शनिवार, 6 मई 2017

संस्मरण- मनोहर वर्मा: यादे और बस यादें... - डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’

बात 1990 की है। बालहंस में एक साथ मेरी दो कहानियां बहन मिल गई और पिंकी बदल गई स्वीकृत हुईं थीं। स्वीकृति पत्र पर सहयोगी संपादक मनोहर वर्मा के हस्ताक्षर थे। बालहंस की उन दिनों अलग ही धज थी। माह में दो अंक आते थे और आए दिन अलग-अलग विधाओं की रचनाओं पर विषेषांक केवल यहीं सुलभ थे। यही नहीं, उन दिनों सृजन विषेषांक के रूप में तो विभिन्न राज्यों के बालसाहित्य पर क्या खूब संग्रहणीय ऐतिहासिक अंक प्रकाषित हुए। किसी व्यावसायिक पत्रिका द्वारा बालसाहित्य पर ऐसा दृष्टिपरक काम कहीं और आज तक देखने को नहीं मिला।
बालहंस में उन दिनों उत्कृष्ट बालसाहित्य लेखन हेतु बालसाहित्यकारों के लिए आए दिन प्रतियोगिताएं भी होती थीं। षिखर स्तंभ में बालसाहित्यकार पर कई पृष्ठों का आलेख छपता था। जीवन भर बालसाहित्य के नाम पर काम करने वाले जाने कितने सर्जक कितना चुपचाप इस दुनियां को अलविदा कह देते हैं और पत्रिकाओं में उन पर दो पंक्तियां भी नहीं छपतीं। कोई बाल साहित्यकार नहीं रहा तो उस पर एक पन्ने का आलेख भी बालहंस के अंतिम पृष्ठ पर प्रकाषित होता था। बालहंस बालसाहित्य की प्रयोगधर्मी पत्रिका थी। ...और इसे प्रयोगधर्मी पत्रिका बनाने का श्रेय कुषल संपादको की युगल जोड़ी को था। अनंत कुषवाहा संपादक थे और मनोहर वर्मा सहयोगी संपादक। वर्मा जी 1986 से 1992 तक बाल हंस के सहयोगी संपादक रहे। वे प्रायः अजमेर से जयपुर की प्रतिदिन की यात्रा तय कर बाल साहित्य के पथ को प्रषस्त कर रहे थे। मैं कई बार सोचता हूं कि कोई भी बाल पत्रिका निष्चय ही तब प्रयोगों का कारखाना बन जाती है जब उसके संपादन मंडल में कोई समर्थ बाल साहित्यकार भी हो।
वर्मा जी से मैं पहली बार लखनऊ में 1995 में मिला था। उत्तर प्रदेष हिंदी संस्थान, लखनऊ से उनको अमृतलाल नागर बाल कथा सम्मान दिया जाना था। उन दिनों बालसाहित्य के सम्मानों में लेखक के लिए प्रादेषिक बंधन नहीं था। मैं चैधरी लाज में उनसे मिला। सारे बाल साहित्यकार वहीं ठहराए गए थे। मैं कमरे-कमरे जाकर बाल साहित्यकारों को अपनी पुस्तक नेहा ने माफी मांगी भेंट करने का सुख प्राप्त कर रहा था। मनोहर जी के कमरे में गया तो वे आराम की मुद्रा में बैठे थे। काया दुबली पतली किंतु आकर्षक। चेहरे पर जितना ओज, उतनी ही विनम्रता। आंखों में जैसे कुछ खोजने की ललक। बात करते-करते सिर का ऊपर उठ जाना या कहें कि चिंतन की मुद्रा में चले जाना उनकी फितरत थी और ऐसा तब महसूसा जब आगे भी उनसे मुलाकातें होती रहीं। तो पहली ही भेंट में मैं साहब का दीवाना हो गया। वह इसलिए भी कि अरे! यही वह षख्स हैं जिनकी (उन दिनों) सौ के लगभग पुस्तकें प्रकाषित हो चुकी हैं। (अब तो यह संख्या दो सौ के पार होगी।)
यही वह षख्स हैं जिन्हांेने बाल साहित्य के आकलन के लिए साठ के दषक में प्रष्नावलियां तैयार कीं। उनके आधार पर सिद्धांत बनाए।
यही वह षख्स हैं जिन्होंने पहली बार बाल बुक बैंक योजना के अंतर्गत पुस्तकों का संपादन किया।
यही वह षख्स हैं जिन्होने बाल साहित्य में पहली बार जुलाई-अगस्त,1967 में मधुमती के भारतीय बाल साहित्य विवेचन विषेषांक का अतिथि संपादन किया था और 418 पृष्ठों में फैले उस विषेषांक जैसी समग्रता वाला कोई दूसरा विषेषांक फिर नहीं आया। .
वाकई, मैं हतप्रभ था। श्रद्धावनत था। मेरा रोम-रोम पुलकित था कि बालसाहित्य के किसी देवता के पास बैठा हूं। दरअसल ऐसे महानुभाव किसी देव से कम नहीं होते और उनकी कर्मस्थली किसी तीर्थ से बढ़कर होती है।
वर्मा जी भेंट की हुई मेरी पुस्तक नेहा ने माफी मांगी में तल्लीन थे। उसके पन्ने पलट रहे थे। अचानक बोले-‘ये कहानी तो हमने बालहंस में छापी थी। पर इसका...?’
‘हां, इसका षीर्षक मैंने बदल दिया है, आपने कहानी छापी थी-पिंकी बदल गई और मैंने अब इसका नाम रख दिया है देखा तो चैंकी।’ फिर जब मैंने यह बताया कि इस संकलन की सारी कहानियों के षीर्षक जब आप एक साथ पढ़ेंगे तो पूरा एक वाक्य बन जाएगा। उन्होंने पढ़कर देखा तो खुष हुए। बोले-‘बाल साहित्य में प्रयोगों की अपार संभावनाएं हैं।’
तब तक राष्ट्रबंधु जी की धमाकेदार आवाज ने हमें चैंका दिया। कमरे में घुसते ही वे मनोहर जी से बोले-‘भाई साहब मैं आपसे बहुत नाराज हूं।’
‘भला क्यों ?’ बेचारे वर्मा जी तो एकदम गंभीर हो गए।
राष्ट्रबंधु जी बोले- ‘भाई, आपने हमें बालसाहित्य का हनुमान क्यों लिख दिया? यह तो हो ही नहीं सकता। मैं तो उनकी पूजा करता हूं।’ फिर वे मेरी तरफ मुखातिब होते हुए कहने लगे- ‘और देखिए, एक ये हैं नागेष, इन्हांेने भी तो आपके समर्थन में मुझ पर लिखे एक आलेख का षीर्षक ही रख दिया है -बाल साहित्य के हनुमान: राष्ट्रबंधु।’
कोलकाता से एक ग्रंथ छपा था ‘षंभूप्रसाद श्रीवास्तव व्यक्तित्व कृतित्व।’ उसमें मनोहर जी ने अपने एक आलेख में राष्ट्रबंधु जी को बाल साहित्य का हनुमान लिखा था। उन दिनों राष्ट्रबंधु जी पर भी एक ग्रंथ प्रकाष्य था। उसके लिए जब मैंने आलेख लिखा तो मनोहर जी के कथित आलेख से प्रभावित होकर उनका संदर्भ देते हुए यही षीर्षक रख दिया था। खैर...बाद में कई अन्य साहित्यकार भी कमरे में आ गए। सभी कहते रहे, आप तो हनुमान की तरह ही बालकाज कीन्हें बिना, मोंहि कहां विश्राम के भाव से लगे हैं। लेकिन राष्ट्रबंधु जी न माने। साफ षब्दों में बोले - ‘यह नहीं हो सकता।’
बाद में उन्होंने 1996 में प्रकाषित उस ग्रंथ में मेरे उक्त आलेख का षीर्षक बदल ही दिया।
तो मनोहर जी से यह पहली भेट थी और इस प्रथम भेंट से ही यह बात बात-बात में ही स्पष्ट हो गई थी कि मुझ पर उनका सहज प्रभाव है। उनसे खूब पत्राचार रहा। उस पत्राचार में बालसाहित्य को लेकर उनकी अनेक चिंताएं-अपेक्षाएं और पीड़ाएं भी अंकित हैं।
5 अक्टूबर 2013 को भीलवाड़ा जाते समय मैं उनसे मिलने के लिए अजमेर उतर लिया था। दो-ढाई घंटे उनकी कर्मस्थली पर या कहें कि बाल साहित्य के तीर्थ पर उनसे कितनी बातें हुईं। गोविंद भारद्वाज जी वहां आ गए। उन्होंने हमारे कई चित्र लिए। उनकी धर्मपत्नी और उनकी बेटी निधि भी मिली थीं। हम खूब बतियाए। बालसाहित्यकारों की उपेक्षा से वे खिन्न थे। पुरस्कारों में भाई-भतीजावाद को लेकर उनके मन में पीड़ा थी। हमारी चर्चा में बाल वाटिका और प्रकाष मनु जी की बार-बार सराहना होती रही। उन्होंने बताया कि दो रोज पहले ही प्रकाष मनु जी ने उनसे देर तक बात की। मनु जी ने जिस तरह से बाल साहित्य की प्रतिष्ठा को लेकर एक अभियान की तरह काम किया है। उसकी धमक से वे प्रभावित थे।
बाल वाटिका के प्रकाषन को लेकर डा. भैरूंलाल गर्ग ने कैसे-कितना संघर्ष किया। कितने पापड़ बेले, यह चर्चाएं उनसे हुईं। उन्हें खुषी थी कि बाल वाटिका के बहाने गर्ग जी सारे देष के साहित्यकारों को एकसूत्र में बांधे हैं। मैंने उन्हें याद दिलाया कि सन् 2000 में जब सारे देष में हिंदी साहित्य को लेकर षताब्दी समारोह हो रहे थे तो अकेली बाल वाटिका ही थी जिसने बाल साहित्य षताब्दी समारोह किया था। नंदन के संपादक जयप्रकाष भारती और जाने कितने बालसाहित्यकार एकत्र हुए थे।
वर्मा जी अस्वस्थता के कारण उस समारोह में नहीं आ सके थे लेकिन जयप्रकाष भारती और राष्ट्रबंधु आदि उनसे मिलने अजमेर गए थे। भारती जी ने हंसकर कहा था कि भाई मनोहर वर्मा से मिले बगैर तो यात्रा ही पूरी नहीं होगी।
मैंने उनसे कहा कि उस समय मेरी ट्रेन थी। मैं भी अपनी अधूरी यात्रा पूरी करने आया हूं।
प्रभा बाल साहित्य सम्मान समारोह मैं उन्हें षाहजहांपुर बुलाना चाहता था। मैंने गोविंद भारद्वाज को राजी किया था कि वे ही उनको साथ लाएंगे लेकिन अस्वस्थता के चलते उनका आना हो न सका। फिर मेरा भी जाना न हो सका। लेकिन वह भेंट अंतिम भेंट हो जाएगी, यह न सोचा था।
यादें रह गईं हैं, सिर्फ यादें। उनसे विदा ली थी तो पीछे मुड़-मुड़ कर मैं उनको निहारता रहा था। खिड़की से बड़ी ही स्निगधता से वे भी देख रहे थे। वह खिड़की अक्सर मेरी यादों में आ धमकती है। मेरी आंखे भीग जाती हैं। चला-चली के इस मेले में कैसे हम अकेले होते जाते हैं।
हाल ही में मेरी नयी आलोचना कृति आई है- बाल साहित्य का शंखनाद। इसका अंतिम आलेख मनोहर वर्मा जी की स्मृति को ही समर्पित है।
उनकी स्मृति को नमन।
बार-बार हजार बार नमन।
- डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

बाल साहित्य में हमेशा रहेंगे डा. श्रीप्रसाद/ आलेख / डा. नागेश पांडेय ‘संजय'



बाल साहित्य में हमेशा रहेंगे डा. श्रीप्रसाद 


पचास साल से भी ज्यादा समय तक बाल साहित्य के क्षेत्र में सर्वात्मना समर्पित डा. श्रीप्रसाद जी नहीं रहे। 12 अक्टूबर को दिल्ली में मेक्स हॉस्पिटल साकेत में ह्रदय चिकित्सा के दौरान उनका निधन हो गया। श्रीप्रसाद जी ने खुद को बालसाहित्य के लिए समर्पित कर दिया था । बाल साहित्य की समस्त विधाओं में सृजन के साथ-साथ शोध और समीक्षा के स्तर पर भी उन्होंने बालसाहित्य को उँचाइयाँ प्रदान कीं । उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से प्रकाशित उनकी कृति बालसाहित्य की अवधारणा तत्वाभिनिवेशी आलोचना का साकार दस्तावेज है । उन्होंने  काशी विद्यापीठ से 1973 में हिंदी बाल साहित्य विषय पर पी-एच. डी. की उपाधि की प्राप्त की। कालांतर में उनका शोध ग्रन्थ बाल साहित्य की रुपरेखा शीर्षक से 1985 में प्रकाशित हुआ। श्रीप्रसाद जी समय-समय पर बाल साहित्य के विविध पक्षों पर बड़े ही गवेषणात्मक आलेख लिखते रहे, यदि उनको संकलित किया जाए तो बाल साहित्य की सार्थक समालोचना  पर एक महत्त्वपूर्ण कृति तैयार हो सकती है।

  श्रीप्रसाद जी को पढ़कर- उनसे प्रेरित होकर न जाने कितने बाल साहित्यकार तैयार हुए हैं। फ़िलहाल मैं तो स्वयं को उनमें से एक मानता हूँ। 1984-85 से बतौर बाल पाठक बाल साहित्य से जुड़ गया, चूँकि लिखने की भी रूचि जग गयी थी, सो पत्रिकाओं और अख़बारों में लेखक के नाम पर भी सहज ध्यान चला ही जाता था। श्रीप्रसाद जी तो यत्र तत्र सर्वत्र वाली स्थिति में थे। मैं तब बालक था। पी-एच. डी. वाले डाक्टर का तो बोध भी न था। सोचता था कि कोई क्लीनिक होगी और फिर ये भी सोचता था कि कैसे इतना समय निकलते होंगे ? और राम झंूठ न बुलवाए तो मन में ये भी आता था की क्लीनिक कम चलती होगी। शायद तभी इतना समय मिल जाता होगा। 
बाद में बाल भारती में प्रकाशित उनके पते से जाना कि वे तो संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय में प्रोफ़ेसर हैं। और कहीं न कहीं मैंने भी आगे चलकर पी-एच. डी. करने का मन बना लिया था। मेरे किशोर मन को हवा दी लखनऊ के बंधु कुशावर्ती जी ने। उन्होंने शायद 90 या 91 में मुझे पत्र लिखा, तुम अच्छा लिखते हो पर शायद तुम्हे पता हो, वाराणसी के श्रीप्रसाद जी केवल बाल साहित्य ही लिखते हैं और उसी में डाक्टरेट भी हैं। क्या तुम उनकी तरह खुद को बाल साहित्य के प्रति समर्पित करने का मन बना सकते हो ? और ये सब बातें मुझे उनसे जोड़ती चली गयीं। 
नंदन में तब पुस्तकों का परिचय भी छपता था और प्रकाशकों के पते भी मिल जाते थे। मैं सूची पत्र मंगा कर बाल साहित्य की पुस्तकें मँगा कर पढता था। उनकी एक किताब ’गाड़ी देर से आई’ भी मैंने मँगा कर पढ़ी थी।
उनकी शैली का मैं कायल हूँ कई बार लगता है की कहानी पढ़ नहीं सुन रहे हैं और जब वह आत्मकथनात्मक अंदाज में कथानक को परोसते हैं तो खासकर लगता है कि कहीं हम भी कथानक के एक पात्र के रूप में कहानी के साथ-साथ चल रहे हैं।  
इस पुस्तक की कहानी ’भय’ का एक वाक्य आंधेर आपनेर पिठेर भयेत मेरे मन में जैसे बस सा गया था। आज भी जब कभी रात में अपनी लंबी-सी परछाई देखता हूँ तो बचपन की तरह डर तो नहीं लगता किन्तु वह कहानी याद आती है।
खैर... इस बहाने मैंने जाना कि प्रसाद जी बंगला के भी जानकार हैं। उनके आलोचना लेखों में बंगला बाल साहित्य के उदाहरण बखूबी मिलते हैं।
मेरी पहली पुस्तक नेहा ने माफ़ी मांगी की भूमिका उन्होंने ही लिखी थी। उन्होंने सारी कहानियां पढने के बाद मुझे सुझाव भी दिया था कि गिरा राजा कहानी पुराने चाल की कहानी है। आप केवल आधुनिक कहानियां ही लिखिए। ...और उनके आदेशानुसार मैंने उस संकलन में केवल आधुनिक कहानियां ही रखी थीं। 
मेरे पास उनके ढेर सारे पत्र हैं और उनमें बाल साहित्य के स्वरुप को लेकर खुलकर चर्चाएँ हुयी हैं। वे बाल साहित्य के साथ-साथ बाल सहित्यकारों में भी सहजता के पक्षधर थे।  गर्वोक्ति नहीं होनी चाहिए। उनका मानना था की बाल साहित्य की छवि को बच्चे की तरह पारदर्शी बनाना है। 
बाल साहित्य में भ्रामक सूचनायें नहीं जाना चाहिए। एक संपादक ने अपने 100 बाल कविताओं  के संपादित बाल कविता संकलन को भारतीय भाषाओँ में सबसे बड़ा घोषित कर दिया था। डा. श्रीप्रसाद जी ने स्पष्ट किया कि (उन दिनों) सबसे बड़ा संकलन तो तमिल के एन मुदलियार का पिल्ललू पाटलू है। उसमें 500 बाल गीत थे। वे बाल साहित्य के सजग अध्येता थे। 
  मैं पहली बार उनसे उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा 1994 में आयोजित सर्वभाषा बाल साहित्य समारोह में मिला था। देश के कोने-कोने से बाल साहित्यकार आए थे और यह महत्वपूर्ण आयोजन तत्कालीन निदेशक विनोद चन्द्र पांडेय जी ने कराया था। तीनों पीढ़ियों के बालसाहित्यकारों का समागम था। सच कहूँ तो उस आयोजन से बहुत कुछ सीखने को मिला था।

वास्तव में आयोजनों की यही गरिमा है। विमर्श को बल मिलता है और मौलिकता को संभावनाएं। भावनाएं भी पुष्ट होती है। आत्मीयता स्थापित होती है। डा. श्रीप्रसाद के न रहने पर केवल एक बाल साहित्यकार को खोने जैसा नहीं, बल्कि एक संरक्षक  का चले जाना जैसा महसूस हो रहा है। कभी कानपुर तो कभी शिमला तो कभी बरेली जाने कितनी यात्राओं में वे मिले और अपना स्नेह बरसाते रहे।
 बरेली में निरंकारदेव सेवक की याद में समारोह था। हम लोग सेवक जी के ही घर में ठहरे थे। रात भर जागते-खिलखिलाते रहे। सेवक जी की पुत्रवधु पूनम सेवक ने रोते हुए कहा था, आज वर्षों बाद इस घर में ठहाके गूंजे हैं।   
वाराणसी उनके घर भी गया हूँ। बजरडीहा में रहते थे। बजरडिहा की कहानी भी सुनाई थी। वज्र ढूह। ऊँचा स्थल। उनका आतिथ्य नहीं भूल सकता। तब माता जी भी थीं। एक सच्ची गृहणी और लेखन में उनकी परोक्ष साथी भी। सृजन का परिवेश बनाये रखती थीं। उनके निधन पर फोन किया था तो श्रीप्रसाद जी बहुत आहत थे। 
मुझको हुआ जुकाम उनका प्रसिद्द शिशुगीत है इसे स्वीडन से प्रकाशित विश्व बालकाव्य संग्रह में लिया गया है। भारत से दो लोग हैं एक हिंदी और एक तमिल से।
बिल्ली बोली, बड़े जोर का 
मुझको हुआ जुकाम
चूहे चाचा चूरन दे दो 
जल्दी हो आराम

चूहा बोला, बतलाता हूं
एक दवा बेजोड़
अब आगे से चूहे खाना
बिलकुल ही दो छोड़.

हाथी चल्लम चल्लम डा. श्रीप्रसाद जी का चर्चित बाल गीत है। अनेक स्थानों पर यह रचना अपूर्ण रूप में प्रकाशित की गयी है। मैंने इसे इंटरनेट पर अपने संपादन में बाल मंदिर में प्रकाशित किया तो उन्हीं से जानकारी हुई कि ये रचना तो एक तिहाई है। फिर इसे अपने सुपुत्र प्रो. आनद वर्धन जी के द्वारा मेल से भिजवाया। यह बाल गीत शुद्ध एवं पूर्ण रूप में पाठकों की सेवा में प्रस्तुत है- 

हल्लम हल्लम हौदा, हाथी चल्लम चल्लम

हम बैठे हाथी पर, हाथी हल्लम हल्लम

लंबी लंबी सूँड़ फटाफट फट्टर फट्टर

लंबे लंबे दाँत खटाखट खट्टर खट्टर

भारी भारी मूँड़ मटकता झम्मम झम्मम

हल्लम हल्लम हौदा, हाथी चल्लम चल्लम

पर्वत जैसी देह थुलथुली थल्लल थल्लल

हालर हालर देह हिले जब हाथी चल्लल

खंभे जैसे पाँव धपाधप पड़ते धम्मम

हल्लम हल्लम हौदा, हाथी चल्लम चल्लम

हाथी जैसी नहीं सवारी अग्गड़ बग्गड़

पीलवान पुच्छन बैठा है बाँधे पग्गड़

बैठे बच्चे बीस सभी हम डग्गम डग्गम

हल्लम हल्लम हौदा, हाथी चल्लम चल्लम

दिनभर घूमेंगे हाथी पर हल्लर हल्लर

हाथी दादा जरा नाच दो थल्लर थल्लर

अरे नहीं हम गिर जाएँगे घम्मम घम्मम

हल्लम हल्लम हौदा, हाथी चल्लम चल्लम
इस रचना पर आज के प्रसिद्द बाल साहित्य समालोचक डा. प्रकाश मनु जी ने लिखा था- 

प्रिय नागेश, डा. श्रीप्रसाद जी की यह बाल कविता मेरी सर्वाधिक पसंदीदा बाल कविताओं में से है जिनके बारे में मैंने बाल कविता के इतिहास में बहुत विस्तार से लिखा है और इसका जिक्र और प्रशंसा करते हुए मैं कभी थकता नहीं। श्रीप्रसाद जी हमारे बीच के सबसे वरिष्ठ लेखकों में से हैं जो अब भी इतने उत्साह से लिख रहे हैं। बाल कविता के तो वे शिखर व्यक्तित्व हैं ही, साथ ही बाल कहानी, बाल उपन्यास, संसमरण हर विधा में उन्होंने लिखा है और बहुत ऊँचे पाए का लिखा है। हम सब सौभाग्यशाली हैं कि वे हमारे बीच मौजूद हैं और हम उन्हें इतनी लगन और तन्मयता से काम में लगे देखते हैं। सस्नेह, प्रकाश मनु

आदरणीय मनु जी, वह सौभाग्य जाता रहा किंतु उनका नाम-काम अविस्मरणीय है। यशकाया के रूप में वे हमारे बीच हैं। बाल साहित्य में हमेशा रहेंगे। उन्हें बारंबार नमन और श्रद्धांजलि।   

सुभाष नगर, निकट-रेलवे कालोनी, 
शाहजहाँपुर - 242 001 (उ.प्र.)

शुक्रवार, 5 अक्तूबर 2012

बाल साहित्य में चौर्य वृत्ति (आलेख) -नागेश पांडेय 'संजय'


  ‘बाल भारती’ (मा.) के जून 1988 अंक में एक कहानी छपी थी- ‘सारस परी।’ इसे पढ़कर मेरा चौंकना स्वाभाविक था क्योंकि इससे पूर्व मैं इसी कहानी को ‘चुप-चुप चोरी’ शीर्षक से जापानी लेखिका मिजुओचि के नाम से पढ़ चुका था। मैंने तत्काल ‘बाल भारती’ के संपादक श्री शिवकुमार को एक छोटा सा पत्र लिखा। मेरे उस पत्र के उत्तर के रूप में उन्होंने ‘बाल भारती’ के अक्तूबर 1988 अंक में एक पृष्ठीय संपादकीय लिखा था। चौर्यवृत्ति की दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति के विरोध में निःसंदेह वह एक महत्त्वपूर्ण पहल थी। श्री कुमार जी का वह संपादकीय दो-टूक वादिता, निर्भीकता और साहस की दृष्टि से आज भी प्रशंस्य है।
‘‘हमें पाठकों से हाल ही में कुछ शिकायत भरे पत्र प्राप्त हुए हैं। शिकायत है- चोरी के साहित्य की। लेखक वर्ग अन्य लेखकों की रचनाएँ अपने नाम से भेजते हैं। साहित्यिक चोरी के रूप हैं, रचना के पात्र बदलकर, रचना को अपनी कहकर भेजना। दूसरा रूप हैं विदेशी कहानियों का अनुवाद करके अपनी रचना बताना। तीसरा रूप है, अपनी रचना को विभिन्न नामों से विभिन्न पत्रिकाओं में छपवाना तथा चौथा रूप है लब्धप्रतिष्ठ लेखकों की विश्व प्रसिद्ध रचनाओं को अपनी रचना बताकर प्रकाशित करवाना। इस श्रेणी के तथाकथित लेखक केवल अपना नाम-भर लेखक के रूप में देखना चाहते हैं। वे शायद यह समझते हैं कि ऐसा करने से वे लेखक के रूप में प्रसिद्ध हो जाएँगे।
यह प्रसंग यहीं समाप्त नहीं होता। कुछ लेखक प्रेरणात्मक प्रसंगों को, जो कि वास्तविक रूप से ‘क’ से जुड़ा है, वे उस प्रसंग को ‘ख’ ‘ग’ या ‘च’ के नाम साथ जोड़कर भेजते हैं।
जो लेखक चोरी की हुई रचनाएँ भेजते हैं, हम उन्हें ब्लैक लिस्ट कर रहे हैं। हमारा जागरूक पाठक सदा की तरह हमें चोरी की हुई रचनाओं के संबंध में सूचित करता रहेगा।’’
- शिव कुमार
इसके अनंतर चोर लेखकों ने ‘बालभारती’ में तो कम ही धृष्टता दिखाई किंतु विविध पत्र/पत्रिकाओं के माध्यम से उनके प्रयोग चलते रहे और यह क्रम आज भी जारी है।
वस्तुतः रचना चोरी के अन्य भी कई रूप हैं। पिष्ट-पेषण या पुनरावृत्ति भी एक प्रकार से रचनात्मक-चोरी का ही एक चेहरा है। हिंदी में ऐसे बाल साहित्यकारों की बड़ी संख्या है जो प्रतिवर्ष होली या दीवाली पर स्वयं को ही दोहराते किसी भी पत्र/पत्रिका में मिल जाएँगे।
समीक्षा की स्वस्थ परंपरा के अभाववश बाल साहित्य में चौर्य वृत्ति एक दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष के रूप में विद्यमान है। कुछ भी ‘टीप’ दो, कहीं भी छपा दो; कोई कहने-सुनने वाला नहीं। इधर ‘प्राइवेट’ पाठ्यक्रम के रूप में बच्चों की जो पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं, उनमें प्रतिष्ठित लेखकों की रचनाएँ अपने नाम से छपवाने का फैशन सा चल पड़ा है।
हाल ही में दिल्ली से प्रकाशित कक्षा-एक की पुस्तक ‘हिंदी दर्पण’ में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी की चर्चित कविता ‘जिसने सूरज चाँद बनाया’ को लेखिका आभा गोस्वामी ने अपने नाम से प्रकाशित कराया है। इसी प्रकाशन की कक्षा-दो की ‘हिंदी दर्पण’ में चंद्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’ की लोकप्रिय रचना ‘नानी का घर’ को लेखिका आभा गोस्वामी ने आंशिक फेरबदल के साथ ‘दादी का घर’ शीर्षक से प्रकाशित कराने का घृणास्पद कृत्य किया है। ऐसे कार्यों की जितनी भी निंदा की जाए, कम है।
ऐसा नहीं है कि रचना-चोरी का कार्य केवल नवसिखुए यशाकांक्षी ही करते हैं, मैं व्यक्तिगत रूप से हिंदी के अनेक ऐसे बाल साहित्यकारों को जानता हूँ, जिन्होंने आंशिक फेरबदल के साथ दूसरे लेखकों की रचनाएँ अपने नाम से प्रकाशित कर वाहवाही लूटी है।
पं. सोहन लाल द्विवेदी की एक कविता है- ‘फूलों से तुम हँसना सीखो, भौरों से तुम गाना।’ हिंदी के अनेक बाल साहित्य सेवी इसका उद्धार कर चुके हैं। द्विवेदी जी की ही एक कविता- ‘अम्मा कहती, बनूँ कलक्टर/दादा कहते, जज बन जाऊँ। दीदी कहतीं बनूँ गवर्नर/सबके ऊपर हुक्म चलाऊँ। बहन कह रही बनूँ डाक्टर/या कि बनूँ कोई विज्ञानी।’, जो कि ‘महिला’ (मासिक) के अक्तूबर 1937 अंक में छपी थी, कुछ फेर बदल के बाद आज एक युवा लेखक की मौलिक रचना बन गई है। निरंकार देव सेवक की चर्चित रचना ‘अगर-मगर दो भाई थे/करते खूब लड़ाई थे। अगर मगर से छोटा था/मगर मगर से खोटा था।’ को उनके ही एक समकालीन बाल कवि ने आंशिक उलट-पुलट के बाद अपने संकलन में अपनी कविता के रूप में छपा लिया था।
चोर-लेखकों के प्रति कठोरता का बर्ताव बहुत आवश्यक है। चौर्य-वृत्ति तभी रूक सकेगी। डॉ. सुरेंद्र विक्रम की एक कविता है- ‘बस्ते का बोझ।’ इसे राजस्थान के एक रचनाकार ने ‘अमर उजाला’ में छपवा लिया था। उसे न केवल संपादक ने ब्लैक-लिस्ट किया, बल्कि डॉ. विक्रम ने मानहानि के दावे के रूप में उससे समुचित राशि भी वसूल की।
बस्ते के ही प्रसंग पर केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा की ‘बाल-काव्य गोष्ठी’ याद आ रही है। डॉ. उषा यादव की एक मार्मिक कविता है-‘उफ’! बस्ता कितना भारी है।’ इसे एक शोध-छात्र अपने नाम से पढ़ गया। बाद में जानकारी हुई कि वह उषा जी का ही छात्र था और प्रभाववश उनकी ही रचना को दोहरा गया। खैर..., न केवल उसने क्षमा मांगी बल्कि भविष्य में ऐसी त्रुटि न करने का वचन दिया।
बहुत पहले (1994) में चंद्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’ की कविता ‘दशहरा’ को किन्हीं नरेश आचार्य ने अपने नाम से ‘अमर उजाला’ में छपवाया था। मैंने ‘मयंक’ जी और संपादक को पत्र लिखा। ‘मयंक’ जी का उत्तर आया तो जाना, उसी कविता को एक लेखिका भी अपने नाम से छपाए बैठी है। द्रष्टव्य उनका 27.10.1994 का यह पत्र-
प्रिय संजय जी,
हिंदी बाल साहित्य में आजकल दूसरे की कविता चुरा कर अपने नाम से छपवाने की प्रवृत्ति जोरों से बढ़ रही है। मेरी कविता ‘दशहरा’ को चोरी से किसी ने अमर उजाला (बरेली) में छपवाई थी, जिसकी सूचना आपने दी थी।... यही कविता निशि बाजपेई ने अमर उजाला (कानपुर) में 22.10.94 को अपने नाम से छपवाई है।
ऐसी बातों से हिंदी बाल साहित्य का भला क्या लाभ हो सकता है? इस खतरनाक प्रवृत्ति को रोकना ही उचित है। 
शेष कुशल है।
शुभकामनाओं सहित,
           भवदीय
           चंद्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’
बाल साहित्य में चौर्य-वृत्ति को रोकने के लिए समीक्षकों की सतर्कता आवश्यक है। दरअसल बाल साहित्य छापने वाले अधिकांश संपादक बाल साहित्य के जानकार नहीं होते। ऐतिहासिक परिदृश्य से अनभिज्ञता ही इस विडंबना को संरक्षित करती है। बाल स्तंभ अथवा बाल पत्रिकाओं के संपादक की नियुक्ति हेतु बाल साहित्य का ज्ञान अनिवार्य होना चाहिए तभी बाल-साहित्य के मौलिक-सृजन का मार्ग भी प्रशस्त होगा।
तथापि, लेखकों और समीक्षकों को चाहिए कि वे बाल साहित्य में चौर्य-वृत्ति की खुलकर निंदा करें। ऐसे लेखकों का तिरस्कार और बहिष्कार बहुत जरूरी है।

शनिवार, 21 जनवरी 2012

निरंकारदेव सेवक जी की याद में समारोह

          बरेली / १९ जनवरी को स्वर्गीय निरंकारदेव सेवक जी के  जन्म दिन के अवसर पर रोटरी क्लब में एक भव्य आयोजन किया गया. सेवक जी हिंदी के महान बाल साहित्यकार एवं समीक्षक थे.  आजन्म बाल साहित्य सेवा में लगे रहे. उनकी रचनाएँ  आज भी नयी और कालजयी हैं.
१९६६ में उन्होंने तब 'बाल गीत साहित्य' नाम से एक समीक्षा ग्रन्थ लिखा , जब इस क्षेत्र में समीक्षात्मक पुस्तकें थीं हीं नहीं.
       इस अवसर बाल कविता प्रतियोगिता का आयोजन भी किया गया, पुरस्कृत बच्चों को ५००/-, ३००/- और २००/- रूपये की धनराशि के अतिरिक्त बाल साहित्य की पुस्तकें और सभी बच्चों को प्रमाण पत्र दिए गए. बच्चों में साहित्यिक अभिरुचि जाग्रत करने का यह सफल प्रयोग था. 
समारोह के मुख्य अतिथि प्रख्यात गीतकार किशन सरोज ने सफल समाज हेतु बाल साहित्य के अधिकाधिक प्रयोग की आवश्यकता जताई. 
पूर्व विधान परिषद् सदस्य रमेश विकट, साहित्यकार डा. अवनीश यादव, कवि हरी ओम अनजान, बाल साहित्य पर शोध कर रहे ऋषि कपूर , तितली के संपादक फहीम करार, भारतीय पत्रकारिता संस्थान के सुरेन्द्र बीनू सिन्हा और सेवक जी की पुत्र वधु पूनम सेवक सहित अनेक गणमान्य व्यक्तियों ने इस आयोजन की शोभा बढ़ाई. 
इन्द्रदेव त्रिवेदी के सफल संचालन में संपन्न इस समारोह की अध्यक्षता बाल साहित्यकार डा. नागेश पांडेय 'संजय' ने की .

मंच पर पूनम सेवक, इन्द्रदेव त्रिवेदी, हरी ओम अनजान,रमेश विकट, किशन सरोज और डा. नागेश पांडेय 'संजय'

गुरुवार, 10 नवंबर 2011

बाल साहित्य का भविष्य

आलेख : नागेश पांडेय 'संजय'

- भीड़ में तेज स्पीड में बाइक ड्राइव करता बच्चा आपको धूल खिलाता निकल जाएगा। उसके एक हाथ में मोबाइल होगा-अत्याधुनिक मोबाइल। जिसकी कीमत दस-पंद्रह हजार तक हो सकती है। पीठ पर जो बैग है, उसमें लैपटाप हो सकता है। जी, हाँ! ये नयी  दुनिया के बच्चे हैं जो भीड़ में आगे निकलने के लिए आपको धकियाने से भी नहीं चूकेंगे और ‘सारी...!’ सारी का तो सवाल ही नहीं उठता।
 - ट्रेन में, पार्क  में, किसी चौराहे पर, स्टेशन पर या फिर स्कूल के कैंटीन में खड़े भारत के भविष्यों की बातें आप न ही सुनें तो  अच्छा है। कान में रुई  लगाने को जी करेगा।
 - हाँ, और कभी इन्हें समझाने की भूल तो आप करिएगा मत। ये आपसे प्रतिवाद करने से चूकेंगे नहीं। आपका सम्मान आपके हाथ में (सच कहूँ तो आपके मौन में) है।
 जहाँ देश के भविष्य की यह दशा हो वहाँ उनके लिए बाल साहित्य के भविष्य की बात करना थोड़ा अटपटा और अव्यावहारिक तो है किंतु अंधकार में क्या रोशनी के लिए आशा और प्रयास छोड़ देना चाहिए? कुछ यही सोचकर... दो-चार बातें...

बाल साहित्य के मूल उपभोक्ता बच्चे हैं और वही बाल साहित्य से कट गए हैं या सीधी बात कहें कि ‘काट’ दिया गया है। समाचार पत्र बच्चों तक उनका साहित्य पहुँचाने के सशक्त माध्यम थे। इस बहाने बच्चा देर-सवेर किंतु बाल साहित्य को पढ़ता था। यह पठन उसे कई बार सृजनात्मक अभिरुचि से भी जोड़ता था। आज बाल साहित्य में गत कई वर्षों  से नए बाल साहित्यकारों की पदचाप के मामले में सन्नाटा है। इसका एक कारण समाचार पत्रों से बाल साहित्य का हट जाना भी है। 
 बाल साहित्य को लेकर बड़ों की, विशेषकर समझदार बड़ों की और उनमें भी  (बड़े नहीं) ‘बड़ों’ के कुछ लेखकों की मानसिकता दुर्भाग्यपूर्ण है । समूचे बाल साहित्य जगत की प्रगति से आँखें मूँदकर वे एक रटा-रटाया जुमला दोहराने से नहीं चूकते - हिंदी में श्रेष्ठ बाल साहित्य का अभाव है। अभाव है तो आप क्यों नहीं लिखते? नहीं लिखते तो टिप्पणी का आपको क्या अधिकार ? टालस्टाय, प्रेमचंद, टैगोर, निराला, बच्चन, महादेवी, सोहन लाल दिवेदी , रामनरेश त्रिपाठी , सवेश्वर दयाल सक्सेना और विष्णु प्रभाकर सरीखे जाने कितने लेखकों ने बाल साहित्य लिखा और इसलिए लिखा कि बच्चों के लिए साहित्य अपेक्षित है। उन्होंने भी बचपन में बाल साहित्य पढ़ा होगा। इसलिए दायित्व बोध से प्रेरित होकर इसकी जरूरत को महसूसा।
 एक महाशय ने मुझसे कहा-‘मुझे अब बाल साहित्य का कोई  भविष्य नहीं दिखता।’
 मैंने विनम्रतापूर्वक उनसे पूछा-‘क्यों? क्या अब बच्चा शैशवावस्था से ही गोदान और कामायनी सुनेगा, पढ़ेगा? कक्षा दो के पाठ्यक्रम में राम की शक्ति पूजा लगेगी?’
 नेशनल बुक ट्रस्ट की एक संगोष्ठी में मैंने कहा था-दुनिया में सब कुछ बदल सकता है। बच्चा - बच्चा रहेगा, भले ही कुछ समय तक। और उसके बाद भले ही आपकी लापरवाही उसका बचपन छीन ले, यह  बात दीगर है। 
 आज के बच्चे के जिन रूपों की बात मैंने की है, उसके लिए मैं बच्चों को कभी दोषी नहीं मानता। कटघरे में तो अभिभावक और शिक्षक हैं जिन्होंने बालक की मानसिक भूख को समझा ही नहीं।
 समाचार पत्रों ने बाल साहित्य छापना बंद किया-कितने अभिभावकों ने विरोध किया ? आज बच्चा रविवारी परिशिष्ट में प्रकाशित अधनंगे चित्रों को देखकर यदि असमय जवान (या कहें बूढ़ा) हो रहा है तो इसमें भला उसका क्या दोष? आधुनिकता के नाम पर यदि आप इतने उन्मुक्त हो गए हैं कि अश्लीलता की सीमा लाँघे हुए विज्ञापन आपको आक्रांत नहीं करते और बच्चा उनके अर्थ  को खोजने में अपने भविष्य को दीमक की तरह चट करने में लगा है तो क्या इसके लिए वह दोषी है?
 दस हजार का मोबाइल बच्चे के पास है-दिलाया किसने?
 महँगे लैपटाप, जींस, टी-शर्ट , बाइक - ये सारी भौतिक सुविधाएँ आपकी देन हैं किंतु इन्हें जरूरत मानने वाले अभिभावकों ने क्या कभी पंद्रह रुपये मूल्य की कोई  बाल पत्रिका  भी उसे लाकर दी ?
 आप कह सकते हैं - पंद्रह रुपये की पत्रिका। ये तो मँहगी है।
 इसी दृष्टि ने आज आपको सस्ता कर दिया है।
 बच्चे की निगाह में आज आपकी कीमत कुछ भी नहीं। आप उसके लिए जिदों को पूरा करने वाले पायदान भर हैं।
 चिमटे के बिना दादी की जलती उँगलियों का दर्द  अपने दिल से महसूस करने वाले हामिद आज नहीं हैं लेकिन केवल-केवल इसलिए कि हम उन्हें प्रेमचंद का 'ईदगाह' नहीं, पंद्रह हजार का टी.वी. और पाँच सौ रुपये प्रतिमाह का केबिल उपलब्ध कराने में स्वयं को दूसरों से बेहतर पिता अनुभव करते हैं। 
 मैंने एक मित्र से पूछा-आप अब बाल साहित्य क्यों नहीं लिखते?
 उन्होंने कहा-बाल साहित्य तो तब लिखूँ जब बच्चा हो। आज बच्चा है कहाँ।
 कुछ समझदार लेखक बदले हुए बच्चे को देखकर बाल साहित्य को भी बदलने में जुट गए हैं। बच्चे जो कुछ सोच-कर रहे हैं उसे बाल साहित्य में लाने के लिए वे बाल साहित्य को अश्लीलता से जोड़ने में भी नहीं  हिचकते- इस साफगोइ के साथ बाल साहित्य तो बाल मन की अभिव्यक्ति है। बाल साहित्य तो बाल समाज का दर्पण है।
 बाल साहित्य बाल-मन की अभिव्यक्ति है, बाल-दुष्मन की अभिव्यक्ति नहीं।
 दर्पण वह इस नाते हैं कि बाल समाज को उसकी वास्तविक छवि दिखाते हुए उसे सँवारने को भी प्रेरित करे।
 दरअसल बच्चे बाल साहित्य से कट गए हैं - कहते हुए हमारे जेहन में केवल महानगरों में रहने वाले ऊँची चमक-दमक के बच्चे होते हैं। भारत गाँव का बल्कि गाँव का भी देश है, हम यह भूल जाते हैं। गाँव के निश्छल, सहज बच्चों को भूल जाते हैं। गाँव के बच्चे आज भी साहित्य सुनना-पढ़ना चाहते हैं। वे दादी-नानी से जुड़े हैं, उनकी कहानियों से जुड़े हैं। गाँव में बच्चों के कवि सम्मेलन खूब सफल हुए हैं। बल्कि बड़े शहरों में भी बाल कवि सम्मेलनों की सफलता असंदिग्ध है। कानपुर के एक बाल कवि सम्मेलन में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी मुख्य अतिथि थे। बच्चे उन्हें देखकर हतप्रभ थे - इनकी कविताएँ तो हमारे कोर्स  में हैं।
 बाल साहित्य और बच्चे को जोड़ने के लिए नेटवर्क  की जरूरत है। अभिभावक तो भौतिकता की चकाचौंध में और यह भी कह सकते हैं कि बाल साहित्य के महत्व से परिचित न होने के कारण विशेष योगदान नहीं दे रहे। बाल साहित्यकार और शिक्षक भी इस दायित्व से बचते ही नजर आते हैं।
 एक बाल साहित्यकार बोले-हमारा काम है लिखना। हम लिख रहे हैं। बाल साहित्य बेचना या उसका प्रसार करना हमारा काम नहीं है।
 माफ करें, बाल साहित्य यदि बच्चों तक नहीं पहुँच रहा तो परिवेश बनने तक बाल साहित्यकारों को भी आगे आना ही होगा। आप कुछ नहीं तो विद्यालयों में बाल कवि सम्मेलन तो करा ही सकते हैं। बच्चों को पुरस्कार में बाल साहित्य की पुस्तकें देने के लिए वातावरण निर्मित  कर सकते हैं। जन्मदिन पर बाल साहित्य भेंट करने की परंपरा विकसित कर सकते हैं और कुछ भी नहीं तो कम से कम इतना कि विद्यालयों में जाकर केवल अपनी-कविता या कहानी का पाठ ही बच्चों के समक्ष कर सकते हैं। विद्यालयों में प्रार्थनाकाल या खाली पीरियड में यह काम हो सकता है।
 बाल साहित्य के प्रसार में शिक्षक महत्वपूर्ण  सिद्ध हो सकते हैं किंतु उन्हें बाल साहित्य के बारे में ज्ञान नहीं। इसमें भी उनका दोष नहीं। स्नातक, स्नातकोत्तर स्तर के पाठ्यक्रम में बाल साहित्य होना चाहिए। उसके महत्व पर अध्याय होने चाहिए। कुछ नहीं तो एम. ए. स्तर पर वैकल्पिक प्रश्न पत्र के रूप में जैसे - लोक साहित्य, पत्रकारिता विशेष विधा आदि के प्रश्न पत्र होते हैं, उनमें बाल साहित्य भी रहे। इससे भावी माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी तथा शिक्षक बाल साहित्य की दशा और महत्ता से परिचित होकर उसके विकास में अच्छी भूमिका निभा सकेंगे।
 मुझे यह कहने में कोई  संकोच नहीं कि आज बाल साहित्य बहुत लिखा जा रहा है, बहुत छप रहा है किंतु पढ़ा कम जा रहा है। पढ़ा इसलिए कम जा रहा है क्योंकि बहुत से पूर्वाग्रह हावी हैं। बाल साहित्य केवल बच्चों के लिए ही नहीं - शिक्षकों, अभिभावकों, शोधार्थियों, पाठ्य समितियों, फिल्म निर्माताओं-सबके लिए है। बाल साहित्य साझा साहित्य है। बाल साहित्य को जब हम केवल बच्चों का मान बैठते हैं, बस वहीं से उसकी उपेक्षा शुरू हो जाती है। एक जमाना था जब  नंदन बड़ों की भी पत्रिका  थी। प्राचीन कथा विशेषांक की प्रतीक्षा दादा-दादी, माता-पिता, शिक्षक और यहाँ तक कि साधु-संत भी करते थे। बाल साहित्य को ऐसे ही बहुआयामी बनाने की जरूरत है।
 बाल साहित्य गंभीर लेखन है, इसके लिखने वाले को भी गंभीर होना चाहिए। बाल साहित्य की प्रगति की ओर उन्मुख होना चाहिए। जबरदस्ती नहीं, जबरदस्त लेखन की जरूरत है। 
 बाल साहित्य का क्षेत्र अपार संभावनाओं से युक्त है। खुला आमंत्रण दे रहा है-जरूरत है निष्ठा से काम करने वालों की। 
 जरूरत है काम करने वालों को उत्साहित-प्रोत्साहित करने वालों की।
 इधर बाल साहित्य का इतिहास लिखकर प्रकाश मनु ने बहुत बड़ा काम किया है। कृष्ण शलभ के संपादन में वृहद् ग्रंथ बचपन एक समंदर प्रकाशित हुआ है। इंटरनेट पर बाल पत्रिकाएँ आ रही हैं। विश्व पुस्तक मेले यह सिद्ध करते हैं कि आज बच्चों की सर्वाधिक पुस्तकें छपती हैं। बाल साहित्य पर दिल्ली और पंजाब से एक-एक लाख रुपये के पुरस्कार दिए जा रहे हैं।
 बाल साहित्य का भविष्य उज्ज्वल है। अक्षुण्ण संभावनाओं से ओतप्रोत है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है। बाल साहित्य भी उससे अछूता नहीं रह सकता। लेकिन यह कहना कि बाल साहित्य का अस्तित्व खतरे में है, बड़ी भूल है। बाल साहित्य नहीं रहा तो उसके रूप में आज तक हस्तांतरित होती आ रही संस्कृति भी नहीं रहेगी और तब... मानवता... समाज... राष्ट्र और... यह विश्व भी...! आप खुद समझ सकते हैं। मैं क्या कहूँ ?
(पुस्तक बाल साहित्य के प्रतिमान के अंतिम अध्याय से ...साभार)