रविवार, 30 मई 2021

आलेख : 'बहुआयामी कृतित्व के धनी : जयप्रकाश भारती' - डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'


  'बहुआयामी कृतित्व के धनी : जयप्रकाश भारती' 

आलेख : डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'      

    जयप्रकाश भारती जी  से मेरी पहली भेंट नंदन कार्यालय में हुई थी। 1995 की जनवरी यानी कड़ाके की ठंड। मैं  दिल्ली बालकन जी बारी इंटरनेशनल के आयोजन में गया था। मुझे ज्ञात था कि समारोह के मुख्य अतिथि भारतीजी हैं लेकिन मैं नहीं चाहता था कि उनसे भेंट की मेरी बहुत पुरानी इच्छा दिल्ली आकर भी प्रतीक्षा के बोझ से दबे। सूर्य का कार्यालय बंद हो चुका था लेकिन बालसाहित्य का यह सूर्य तो बड़ी ही तत्परता और सजगता से अपने कार्यालय में मुस्तैद था। मेज पर ढेर सारी डाक पड़ी थी और भारतीजी उसे छाँटने में लगे हुए थे। मुझे लगा कि ऐसे समय पर पहुँचकर मैंने गलती की है लेकिन नहीं, यदि उस समय न पहुँचता तो एक उदात्त व्यक्तित्व की महानता और आत्मीयता का साक्षात् कैसे संभव होता? तब मुझे अनुभूति हुई थी कि भारतीजी केवल संस्कारवान साहित्य के ही नहीं, अपितु तदनुरूप आचरण के भी कुबेर हैं। 

    मैं लगभग एक घंटे उनके साथ रहा। ढेरों बातें हुई। बालसाहित्य के प्रति उनकी गहरी निष्ठा और चिंता को बहुत करीब से अनुभव किया। मैंने जाना कि यह व्यक्ति तो वास्तव में बालसाहित्य का पर्याय है। गजब की अंतरंगता और इसके साथ-साथ अभूतपूर्व साहस भी। बालसाहित्य के महत्व को प्रतिपादित करने का साहस। बालसाहित्य के प्रति भ्रांतिपूर्ण दृष्टिकोणों को तोडने का साहस। जी हाँ, बालसाहित्य को मान्यता दिलाने का साहस। 

जयप्रकाश भारती, पद्मश्री श्याम सिंह शशि, पद्मश्री उषा यादव, डॉ. राष्ट्रबंधु, डॉ. राजकिशोर सिंह के साथ लेखक 

भीलवाडा में 





इस भेंट के बाद भारतीजी से कई बार मिला। कभी दिल्ली, कभी कानपुर तो कभी आगरा में आगरा विश्वविद्यालय और केन्द्रीय हिंदी संस्थान और  कभी भीलवाड़ा में । मैं हमेशा उनके साहस का कद्रदान रहा। बेबाक टिप्पणी उनकी आदत थी। हिंदी के बालसाहित्यकारों में एक बड़ी कमी है, बालसाहित्य के बारे में उनका सामान्य ज्ञान बहुत कम है। अतीत की तो छोड़ दीजिए, बालसाहित्य के वर्तमान के बारे में भी ठीक से जानकारी नहीं रखते। बालसाहित्य के बारे में कोई कुछ भी कह-बोल दे, हिंदी के बालसाहित्यकार प्राय: मूक श्रोता होते हैं। कोई प्रतिरोध नहीं। इस दृष्टि से भारतीजी के स्वाभिमान की सराहना करनी होगी। उनकी बेबाकी से न केवल जनसामान्य का अपितु दिग्गज आलोचकों का ध्यान भी बालसाहित्य की ओर गया। बड़े-बड़े लेखकों से उन्होंने बालसाहित्य लिखवाया और आजीवन बालसाहित्य को लेकर अभिनव प्रयोग करते रहे। 

कहानी, कविता, नाटक, लेख विज्ञान और समीक्षा-हर क्षेत्र में उनका अवदान है। उनके साहित्य के विविध रंग है। उसमें कल्पना का प्राचुर्य भी है और यथार्थ की स्निग्धता भी। एक शिशु का तोतलापन है तो एक बालक का खिलंदड़ापन आर एक किशोर-मन की कुलबुलाहट ओर चिंतन भी। यही उनकी रचनाधर्मिता की खूबी है कि उन्होंने किसी वाद से बँधकर नहीं लिखा। जी हाँ, मुझे बड़ा आश्चर्य होता है कि जब उन पर प्राचीनता के पोषक होने  का आरोप मढ़ा देखता हूँ।  वह राजा-रानी और परीकथाओं के पक्षधर थे, यह बात तो दीगर है लेकिन उन्होंने आधुनिकता की उपेक्षा की हो, पता नहीं कुछ स्वनामधन्य आलोचकों को ऐसा क्यों लगता है? स्वयं भारतीजी के शब्दों में- क्या अपनी धरती से कट जाना ही आधुनिकता है? आधुनिकता पुराने को पूरी तरह त्याग देने में नहीं होती। हाँ, नित नूतन बने रहने में होती है।(बालसाहित्य : इक्कीसवी सदी में, पृ. 36) इसी पुस्तक में उन्होंने लिखा है- बाल  रुचि को किसी एक तरह की कहानियों के घेरे में नहीं बाँधा जा सकता। बालक सभी तरह की कहानियों में रुचि रखते हैं। कभी-कभी आयु के अनुसार रुचि में अंतर होता है। जैसे छोटे बच्चे पशु-पक्षियों की कथाएँ अधिक पसंद करते हैं जबकि बड़े बच्चे इनमें कम रस ले पाते हैं। भारतीजी का साहित्य वाद-मुक्त और मनोवैज्ञानिकता से परिपूर्ण है। 

    हीरों का हार , रंग -रंग के फूल खिले, झिलमिल  कथाएँ और मेरी  प्रिय बालकहानियाँ  जैसी कथा-पुस्तकों के बहाने उन्होंने खेल-खेल में मनोरंजन करते हुए बच्चों को जीवनोपयोगी शिक्षाएँ दी हैं। इनमें राजा-रानी, परी और आधुनिक हर तरह की कथाएँ हैं। 

    उनकी कहानी आमिर गरीब  (श्रेष्ठ बालकहानियाँ, पृष्ठ509, संपादक-डॉ. बालशौरि रेड्डी) मेहनत और लगन की महता प्रतिपादित करती है। अन्य कहानी माँ की अमानत (हिंदी की श्रेष्ठ बालकहानियाँ, पृष्ठ-79, संपादक-डॉ. उषा यादव) की शैली अद्भुत है। खासकर कहानी आरंभ से ही पाठकों को बाँधने में सक्षम है-ठुम्मक ठुम्मक......ठुम्मक ठुम्मक...। ऊँटगाड़ी दिल्ली की ओर चली जा रही थी। यह कहानी एक लुटेरे जगमल के हृदय परिवर्तन को इस अंदाज में बयां करती है कि पाठक का मन ही भीग जाता है। ऐसे ही कहानी गुब्बारे  (किशोरों की श्रेष्ठ कहानियाँ, पृष्ठ 34, संपादक-नागेश पांडेय संजय) यह मिथक तोड़ती है कि वे पारंपरिक कहानियों के पोषक थे। कहानी का पात्र संजीव अपंग है किंतु असमर्थता और उपहास उसके लक्ष्य को डिगा नहीं पाते और वह एक दिन कीर्तिमान स्थापित करता है। दीप  जले, शंख बजे (चुनी हुई बालकहानियाँ, पृष्ठ-82, संपादक-डॉ. रोहिताश्व अस्थाना) बालिका कथा है। हिंदी में बालिकाओं के जीवन और अनुभूतियों की कम ही कहानियाँ हैं। यह कहानी पैल्दी नामक लड़की के जीवत और उच्च संस्कारों की मनोरम प्रस्तुति है। 

कानपुर में मंच पर भारती जी 

फूलों के गीत, विज्ञानं गीत,  गा गा गा, रुनझुन रुनझुन शिशु के गुनगुन गीत जैसी पुस्तकों में उनकी सरस-सहज कविताएँ हैं। विज्ञान के क्लिष्ट विषयों पर ग्राह्य भाषा में लेखन नि:संदेह उन्हें विशिष्ट बनाता है। रॉकेट  पर उनकी एक चर्चित कविता देखिए- 

राकेट उड़ा हवा में एक, लाखों लोग रहे थे देख।  पहले खूब लगे चक्कर, हुआ  अचानक छू-मंतर। जा पहुँचा चंदा के पास, जहाँ  न पानी, जहाँ न घास। 

उलटे पाँव लौट आया, साथ धूल-मिट्टी लाया। 

ऐसे ही बालकों के ज्ञानवर्धक, मनोरंजन और बौद्धिक व्यायाम की दृष्टि से लिखित उनकी पहेली भी उल्लेखनीय है-

बसा पेट में एक नगर, नहीं  नगर में रहूँ मगर। सदा तैरता हूँ जल पर, मगर न कहना मुझे मगर। (जहाज)

    उनके एकांकी संग्रह चाँद पर  पर चहल-पहल के क्या कहने! इसमें 8 मंचीय एकांकी हैं। सामाजिक, आधुनिक और वैज्ञानिक विषयों पर। अभिनेयता इनमें प्राणवत विद्यमान है। 

    भारतीजी मूलत: विज्ञान के विद्यार्थी थे। उनका वैज्ञानिक लेखन प्रामाणिक और रोचक है। अंतरिक्ष कितना जाना-कितना अनजाना, भारत का प्रथम अंतरिक्ष यात्री  , चलो  चांद पर चले, अनंत  आकाश, अथाह सागर, सच  होते सपने, बिजली  रानी की कहानी जैसी न जाने कितनी पुस्तकें उन्होंने बच्चों के लिए लिखीं। उनका निबंध पानी  में चाँद और चाँद पर आदमी आज भी उ.प्र. के हाई स्कूल के पाठ्यक्रम में है।  इस सबके बाद भी यदि कोई उन्हें  प्राचीनता  का पोषक या आधुनिकता का विरोधी कहता  है तो यह सिर्फ उसकी दरिद्र और दयनीय मानसिकता का ही द्योतक है।

    बालसाहित्य के क्षेत्र में प्राचीनता और आधुनिकता को लेकर बहुत वाक्-व्यायाम चला लेकिन बिना विचलित हुए भारतीजी अपने काम में लगे रहे। नंदन  उनके संपादन काल  में लोकप्रियता के कीर्तिमानों का स्पर्श करता रहा। विश्व की न जाने कितनी अद्वितीय कृतियों (जिनमें अधिकांशत: आधुनिक ही थी) के अनुवाद नंदन  में उन्होंने प्रकाशित किए । 

 भारतीजी ने समीक्षा का क्षेत्र पकड़ा तो कई कृतियों से बालसाहित्य का भंडार भर दिया। 'बाल  पत्रकारिता स्वर्ण युग की ओर', 'बाल  साहित्य इक्कीसवी सदी मे',  'कम्प्यूटर  क्रांति और बालक' उनकी बेजोड़ समीक्षा पुस्तकें हैं इनमें उनके दीर्घकालीन बालसाहित्यिक अनुभवों जिनमें कटु अनुभव भी हैं) का निचोड़ है। बालक से जुड़े हर व्यक्ति के लिए इनकी महता है क्योंकि इनमें चिंतन है, मनन है, आकलन है और शोध दृष्टि भी। 'बाल पत्रकारिता स्वर्ण युग की ओर' पुस्तक पर तो पहली बार भारत सरकार से भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार दिया गया था। हां, पुस्तक  'बालसाहित्य इक्कीसवीं सदी में' पुस्तक में भारतीजी ने भले ही  (भूमिका में ही) पृष्ठ -सीमा की दुहाई देते हुए अनेक लेखकों की चर्चा न हो सकने की विवशता प्रदर्शित कर दी हो लेकिन बहुत से महत्वपूर्ण ओर अत्याज्य नामों की चर्चा न होना उचित नहीं लगता ।  महत्त्वपूर्ण नाम छूटने से  इतिहास प्रभावित ओर विकृत होता है। 

यहाँ पर उनके संपादन में प्रकाशित 125 बालगीतों के संग्रह हिंदी  के श्रेष्ठ बालगीत की चर्चा भी जरूरी है। इसे भारतीय भाषाओं में सबसे बड़ा संग्रह बताया गया है जबकि पूर्व में पिल्ललु पाटलु् शीर्षक से 500 बालगीतों को संग्रह तेलगु में छप चुका था। ऐसी भूलों (जो किसी से भी संभव है) का निराकरण अवश्य किया जाना चाहिए। 

    खैर...., कोई भी संपूर्णता का दावा नहीं कर सकत। सीमाओं के लिए तो हर कहीं अवसर हैं, किंतु इससे भारतीजी के समर्पण, श्रम और सामथ्र्य पर प्रश्न चिह्न नहीं लगाया जा सकता। उनका कृतित्व बहुआयामी था। वे सच्चे बालमित्र थे। मौलिक सूझ-बूझ, अदम्य साहस और अपने ढंग के अनूठे प्रयासों के लिए वे हमेशा जाने और माने जाएँगे।     भारतीजी का एक बड़ा काम, जिसकी चर्चा कम हो सकी या कह सकते हैं कि तथाकथित महानुभावों ने जानबूझ कर ही उसकी चर्चा न की हो। उन्होंने एक महत्वपूर्ण ग्रंथ संपादित किया था - भारतीय  बालसाहित्य का इतिहास।  वर्ष 2002 में इसे अखिल भारती, 3014, चर्खे वालान, दिल्ली-110016 ने प्रकाशित किया था। उस दौर में लोग-बाग हिंदी साहित्य के इतिहास में बालसाहित्य के उल्लेख न होने का रूदन भर करते थे किंतु भारतीजी ने इस दिशा में पहल की ओर बालसाहित्य के इतिहास लेखन हेतु मार्ग प्रशस्त किया।  

    भारतीजी कुशल वक्ता थे। कई बार वे एक गर्वोक्ति भी करते थे, आप पाँच हजार आदमी मेरे सामने खड़े कर दो। मैं अपने वक्तव्य से उन्हें बाँध सकता हूँ। लेकिन यह बात सोलह आने सच थी। 

    जीवन के अंतिम समय में वे कई आयोजनों में जाने लगे थे। बाल वाटिका, भीलवाडा  द्वारा आयोजित बाल साहित्य शताब्दी समारोह  से वे बहुत प्रभावित हुए थे। उन्होंने कहा भी था, यहाँ आकर मुझे बहुत परितोष मिला हैं। डॉ. गर्ग  मेें बालसाहित्य के प्रति अद्भूत समर्पण है।

जयप्रकाश भारतीजी के साथ मेरे ढेरों संस्मरण हैं। कभी वक्त पाकर उन्हें लिखूँगा। मगर आगरा में उनके साथ बिताए पल मैं भूल नहीं पाता। किसी ने कहा था कि आलोकनगर के पास खुरचन बहुत अच्छी मिलती है। खुरचन खाने के मोह में हम लोग जाने कितना पैदल चले गए थे मगर बाद में  रबड़ी खाकर संतोष करना पड़ा। 

उन्हीं दिनों मूर्धन्य बालसाहित्यकार द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी का निधन हुआ था। भारतीजी, डॉ. राष्ट्रबंधु जी और मैं उनके घर पहुँचे। माहेश्वरी जी की छड़ी, उनका चश्मा-उनकी टोपी, उनके बेटे डॉ. विनोद माहेश्वरी जी ने बड़े सलीके से रखी थी। कितनी देर तक हम लोग उसे निहारते रहे थे। उनके घर के पास द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी मार्ग की स्थापना की गई थी। भारतीजी यह देखकर बहुत प्रसन्न हुए थे। 

    क्या ऐसा प्रयास भारतीजी को लेकर दिल्ली में नहीं होना चाहिए? 

   आज भारतीजी नहीं हैं। अपनी पुस्तक 'बाल साहित्य इक्कीसवीं  सदी मे' की भूमिका में उन्होंने लिखा था, जीवन  की ढलान पर मैं खड़ा हूँ। ......इक्कीसवीं सदी बालक की है। अगले कई दशकों में बालक के बारे में अध्ययन, मनन और शोध का कार्य बहुत अधिक होगा। बालक की पुस्तक के बारे में दिलचस्पी जगेगी।... उन दिनों मैं इस ढलान से फिसल चुका होऊँगा।

     वाकई भारतीजी भले ही आज हमारे मध्य नहीं है किंतु उनके स्वप्न जीवित हैं। उनकी आशाएँ साकार होती दिख रही हैं। उनका विश्वास जगमगा रहा है और उसकी दमक से बालसाहित्य निखर उठा है। 


(जयप्रकाश भारती जी पर डॉ. शकुन्तला कालरा जी के सम्पादन में भावना प्रकाशन, दिल्ली  से  दो पुस्तकें आई  हैं. मेरा यह आलेख बाल साहित्य के युग निर्माता पुस्तक में प्रकाशित हुआ था, यह आलेख मेरी पुस्तक 'बाल साहित्य का शंखनाद' में भी संकलित है.)



4 टिप्‍पणियां:

  1. नागेश जी, आपकी लेखनी का जवाब नहीं। भारती जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर बहुत ही प्रभावपूर्ण आलेख है। कोई भी पाठक मंत्रमुग्ध हो जाए पढ़कर।

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    1. आत्मीय वशिष्ठ जी, आप सदैव उत्साह चौगुना कर देते हैं। हृदय से आभारी हूँ।

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  2. बहुत ही प्रभावपूर्ण आलेख है।

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