्चों को यदि आत्ममूल्यांकन की सुप्रेरणा देने का कौषल हो तो उन्हें उच्च शिखर पर पहुंचाने में देर न लगेगी।
पराग अक्टूबर 1989 में छपी पदमा चौगांवकर की कहानी छोटी सी भूल घर की तरह देष के प्रति भी समान भाव जाग्रत करने का आवाहन करती है। हरिभूमि, 18 मई 2017 में प्रकाशित घमंडीलाल अग्रवाल की कहानी अनोखा जन्मदिन भारतीय संस्कृति के विविध पक्षों का बोध कराती है।
पवनकुमार वर्मा इधर खूब लिख छप रहे हैं। बच्चों का देश, अगस्त 2019 में आई उनकी कहानी भाई बहन का प्रेम पारिवारिकता के आत्मीय स्वर को बुलंद करती है।
नीलम राकेश की कहानी और वे मित्र बन गए (देवपुत्र सितंबर 19, पृष्ठ 5) आडंबर से दूर रहकर जीवनयापन का संदेष देती है। यहां पर विमला भंडारी की चित्रकथा मां ने कहा था (बाल भास्कर 3 मई 2019) का भी खासतौर पर उल्लेख्य करना चाहूंगा।  एकाग्रता, आज्ञाकारिता और बड़ों के अनुभव का महत्व दर्शाती ऐसी कहानियां तो जरूरी हैं ही लेकिन मूल्यों को जगाती ऐसी कहानियां काष ! चित्रकथाओं के रूप में सुलभ हो सकें तो मूल्य षिक्षा की राह को रोचकता के आवरण में आसान किया जा सकता है।
कहानियाँ और भी हैं किन्तु विस्तार भय से उनकी चर्चा यहां सम्भव नहीं है। ऐसी कहानियों की रचना करते समय अतिरिक्त लेखकीय सजगता अत्यापेक्षित है। मूल्य संस्थापन के प्रयास कहानी का मूल तत्व मनोरंजन नष्ट नहीं होना चाहिए। रोचकता तो आद्यंत अपेक्षित है। कहानी विशुद्ध रूप से उपदेशात्मक होकर न रह जाए, यह ध्यान रखना होगा।
बाल कहानियां में मूल्य शिक्षा  की विविधरंगी छटा मनोहारी है और उसका महत्व सर्वकालिक है। पत्र पत्रिकाओं में तो ऐसी कहानियों को स्थान मिले ही, उनका वृहद संचयन भी प्रकाशित होना चाहिए।
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डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

बाल साहित्य में चौर्य वृत्ति (आलेख) -नागेश पांडेय 'संजय'

‘बाल भारती’ (मा.) के जून 1988 अंक में एक कहानी छपी थी- ‘सारस परी।’ इसे पढ़कर मेरा चौंकना स्वाभाविक था क्योंकि इससे पूर्व मैं इसी कहानी को ‘चुप-चुप चोरी’ शीर्षक से जापानी लेखिका मिजुओचि के नाम से पढ़ चुका था। मैंने तत्काल ‘बाल भारती’ के संपादक श्री शिवकुमार को एक छोटा सा पत्र लिखा। मेरे उस पत्र के उत्तर के रूप में उन्होंने ‘बाल भारती’ के अक्तूबर 1988 अंक में एक पृष्ठीय संपादकीय लिखा था। चौर्यवृत्ति की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के विरोध में निःसंदेह वह एक महत्त्वपूर्ण पहल थी। श्री कुमार जी का वह संपादकीय दो-टूक वादिता, निर्भीकता और साहस की दृष्टि से आज भी प्रशंस्य है।
‘‘हमें पाठकों से हाल ही में कुछ शिकायत भरे पत्र प्राप्त हुए हैं। शिकायत है- चोरी के साहित्य की। लेखक वर्ग अन्य लेखकों की रचनाएँ अपने नाम से भेजते हैं। साहित्यिक चोरी के रूप हैं, रचना के पात्र बदलकर, रचना को अपनी कहकर भेजना। दूसरा रूप हैं विदेशी कहानियों का अनुवाद करके अपनी रचना बताना। तीसरा रूप है, अपनी रचना को विभिन्न नामों से विभिन्न पत्रिकाओं में छपवाना तथा चौथा रूप है लब्धप्रतिष्ठ लेखकों की विश्व प्रसिद्ध रचनाओं को अपनी रचना बताकर प्रकाशित करवाना। इस श्रेणी के तथाकथित लेखक केवल अपना नाम-भर लेखक के रूप में देखना चाहते हैं। वे शायद यह समझते हैं कि ऐसा करने से वे लेखक के रूप में प्रसिद्ध हो जाएँगे।
यह प्रसंग यहीं समाप्त नहीं होता। कुछ लेखक प्रेरणात्मक प्रसंगों को, जो कि वास्तविक रूप से ‘क’ से जुड़ा है, वे उस प्रसंग को ‘ख’ ‘ग’ या ‘च’ के नाम साथ जोड़कर भेजते हैं।
जो लेखक चोरी की हुई रचनाएँ भेजते हैं, हम उन्हें ब्लैक लिस्ट कर रहे हैं। हमारा जागरूक पाठक सदा की तरह हमें चोरी की हुई रचनाओं के संबंध में सूचित करता रहेगा।’’
- शिव कुमार
इसके अनंतर चोर लेखकों ने ‘बालभारती’ में तो कम ही धृष्टता दिखाई किंतु विविध पत्र/पत्रिकाओं के माध्यम से उनके प्रयोग चलते रहे और यह क्रम आज भी जारी है।
वस्तुतः रचना चोरी के अन्य भी कई रूप हैं। पिष्ट-पेषण या पुनरावृत्ति भी एक प्रकार से रचनात्मक-चोरी का ही एक चेहरा है। हिंदी में ऐसे बाल साहित्यकारों की बड़ी संख्या है जो प्रतिवर्ष होली या दीवाली पर स्वयं को ही दोहराते किसी भी पत्र/पत्रिका में मिल जाएँगे।
समीक्षा की स्वस्थ परंपरा के अभाववश बाल साहित्य में चौर्य वृत्ति एक दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष के रूप में विद्यमान है। कुछ भी ‘टीप’ दो, कहीं भी छपा दो; कोई कहने-सुनने वाला नहीं। इधर ‘प्राइवेट’ पाठ्यक्रम के रूप में बच्चों की जो पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं, उनमें प्रतिष्ठित लेखकों की रचनाएँ अपने नाम से छपवाने का फैशन सा चल पड़ा है।
हाल ही में दिल्ली से प्रकाशित कक्षा-एक की पुस्तक ‘हिंदी दर्पण’ में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की चर्चित कविता ‘जिसने सूरज चाँद बनाया’ को लेखिका आभा गोस्वामी ने अपने नाम से प्रकाशित कराया है। इसी प्रकाशन की कक्षा-दो की ‘हिंदी दर्पण’ में चंद्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’ की लोकप्रिय रचना ‘नानी का घर’ को लेखिका आभा गोस्वामी ने आंशिक फेरबदल के साथ ‘दादी का घर’ शीर्षक से प्रकाशित कराने का घृणास्पद कृत्य किया है। ऐसे कार्यों की जितनी भी निंदा की जाए, कम है।
ऐसा नहीं है कि रचना-चोरी का कार्य केवल नवसिखुए यशाकांक्षी ही करते हैं, मैं व्यक्तिगत रूप से हिंदी के अनेक ऐसे बाल साहित्यकारों को जानता हूँ, जिन्होंने आंशिक फेरबदल के साथ दूसरे लेखकों की रचनाएँ अपने नाम से प्रकाशित कर वाहवाही लूटी है।
पं. सोहन लाल द्विवेदी की एक कविता है- ‘फूलों से तुम हँसना सीखो, भौरों से तुम गाना।’ हिंदी के अनेक बाल साहित्य सेवी इसका उद्धार कर चुके हैं। द्विवेदी जी की ही एक कविता- ‘अम्मा कहती, बनूँ कलक्टर/दादा कहते, जज बन जाऊँ। दीदी कहतीं बनूँ गवर्नर/सबके ऊपर हुक्म चलाऊँ। बहन कह रही बनूँ डाक्टर/या कि बनूँ कोई विज्ञानी।’, जो कि ‘महिला’ (मासिक) के अक्तूबर 1937 अंक में छपी थी, कुछ फेर बदल के बाद आज एक समीक्षक की मौलिक रचना बनकर पाठ्यक्रम में भी शामिल हो गई है। निरंकार देव सेवक की चर्चित रचना ‘अगर-मगर दो भाई थे/करते खूब लड़ाई थे। अगर मगर से छोटा था/मगर मगर से खोटा था।’ को उनके ही एक समकालीन बाल कवि ने आंशिक उलट-पुलट के बाद अपने संकलन में अपनी कविता के रूप में छपा लिया था।
ऐसे लेखकों के प्रति कठोरता का बर्ताव बहुत आवश्यक है। चौर्य-वृत्ति तभी रूक सकेगी। डॉ. सुरेंद्र विक्रम की एक कविता है- ‘बस्ते का बोझ।’ इसे राजस्थान के एक रचनाकार ने ‘अमर उजाला’ में छपवा लिया था। उसे न केवल संपादक ने ब्लैक-लिस्ट किया, बल्कि डॉ. विक्रम ने मानहानि के दावे के रूप में उससे समुचित राशि भी वसूल की थी।
बस्ते के ही प्रसंग पर केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की ‘बाल-काव्य गोष्ठी’ याद आ रही है। डॉ. उषा यादव की एक मार्मिक कविता है-‘उफ’! बस्ता कितना भारी है।’ इसे एक शोध-छात्र अपने नाम से पढ़ गया। बाद में जानकारी हुई कि वह उषा जी का ही छात्र था और प्रभाववश उनकी ही रचना को दोहरा गया। खैर..., न केवल उसने क्षमा मांगी बल्कि भविष्य में ऐसी त्रुटि न करने का वचन दिया।
बहुत पहले (1994) में चंद्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’ की कविता ‘दशहरा’ को किन्हीं नरेश आचार्य ने अपने नाम से ‘अमर उजाला’ में छपवाया था। मैंने ‘मयंक’ जी और संपादक को पत्र लिखा। ‘मयंक’ जी का उत्तर आया तो जाना, उसी कविता को एक लेखिका भी अपने नाम से छपाए बैठी है। द्रष्टव्य उनका 27.10.1994 का यह पत्र-
प्रिय संजय जी,
हिंदी बाल साहित्य में आजकल दूसरे की कविता चुरा कर अपने नाम से छपवाने की प्रवृत्ति जोरों से बढ़ रही है। मेरी कविता ‘दशहरा’ को चोरी से किसी ने अमर उजाला (बरेली) में छपवाई थी, जिसकी सूचना आपने दी थी।... यही कविता निशि बाजपेई ने अमर उजाला (कानपुर) में 22.10.94 को अपने नाम से छपवाई है।
ऐसी बातों से हिंदी बाल साहित्य का भला क्या लाभ हो सकता है? इस खतरनाक प्रवृत्ति को रोकना ही उचित है। 
शेष कुशल है।
शुभकामनाओं सहित,
           भवदीय
           चंद्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’
बाल साहित्य में चौर्य-वृत्ति को रोकने के लिए समीक्षकों की सतर्कता आवश्यक है। दरअसल बाल साहित्य छापने वाले अधिकांश संपादक बाल साहित्य के जानकार नहीं होते। ऐतिहासिक परिदृश्य से अनभिज्ञता ही इस विडंबना को संरक्षित करती है। बाल स्तंभ अथवा बाल पत्रिकाओं के संपादक की नियुक्ति हेतु बाल साहित्य का ज्ञान अनिवार्य होना चाहिए तभी बाल-साहित्य के मौलिक-सृजन का मार्ग भी प्रशस्त होगा।
तथापि, लेखकों और समीक्षकों को चाहिए कि वे बाल साहित्य में चौर्य-वृत्ति की खुलकर निंदा करें। ऐसे लेखकों का तिरस्कार और बहिष्कार बहुत जरूरी है।

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

बाल साहित्य का भविष्य

आलेख : नागेश पांडेय 'संजय'

- भीड़ में तेज स्पीड में बाइक ड्राइव करता बच्चा आपको धूल खिलाता निकल जाएगा। उसके एक हाथ में मोबाइल होगा-अत्याधुनिक मोबाइल। जिसकी कीमत दस-पंद्रह हजार तक हो सकती है। पीठ पर जो बैग है, उसमें लैपटाप हो सकता है। जी, हाँ! ये नयी  दुनिया के बच्चे हैं जो भीड़ में आगे निकलने के लिए आपको धकियाने से भी नहीं चूकेंगे और ‘सारी...!’ सारी का तो सवाल ही नहीं उठता।
 - ट्रेन में, पार्क  में, किसी चौराहे पर, स्टेशन पर या फिर स्कूल के कैंटीन में खड़े भारत के भविष्यों की बातें आप न ही सुनें तो  अच्छा है। कान में रुई  लगाने को जी करेगा।
 - हाँ, और कभी इन्हें समझाने की भूल तो आप करिएगा मत। ये आपसे प्रतिवाद करने से चूकेंगे नहीं। आपका सम्मान आपके हाथ में (सच कहूँ तो आपके मौन में) है।
 जहाँ देश के भविष्य की यह दशा हो वहाँ उनके लिए बाल साहित्य के भविष्य की बात करना थोड़ा अटपटा और अव्यावहारिक तो है किंतु अंधकार में क्या रोशनी के लिए आशा और प्रयास छोड़ देना चाहिए? कुछ यही सोचकर... दो-चार बातें...

बाल साहित्य के मूल उपभोक्ता बच्चे हैं और वही बाल साहित्य से कट गए हैं या सीधी बात कहें कि ‘काट’ दिया गया है। समाचार पत्र बच्चों तक उनका साहित्य पहुँचाने के सशक्त माध्यम थे। इस बहाने बच्चा देर-सवेर किंतु बाल साहित्य को पढ़ता था। यह पठन उसे कई बार सृजनात्मक अभिरुचि से भी जोड़ता था। आज बाल साहित्य में गत कई वर्षों  से नए बाल साहित्यकारों की पदचाप के मामले में सन्नाटा है। इसका एक कारण समाचार पत्रों से बाल साहित्य का हट जाना भी है। 
 बाल साहित्य को लेकर बड़ों की, विशेषकर समझदार बड़ों की और उनमें भी  (बड़े नहीं) ‘बड़ों’ के कुछ लेखकों की मानसिकता दुर्भाग्यपूर्ण है । समूचे बाल साहित्य जगत की प्रगति से आँखें मूँदकर वे एक रटा-रटाया जुमला दोहराने से नहीं चूकते - हिंदी में श्रेष्ठ बाल साहित्य का अभाव है। अभाव है तो आप क्यों नहीं लिखते? नहीं लिखते तो टिप्पणी का आपको क्या अधिकार ? टालस्टाय, प्रेमचंद, टैगोर, निराला, बच्चन, महादेवी, सोहन लाल दिवेदी , रामनरेश त्रिपाठी , सवेश्वर दयाल सक्सेना और विष्णु प्रभाकर सरीखे जाने कितने लेखकों ने बाल साहित्य लिखा और इसलिए लिखा कि बच्चों के लिए साहित्य अपेक्षित है। उन्होंने भी बचपन में बाल साहित्य पढ़ा होगा। इसलिए दायित्व बोध से प्रेरित होकर इसकी जरूरत को महसूसा।
 एक महाशय ने मुझसे कहा-‘मुझे अब बाल साहित्य का कोई  भविष्य नहीं दिखता।’
 मैंने विनम्रतापूर्वक उनसे पूछा-‘क्यों? क्या अब बच्चा शैशवावस्था से ही गोदान और कामायनी सुनेगा, पढ़ेगा? कक्षा दो के पाठ्यक्रम में राम की शक्ति पूजा लगेगी?’
 नेशनल बुक ट्रस्ट की एक संगोष्ठी में मैंने कहा था-दुनिया में सब कुछ बदल सकता है। बच्चा - बच्चा रहेगा, भले ही कुछ समय तक। और उसके बाद भले ही आपकी लापरवाही उसका बचपन छीन ले, यह  बात दीगर है। 
 आज के बच्चे के जिन रूपों की बात मैंने की है, उसके लिए मैं बच्चों को कभी दोषी नहीं मानता। कटघरे में तो अभिभावक और शिक्षक हैं जिन्होंने बालक की मानसिक भूख को समझा ही नहीं।
 समाचार पत्रों ने बाल साहित्य छापना बंद किया-कितने अभिभावकों ने विरोध किया ? आज बच्चा रविवारी परिशिष्ट में प्रकाशित अधनंगे चित्रों को देखकर यदि असमय जवान (या कहें बूढ़ा) हो रहा है तो इसमें भला उसका क्या दोष? आधुनिकता के नाम पर यदि आप इतने उन्मुक्त हो गए हैं कि अश्लीलता की सीमा लाँघे हुए विज्ञापन आपको आक्रांत नहीं करते और बच्चा उनके अर्थ  को खोजने में अपने भविष्य को दीमक की तरह चट करने में लगा है तो क्या इसके लिए वह दोषी है?
 दस हजार का मोबाइल बच्चे के पास है-दिलाया किसने?
 महँगे लैपटाप, जींस, टी-शर्ट , बाइक - ये सारी भौतिक सुविधाएँ आपकी देन हैं किंतु इन्हें जरूरत मानने वाले अभिभावकों ने क्या कभी पंद्रह रुपये मूल्य की कोई  बाल पत्रिका  भी उसे लाकर दी ?
 आप कह सकते हैं - पंद्रह रुपये की पत्रिका। ये तो मँहगी है।
 इसी दृष्टि ने आज आपको सस्ता कर दिया है।
 बच्चे की निगाह में आज आपकी कीमत कुछ भी नहीं। आप उसके लिए जिदों को पूरा करने वाले पायदान भर हैं।
 चिमटे के बिना दादी की जलती उँगलियों का दर्द  अपने दिल से महसूस करने वाले हामिद आज नहीं हैं लेकिन केवल-केवल इसलिए कि हम उन्हें प्रेमचंद का 'ईदगाह' नहीं, पंद्रह हजार का टी.वी. और पाँच सौ रुपये प्रतिमाह का केबिल उपलब्ध कराने में स्वयं को दूसरों से बेहतर पिता अनुभव करते हैं। 
 मैंने एक मित्र से पूछा-आप अब बाल साहित्य क्यों नहीं लिखते?
 उन्होंने कहा-बाल साहित्य तो तब लिखूँ जब बच्चा हो। आज बच्चा है कहाँ।
 कुछ समझदार लेखक बदले हुए बच्चे को देखकर बाल साहित्य को भी बदलने में जुट गए हैं। बच्चे जो कुछ सोच-कर रहे हैं उसे बाल साहित्य में लाने के लिए वे बाल साहित्य को अश्लीलता से जोड़ने में भी नहीं  हिचकते- इस साफगोइ के साथ बाल साहित्य तो बाल मन की अभिव्यक्ति है। बाल साहित्य तो बाल समाज का दर्पण है।
 बाल साहित्य बाल-मन की अभिव्यक्ति है, बाल-दुष्मन की अभिव्यक्ति नहीं।
 दर्पण वह इस नाते हैं कि बाल समाज को उसकी वास्तविक छवि दिखाते हुए उसे सँवारने को भी प्रेरित करे।
 दरअसल बच्चे बाल साहित्य से कट गए हैं - कहते हुए हमारे जेहन में केवल महानगरों में रहने वाले ऊँची चमक-दमक के बच्चे होते हैं। भारत गाँव का बल्कि गाँव का भी देश है, हम यह भूल जाते हैं। गाँव के निश्छल, सहज बच्चों को भूल जाते हैं। गाँव के बच्चे आज भी साहित्य सुनना-पढ़ना चाहते हैं। वे दादी-नानी से जुड़े हैं, उनकी कहानियों से जुड़े हैं। गाँव में बच्चों के कवि सम्मेलन खूब सफल हुए हैं। बल्कि बड़े शहरों में भी बाल कवि सम्मेलनों की सफलता असंदिग्ध है। कानपुर के एक बाल कवि सम्मेलन में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी मुख्य अतिथि थे। बच्चे उन्हें देखकर हतप्रभ थे - इनकी कविताएँ तो हमारे कोर्स  में हैं।
 बाल साहित्य और बच्चे को जोड़ने के लिए नेटवर्क  की जरूरत है। अभिभावक तो भौतिकता की चकाचौंध में और यह भी कह सकते हैं कि बाल साहित्य के महत्व से परिचित न होने के कारण विशेष योगदान नहीं दे रहे। बाल साहित्यकार और शिक्षक भी इस दायित्व से बचते ही नजर आते हैं।
 एक बाल साहित्यकार बोले-हमारा काम है लिखना। हम लिख रहे हैं। बाल साहित्य बेचना या उसका प्रसार करना हमारा काम नहीं है।
 माफ करें, बाल साहित्य यदि बच्चों तक नहीं पहुँच रहा तो परिवेश बनने तक बाल साहित्यकारों को भी आगे आना ही होगा। आप कुछ नहीं तो विद्यालयों में बाल कवि सम्मेलन तो करा ही सकते हैं। बच्चों को पुरस्कार में बाल साहित्य की पुस्तकें देने के लिए वातावरण निर्मित  कर सकते हैं। जन्मदिन पर बाल साहित्य भेंट करने की परंपरा विकसित कर सकते हैं और कुछ भी नहीं तो कम से कम इतना कि विद्यालयों में जाकर केवल अपनी-कविता या कहानी का पाठ ही बच्चों के समक्ष कर सकते हैं। विद्यालयों में प्रार्थनाकाल या खाली पीरियड में यह काम हो सकता है।
 बाल साहित्य के प्रसार में शिक्षक महत्वपूर्ण  सिद्ध हो सकते हैं किंतु उन्हें बाल साहित्य के बारे में ज्ञान नहीं। इसमें भी उनका दोष नहीं। स्नातक, स्नातकोत्तर स्तर के पाठ्यक्रम में बाल साहित्य होना चाहिए। उसके महत्व पर अध्याय होने चाहिए। कुछ नहीं तो एम. ए. स्तर पर वैकल्पिक प्रश्न पत्र के रूप में जैसे - लोक साहित्य, पत्रकारिता विशेष विधा आदि के प्रश्न पत्र होते हैं, उनमें बाल साहित्य भी रहे। इससे भावी माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी तथा शिक्षक बाल साहित्य की दशा और महत्ता से परिचित होकर उसके विकास में अच्छी भूमिका निभा सकेंगे।
 मुझे यह कहने में कोई  संकोच नहीं कि आज बाल साहित्य बहुत लिखा जा रहा है, बहुत छप रहा है किंतु पढ़ा कम जा रहा है। पढ़ा इसलिए कम जा रहा है क्योंकि बहुत से पूर्वाग्रह हावी हैं। बाल साहित्य केवल बच्चों के लिए ही नहीं - शिक्षकों, अभिभावकों, शोधार्थियों, पाठ्य समितियों, फिल्म निर्माताओं-सबके लिए है। बाल साहित्य साझा साहित्य है। बाल साहित्य को जब हम केवल बच्चों का मान बैठते हैं, बस वहीं से उसकी उपेक्षा शुरू हो जाती है। एक जमाना था जब  नंदन बड़ों की भी पत्रिका  थी। प्राचीन कथा विशेषांक की प्रतीक्षा दादा-दादी, माता-पिता, शिक्षक और यहाँ तक कि साधु-संत भी करते थे। बाल साहित्य को ऐसे ही बहुआयामी बनाने की जरूरत है।
 बाल साहित्य गंभीर लेखन है, इसके लिखने वाले को भी गंभीर होना चाहिए। बाल साहित्य की प्रगति की ओर उन्मुख होना चाहिए। जबरदस्ती नहीं, जबरदस्त लेखन की जरूरत है। 
 बाल साहित्य का क्षेत्र अपार संभावनाओं से युक्त है। खुला आमंत्रण दे रहा है-जरूरत है निष्ठा से काम करने वालों की। 
 जरूरत है काम करने वालों को उत्साहित-प्रोत्साहित करने वालों की।
 इधर बाल साहित्य का इतिहास लिखकर प्रकाश मनु ने बहुत बड़ा काम किया है। कृष्ण शलभ के संपादन में वृहद् ग्रंथ बचपन एक समंदर प्रकाशित हुआ है। इंटरनेट पर बाल पत्रिकाएँ आ रही हैं। विश्व पुस्तक मेले यह सिद्ध करते हैं कि आज बच्चों की सर्वाधिक पुस्तकें छपती हैं। बाल साहित्य पर लाखों के पुरस्कार हैं।
 बाल साहित्य का भविष्य उज्ज्वल है। अक्षुण्ण संभावनाओं से ओतप्रोत है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। बाल साहित्य भी उससे अछूता नहीं रह सकता। लेकिन यह कहना कि बाल साहित्य का अस्तित्व खतरे में है, बड़ी भूल है। बाल साहित्य नहीं रहा तो उसके रूप में आज तक हस्तांतरित होती आ रही संस्कृति भी नहीं रहेगी और तब... मानवता... समाज... राष्ट्र और... यह विश्व भी...! आप खुद समझ सकते हैं। मैं क्या कहूँ ?
(पुस्तक बाल साहित्य के प्रतिमान के अंतिम अध्याय से ...साभार)