मंगलवार, 8 मई 2018

आलेख : बाल साहित्य आलोचना का इतिहास/ डाॅ. नागेश पांडेय ‘संजय’

बाल साहित्य आलोचना का इतिहास 

बाल साहित्य की तुलना में ‘बाल साहित्य समीक्षा’ का उद्भव भले ही विलंब से हुआ हो तथापि उसकी विकास-यात्रा का इतिहास स्वयं में बड़ा रोचक और गौरवपूर्ण है। अनेक विसंगतियों एवं अवरोधों के बावजूद भी बाल साहित्य समीक्षा की नाव निरंतर आगे बढ़ती रही। डगमग-डगमग, थपेड़े खाते हुए; झंझावातों से जूझते हुए, तेज लहरों को चीरते हुए और कई-कई बार बिना पतवार के और इससे भी बड़ी बात कि बगैर नाविक के भी: मगर यह ‘नाव’ रुकी नहीं, सहमी नहीं। लीक बनाती रही और बढ़ती रही। गढ़ती रही सफलता के नए सोपान। मढ़ती रही नित नए प्रतिमान और किनारे खुद-ब-खुद मिलते गए। कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष माध्यमों से बाल साहित्य समीक्षा की कीर्ति-पताका फहरती ही गई।

बाल साहित्य समीक्षा का उद्भव और उसका प्रारंभिक स्वरूप 
हिंदी में बाल साहित्य समीक्षा की शुरूआत भले ही पर्याप्त विलंब से हुई लेकिन उसका सांकेतिक सूत्रपात तो बाल साहित्य की पत्रिकाओं के कुछ गंभीर किस्म के संपादकों की नीतियों, उनके चिंतन और अपेक्षाओं-आकांक्षाओं के साथ ही हो गया था। प्रारंभिक बाल पत्रिकाओं के संपादकीयों से बाल साहित्य के स्वरूप और प्रयोजन की वकालत को समुचित प्रोत्साहन मिला। इसी के चलते बाल साहित्य के सार्थक सृजन को गति मिली और यह स्वीकारा गया कि बाल साहित्य, साहित्य की सर्वाधिक मनोवैज्ञानिक तथा महत्वपूर्ण विधा है। बाल साहित्य बालकों के स्वस्थ मानसिक विकास हेतु सुस्वादु भोजन की भाँति है। यदि उसकी उपेक्षा की गई तो इसके दूरगामी दुष्परिणाम संपूर्ण राष्ट्र अपितु संपूर्ण विश्व को भुगतने पड़ेंगे।
कतिपय विद्वान बाल साहित्य समीक्षा की शुरूआत 1928 से मानते हैं जब सुधा (मासिक) में ‘बाल साहित्य का निर्माण’ शीर्षक से जहूर बख्श का आलेख प्रकाशित हुआ था। किंतु गंभीरतापूर्वक देखें तो यह सुप्रयत्न तो इससे लगभग 11 वर्ष पूर्व ही ‘बाल सखा (मासिक) की संपादकीय नीतियों से ही प्रारंभ हो गया था। सही अर्थों में यह ‘बाल साहित्य समीक्षा’ की नींव का पहला पत्थर था, जिसे रखने वाले थे पत्रिका के तत्कालीन संपादक लल्ली प्रसाद पांडेय। उन्होंने ‘बाल सखा’ के प्रवेशांक (जनवरी, 1917) में बाल साहित्य के औचित्य और उपादेयता को बड़ी ही मार्मिकता के साथ उद्घाटित किया था- ‘‘उन्नत भाषाओं में बाल साहित्य को एक विशेष स्थान प्राप्त हैं। उन्नत जातियों के लोग अपने देश के बच्चों का सुधार करना आवश्यक समझते हैं। .............. यही कारण है कि उनके यहाँ बाल साहित्य को गौरव की दृष्टि से देखा जाता है। उसको सर्वांग सुंदर बनाने का प्रयत्न किया जाता है। .......... लेकिन हमारे देश में यह बात नहीं है। शिक्षा की कमी के कारण बहुत सी जरूरी बातें भी यहाँ उपेक्षा की दृष्टि से देखी जाती हैं।’’
पांडेय जी की नीतियों के फलस्वरूप न केवल बालकों को उत्तम साहित्य मिला बल्कि उनके ‘स्वतंत्र लेखक’ भी तैयार हुए।
‘बाल सखा’ के साथ-साथ ‘शिशु’, ‘वानर’, ‘कुमार’, ‘बाल विनोद’, ‘किशोर’, ‘तितली’ इत्यादि स्वातंत्र्य-पूर्व की बाल पत्रिकाओं में बाल साहित्य समीक्षा की नींव को पुख्ता करने में अप्रत्यक्ष रूप से महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन पत्रिकाओं के संपादक निःसंदेह बाल साहित्य समीक्षा की नाव के ‘अघोषित नाविकों’ जैसे थे जिन्होंने यथावसर अपना योगदान देने में कोई हीला-हवाली नहीं की। ऐसे संपादकों में सुदर्शनाचार्य (सं0-शिशु) और आनंद कुमार (सं.- वानर) के नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। इन्होंने बाल साहित्य में युगानुकूलता, नवीनता, मनोविज्ञान तथा साज-सज्जा (प्रस्तुति) जैसे अनिवार्य तत्व उद्घाटित किए।
स्वतंत्रता-प्राप्ति से ठीक दो वर्ष पूर्व का समय बाल साहित्य समीक्षा के लिए विशेष आह्लादकारी रहा। एक तो 1946 में कृष्ण विनायक फड़के की पुस्तक ‘बाल दर्शन’ (जिसे कुछ विद्वान बाल साहित्य समीक्षा की पहली पुस्तक भी मानते हैं) का प्रकाशन हुआ और दूसरे इससे एक वर्ष पूर्व ‘‘बाल साहित्य का आलोचनात्मक और तुलनात्मक सिंहावलोकन तथा उसकी भावी समृद्धि के सुझाव’’ विषय पर निबंध प्रतियोगिता आयोजित हुई। जिसके लिए उस जमाने में कानपुर के मनोहर लाल के द्वारा एक सौ रूपये का पुरस्कार प्रस्तावित किया गया था। इसके मूल में श्रद्धेय फड़के जी का ही सद्प्रयास सन्निहित था।
जहाँ तक ‘बाल दर्शन’ पुस्तक की बात है; वह बाल साहित्य पर समीक्षात्मक पड़ताल करने वाली पूर्णतः बाल साहित्य समीक्षा केंद्रित पुस्तक नहीं है। डाॅ. श्रीप्रसाद के अनुसार - ‘‘बाल दर्शन उस समय की एक मात्र कृति है जिसमें बाल साहित्य समीक्षा की भी दृष्टि है, साथ ही उसमें बालकों का मनोवैज्ञानिक अध्ययन, उनकी शिक्षा, खेल, बाल साहित्य का विकास, बच्चों की पत्रिकाएँ और बाल साहित्य के संबंध में ‘बाल दर्शन’ संदर्भ-पुस्तक है।’’

फिलहाल आयु वर्ग के आधार पर बाल साहित्य की सर्जना और तुलनात्मक दृष्टि से उसके मूल्यांकन के संदर्भ में कृष्ण विनायक फड़के की पहल को सदैव सम्मान की दृष्टि से देखा जाएगा। उनकी चर्चा के बिना बाल साहित्य समीक्षा का इतिहास ही अधूरा है। ऐसे प्रयत्न आज भी अनुकरणीय हैं।

बाल साहित्य समीक्षा की विधिवत शुरूआत
बाल साहित्य समीक्षा का विधिवत विकास स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात हुआ। बाल साहित्य जगत सदैव ज्योत्स्ना द्विवेदी और रमापति शुक्ल का ऋणी रहेगा जिन्होंने बाल-साहित्य के मूल्यांकन और उस पर शोध-कार्य की परंपरा का सूत्रपात किया।
1952 में ज्योत्स्ना द्विवेदी ने ‘हिंदी किशोर साहित्य’ शीर्षक से एक लघु शोध प्रबंध रमापति शुक्ल के निर्देशन में तैयार किया। भले ही यह शोध प्रबंध लघु था; एम. एड्. परीक्षा हेतु था किंतु न केवल हिंदी वरन् समस्त भारतीय भाषाओं में बाल साहित्य पर प्रस्तुत यह पहला शोध-कार्य है। इसी के अनंतर बाल साहित्य पर शोध कार्य का सिलसिला शुरू हुआ और भारतीय भाषाओं में सर्वप्रथम पी-एच डी 1960 में आशा गंगोपाध्याय को कलकत्ता विश्वविद्यालय से ‘बांग्ला शिशु साहित्येर विकास’विषय  पर प्राप्त हुई।
ऐसे समय में, जबकि बाल साहित्य पर समीक्षात्मक सामग्री ‘न’ के बराबर थी, बाल-साहित्य पर शोध-कार्य की पहल करना ज्योत्स्ना द्विवेदी के अभूतपूर्व साहस और समर्पण को दर्शाता है। सुश्री द्विवेदी के लघु शोध प्रबंध हिंदी किशोर साहित्य को  को 1953 में नंद किशोर एंड ब्रदर्स, वाराणसी ने 214 पृष्ठों की पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया। भूमिका में शोध निर्देशक रमापति शुक्ल ने लिखा था- ‘‘हिंदी बाल तथा किशोर साहित्य पर अभी तक एक भी विवेचनात्मक पुस्तक नहीं लिखी गई है।’’
उपर्युक्त पुस्तक में शिक्षा मनोविज्ञान तथा साहित्य के प्रमुख मानदंडों को आधार मानकर बाल तथा किशोर साहित्य का सार्थक विवेचन प्रस्तुत किया गया है।
‘हिंदी किशोर साहित्य’ ग्रंथ शांत सरोवर में किसी कंकड़ के डालने जैसा था। इसका प्रकाशन क्या हुआ, बाल साहित्य समीक्षा को कई सशक्त खेवनहार मिल गए। सबसे पहले कमर कसी निरंकार देव सेवक ने। नवंबर, 1954 में ‘वीणा’ (हिंदी साहित्य सम्मेलन, इंदौर की पत्रिका) में ‘बाल साहित्य रचना’ शीर्षक से उनका एक आलेख प्रकाशित हुआ। यह एक तरह से बाल साहित्य पर आलोचनात्मक निबंध लिखने का शुभारंभ था। डाॅ. हरिकृष्ण देवसरे ने लिखा भी है-‘‘सेवक जी ने अपने इस लेख में बाल साहित्य रचना के कई आवश्यक तथ्यों को उद्घाटित करते हुए हिंदी में बाल साहित्य आलोचना को जन्म दिया।’’
सेवक जी के साथ-साथ आनंद प्रकाश जैन, विष्णु प्रभाकर, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, सत्यकाम विद्यालंकार, मन्मथनाथ गुप्त, जयप्रकाश भारती, मनोहर वर्मा, मस्तराम कपूर ‘उर्मिल’, डाॅ. देवेंद्रदत्त तिवारी, हरिकृष्ण देवसरे, राष्ट्रबंधु इत्यादि अनेक रचनाधर्मी बाल साहित्य समीक्षा की श्रीवृद्धि हेतु तत्पर हो उठे। आलेखों, रचनालयों, समीक्षाओं और अनुसंधानों के रूप में बाल साहित्य समीक्षा का शंखनाद गूंज उठा।
1956 से ‘आज’ दैनिक ने प्रतिवर्ष साहित्य मूल्यांकन विशेषांक में बाल साहित्य को भी सम्मिलित कर उसकी समीक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल की।
1958 में डाॅ. हरिकृष्ण देवसरे ने ‘बाल सखा’ पत्रिका में बाल कवियों पर समीक्षात्मक लेखमाला प्रारंभ की। इससे बाल साहित्यकारों की प्रतिष्ठा को बल मिला।
1962 में गवर्नमेंट पेडागाजिकल इंस्टीट्यूट, इलाहाबाद ने ‘बाल साहित्य रचनालय’ आयोजित किया। उद्गीथ वक्तव्य महीयसी महादेवी वर्मा ने दिया। बाल साहित्य पर विचारोत्तेजक चर्चा हुई। पठित आलेख डाॅ.. देवेंद्रदत्त तिवारी के संपादन में ‘बाल साहित्य की मान्यताएं एवं आदर्श’ पुस्तक-रूप में प्रकाशित हुए। बाल-साहित्य आलेखों की प्रथम संपादित पुस्तक होने के कारण यह कृति खूब चर्चित हुई।
उक्त कालावधि में निरंकार देव सेवक बाल साहित्य पर निरंतर आलेख लिखते-छपाते रहे।
1966 में उन्होंने एक अभिनव और महत्वपूर्ण इतिहास एवं समीक्षा ग्रंथ  लिखा- ‘बालगीत साहित्य’। बाल साहित्य की महत्वपूर्ण विधा कविता के स्वरूप और प्रयोजन की चर्चा करते हुए उसके मूल्यांकन की दिशा में संपन्न यह पहला काम था। इसका परिवर्द्धित संस्करण 1983 में उ.प्र. हिंदी संस्थान से प्रकाशित हो चुका है।
निरंकार देव सेवक को बाल साहित्य समीक्षा का भगीरथ कहा जाना चाहिए। अनेक राहों को खोजता और बनाता उनका उक्त गं्रथ परवर्ती बाल साहित्य लेखकों/समीक्षकों के लिए भव्य-स्मारक-सा है। विभिन्न परंपराओं का सूत्रपात करने की दृष्टि से इसे हमेशा याद रखा जाएगा। बाल साहित्य में तात्विक समीक्षा, इतिहास-लेखन, शोध-कार्य, तुलनात्मक अध्ययन इन सभी परंपराओं के मूल में सेवक जी का ग्रंथ ही आधार-रूप में विद्यमान रहा है।
1967 में मनोहर वर्मा ने अपने ढंग का पहला प्रयोग कर बाल साहित्य समीक्षा के वितान की ऊँचाइयों को छुआ। उन्होंने राजस्थान साहित्य अकादमी की पत्रिका ‘मधुमती’ का 418 पृष्ठीय ‘भारतीय बाल साहित्य विवेचन विशेषांक’ संपादित कर न केवल बाल साहित्य की एक दशकीय प्रगति के लेखा-जोखा की दृष्टि प्रदान की, बल्कि प्रौढ़-साहित्य की पत्रिकाओं के ‘बाल साहित्य विशेषांक’ प्रकाशित होने की संभावनाओं का भी सूत्रपात कर दिया। कालांतर में यह विशेषांक राजस्थान साहित्य अकादमी से पुस्तक-रूप में भी प्रकाशित हुआ।
बाल साहित्य में समीक्षात्मक पक्ष को लेकर तरह-तरह के इन सद्प्रयासों के चलते समाज में एक सुगबुगाहट स्वाभाविक थी। कौतूहल स्वाभाविक था। परिणामस्वरूप पी-एच. डी. स्तर के शोध-निर्देशकों को मानना पड़ा कि अनुसंधान के विविध क्षेत्रों में बाल साहित्य भी एक है। यद्यपि यहाँ पर यह चर्चा प्रासंगिक है कि अनुसंधान और समीक्षा दोनों पृथक विधाएँ हैं। अंतः प्रकृति की दृष्टि से दोनों भिन्न हैं। बकौल निर्मला जैन- ‘‘अनुसंधान, पांडित्य, सिद्धांत-निरूपण, इतिहास आदि आलोचना के लिए उपयोगी होते हुए भी आलोचना नहीं है।’’ तथापि उपयोगिता की ही दृष्टि से देखे तो बाल साहित्य के क्षेत्र में होने वाले अनुसंधानों से बाल साहित्य समीक्षा के विकास को भी दिशा मिली, गति मिली और बाल साहित्य समीक्षा की उर्वर भूमि तैयार होने लगी।
1968 में हरिकृष्ण देवसरे और मस्तराम कपूर ‘उर्मिल’ को क्रमशः ‘हिंदी बाल साहित्य: एक अध्ययन; ‘हिंदी बाल साहित्य का विवेचनात्मक अध्ययन’ विषयों पर पी-एच्. डी. उपाधि प्राप्त हुई। देवसरे जी का शोध प्रबंध 1969 में आत्माराम एंड संस, दिल्ली से प्रकाशित होकर बाल साहित्य जगत के समक्ष भी आ गया। निःसंदेह डाॅ. देवेंद्रदत्त तिवारी और निरंकार देव सेवक जी के बाद यह तीसरी महत्वपूर्ण समीक्षात्मक कृति थी। इसमें बाल साहित्य का विहंगावलोकन कर तत्कालीन परिवेश में उसके निकषों की भी स्थापना की गई थी। डाॅ. देवसरे द्वारा निर्णीत बाल साहित्य समीक्षा के अधोलिखित पांच तत्व आज भी समसामयिक हैं - 1. बाल मनोविज्ञान 2. बच्चों का घर-परिवार 3. समाज 4. देश 5. भाषा

सफलता के नए सोपान: विश्वास से लबरेज कदम
बीसवीं सदी का आठवाँ दशक कई मायनों में महत्वपूर्ण है। विशेष रूप से समीक्षा-पत्रकारिता की दृष्टि से इसे हमेशा याद रखा जाएगा। याद रखे जाएँगे डाॅ. मस्तराम कपूर ‘उर्मिल’ और डाॅ. राष्ट्रबंधु। ‘उर्मिल’ जी ने 1972 में ‘बच्चे और हम’ पत्रिका निकाली, जिसमें बाल साहित्य समीक्षा को भी प्रचुर प्रोत्साहन प्राप्त था तो डाॅ. राष्ट्रबंधु ने तो ‘बाल साहित्य समीक्षा’ नाम से एक मासिक पत्रिका ही 1977 में प्रारंभ कर दी। भारतीय भाषाओं में अपने तरह की इस अकेली पत्रिका ने बाल साहित्यकारों को उचित प्रतिष्ठा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। डाॅ. हरिकृष्ण देवसरे के अनुसार-‘‘बाल साहित्य समीक्षा के क्रमिक विकास का मूल्यांकन अधूरा रह जाएगा यदि राष्ट्रबंधु के संपादन में प्रकाशित ‘बाल साहित्य समीक्षा’ की चर्चा न की जाएगी। इस पत्रिका ने बाल साहित्य के विकास में अपना उल्लेखनीय योगदान दिया है।’’
इसमें संदेह नहीं कि पत्रिका में एक लंबे समय तक प्रकाशित होते रहे डाॅ. राष्ट्रबंधु के संपादकीय अत्यंत मार्मिक, बेबाक और विचारोत्तेजक होने के कारण आज भी पुनः पठनीय और विचारणीय हैं। यह पत्रिका बाल साहित्य के क्षेत्र में व्याप्त विसंगतियों पर जबरदस्त प्रहार करती रही। एक तरह से यह पत्रिका बाल साहित्य के हितचिंतकों, उससे समीक्षकों के लिए एक खुला दरबार, खुला मंच रही है। इतने महत्वपूर्ण और गवेषणात्मक आलेख इसमें प्रकाशित हुए हैं कि यदि उन्हें संकलित कर दिया जाए तो एक वृहद समीक्षा-ग्रंथ ही तैयार हो जाएगा। किंतु यह दुःख का विषय है कि संपादक की व्यस्तताओं-विवशताओं के चलते बाद में  पत्रिका का स्वरूप ही बदल गया । पत्रिका एक बने-बनाए ‘फार्मेट’ में बँधकर रह गई । ‘बाल साहित्य समीक्षा’ पत्रिका ‘बाल साहित्यकार समीक्षा’ होकर रह गई । विशेषांक प्रायः किसी बाल साहित्यकार की (केवल यश गाथा) पर केंद्रित होते रहे । इससे बड़ा नुकसान हुआ ।
आठवें दशक में ही कई और ठोस कदम भी उठे। महत्ता की दृष्टि से सर्वप्रथम राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, नई दिल्ली का स्मरण करना होगा जिसने सन् 1977 में बाल साहित्य के मूल्यांकन को लेकर कई कार्यशालाएं आयोजित की। बाल साहित्य की पुस्तकों के मूल्यांकन हेतु एक प्रपत्र तैयार किया गया, जिसमें पुस्तक की जानकारी, कथ्य, प्रस्तुतीकरण एवं भौतिक पक्ष से संबंधित जानकारी और समीक्षात्मक टिप्पणी की अपेक्षा की गई थी। ऐसी कार्यशालाएँ बाद में ‘न’ के बराबर हुईं। काश! ऐसे प्रयासों को निरंतरता मिलती, परंपरा बनती तो बाल साहित्य की स्थिति ही कुछ और होती। फिलहाल इस कार्यशाला के फलस्वरूप डाॅ. इंद्रसेन शर्मा के संपादन में 1977 में ही ‘तरूण साहित्य’ ‘बाल साहित्य’ और ‘किशोर साहित्य सूची’ शीर्षक से तीन अपने ढंग की पहली पुस्तकें प्रकाशित हुईं।
अंतर-राष्ट्रीय बाल वर्ष (1979) में एक बहुत ही दृष्टिपूर्ण ग्रंथ ‘बाल साहित्य रचना और समीक्षा’ (सं0 डाॅ. हरिकृष्ण देवसरे) प्रकाशित हुआ। बाल साहित्य के विकास-क्रम को अधिकारी विद्वानों की दृष्टि से देखने-परखने का यह सुंदर आयोजन था और इससे ग्रंथ भी बड़ा प्रामाणिक बन पड़ा। अमृतलाल नागर, कन्हैयालाल नंदन, मन्मथनाथ गुप्त, नेमिचंद्र जैन, विष्णु प्रभाकर, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, निरंकार देव सेवक सहित लगभग दो दर्जन विद्वानों ने बाल साहित्य के विविध पक्षों पर निष्पक्ष-भाव से लिखा और महत्वपूर्ण बात यह है कि सर्वप्रथम इसी ग्रंथ में बाल साहित्य के शोध-प्रबंधों के सार-संक्षेप प्रकाशित किए गए।
शोध के माध्यम से बाल साहित्य-समीक्षा का कार्य आगे बढ़ाया डाॅ. राष्ट्रबंधु, डाॅ. ज्योति स्वरूप (1971), डाॅ. श्रीप्रसाद (1973), डाॅ. कुसुम डोभाल तथा डाॅ. प्रदीप कुमार हंस (1980) ने। इनमें प्रथम तीन विद्वानों ने जहाँ बाल साहित्य के स्वरूप को लेकर शोध कार्य किए, वहीं डाॅ. डोभाल ने बाल साहित्य में प्रतीक एवं कल्पना तत्व और डाॅ. प्रदीप ने हिंदी-गुजराती, के लोरी बाल-साहित्य की अनंत संभावनाओं को सहज उद्घाटित किया।

नवें दशक में बाल-साहित्य समीक्षा के क्षेत्र में और अधिक गति-प्रगति देखने को मिलती है। सरकारी-असरकारी प्रयास हुए। पुस्तकों और शोध-कार्यों के साथ-साथ बाल साहित्यकारों पर भी पुस्तकें प्रकाशित होने से एक नया परिवेश निर्मित हुआ।
शासकीय स्तर पर जहाँ 1982 में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद, नई दिल्ली ने ‘बाल साहित्य: निर्माण एवं मूल्यांकन (सं.-डाॅ. इंद्रसेन शर्मा) गं्रथ प्रकाशित किया, वहीं भारत सरकार के प्रकाशन
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 विभाग ने ब्ीपसकतमदश्े स्पजमतंजनतम पद प्दकपंद स्ंदहनंहम गं्रथ (सं.: डाॅ. के. ए. जमुना) प्रकाशित कर बाल साहित्य के क्षितिज को विस्तार दिया।
1985 में बाल साहित्यकार रामसिंहासन सहाय ‘मधुर’ अभिनंदन गं्रथ प्रकाशित हुआ। कदाचित् किसी बाल साहित्यकार को समर्पित यह प्रथम अभिनंदन गं्रथ था। 1985 में ही डाॅ. ओम निश्चल के संपादन में द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी: सृजन और मूूल्यांकन गं्रथ प्रकाशित हुआ। 1986 में ‘लोरी-साम्राज्ञी’ शकुंतला सिरोठिया अभिनंदन ग्रंथ इस शंृखला की अगली कड़ी है।
इसी अवधि में बाल साहित्य के शोध-प्रबंधों के प्रकाशन की दिशा में भी सार्थक शुरूआत हुई। जो क्रम ज्योत्सना द्विवेदी और डाॅ. हरिकृष्ण देवसरे के शोध-प्रबंधों के प्रकाशन से प्रारंभ हुआ था, उसे बल मिला।
डाॅ. श्रीप्रसाद, डाॅ. विजय लक्ष्मी सिन्हा और डाॅ. कुसुम डोभाल के शोध प्रबंध क्रमशः बाल साहित्य की रूपरेखा (1985), आधुनिक हिंदी में बाल साहित्य का विकास (1986) और ‘हिंदी बाल काव्य में प्रतीक एवं कल्पना-तत्व’ (1990) शीर्षक से प्रकाशित हुए। इन ग्रंथों से बाल साहित्य की समीक्षा और शोध के कार्य को बहुत बढ़ावा मिला।
इस दशक में पी-एच्. डी. उपाधि हेतु लगभग दो दर्जन शोध-प्रबंध लिखे गए; बाल साहित्य की धरोहर बने। बाल साहित्य पर लघुशोध प्रबंध लिखे जाने लगे। विस्तार-भय से इनकी चर्चा तो यहाँ संभव नहीं किंतु संक्षेप में कहूँ तो बाल साहित्य समीक्षा की गौरवोन्मुखता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि उड़ीसा, म. प्र., बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात और उत्तर प्रदेश के विभिन्न विश्वविद्यालयों में इनकी सुप्रस्तुति हुई। विषयगत वैविध्य की बात की जाए तो अन्य भाषाओं से हिंदी बाल साहित्य की तुलना, बाल पत्र-पत्रिकाएँ, विविध बाल साहित्यिक विधाएँ तथा बाल साहित्यकारों पर प्रबंध-रचना हुई। हाँ, यह अवश्य दुर्भाग्यपूर्ण है कि इतने ढेर सारे शोध-प्रबंधों के प्रकाशन की दिशा में कोई ठोस-कार्य नहीं हो सका। एक मात्र डाॅ. विजयलक्ष्मी सिन्हा का ही शोध-प्रबंध प्रकाशित हुआ- ‘हिंदी में बाल साहित्य का विकास’, जिसमें आधुनिक बाल साहित्य का विकासात्मक सर्वेक्षण है। अन्य प्रबंधों की मान्यताएँ, स्थापनाएँ शोध-विभागों की अलमारियों में बंद रह गईं। अनुदान देने वाली कोई संस्था होती, बाल साहित्य अकादमी होती तो संभवतः ये शोध-प्रबंध आज पुस्तकालयों की शोभा होते, कुछ अलग ही परिदृश्य होता।
पत्रिकाओं में यदि संगीत (1981) और 1988 से प्रकाशित ‘किशोर लेखनी’ की चर्चा नहीं करेंगे तो नवें दशक की समीक्षात्मक-प्रगति का विवरण अपूर्ण रहेगा। ‘संगीत’ का ‘बाल-संगीत अंक’ बाल काव्य के क्षेत्र में ‘मील के पत्थर’ के समान है। बाल काव्य की गेयता ही उसका प्राण तत्व हैं। कविता कानों का विषय है, आँखों का नहीं-जैसी मान्यताओं को पुष्ट करता यह विशेषांक बाल साहित्य को दीर्घजीवी बनाने में संगीत तत्व की अपरिहार्यता को उद्घाटित करता है।
‘किशोर लेखनी’ किशोरों के लिए पृथक लेखन को एक आंदोलन के रूप में प्रस्तुत कर उसे प्रतिष्ठित करने की दिशा में सुरुचिपूर्ण पहल थी। देवेंद्र कुमार ‘देवेश’ के साहित्य अकादमी में उप-संपादक हो जाने से भले ही अब यह पत्रिका बंद है किंतु इसकी प्रासंगिकता और प्रदेय हमेशा याद रखा जाएगा।

महाकाश का संस्पर्श: हौसलों से उड़ान होती है
किसी ने क्या खूब कहा है- ‘पंख से कुछ नहीं होता/हौसलों से उड़ान होती है।’ बीसवीं सदी का अंतिम दशक क्या शुरू हुआ। बाल साहित्य समीक्षा की तस्वीर ही बदलती चली गई। एक तरह से यह दशक बाल साहित्य समीक्षा के लिए ‘क्रांतिकारी दशक’ सिद्ध हुआ। बहुत काम हुआ, बहुत ज्यादा काम हुआ बल्कि यह कहना अत्युक्ति न होगी कि ‘बाल साहित्य’ से भी ज्यादा काम ‘बाल साहित्य समीक्षा’ के क्षेत्र में हुआ।
प्रवृत्तियाँ बदलीं। नए प्रतिमान गढ़े गए। नयी सोच जगी। मिशनरी भाव से जुट गए लोग। ‘बाल साहित्य के समीक्षा-कर्म’ को एक आंदोलन की तरह स्वीकार कर सजग-सक्रिय हो उठे महारथी। लकीरें टूटीं क्योंकि मुंह ताकने की प्रवृत्ति छूटी।
अनेक पंखधारी जो केवल ‘चोंचें’ लड़ाया करते थे। फुदकते भर थे। ‘ऐसा होता-वैसा होता’ चिल्लाया करते थे। अभावों का रोना रोते थे। उन्होंने भी कमर कसी और उड़ चले एक नए महाकाश का संस्पर्श करने।

सच तो यह है कि परिमाण और परिणाम: दोनों ही दृष्टियों से अन्यतम कार्य हुए। सर्वाधिक कृतियाँ प्रकाशित हुईं। ढेरों शोध कार्य हुए। बाल साहित्य पर संगोष्ठियाँ एक परंपरा बन गई। विश्वविद्यालयों ने भी बाल साहित्य पर सेमिनार आयोजित किए। बाल साहित्य पाठ्यक्रम का-प्रश्नपत्रों का विषय बना। ‘बाल साहित्य का स्वतंत्र इतिहास’ लिखा गया और यहाँ तक कि बाल साहित्य के निजी प्रतिमान ही गढ़ लिए गए।
संपूर्ण प्रगति पर दृष्टिपात किया जाए तो कुछ नाम मोटे तौर पर उभरते हैं, जिन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता, ‘प्रकाश-स्तंभ’ की भाँति जो ‘प्रेरणा पुंज’ बने रहेंगे। यथा-विनोद चंद्र पांडेय ‘विनोद’, डाॅ. ओमप्रकाश सिंहल, जय प्रकाश भारती, डाॅ. श्रीप्रसाद, डाॅ. राष्ट्रबंधु, डाॅ. सुरेंद्र विक्रम, डाॅ. प्रकाश मनु, डाॅ. मधुपंत, डाॅ. भैरुंलाल गर्ग, अनंत कुशवाहा, डाॅ. शकुंतला कालरा इत्यादि।
1991 में विनोद चंद्र पांडेय ‘विनोद’ ने एक पुस्तक संपादित की-‘हिंदी बाल काव्य: एक अविराम यात्रा’। यह अपने ढंग की पहली पुस्तक है। बाल कवियों के आत्मकथ्यों पर केंद्रित इस पुस्तक को पढ़ते हुए बाल-काव्य की रचना-प्रक्रिया और उसकी विकास यात्रा को बहुत करीब से जानने-समझने का अवसर मिलता है। 1998 में विनोदजी द्वारा सम्पादित बाल काव्य की अविरल यात्रा इसी प्रयत्न का अद्यतन रूप है.  बाल साहित्य की अन्य विधाओं में भी ऐसे प्रयोग होने चाहिए। ‘विनोद’ जी ने उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, लखनऊ के निदेशक के रूप में बाल साहित्य समीक्षा को बहुत बढ़ावा दिया। उन्होंने ‘सर्वभाषा बाल साहित्य समारोह’ आयोजित कराए। संगोष्ठियाँ आयोजित कीं। पठित प्रपत्रों के संपादित गं्रथ प्रकाशित कराए और यहाँ तक कि ‘बाल साहित्य समीक्षा’ को समर्पित एक सम्मान ही (1993 से) प्रवर्तित करा दिया। ‘कृष्ण विनायक फड़के बाल साहित्य समीक्षा सम्मान’ अपने ढंग का एक मात्र सम्मान था और बाल साहित्य के समीक्षा-कर्म के प्रोत्साहन हेतु बहुत जरूरी भी किंतु दुर्भाग्य से पांडेय जी के संस्थान से हटने के बाद यह बंद हो गया।
पांडेय जी ने उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से ‘बाल साहित्य संवर्द्धन योजना’ प्रारंभ की थी। इसके अंतर्गत बाल साहित्य समीक्षा की भी अनेक कृतियाँ प्रकाशित हुईं, जिनकी चर्चा आगे की जाएगी। 1992 में डाॅ. ओम प्रकाश सिंहल के संपादन में ‘बाल साहित्य: परंपरा और प्रयोग’ नामक ग्रंथ प्रकाशित हुआ। इसमें संकलित लेख अत्यंत विचारोत्तेजक है। वस्तुतः डाॅ. सिंहल की दृष्टि थी कि जब बड़ों के साहित्य पर आए दिन संगोष्ठियाँ होती रहती हैं तो ‘बाल साहित्य’ पर क्यों नहीं। उन्होंने 21 दिसम्बर 1991 को बाल साहित्य पर एक दिवसीय गोष्ठी की, जिसमें प्रस्तुत आलेखों ने उक्त पुस्तक का रूप लिया।
1992 में ही ‘हिंदी बाल पत्रकारिता: उद्भव और विकास’ (सुरेंद्र विक्रम का लघु शोध प्रबंध) प्रकाशित हुआ। 1953 में ज्योत्स्ना द्विवेदी के लघु शोध प्रबंध के बाद यह दूसरा लघुशोध था, जिसे प्रकाशित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसमें बड़े ही श्रमपूर्वक बाल पत्रिकाओं की विकास-यात्रा के साथ-साथ बाल साहित्य के सैद्धांतिक पक्ष को भी उद्घाटित किया गया है।
1993 में जयप्रकाश भारती की पुस्तक ‘बाल पत्रकारिता: स्वर्णयुग की ओर’ प्रकाशित हुई। इसमें बाल साहित्य का वर्तमान और भविष्य तो रेखांकित है किंतु सुरेंद्र विक्रम की पुस्तक जैसी पूर्णता और गांभीर्य का दर्शन दुर्लभ रहा।
1993 में ही इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय ने बाल और किशोर साहित्य पर पाठ्यक्रम तैयार कराए। इससे बाल-साहित्य को विश्वविद्यालय स्तर के पाठ्यक्रम में सम्मिलित किए जाने के प्रयासों को बल मिला। ऐसे प्रयास आज भी जारी हैं यद्यपि उनकी सफलता भविष्य के गर्भ में छिपी है।
1995 में जयप्रकाश भारती की पुस्तक ‘बाल साहित्य: इक्कीसीं सदी में’ छपी। इसमें विश्व बाल साहित्य की भूमिका, बाल साहित्य के सप्त ऋषि, बाल-पुस्तकों का प्रकाशन, परियों की कथाएँ तथा बाल लेखकों और पुस्तकों पर भी सूचनात्मक आलेख संकलित हैं। किंतु कई नामों को जबरदस्ती महत्वपूर्ण बनाने और कई महत्वपूर्ण नामों को जबरदस्ती छोड़ देने के कारण इस पुस्तक की बहुत आलोचना भी हुई।
1996 में डाॅ. रमाकांत श्रीवास्तव के संपादन में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान से एक ग्रंथ प्रकाशित हुआ- ‘बाल साहित्य के विविध आयाम’। हिंदी के साथ-साथ इस ग्रंथ में पंजाबी, डोगरी, सिंधी, उड़िया, बंगाली, मराठी, मलयालम, कन्नड़, तमिल तथा तेलुगु भाषाओं के बाल साहित्य पर (दो-चार को छोड़कर) अत्यंत गवेषणात्मक आलेख संकलित हैं। इनसे भारतीय बाल-साहित्य की विकास-यात्रा का अभिज्ञान प्राप्त होता है। एक तरह से यह भारतीय बाल साहित्य के इतिहास का आमुख है। हाँ, कुछ सतही आलेखों, जो केवल नाम-गणना तक ही सीमित हैं या फिर खुद को स्थापित करने की चेष्टा में लिखित हैं, से अवश्य बाल साहित्य की तस्वीर प्रभावित हुई है।
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1997 में ‘बाल कल्याण में बाल साहित्य की भूमिका’ (सं0 रमाकांत श्रीवास्तव), ‘हिंदी में बाल विज्ञान लेखन (डाॅ. शिवगोपाल मिश्र), तथा हिंदी बाल साहित्य: विविध परिदृश्य’ (डाॅ. सुरेंद्र विक्रम) पुस्तकें प्रकाशित हुईं। डाॅ. शिव गोपाल मिश्र की पुस्तक वैज्ञानिक बाल साहित्य को लेकर नवीन एवं अधुनातन जानकारियाँ प्रस्तुत करती हैं और अपने क्षेत्र की पहली समीक्षा-कृति है। डाॅ. सुरेंद्र विक्रम की पुस्तक में ‘चिंतन’, ‘आकलन’ और ‘टीका-टिप्पणी’ खंडों के माध्यम से बाल साहित्य और बालकों से जुड़े अंतरंग तथ्यों को विश्लेषित किया गया है। बाल-पुस्तकों की समीक्षाएं भी प्रकाशित होने के कारण यह पुस्तक विशेष रूप से संग्रहणीय बन पड़ी है।
1998 में डाॅ. सुरेंद्र विक्रम के दो और महत्वपूर्ण समीक्षा-ग्रन्थ छपे। ‘बाल साहित्य: परख और पहचान’ में वर्तमान बाल साहित्य का समीक्षात्मक मूल्यांकन प्रस्तुत है वहीं ‘बाल साहित्य: शोध समीक्षा संदर्भ’ उनके संपादन में बाल साहित्य समीक्षा जगत की विशद् उपलब्धियों को अत्यंत व्यवस्थित ढंग से रेखांकित करता है। इस ग्रंथ में बाल साहित्य के शोध-प्रबंधों के सार-संक्षेपों के अतिरिक्त प्रकाशित बाल साहित्य आलेखों का क्रमवार विवरण संपादक के अथक परिश्रम का परिचायक है।
इसी वर्ष बाल साहित्य के अधिकारी विद्वान डाॅ. श्रीप्रसाद की पुस्तक ‘बाल साहित्य की अवधारणा’ प्रकाशित हुई। सही अर्थों में यह बाल साहित्य समीक्षा की व्यवस्थित कृति है। लेखक का दीर्घकालीन अनुभव उनके 28 आलेखों में सहज झलकता है। ‘बाल साहित्य की द्विअर्थकता’, ‘बाल साहित्य के सौ वर्ष’, ‘बाल कविता की वापसी’, ‘बाल साहित्य की अवधारणा’, मैक्सिम गोर्की और बाल साहित्य’ जैसे अनेक लेख पुनः पठनीय हैं। यह पुस्तक उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान ने प्रकाशित की थी। इस संस्थान के अतिरिक्त बाल साहित्य समीक्षा को गति देने वाली संस्थाओं को याद किया जाए तो दो संस्थाएं तत्काल और विशेष रूप से याद आती हैं। एक-कानपुर का भारतीय बाल कल्याण संस्थान, जिसने बाल साहित्य के विविध पक्षों पर एक-एक वर्ष में कई-कई बार अत्यंत महत्वपूर्ण संगोष्ठियाँ आयोजित की हैं। इसकी दृष्टि-सृष्टि के मूल में डाॅ. राष्ट्रबंधु का प्रदेय है तो दूसरी संस्था है ‘बाल भवन सोसायटी’, नई दिल्ली। इसकी निदेशिका डाॅ. मधु पंत ने 1994 से प्रतिवर्ष बाल-साहित्य के विविध पक्षों पर न केवल राष्ट्रीय संगोष्ठियाँ आयोजित कीं, बल्कि पठित आलेखों को गं्रथाकार भी प्रकाशित कराया। संस्था द्वारा प्रकाशित बाल साहित्य समीक्षा ग्रंथ हैं-‘त्रिविधा’ (1994), ‘त्रिधारा’ (1996), ‘त्रिपदा’ (1997), ‘त्रिपथगा’ (1998), ‘त्रिदिशा’ (1999), ‘त्रिवेणी’ (2000) इन ग्रंथों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि एक ही पक्ष पर विविध विद्यानों के चिंतनपरक आलेख इनमें संकलित हैं और ग्रंथों का सबसे बड़ा दोष है उनका नामकरण। शीर्षक से सामान्य पाठक भला कैसे समझेगा कि यह ग्रंथ बाल-साहित्य पर केंद्रित हैं ?
इस दशक में बाल साहित्यकारों के मानवर्द्धन की दिशा में उल्लेखनीय प्रयास हुए। बाल साहित्यकारों के व्यक्तित्व-कृतित्व पर केंद्रित मूल्यांकन-ग्रंथों के प्रकाशन की परंपरा को और अधिक बल मिला। ‘शंभूप्रसाद श्रीवास्तव: व्यक्तित्व और कृतित्व’ (1994), ‘डा0 राष्ट्रबंधु: व्यक्तित्व-कर्तत्व ’ (1996), डाॅ. ओमप्रकाश सिंहल की बाल-साहित्य सर्जना पर केंद्रित आलोचना-ग्रंथ ‘बाल साहित्य के आयाम’ (1998), ‘डाॅ. श्यामलाकांत वर्मा: व्यक्तित्व और कृतित्व’ (1998) अभिनंदन-ग्रंथ प्रकाशित हुए।
उपर्युक्त ग्रंथों  में ‘बाल साहित्य के आयाम’ तो विशेष उल्लेखनीय हैं, जहाँ एक बाल साहित्यकार की सृजन-यात्रा को बड़ी ही अंतरंग दृष्टि से देखने-परखने की चेष्टा की गई है और बड़ी बात यह कि मूल्यांकन-गं्रथों का जो एक ‘ढर्रा’ है, बनी-बनाई लीक है, उससे पूरी तरह हटकर इस ग्रंथ का प्रणयन हुआ है। डाॅ. ओमप्रकाश सिंहल के बाल-साहित्य को समूचे बाल साहित्य के परिप्रेक्ष्य में मूल्यांकित करने की पहल स्वागतीय है। फिर महत्वपूर्ण बात यह भी कि यह पहल केवल बाल साहित्यकारों के द्वारा ही नहीं है, बल्कि जो मूलतः बाल साहित्य से जुड़े नहीं हैं, किंतु बाल साहित्य के प्रति उनका क्या चिंतन है- क्या अवधारणा है- क्या मूल्यांकन दृष्टि है, यह जानने के क्रम में-उनसे भी लिखाया गया है।
बाल साहित्य पर शोध-प्रबंध भी लिखे गए। इनमें से अनेक इसलिए उल्लेखनीय हैं क्योंकि वे एक नयी विषय-वस्तु पर अर्थात् बाल साहित्य के संभावनाशील क्षेत्रों पर केंद्रित हैं।
1992 में काशी विश्वविद्यालय से डाॅ. रुद्रशंकर दुबे का शोध प्रबंध ‘हिंदी बाल साहित्य और शिक्षाशास्त्र’ तथा दिल्ली विश्वविद्यालय से डाॅ. स्नेह प्रभा का शोध प्रबंध ‘बाल साहित्य में रस व उसकी शैक्षिक महत्ता’ बाल साहित्य के शैक्षिक सरोकारों को उद्घाटित करता है। अनेकानेक बाल साहित्यकारों और विधाओं पर प्रबंध लिखे गए लेकिन क्षेत्र और प्रवृत्ति विशेष को ध्यान में रखकर लिये गए कतिपय शोध-प्रबंध भी श्लाघनीय बल्कि विशेष रूप से श्लाघनीय हैं- 1995 में डाॅ. सुधा हिशीकर ने छत्तीसगढ़ अंचल के बाल साहित्य पर तथा 1999 में डाॅ. विभा सिंह ने कानपुर परिक्षेत्र के बाल साहित्य पर शोध कार्य प्रस्तुत कर क्रमशः रायपुर और कानपुर विश्वविद्यालयों से पी-एच्.डी. उपाधि प्राप्त की। इसी क्रम में ‘साठोत्तरी बाल साहित्य’ पर (1999 में आगरा विश्वविद्यालय से पी-एच्.डी. उपाधि प्राप्त) डाॅ. शेषपाल सिंह ‘शेष’ का अवदान भी स्मरणीय-उल्लेखनीय है। कर्नाटक विश्वविद्यालय से 1999 में डाॅ. समीउल्लाह को हिंदी-कन्नड़ के बाल साहित्य पर तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए पी-एच्.डी. उपाधि प्राप्त हुई।
इस प्रकार के कार्य बाल साहित्य की अनंत संभावनाएं निरूपित करते हैं। ‘सूर-कबीर-तुलसी’ के इर्द-गिर्द घूमते हुए बारंबार पुराने विषयों का पिष्टपेषण करने-कराने वाले शोध निर्देशकों का आह्वान करते हैं। उन शोध निर्देशकों को मुँह-तोड़ जबाव देते हैं जो ‘सूर्य के आगे आँखें बंद कर बैठे हैं’, अंधेरे का ‘फतवा’ जारी करते कहते हैं कि बाल साहित्य है ही नहीं, उस पर क्या काम हो।
एम.ए., एम. फिल. और एम. एड. उपाधि हेतु भी अनेक लघुशोध प्रबंध लिखे गए हैं और यह सुक्रम निरंतर जारी है। यद्यपि यह प्रबंध प्रायः बाल साहित्यकारों की कतिपय रचनाओं पर ही केंद्रित होते हैं और लघु शोधों की यही सीमा भी है कि सहज रूप से सुलभ सामग्री पर ही शीघ्रातिशीघ्र कार्य संपन्न हो जाए तथापि इससे मूल्यांकन की परंपरा को तो बल प्राप्त ही होता है और कभी-कभार तो चुनौतीपूर्ण विषयों पर भी महŸवपूर्ण कार्य देखने को मिल जाता है। 1998 में डाॅ. प्रतीक मिश्र ने एम. ए. उपाधि हेतु ‘बाल साहित्य समीक्षा’ पत्रिका पर एक लघु शोध प्रबंध तैयार कराया था। बाल साहित्य समीक्षा की दशा-दिशा को भी इस प्रबंध में सजगतापूर्वक उद्घाटित किया गया है।
एकदम शुरुआत में समीक्षा की विकास-परंपरा में ‘बाल सखा’ के संपादक लल्ली प्रसाद पांडेय की चर्चा की गई थी। संपादक यदि बाल साहित्य के सजग प्रहरी के रूप में समर्थ हो तो ‘बाल साहित्य समीक्षा’ का कार्य स्वाभाविक रूप से सरल हो जाएगा। उसे गति-प्रगति प्राप्त होगी। भले ही एक लंबे-बहुत लंबे अंतराल के बाद लल्ली प्रसाद पांडेय के बाद, ठीक वैसी ही तात्विक  दृष्टि वाले दो संपादकों के नाम उभरते हैं - डाॅ. हरिकृष्ण देवसरे और अनंत कुशवाहा। ‘पराग’ के संपादक के रूप में जहाँ देवसरे जी ने कभी रचनाओं के स्तर से कोई समझौता नहीं किया, वहीं ‘बालहंस’ के संपादक अनंत कुशवाहा ने बाल साहित्य समीक्षा को नई संभावनाएँ परोसीं। उन्होंने विविध राज्यों के बाल साहित्य पर विशेषांक प्रकाशित किए। बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं, अछूती विधाओं के बाल साहित्य पर विशेषांक निकालकर सृजनात्मक लेखन को बढ़ावा दिया। ‘बाल साहित्य के गौरव’ शृंखला प्रारंभ कर बाल-साहित्यकारों को प्रतिष्ठित किया। बाल साहित्य के स्वरूप और उसकी विकास यात्रा पर आलेख लिखवाए और प्रकाशित किए।
वर्ष 2000 में डाॅ. हरिकृष्ण देवसरे की पुस्तक ‘बाल साहित्य: मेरा चिंतन’ प्रकाशित हुई। बाल साहित्य के समीक्षात्मक पक्ष पर केंद्रित यह उनकी तीसरी पुस्तक थी और एक तरह से बहुप्रतीक्षित भी। 1979 में ‘बाल साहित्य रचना और समीक्षा’ के संपादन के बाद उनकी यह पुस्तक आई थी। इस पुस्तक में डाॅ. देवसरे के दीर्घकालिक अनुभव से जुड़े 48 आलेख हैं। यह पुस्तक डाॅ. देवसरे के 1962 से 2000 तक के प्रकाशित आलेखों में से चुने हुए आलेखों का संकलन है। यानि कि इस पुस्तक को पढ़ने का मतलब है कि लगभग चार दशकों के बाल साहित्यिक परिदृश्य को एक सजग चिंतक और समर्पित साहित्यकार की आँखों से देखना-समझना। हिंदी बाल साहित्य को परखने के लिए यह एक जरूरी पुस्तक है।
2000 में ही जयप्रकाश भारती की पुस्तक ‘कंप्यूटर क्रांति और बालक’ प्रकाषित हुई, इसमें विषेष रूप से तकनीकी युग के बालक को लेकर गंभीर चिंतन-मनन है। बाल साहित्य पर भी चर्चा है।
... और आइए अब उस प्रवृत्ति  की बात करें जिससे बाल साहित्य की वास्तविक समीक्षा को दिशा प्राप्त होती है। ‘बाल साहित्य समीक्षा’ एक लंबे समय तक ‘बाल साहित्य परिचय’ भर रही है। पुस्तक/बाल साहित्य का सामान्य परिचय, लेखक की प्रशंसाओं के बहुत जल्दी भरभरा कर टूट जाने वाले पुल, पारस्परिक गुणानुवाद अथवा ‘अहो रूपं-अहो ध्वनि’: बस, यही बाल साहित्य समीक्षा का स्वरूप था। एक तरह से ‘ठकुर सुहाती’ और ‘बाल साहित्य समीक्षा’ में ज्यादा अंतर न था। और/या फिर आँकड़ों को प्रस्तुत कर देना, बस यही समीक्षा थी और इसके नाम पर कुछ तथाकथित मठाधीशों ने अपने ‘कृपापात्रों’ को कर्णधार घोषित करना शुरू कर दिया था।
ये कर्णधार कुछ तथाकथित ‘बेतालों’ को अपनी पीठ पर लादे हुए खुद को ‘भारी-भरकम’ सिद्ध करने में जुट गए थे। लेकिन रेत के पुल दीर्घजीवी नहीं होते। बाल साहित्य आलोचना  को एक बहुत अच्छा नाम मिला। एक ऐसा कर्णधार मिला, जिसके पास समीक्षा की सही दृष्टि थी। ‘सघन-अध्ययन’ की क्षमता थी। ‘नीर-क्षीर’ का विवेक था और इसके साथ-साथ इतिहास की और सर्वेक्षण की भी अद्भुत शक्ति-सामथ्र्य थी। जी हाँ, प्रकाश मनु, बाल साहित्य के ऐसे क्षमतावान व्यक्ति जिनके  पास एक साथ इतनी ढेर सारी योग्यताएँ थीं, यद्यपि आगे चलकर वे आत्ममुग्धता  के शिकार होते गए. । ‘साहित्य अकादमी’ की पत्रिका ‘समकालीन भारतीय साहित्य’ (मई-जून 1996) के माध्यम से उन्होंने बाल साहित्य समीक्षा के क्षेत्र में जोरदार दस्तक दी थी । सघन अध्ययन-दृष्टि और निरपेक्ष मूल्यांकन के चलते इसमें प्रकाशित उनका आलेख ‘हिंदी की बाल कविता: मेरे कुछ नोट्स’ खासा चर्चित हुआ। तब से वे निरंतर बाल साहित्य समीक्षा की तपश्चर्या में लीन हैं। इस तपश्चर्या का सुफल बाल साहित्य को 2003 में ‘हिंदी बाल कविता का इतिहास’ ग्रंथ के रूप में मिल चुका है। 387 पृष्ठों में बाल-कविता की समीक्षात्मक विकास यात्रा प्रस्तुत करता यह ग्रंथ निःसंदेह  एकदम अलग और बेजोड़ है। यद्यपि क्षेत्र और पत्रिका विशेष  की सीमाओं और पूर्वाग्रहों  से निकल कर यदि मुक्त भाव से इसका लेखन किया गया होता तो बहुतेरे समर्पित दूरस्थ  बाल कवियों की दमदार बाल कविताएं भी प्रकाश  में आ पातीं।
वैसे भी नई सदी का प्रारंभ बाल साहित्य समीक्षा के लिए कई मायनों में सुखकर है। नए सरोकारों से जुड़े और स्वयं में पूर्णता लिए हुए गंभीर कार्य हुए और हो रहे हैं। बाल साहित्य की संभावनाशील विधा ‘किशोर साहित्य’ पर स्वतंत्र रूप से चिंतन की पहल, ‘बाल कविता का इतिहास’ लिख दिया जाना, स्वतंत्र रूप से ‘बाल साहित्य का इतिहास’ का लेखन, ‘बाल साहित्य के समीक्षा सिद्धांतों’ का निर्धारण और उस पर पी-एच्. डी. की उपाधि का मिलना: निःसंदेह बाल साहित्य समीक्षा के लिए अभूतपूर्व घटनाएँ हैं जो उसके उज्ज्वल भविष्य को रेखांकित करती हैं।
नई सदी में अब तक लगभग एक दर्जन ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं। 2001 में देवेंद्र कुमार ‘देवेश’ के संपादन में प्रकाशित ग्रंथ ‘किशोर साहित्य की संभावनाएँ’ किशोर साहित्य को उसकी पहचान दिलाने की दिशा में किया गया सार्थक प्रयत्न है। 1952 में ज्योत्स्ना द्विवेदी के बाद किशोर साहित्य की अवधारणा, उसकी विकास यात्रा और संभावनाओं को बड़ी ही शिद्दत से महसूस करता हुआ काम हुआ, जिसके लिए ‘देवेश’ को ‘किशोर साहित्य’ के आंदोलन-सूत्रधार के रूप में देखा जाएगा। पुस्तक  में चार खंड हैं - ‘आलोचकों की नजर’, ‘रचनाकारों की नजर’, ‘युवा आलोचक और रचनाकार’ तथा ‘संपादक की नजर’। किशोरों के लिए स्वतंत्र-लेखन की महŸाा उद्घाटित करती यह पुस्तक बाल साहित्यकारों को अपने रचनाकर्म को नवीन आयामों से संपृक्त करने की दृष्टि से विशेष रूप से पठनीय है।
‘हिंदी साहित्य के इतिहास’ ग्रंथों में बाल साहित्य की चर्चा न होने का दुःख तो समीक्षक प्रायः विभिन्न आलेखों में अभिव्यक्त करते रहे थे किंतु हम स्वयं क्यों न ‘बाल साहित्य का स्वतंत्र इतिहास’ तैयार करने का बीड़ा उठाएँ, इस दिशा में पहल की जय प्रकाश भारती और प्रकाश मनु ने।
2002 में जयप्रकाश भारती के संपादन में एक ग्रंथ छपा - ‘भारतीय बाल साहित्य का इतिहास’। इसमें 19 भारतीय भाषाओं के बाल साहित्य के विकास को उद्धृत करने का प्रयास किया गया है। एक तरह से इसे ‘इतिहास नहीं’ बल्कि ‘इतिहास की भूमिका’ कहना ज्यादा उचित होगा क्योंकि संकलित आलेख अपने क्षेत्र का पूर्ण प्रतिनिधित्व नहीं करते। स्वयं संपादक ने भी विनम्रतापूर्वक इस तथ्य को स्वीकार करते हुए संपादकीय में लिखा भी है - ‘यह बाल साहित्य का इतिहास नहीं, लेखों का संकलन है।’ तथापि ‘इतिहास लेखन की परंपरा’ और एक तरह से झंडा उठाने की तर्ज से यह काम उल्लेखनीय है और उसका महत्त्व  किसी भी दृष्टि से कमतर नहीं कहा जा सकता।
इतिहास की दिशा में निरंकार देव सेवक के अनन्तर गंभीर और  सही मायनों में समीक्षात्मक - संवेदनात्मक कार्य किया डाॅ. प्रकाश मनु ने। उनका ग्रन्थ  ‘हिंदी बाल कविता का इतिहास’ बाल साहित्य के अनेक निष्ठावान कवियों के रचनाकर्म को अत्यंत सम्मान के साथ  रेखांकित करता है। बच्चे और उसकी कविताओं की आकांक्षाओं और मुश्किलों को जिस संवेदना के साथ परोसता चलता है यह इतिहास, उससे यह ‘इतिहास’ एक तरह के बड़े ही कौतूहलपूर्ण उपन्यास का रूप अख्तियार कर लेता है जिसे पढ़ना आरंभ कर देने के बाद आप उसे छोड़ नहीं सकते। बाल कविता का अनौपचारिक परिचय प्रस्तुत करती इस  पुस्तक में यदि केवल सहज उपलब्ध रचनाओं के इतर बाल साहित्य के युगनायकों की लेखनी पर भी दृष्टि डाली गयी होती तो इसका अलग ही महत्व होता. उदाहरण के लिए बाल कविता का  जैसे एक  युग जीने वाले सीताराम गुप्त की केवल एक ही रचना का उल्लेख्य किया गया है. लेखक का तकिया कलाम कि काश! कवियों ने ऐसी रचनाएं और लिखी होतीं... अचंभित करता है. साहित्य सृजन और साहित्य निर्माण में अंतर् होता है. कह सकते हैं कि काश ! इतिहासकार ने ऐसी रचनाएं और पढ़ीं होतीं..
इस कालावधि में पांच शोध प्रबंध भी पुस्तक रूप में प्रकाशित हुए। खासकर 2002 में प्रकाशित डाॅ. ज्योति स्वरूप का शोध प्रबंध ‘हिंदी में बाल साहित्य’ जिसे 1971 में आगरा विश्वविद्यालय से पी-एच्. डी. उपाधि के योग्य समझा गया था। यानि की 30 वर्ष से भी अधिक समय के पश्चात् अलमारियों में बंद पड़े एक प्रबंध को पुस्तक के रूप में आने का सौभाग्य मिला। यह अनुभूति बाल साहित्य के लिए बड़ी सुखद  है। डाॅ. ज्योति स्वरूप की उक्त पुस्तक प्राचीन बाल साहित्य से लेकर आधुनिक बाल साहित्य तक की विकास-यात्रा का समीक्षात्मक अध्ययन है।
2002 में डाॅ. शेषपाल सिंह ‘शेष’ का शोध प्रबंध पुस्तक रूप में आया-‘साठोत्तरी हिंदी बाल साहित्य’। यह पुस्तक बाल साहित्य की प्रवृत्ति  विशेष का अध्ययन सुप्रसिद्ध बाल साहित्यकार डाॅ. रोहिताश्व अस्थाना के विशेष संदर्भ में प्रस्तुत करती है।
2005 में डाॅ. कामना सिंह का शोध प्रबंध ‘स्वातंत्र्रयोत्तर  हिंदी बाल साहित्य’ प्रकाशित हुआ। यह पुस्तक (शोध) बाल साहित्य में अनुसंधान की पारंपरिक प्रवृत्ति  से हटकर है। इसमें विभिन्न विधाओं में रचित बाल साहित्य का केवल प्रशंसात्मक अध्ययन न करते हुए शिल्प की दृष्टि से बाल साहित्यकारों की शोचनीय (बल्कि हास्यास्पद भी) भूलों को भी एक सच्चे समीक्षक की तरह उद्घाटित किया गया है।
बाल साहित्य के समीक्षा-सिद्धांतों की आवश्यकता को बहुत दिनों से उद्घाटित किया जा रहा था। 2006 में इन पंक्तियों के लेखक (डाॅ. नागेश  पांडेय ‘संजय’) को आगरा विश्वविद्यालय ने ‘बाल साहित्य के समीक्षा सिद्धांत’ विषय पर पी-एच्. डी. उपाधि प्रदान की। (यह शोधप्रबंध अद्यतन  रूप में ‘बाल साहित्य के प्रतिमान’ शीर्षक से 2009 में प्रकाशित हुआ, जिसके बारे में स्वयं क्या कहूँ ?)
राष्ट्रीय बाल भवन, नई दिल्ली की संगोठियों में पठित आलेखों की चार और पुस्तकें भी आ गई हैं - त्रिसंगम, त्रिसंध्या (2004), त्रिवर्णा, त्रिसाम्या (2006)।
2012 में डाॅ. स्वाति शर्मा का शोधप्रबंध ‘हिंदी बाल साहित्य डाॅ. सुरेंद्र विक्रम का योगदान’ एक बेहतर प्रस्तुति है। इसमें समीक्षा-सिद्धांतों का पूरी तरह अनुषीलन करते हुए डाॅ. सुरेंद्र के बाल साहित्य की परख की गई है।

बाल साहित्यकारों पर आलोचना-कृतियों का भी निरंतर प्रकाशन स्वयं में गौरवपूर्ण है। इस दिशा में डाॅ. शकुंतला कालरा को तो विशेष रूप से याद करना होगा, जिन्होंने ऐसी कृतियों के संपादन के नए मुहावरे गढ़े हैं। जयप्रकाश भारती पर केंद्रित उनकी दो पुस्तकें प्रकाश में आईं-‘बाल साहित्य का स्वरूप और रचना संसार’ (2002) तथा ‘बाल साहित्य के युग निर्माता: जय प्रकाश भारती’ (2006)। ये पुस्तकें आलोचना-कृतियों के संपादकों के लिए मानक-सदृश हैं जो यह बताती हैं कि केवल संकलन भर कर देना ही संपादन नहीं है अपितु संपादन स्वयं में कितना दुरूह और गुरुतर कार्य है।
‘बाल साहित्य का स्वरूप और रचना संसार’ पुस्तक की लगभग आधी सामग्री डाॅ. कालरा ने स्वयं तैयार की है। ऐसा पुस्तक को पूर्णता प्रदान करने के  उद्देश्य से किया गया है। डाॅ. कालरा चाहती तो उक्त सामग्री को पृथक से प्रकाशित करा सकती थीं और ऐसा करने से उनकी अपनी एक अलग पुस्तक तैयार हो जाती लेकिन तब उपर्युक्त पुस्तक को वह समग्रता कहाँ से प्राप्त होती ? हाँ, इस पुस्तक के शीर्षक में जयप्रकाश भारती के नाम का उल्लेख्य न होना प्रकाशक के व्यावसायिक चातुर्य की ओर इंगित करता है.
डाॅ. कालरा की दोनों संपादित पुस्तकें जयप्रकाश भारती की साहित्य-साधना के विविध पक्षों को पूरी ईमानदारी के साथ प्रस्तुत करती हैं।
कुछ ऐसी ही विशेषता से युक्त एक ग्रंथ है - ‘यहाँ सुमन बिखेर दो’ (2004) यह बाल साहित्य के कीर्तिस्तंभ चंद्रपाल सिंह यादव ‘मयंक’ के व्यक्तित्व-कृतित्व पर केंद्रित है। डाॅ. राजकिशोर सिंह और डाॅ. उषा यादव के संपादन में प्रकाशित उक्त गं्रथ ‘मयंक’ जी की साहित्य-साधना को एक सधी हुई रूपरेखा के अंतर्गत परोसने में समर्थ है।
बाल साहित्यकारों पर केंद्रित अन्य पुस्तकों में ‘उद्भ्रांत  का बाल साहित्य: सृजन और मूल्यांकन’ (सं. जय प्रकाश भारती, डाॅ. राष्ट्रबंधु) 2004, डाॅ. शोभनाथ ‘लाल’: व्यक्तित्व और कृतित्व (सं. डाॅ. राष्ट्रबंधु, राजेंद्र दुबे) 2007, डाॅ. राष्ट्रबंधु का बाल साहित्य एक मूल्यांकन (सं. डाॅ. शकुंतला कालरा) 2010, डाॅ. दर्षन सिंह आशट और उनका बाल साहित्य (सं. डाॅ. शकुंतला कालरा) 2012, डाॅ. दिविक रमेश  और उनका बाल साहित्य  (सं. डाॅ. शकुंतला कालरा) 2012 में प्रकाशित हुई हैं।
2007 में डाॅ. हरिकृष्ण देवसरे की एक और महत्वपूर्ण कृति प्रकाश में आई-बाल साहित्य के सरोकार। बाल साहित्य से संपृक्त बिंदुओं को सहजता से उद्घाटित करती यह कृति बालक से जुड़े हर व्यक्ति के लिए पठनीय है।
2008 में प्रकाशित डाॅ. त्रिभुवन नाथ षुक्ल एवं डाॅ. राष्ट्रबंधु की कृति ‘भारतीय बाल साहित्य की भूमिका’ नाम बड़े-दर्शन  छोटे जैसी है। बाल साहित्य के नाम पर गैर बाल साहित्य रचनाओं के उदाहरण भ्रम उत्पन्न करते हैं।

विनोद चंद्र पांडेय जी एक लंबे समय से बाल काव्य की साधना में निरत हैं। उनके पास पुरानी बाल पत्रिकाओं का विपुल संग्रह है। ‘हिंदी बाल काव्य के विविध पक्ष’ कृति में प्रकाषित विविध विषयक बाल कविताओं का विवरणात्मक अध्ययन खासकर षोधकर्ताओं की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है।
हिंदी बाल साहित्य विमर्श  डाॅ. शकुंतला कालरा की अपने विषय की पहली प्रस्तुति है। इसमें 30  बाल साहित्य लेखकों  के साक्षात्कार के बहाने बाल साहित्य को अलग-अलग दृष्टिकोण से देखने-परखने की सफल पहल की गई है।  डाॅ. शकुंतला कालरा की  बाल साहित्य आलोचना पर केंद्रित पुस्तके निरंतर प्रकाशित हो रही हैं। हिंदी बाल साहित्य विचार और चिंतन (2014) पुस्तक में जहाँ उनके गवेषणात्मक आलेख हैं वहीँ उनका ग्रन्थ हिंदी बाल साहित्य विधा विवेचन एक तरह से बाल साहित्य का सम्पादित इतिहास है, जिसमे 669 पृष्ठों में बाल साहित्य की प्रगति की सविस्तार  चर्चा हुई है.
हिंदी बाल साहित्य सम्यग्दृष्टि डाॅ. शेषपाल सिंह ‘शेष’ की छोटी सी पुस्तिका है जिसमें बाल साहित्य पर कुछ अच्छे और सामयिक लेख भी संकलित हैं।

पिछले दिनों प्रकाशित बाल साहित्य और बाल विमर्श (डॉ. उषा यादव), बच्चे, बचपन और बाल साहित्य (अखिलेश श्रीवास्तव चमन), आ से आलेख (सम्पादक धन सिंह मेहता), बाल शिक्षा और बाल साहित्य,2013  (विनोद चंद्र पांडेय),  हिंदी बाल साहित्य के शिखर व्यक्तित्व, 2013 (डॉ. प्रकाश मनु), हिंदी बाल साहित्य नई चुनौतियाँ और संभावनाएं,2014  (डॉ. प्रकाश मनु), हिंदी बाल साहित्य का विवेचनात्मक अध्ययन,2015 (मस्तराम कपूर उर्मिल),  हिंदी बाल साहित्य कुछ पड़ाव, 2015 (डॉ. दिविक रमेश)हिंदी बाल साहित्य का सैद्धांतिक विवेचन, 2016 (परशुराम शुक्ल), हिंदी बाल साहित्य  जिज्ञासा और समाधान :2017 (शकुंतला कालरा), स्वातंत्र्योत्तर बाल कविता का अनुशीलन, 2016 (डॉ. सुधा गुप्ता)  आदि ऐसी कृतियां हैं जिनका मूल्यांकन होना चाहिए.
बाल साहित्य पर अनुसंधान और संगोष्ठियों की धारा भी निरंतर वेगमयी है। 2012 और 2017  में इन पंक्तियों के लेखक (डाॅ. नागेश  पांडेय ‘संजय’) की पुस्तक ‘बाल साहित्य: सृजन और समीक्षा’ और 'बाल साहित्य का शंखनाद ' प्रकाशित  हुई है। इसमें विविध विषयक आलेख  हैं।
2014 में आठ खंडों में आए भारतीय बाल साहित्य कोश (सम्पादक डॉ.सुरेश गौतम, डॉ. वीणा गौतम) में बाल साहित्य पर समग्रता से जानकारी मिल जाती है. इस कोश  की व्यापक चर्चा होनी चाहिए जिससे बाल साहित्य की प्रगति से अनभिज्ञ फ़तवाधारी लोगों की आँखें खुल सकें.


        साहित्य अकादेमी से 2016  में प्रकाशित और डॉ. हरिकृष्ण देवसरे द्वारा सम्पादित ग्रंथ 'भारतीय बाल साहित्य'  निसंदेह  गौरव का विषय है जिसमें 618  पृष्ठों में अधिकारी विद्वानों ने बाल साहित्य का इतिहास प्रस्तुत किया है. ग्रन्थ के फ्लेप पर लिखा है- इस पुस्तक में  भारत की 24 भाषाओँ के बाल साहित्य का विश्लेषण  किया गया है. भारतीय बाल साहित्य के इतिहास के साथ साथ उस पर समालोचक  दृष्टि भी डाली गयी है.
हाल ही में डाॅ. प्रकाश मनु  लिखित ‘ हिंदी बाल साहित्य का  इतिहास’ प्रकाशित हुआ है. लेखक ने बहुत परिश्रम किया है. इस बहाने यत्र तत्र बिखरी जानकारियां एक साथ  आ गयीं हैं. पढ़कर गर्व होता है कि कितना कुछ बाल साहित्य  लिखा गया है.556 पृष्ठों का यह  इतिहास अत्यंत अव्यवस्थित है. कदाचित रचनाकारों के जन्म क्रम  को ही इतिहास का क्रम मान लिया। किसी की भी चर्चा कहीं पर कर दी गयी है. नीव के पत्थरों के अवदान  की सराहना के बजाय दमकते शिखर कलशों का आराधन  हुआ है.    मनमाने ढंग से महिमामंडन और महिमा खंडन किया गया है. काल विभाजन को लेकर काश ! उन्होंने  पूर्व आलोचकों के निर्धारणों का आश्रय लिया होता और पूर्व में प्रकाशित इतिहास आलेखों पर भी दृष्टि डाली होती तो 1950 से लिख-छप रहे लेखकों को सन 1980 के विकास  युग में और 1980 के बाद छपे लेखक को 1950 के गौरव युग में दिखाने की भूल न करते. .  बाल साहित्य में पहले लिखे गए इतिहासों और आलोचनाकर्म की चर्चा ही नहीं की गयी क्योंकि लेखक को स्वयं को पहला इतिहास लेखक जो घोषित करना था.  यहाँ तक कि भारतीय भाषाओँ की श्रेष्ठ 131 बाल कहानियों के चर्चित संग्रह श्रेष्ठ बाल कहानियां का भी इसमें जिक्र नहीं है.
कदाचित यह पहला इतिहास है जिसमें किसी  लेखक ने स्वयं अपनी रचनाओं पर जमकर प्रशंसात्मक  टिप्पणी लिखने की परम्परा विकसित की है. लेखक ने निसंकोच भाव से बार बार अपना गुणगान किया है और बाल साहित्य के मूर्धन्य लेखकों को आइना दिखाया है कि काश! उन्होंने ऐसा और लिखा होता.

बहरहाल, बाल साहित्य आलोचना का काम जारी है.
नेशनल बुक ट्रस्ट और साहित्य अकादेमी  के अतिरिक्त अन्य अनेक संस्थाएँ और उत्साही लोग ‘बाल साहित्य’ पर विमर्श के आयोजन करते रहते हैं।
 इंदौर में ‘बाल साहित्य शोध संस्थान’ स्थापित किया गया है। उससे भी बड़ी अपेक्षाएँ हैं। ‘विश्व हिंदी सम्मेलन’ में भी अब बाल साहित्य पर सत्र रखे जाने लगे हैं, यह बहुत बड़ी बात है।
डाॅ. भैरूंलाल गर्ग प्रतिवर्ष भीलवाड़ा में ‘बाल साहित्य संगोष्ठी’ आयोजित कर रहे हैं।
‘बाल वाटिका’ पत्रिका के माध्यम से वे ‘बाल पुस्तकों की समीक्षा’ लेखन को भी प्रोत्साहित करने के लिए साधुवाद के पात्र हैं। इधर बाल वाटिका पूर्णतः बाल साहित्य की सचेतक पत्रिका बन गई है। प्रसंगवष यहां ‘शोध दिषा’ पत्रिका की चर्चा करना भी आवष्यक होगा, जहां प्रायः बाल साहित्य की समीक्षा का वास्तविक रूप उदृघाटित करते अप्रतिम आलेख प्रकाषित होते रहते हैं। इसी क्रम में ‘भाषा’ और ‘आजकल’ के अवदान भी स्तुत्य हैं। कथा का बाल साहित्य विशेषांक भी उल्लेखनीय है जो बाल साहित्य और आलोचना पुस्तक के रूप में अनुज कुमार और रेखा पांडेय के सम्पादन में 2016  में प्रकाशित हुआ  है.
कुल मिलाकर बाल साहित्य समीक्षा की प्रगति संतोषजनक और अनंत संभावनाओं से परिपूर्ण है। समुचित परिवेश और पर्याप्त प्रोत्साहन न मिलने के बाद भी यदि आज बाल साहित्य समीक्षा ने अपना स्वतंत्र और सम्मानजनक अस्तित्व बनाया है तो वह बहुत बड़ी बात है। बाल साहित्य समीक्षापरक 100 से भी अधिक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं। स्नातकोत्तर  और पी-एच्. डी. उपाधि हेतु 200  से भी अधिक शोध-प्रबंध लिखे जा चुके हैं। लगभग डेढ़ हजार आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। शासकीय और अशासकीय स्तर पर लगातार संगोष्ठियाँ आयोजित हो रही हैं। यह सब किसी के लिए भी चमत्कृत होने के लिए काफी है।
यों तो बाल साहित्य के वास्तविक समीक्षक बच्चे होते हैं किंतु बालकों तक बाल-साहित्य पहुँच सके, उसका महत्त्व  उद्घाटित हो सके, एतदर्थ बाल साहित्य समीक्षा नितांत अपेक्षित है।
आवश्यकता है, उन उत्साही कर्णधारों की जो बाल साहित्य समीक्षा की नैया के सच्चे खिवैया बन सकें।

                                                                                                                      -डा. नागेश  पांडेय ’संजय‘
क्रमश:

(यह आलेख  लेखक की पुस्तक 'बाल साहित्य के प्रतिमान' में प्रकाशित आलेख का अद्यतन रूप है.) 

रविवार, 6 मई 2018

सदाबहार फूलों-सी बाल कहानियां/ डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

(बाल वाटिका में प्रकाशित बाल कहानियों  पर आधारित आलेख )

बाल वाटिका के बाइसवें वर्ष के सारे अंक मेरे सामने हैं। इनमें प्रकाशित कुल सतहत्तर कहानियों को एक बार फिर से पढ़ना मेरे लिए सुखकर तो है ही, उतना ही विस्मयकारी भी है। कितने रंग? कितने आस्वाद। कितनी छवियां और मनोरम आभाओं के तो कहने ही क्या! रसलोभी पाठकों के लिए तो यहां अवसर ही अवसर है। उनका मन तो महकेगा ही, आत्मा भी स्निग्ध हो उठेगी। अच्छी बाल कहानियों की यही विषेषता भी है कि वे पाठक को भीतर तक छू लें और सफल संपादक की यही पहचान कि वह पाठकों की भिन्न रुचियों को समझते हुए कहानियों के अनेकवर्णी रूपों को समान महत्त्व दे। कभी बाल साहित्य के क्षेत्र में पारंपरिक और आधुनिक धाराओं  की कहानियों को लेकर खूब वाक्युद्ध चलते रहे और इस द्वंद्व के कारण अनेक समर्थकगण वस्तुतः स्वयं को ही छलते रहे। क्योंकि बाल पाठक तो आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से सर्वथा पृथक रहते हुए बस...अपने आनंद के लिए कहानियां पढ़ता रहा। चहकता रहा। ...और उनको महत्त्व देने वाली पत्र-पत्रिकाएं भी पूरी दमक के साथ प्रकाषित होती रहीं। कहना गलत न होगा कि आज का बालपाठक लेखक से कहीं ज्यादा समझदार है। कहानी, बस... कहानी है, यह वह जानता है। कहानी कहां तक जीवन का सच हो सकती है, यह भी उसे पता है। कहानी से कितना उसे ग्रहण करना है? इसका भी उसे बखूबी बोध है। बच्चों का बच्चा समझनेवाले दरअसल खुद बचकानेपन के षिकार है। समय बदलता है तो स्थितियां बदलती हैं। परिस्थितियां बदलती हैं। उसी के साथ कहानी भी बदलती रहती है। समय सापेक्ष रचनाओं का सृजन लेखकीय धर्म है लेकिन फिर भी यह याद रखना चाहिए कि कहानी के असली समीक्षक बच्चे हैं। वे कहानी के निहितार्थों को अपने अनुसार ढाल ही लेते हैं। इसलिए यह मगजमारी कि कहानियों का स्वरूप क्या हो? उनकी विषयवस्तु क्या हो? प्रकृति की दृष्टि से कहानियों के औचित्य को हम अपने बौद्धिक अनुभव के आधार पर तय करने की बजाय बालपाठक पर छोड़ दें तो ज्यादा बेहतर होगा। बालकों को कहानियों के विविध रूप सुलभ होंगे तो वे जीवन और परिवेष की विविध छटाओं का आनंद ले सकेंगे। अच्छी कहानियां वही हैं जो अधिसंख्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करें। बालक की सोच में भी व्यापकता तभी आ सकेगी और उसके अनुभव का फलक भी विस्तार पा सकेगा। यह सही है कि आज विज्ञान का युग है लेकिन क्या तब हम साहित्य को बस...कंप्यूटर और तकनीकी के संदर्भों से ही भर दे? ग्लोबलाइजेशन के इस युग में क्या संवेदनाओं से अनुप्राणित प्रसंगों का कोई महत्त्व नहीं रह जाता? हम उस देष के निवासी है जहां आज भी जाने बच्चे कंप्यूटर की पहुंच से कोसों दूर है। गांवों में घंटों बिजली नहीं आती। बच्चों ने षहर नहीं देखा। अभिभावकों के दैन्य और संघर्ष में वे बराबर के सहभागी है तो क्या साहित्य की आवष्यकता ऐसे बच्चों के लिए नहीं है? ऐसे में साहित्य में बस मार्डन एप्रोच की वकालत करना वस्तुतः विद्ववता नहीं, बड़बोलापन है। हर परिवेष के बच्चों को ध्यान रखते हुए लिखना होगा। पारंपरिक विषयों को भी एक सिरे से खारिज कर देने की प्रवृत्ति कतई उचित नहीं है।
पिछले दिनों स्वयं को अत्यंत आधुनिक समझ का समझने वाले एक लेखक ने साहित्य में नएपन की वकालत करते हुए लिखा कि उसने दसियों वर्षों से कोई गुब्बारेवाला नहीं देखा। उसके इर्द-गिर्द मंडराते बच्चे नहीं देखे। फिर भला आज ऐसी रचनाओं की क्या दरकार? और अगर ऐसी रचनाएं पूर्व में लिखी गईं हैं तो उनको भी अब सर माथे लेने की क्या जरूरत है। यह ठीक है कि चकाचौंध  के शिकार उस लेखक की अनेक सीमाएं हो सकती हैं लेकिन प्रतिनिधि साहित्य पर तो हर  बच्चे का हक है। साहित्य और पाठ्यक्रम के लिए साहित्य में अंतर भी है, अस्तु, हर जगह शैक्षिक रूपरेखा का उदाहरण देते हुए साहित्य की प्रासंगिकता का आकलन करना भी अव्यावहारिक ही है। मनोरंजनधर्मी साहित्य की अपनी दरकार है और उसे नकारा नहीं जा सकता।
आज भी विकास की दौड़ में भागते देश  के अनेक क्षेत्र अभी भी शैशवावस्था में हैं। वहां आज भी गुब्बारेवाले हैं। मिट्टी के खिलौनेवाले हैं। और यही नहीं...टूटी साइकिल पर अपने बच्चे को बिठाकर गांव से षहर मेले में सींको से बने तोता, सांप, पपीहरी, झुनझुना जैसे खिलौने बेचने की ललक लिए नन्हीं बच्ची कजली के ठेठ ग्रामीण बाबूजी भी है।
क्या नये जमाने में साहित्य में ये परिदृश्य  अब गए जमाने की बातें हैं? क्या साहित्य में यह गंवईपन नहीं होना चाहिए? क्या देष के अधिसंख्य वर्ग के बच्चों की सहज अनुभूतियों को प्रतिबिंबित करता साहित्य नहीं रचा जाना चाहिए?
डा. भैरूंलाल गर्ग की सराहना करनी होगी कि बाल वाटिका के बहाने बालपाठकों के भिन्न परिवेषों और भिन्न रुचियों का  पूरा ध्यान रखते हुए वे प्रतिनिधि कहानियों को प्राथमिकता देते हैं।
जैसा कि मैंने प्रारंभ में ही लिखा था कि बारह अंकों में कुल सतहत्तर कहानियों के फूलों से मह-मह महकती उनकी बाल वाटिका में विचरना किसी के लिए भी सौभाग्य हो सकता है।
  बाल वाटिका में प्रकाशित कहानियां कल, आज और कल की कहानियां हैं। इन कहानियों में गांव की माटी हैं, शहरों की विकासोन्मुखता है। महानगर की अट्टालिकाएं हैं और आनेवाले कल का आभासीय प्रतिबिंब भी। और यही नहीं, विज्ञान लेखन के ऐसे अनूठे प्रयोग भी उपलब्ध रहते हैं जो स्वयं को बड़ी मानने वाली पत्रिकाओं में भी दुर्लभ रहते हैं।
यह भी बड़ी बात है कि बाल वाटिका को हिंदी के स्वनामधन्य बालकथाकारों का सहज सहयोग प्राप्त है। हिंदी के मूर्धन्य बालकथाकारों की अच्छी कहानियों के प्रति भी संपादक का श्रद्धाभाव पाठको के लिए सुखद है
कई लेखक तो समर्पित भाव से बाल वाटिका के लिए लिख रहे हैं। मसलन कुल सतहत्तर कहानियों में लगभग आधी कहानियां तो बस प्रकाश मनु, सुनीता, राजीव सक्सेना, देवेंद्र कुमार, विनायक, मंजूरानी जैन, साजिद खान और अरशद खान आदि आठ लेखकों की ही हैं।
मोहम्मद साजिद खान के पास गजब की शिल्प सामथ्र्य है। ग्राम्य परिवेष की गहरी समझ उन्हें अन्य कथाकारों से अलग करती है। अक्टूबर 2017 में प्रकाषित उनकी मार्मिक कहानी कजली मुझे बाल वाटिका में प्रकाषित ढेरों कहानियों में अनूठी लगी। गांव के गंवईपन को जिस अनोखे अंदाज में उन्होने अभिव्यक्ति दी है और वह भी बहुत ही कम षब्दों में... अपनी बात कहने का उनका यह हुनर जैसे उनको भाषाई जादूगर सिद्ध करता है। यह उन अन्य कथाकारों के लिए एक दिशाबोधक संकेत भी है जो बच्चों के लिए लंबी-लंबी कहानी लिखते समय यह भूल जाते हैं कि बच्चे का पास न तो इतना समय है और न ही धैर्य। बच्चे क्या, बड़े भी ऐसी कहानियों को देखकर प्रायः पन्ने ही पलटते देखे गए हैं। 
इस कहानी में आधुनिकता के नाम पर लोकशैलियों पर कुठाराघात को लेकर करारा व्यंग्य है। गांव में सेठे से निकलनेवाले सीकों से बने पारंपरिक खिलौनों को षहर के मेले बेचने की असफल कवायद के बहाने एक-एक कर बेबसी की खुलती पर्तें इतनी मार्मिक है कि मन भीग जाता है। चाइना माल के आगे भला उसके इन सीेकों के खिलौनों की क्या बिसात लेकिन खाली हाथ हताष लौटने और इसलिए साथ गई कजली को कुछ न दिला पाने से मन पर चढ़े भारी बोझ का वर्णन इतना सजीव है कि लगता ही नहीं कि हम  कहानी पढ़ रहे हैं या कोई फिल्म सामने चल रही है।
उनकी अन्य प्रकाशित कहानियों में आग और हरियाली (मार्च 2017), ढाबेवाला महेश  (जुलाई 2017), लेटर बाक्स ने पढ़ी चिट्ठियां (दिसंबर 2017), पेड़ों का वसंतोत्सव (फरवरी 2018) भी एक से बढ़कर एक हैं।
राजीव सक्सेना विज्ञान के समर्थ लेखक है। इन अंकों में उनकी सर्वाधिक सात कहानियां प्रकाषित हुई हैं। चाकलेट के चोर (मई 2017) एक अच्छी विज्ञान गल्प तो है ही, पर्यावरण के प्रति सजगता उत्पन्न करने की दृष्टि से भी उल्लेखनीय हैं।
सुपर हीरो (दिसंबर 2017),बिजूका (सितंबर 2017), ड्रीम टेबलेट (जनवरी 2018),स्टोरी मशीन (जून 2017), पापा प्लांट (जुलाई 2017), वर्चुअल गेम (नवंबर 2017)  में भी कल्पना की विविध छटाएं हैं जो विज्ञान से जुड़कर बच्चों को समय से बहुत आगे ले जाने का दम खम रखती हैं।
डा. प्रकाश  मनु बाल साहित्य के तपस्वी मनस्वी हैं। उनकी कहानियोें को पढ़ना जैसे बाल साहित्य के मानकों से अवगत होने जैसा है। कभी किस्सागोई तो कभी संस्मरण शैली में रची उनकी कहानियों में कथारस छलकता चलता है। और उनके छींटे बहुत देर तक अपनी गंध बनाए रहते हैं। उनकी कहानियों में सब्जीपुर के चार मजेदार किस्से (अप्रैल 2017),मन्ना रे मत तोड़ो फूल (जून 2017), अमर गाथा जसोदा बाबू की (सितंबर 2017), गोपी की फिरोजी टोपी (नवंबर 2017), शहीद हरनाम गली (जनवरी 2018) भले ही आकार में लंबी हैं लेकिन एक बार पढ़ना आरंभ कर आप रुक नहीं सकते। कहन की अनूठी शैली के चलते उनकी कहानियां चित्रकथा जैसा आनंद देती चलती हैं।
सुनीता जी की संस्मरणत्मक कहानी ऐसी खेली होली (मार्च 2017) खासी दिलचस्प है जिसमें होली के बहाने आत्मीयता के अनेक रंग मौजूद हैं। किशोरों के लिए उनकी कहानी लापलांग की पुकार (फरवरी 2018) में लोककथा का आस्वाद है। लापलांग की मृत्यु और शि कारियों के पश्चाताप  की इस कहानी का अंत अत्यंत कारुणिक है।
देवेंद्र कुमार बाल साहित्य के पुराने साधक-आराधक हैं। आओ नाष्ता करें (जुलाई 2017) उनकी विशिष्ट कहानी है जो बुजुर्गों के प्रति बच्चों के रागात्मक पक्षों की सुंदर अभिव्यक्ति करती है।  बप्पा बाहर गए हैं (अप्रैल 2017), मिठास (नवंबर 2017),कभी नहीं (फरवरी 2018) भी उनकी ऐसी कहानियां हैं जिनमें बच्चा अपनी परिपक्व समझ के साथ मौजूद है।
विनायक की कहानी चुटकी भर फागुन (मार्च 2017) का षीर्षक जितना रोचक है, उसकी भाषा बच्चों की दृष्टि से उतनी ही कठिन। जून 2017 में प्रकाषित उनकी कहानी तुम यों नहीं जा सकती में पारस्परिक मित्रता जैसे सरल विषय को कथानक बनाया गया है किंतु जलप्लावित, अस्फुट, अवतरित, उदरपूर्ति जैसे कठिन शब्दों ने इसे भी दुरूह बना दिया है। पाठ्यक्रम की दृष्टि से ही ऐसी कहानियां उपयोगी हो सकती हैं। पुट्टन की पिटाई और नजारा (सितंबर 2017), मोहनी अम्मा (नवंबर 2017), षैतान सारे जहान के (फरवरी 2018) उनकी रोचक और मार्मिक कहानियां हैं।
मंजूरानी जैन को सृजन के गुर जैसे विरासत में प्राप्त हुए हैं। वे पराग के आदि संपादक आनंदप्रकाश  जैन की बेटी हैं। अगस्त 2017 में आई उनकी कहानी गुड्डे का ब्याह उनकी मौलिक कल्पना का चमत्कार है। पारस्परिक सौहार्द की दृष्टि से भी यह कहानी लाख टके की है। बच्चों का गंगा-जमुनी तहजीब सिखाती यह कहानी अच्छी बालिका कथाओं के अभाव की पूर्ति भी करती है। मंजू जी जैसे संस्कृति के विरल पक्षों को कहानी में पिरोने में सिद्धहस्त हैं। बड़े दिन का तोहफा (दिसंबर 2017) भी उनकी बेजोड़ रचना है जिसमें संवादों के माध्यम से कथा का सहज विस्तार देखते ही बनता है और इसमे समाया उत्सवी आमोद भी देखते ही बनता है। माली काका (अप्रैल 2017) भी उनकी एक अच्छी कहानियों में शुमार की जा सकती है।
  मोहम्मद अरशद खान कुशल कथाकार हैं। कहानी में जैसे जान लगा देते हैं। डूब कर लिखते हैं। उनकी कहानियां आदमखोर (अगस्त 2017), बिस्किटवाली बुआ (सितंबर 2017), अब तुम्हारे हवाले (नवंबर 2017) मुकम्मल कहानियां हैं। बिस्किटवाली बुआ में निहित ग्राम्य संवेदना और खासकर उसका तानाबाना यह भी दर्षाता है कि एक अच्छी कहानी कैसी होनी चाहिए। स्थितियों-परिस्थितियों से भरा पूरा पारिवारिक परिवेष इस कहानी के माध्यम से जीवंत हो उठा है। 
कहानी को बुनने में माहिर ओमप्रकाष कष्यप कम लेकिन गजब का लिखते हैं। अक्टूबर 2017 में प्रकाशित उनकी कहानी सबसे अच्छा सबसे अलग कुछ अलग अंदाज में षैक्षिक परिवेष को समेटने में सफल हुई है। कहानी के बहाने निबंध की सृजन यात्रा का उनका प्रयोग भी अलग ही है।
पुराने कथाकार श्रीनाथ सिंह की कहानियों का आस्वाद बच्चों का सहज प्रमुदित तो करेगा ही, हतप्रभ भी करेगा कि गए जमाने में भी कितना कुछ उनके नए जमाने जैसा ही था। तुम बड़े होकर क्या बनोगे उनकी शिक्षाप्रद कहानी है जो परिश्रम के महत्त्व को सहज प्रतिपादित करती है। अक्टूबर 2017 में छपी उनकी कहानी चमेली अपने घर कैसे पहुंची दादी-नानी की षैली को याद दिलाती है जिसमें मनगढ़ंत किस्सों के माध्यम से बच्चों को कल्पना के पंखों से उड़ान भरवाने की कोषिष छिपी होती थी।
बाल साहित्य में प्रारंभिक आलोचना को दिशा  देने वाले मनोहर वर्मा की किषोर कहानी ठंडे पानी की बिक्री (मई 2017) का संदेष कोई काम छोटा नहीं होता बड़े ही रोचक घटनाक्रम के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
पराग के संपादक मंडल के अनुभवी सदस्य महावीर प्रसाद जैन की कहानियों के क्या कहने। अपराधी मैं हूं (मई 2017),वापसी (सितंबर 2017), मुसीबत के साथी (जुलाई 2017) एक से बढ़कर एक हैं। वापसी में जहां कामचोरों के लिए सबक है, वहीं मुसीबत के साथी में पारस्परिक सहयोग का बखान है।
देंवेंद्र मेवाड़ी विज्ञान के अग्रणी लेखक हैं। कहानी कहने की उनकी कला प्रषंस्य है। अप्रैल 2017 में आई उनकी कथा कबूतर कभी कहानी,कभी संस्मरण तो कभी निबंध जैसी लगती है लेकिन अंत तक पहुंचते पहुंचते बड़ी ही साफगोई से प्रकृति के सहचरों के प्रति हमारे संवेदनात्मक पहलुओं का दर्षन एकदम षीसे के मानिंद साफ कर जाती है।
बालमन की चितेरी लेखिका रेनू चैहान की पशु पक्षी कथा घमंडी पेड़ (नवंबर 2017) में वन्य जीवन की बाँकी झांकी देखने को मिली। पेड़ का मानवीकरण देखते ही बनता है। कहानी के छोटे-छोटे वाक्य पाठकों के औत्सुक्यवर्धन में सहायक हैं।
गोविंद शर्मा कल्पना और शैली दोनों ही दृष्टि से समर्थ हैं। कहानी का उनका अंदाजे बयाँ अलग ही होता है। मजे की बात यह कि वे शैली में व्यंग्य के पुट का भी अद्भुत समन्वय स्थापित करते हैं और यही कारण है कि पाठक हंसते-चहकते जाने-अनजाने में उनकी कहानी में छिपे सन्देश को भी ग्रहण कर लेता है। ऐसे ही नवम्बर 2017 में प्रकाशित कहानी नहीं छोड़ेंगे में स्वच्छता का लक्ष्य साधने में उनको सहज सफलता मिली है।
शिवचरण सिरोहा बाल साहित्य में तेजी से स्थापित हुए हैं। उनकी कहानी छोटा सांताक्लाज (दिसंबर 2017) अत्यंत भावप्रवण कहानी है। एक संवेदनशील बच्चा किस तरह परिवार में अपने दायित्वबोध को अनुभव करते हुए कर्तव्य निभा सकटा है, यही इस कथा का प्रतिपाद्य है। नए कोट को लेकर पिता की दमित आकांक्षा और फिर बेटे की ओर से अपने प्रयासों से उनके लिए वही उपहार देने का प्रसंग कितना मार्मिक है कि यह कारुणिक कथा आँखे भिगो देती है। भौतिकवाद की आधुनिक सभ्यता, जिसमे स्वहित अधिक महत्वपूर्ण है, में ऐसे भावुक बच्चों की उपस्थिति कितनी गौरवपूर्ण है। उन्हें सैल्यूट करने को जी चाहता है।
विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी ने लो हो गई मेरी शादी (दिसंबर 2017) कहानी के बहाने साक्षात्कार शैली में बच्चों को वैज्ञानिक तथ्यों से जोड़ने की सफल कोशिश  की है।यह प्रयोग यह भी सिद्ध करता है कि विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में कहानिया किस कदर अपनी भूमिका निभा सकती हैं।
लोकबोलियों पर अपने गम्भीर शोधकार्य के लिए चर्चित सुधा गुप्ता की कहानी  एक थी मीशा (फरवरी 2018) अंक की उपलब्धि है। प्रिय शिक्षिका होने के नाते वे बच्चों के अधिक निकट रही हैं, फलस्वरूप संवाद शैली में दादी-पोती की अंतरंगता जिस नटखट अंदाज में इस कहानी में व्यक्त हुई है, उसे देखकर सुखद विस्मय होता है- वह खिलखिलाकर हंसने लगी और हंसती रही, हंसती ही रही।
मैंने कहा अरे, अब इतना क्यों हंस रही हो ?
मीशा दोनों नन्ही हथेली से ताली बजाकर बोली- क्या बताऊँ? मेरी तो हंसी ही नहीं रुक रही।
अन्य रोचक और उल्लेखनीय कहानियों में  ब्रजेष कृष्ण की साहसिक कथा शंभू और कुक्कू (फरवरी 2018), निर्मला सिंह की बालिका कथा मयूरी (दिसंबर 2017), शील कौषिक की श्रेया और आन्या (जनवरी 2018),स्ंजीव जायसवाल की कहानी देश  के बेटे (जनवरी 2018),पवित्रा अग्रवाल की मिर्ची के पकौड़े (फरवरी 2018), सुकीर्ति भटनागर की कहानियां पोहे वाली दादी (अप्रैल 2017), मन की बात (अगस्त 2017), सूर्यनाथ सिंह धमकीबाज को धमकी (अगस्त 2017), रष्मि गौड़ की बिग ब्रदर (अप्रैल 2017), राजा चौरसिया वाह मुनमुन बेटी (अप्रैल 2017), डा. फकीर चंद शुक्ल की झूठ के पांव (सितम्बर 2017), लक्ष्मी खन्ना सुमन की जंगल में परियां (सितंबर 2017) भी उल्लेखनीय हैं। विस्तार भय से भले ही उनकी चर्चा यहां पर संभव न हो सकी हो लेकिन उनका सार्वकालिक महत्त्व नकारा नहीं जा सकता।
सदाबहार फूलों सी ये कहानियां निसंदेह बाल साहित्य की अनुपम निधि हैं। इनकी महक देर तक और दूर तक अपनी पहुंच बरकरार रखने में समर्थ है। इन फूलों को बाल वाटिका में पुष्पित-पल्लवित-संरक्षित करने वाले सजग माली डा. भैरूंलाल गर्ग को जितनी भी बधाई दी जाए, कम है।
- डा. नागेश पांडेय 'संजय'



















(बाल वाटिका, मार्च 2018 में प्रकाशित आलेख)

बुधवार, 2 मई 2018

बाल कविता का निष्पक्ष इतिहास


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बाल कविता का निष्पक्ष इतिहास


निरंकार देव सेवक लिखित  बाल गीत साहित्य इतिहास और समीक्षा अकेला ऐसा ग्रंथ  है जो तीन बार अलग-अलग कलेवर में संशोधित-सम्पादित होकर छपा।
1966 में सर्वप्रथम इसका प्रकाशन किताब महल, इलाहबाद से हुआ था। इसके पश्चात ही बाल साहित्य में पी-एच.डी. और समीक्षा स्तर के कार्यों की शुरुआत हुई। सेवक जी के इस ग्रंथ  में अन्य भाषाओं में रचित बाल साहित्य का  तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत किया गया था और बड़ी बात यह कि पूरी निष्पक्षता के साथ कवियों और उनकी रचनाओं की चर्चा की गयी। 
कालांतर में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान  से प्रकाशित द्वितीय संस्करण (1983) में तो कवियों के दुर्लभ चित्र भी उपलब्ध हैं। ग्रन्थ में इतिहास के लिए अपेक्षित सन्दर्भ ग्रंथों  का भी ईमानदारी से उल्लेख्य किया गया है। 

तृतीय संस्करण 2013 में डॉ. उषा यादव के सम्पादन में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान  से ही आया, जिसकी समीक्षा यहाँ प्रस्तुत है :-



बालगीत साहित्य: इतिहास एवं समीक्षा
लेखक: निरंकार देव सेवक, संपादक: प्रो. उषा यादव
प्रकाशक : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान
6, महात्मा गांधी मार्ग, लखनऊ-226001 (0522-2614470,2614471)
संस्करण (संशोधित) 2013 
मूल्य: 245 रुपये,  
समीक्षकः डा. नागेश पांडेय संजय


हिंदी में बाल-साहित्य आलोचना की परंपरा को लगभग सात दशकों का समय व्यतीत हो चुका है। इस कालावधि में बाल साहित्य और उसके विविध पक्षों पर बहुत महत्त्वपूर्ण कृतियां और शोध प्रबंध लिखे गए हैं। इधर कुछ वर्षों में तो बालसाहित्य की ढेरों समीक्षा पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और इनसे बाल साहित्य का मानवर्द्धन हुआ है किंतु जब ध्यान जब एकदम शुरुआत की तरफ जाता है तो निःसंदेह निरंकार देव सेवक किसी देवदूत की तरह नजर आते हैं जिन्होंने उस जमाने में, जबकि बाल साहित्य पर आधार सामग्री थी ही नहीं या थोड़ा बहुत यदि कुछ था भी तो न के बराबर, ऐसे में 1966 में किताब महल, इलाहाबाद से प्रकाशित अनेक राहों को खोजता और बनाता ग्रंथ बालगीत साहित्यलिखा जो परवर्ती बाल साहित्य लेखकों तथा समीक्षकों के लिए प्रकाश स्तंभ सिद्ध हुआ है। विभिन्न परंपराओं का सूत्रपात करने की दृष्टि से इस बेजोड़ ग्रंथ की कालजयी महत्ता है। बाल साहित्य में तात्विक समीक्षा का कार्य हो या इतिहास-लेखन, शोध-कार्य हो या तुलनात्मक अध्ययन, इन सभी के मूल में सेवक जी का ग्रंथ ही आधार-रूप में विद्यमान रहा है।

1966 में जबकि कृष्ण विनायक फड़के की पुस्तक बालदर्शन’ (1946), श्रीमती ज्योत्स्ना द्विवेदी की कृति हिंदी किशोर साहित्य’ (1952) और डाॅ. देवेंद्रदत्त तिवारी द्वारा संपादित बाल साहित्य की मान्यताएं एवं आदर्श’ (1962)  के सिवाय कोई और समीक्षा कृति थी ही नहीं, ऐसे में उन्होंने बाल साहित्य की महत्वपूर्ण विधा कविता के स्वरूप और प्रयोजन की चर्चा करते हुए उसके मूल्यांकन की दिशा में अपनी तरह का यह पहला काम किया।  
प्रथम संस्करण 1966 
   सेवक जी की इस कृति से केवल बाल साहित्य समीक्षा के क्षेत्र में ही नहीं, वरन् विश्वविद्यालयों में भी बाल साहित्य आलोचना तथा अनुसंधान की दिशा में संभावनाओं का सूत्रपात हुआ। प्रारंभिक बाल साहित्य शोधार्थियों के लिए यह कृति गहन अंधकार में प्रखर प्रकाश जैसी सिद्ध हुई। वर्तमान शोधार्थियों तथा समीक्षकों हेतु भी यह कृति एक अपरिहार्य संदर्भ ग्रंथ की भांति अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है। 
किसी भी पी-एच.डी. स्तर के शोध से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण इस ग्रंथ की पांडुलिपि को देखकर उनके एक मित्र ने कहा भी था- यह तुमने बिल्कुल नए विषय पर इतना काम किया है। इस पर तो तुम्हें किसी विश्वविद्यालय से डाॅक्टरेट मिल सकती है। सेवक जी ने उक्त प्रसंग को हँसकर टाल दिया था। 
फिलहाल उनकी कृति ने हिंदी बाल साहित्य में आलोचना और अनुसंधान को दिशा दी और बहुतों को डाक्टरेटकी उपाधि मिली।

सेवक जी की कृति बालगीत साहित्य बाल साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसी अनोखी और अकेली किताब है जो अब तक तीन बार अलग-अलग रुप और अंदाज में प्रकाशित हो चुकी है।
द्वित्य संस्करण 
दूसरी बार यह कृति
1983 में बालगीत साहित्य: इतिहास एवं समीक्षा नाम से स्वयं सेवक जी के द्वारा ही संशोधित और परिवर्द्धित होकर उ.प्र. हिंदी संस्थान से प्रकाशित हुई थी. खास बात यह कि इस संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण में प्रो. उषा यादव ने भरपूर श्रम किया है और इस ग्रंथ को अद्यतन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, इसके बाद भी पुस्तक की मूल भावना या संवेदना कहीं पर से प्रभावित नहीं हुई है। बड़ी बात यह भी कि उषा  जी ने बिना किसी पूर्वाग्रह या पक्षपात के उच्चकोटि की बाल कविताओं को ससम्मान उद्धृत किया है, वहीं बाल कविताओं के नाम पर खिलबाड़ जैसी लचर रचनाओं को आड़े हाथों लेकर अभूतपूर्व साहस का परिचय भी दिया है। 
प्रो. उषा यादव द्वारा संपादित यह ग्रंथ 524 पृष्ठों में कुल 14 अध्याय स्वयं में समेटे है जो कि इस प्रकार हैं-1. बाल स्वभव 2. बडों की कविता और बाल गीत 3. अलिखित बालगीत 4. शिशु गीत साहित्य 5. चांद तारों के बाल गीत 6. लोरियां, प्रभाती और पालने के गीत 7. हिंदी बालगीतो  का वर्गीकरण 8. हिंदी बालगीत साहित्य के इतिहास की भूमिका 9. हिंदी बालगीत साहित्य का इतिहास 10. हिंदी के राष्ट्रीय बालगीत 11. बालगीतो की शिक्षा एवं रचना  शिक्षा 12. लोकगीतों में बालगीत 13. हिंदी और अंग्रेजी बालगीत 14. भारती भाषाओं में बालगीत साहित्य 
उपर्युक्त अध्यायों के शीर्षकों से एक बात मोेटे तौर पर स्पष्ट हो जाती है कि बाल कविता के समूचे परिदृश्य को संजीदगी से समझनें के लिए यह एक बहुत ही जरुरी पुस्तक है। सेवक जी एक ऐसे समर्थ रचनाकार थे जिनकी कविताएं स्वयं मानक हैं। उनके कथन परिभाषा हैं। वे मानते थे कि बाल साहित्य बच्चों के मनोभावों, जिज्ञासाओं और कल्पनाओं के अनुरूप हो। जो बच्चों का मनोरंजन कर सके और  मनोरंजन भी वह जो स्वस्थ और स्वाभाविक हो। जो बच्चों को बड़ों जैसा बनाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें अपने अनुसार-अपने जैसा बनाने में सहायक हो।
उनकी सोच व्यापक थी, यही कारण है कि उक्त ग्रंथ की रचना करते समय उन्होंने बाल कविता के विस्तृत फलक को अपने अध्ययन का विषय बनाया। कविताओं की चर्चा करते समय किसी मित्रवाद या क्षेत्रवाद के वशीभूत नहीं हुए। न जाने कितने लोंगों से पत्राचार किया। दिग्गज से दिग्गज, नए से नए और गुमनाम: सभी से उनका  संपर्क था। इसीलिए चाहे बालक अमिताभ बच्चन के लिए उनके कवि पिता हरिवंश  राय द्वारा बाल कविता लिखने की बात हो या स्वर्ण सहोदर की प्रकाशन समस्या की पीड़ा। सब कुछ उनकी किताब में सहज मुखरित हुआ। यही कारण था कि उनकी यह कृति केवल बाल कविताओं का ही नहीं, बाल कवियों के अनुभवों और रचना प्रक्रिया का भी दस्तावेज बनी।  
 बता दें कि सेवक जी द्वारा पुनर्प्रस्तुत तथा संस्थान से 1983 में प्रकाशित संस्करण में 17 अध्याय थे लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि नए संस्करण में उषा जी ने किसी अध्याय को समाप्त किया गया हो। हां, आवश्यकतानुसार उन्हें कम-ज्यादा अवश्य  किया गया है। जैसे सेवक जी ने सूरदास पर अलग से सातवां अध्याय लिखा था जिसे उषा जी ने आठवें अध्याय में बहुत ही संक्षेप में लिया है। ऐसे ही सेवक जी ने बालगीतो की  शिक्षा और बालगीत रचना शिक्षा दो अलग अध्याय शामिल किए थे जिन्हें उषा जी ने एक ही अध्याय में समाहित कर दिया है। सेवक जी द्वारा अंग्रेजी की तरह बंगाली बालगीत पर भी अलग से अध्याय था किंतु उषा जी ने इसे अंतिम अध्याय भारती भाषाओं में बालगीत साहित्य में स्थान दिया है। साथ ही पूर्णता की दृष्टि से राजस्थानी, वोडो, मणिपुरी, कोंकणी के बालगीतों पर भी यथासंभव चर्चा की है। 
हां, एक प्रश्न बार-बार  अवश्य  मन में कौंधता है कि द्वितीय संस्करण की भांति इस बार कवियों के दुर्लभ चित्रों को प्रकाशित क्यों नहीं किया गया ? क्योंकि सेवक जी के जमाने में, जबकि आफसेट प्रिंटिग की व्यवस्था नहीं थी, तब कितनी कठिनाइयों के साथ कवियों के चित्र एकत्र किए गए होंगे। उनके ब्लाक बनवाए गए होंगे। अब तो यह सब सहज संभव है। गए और नए जमाने के कवियों के चित्रों को एक स्थान पर देखना पाठकों के लिए प्रभावकारी तो होता ही, यह ग्रंथ पहले की भांति एक सचित्र कोश का भी काम करता। एक बात और ग्रंथ को अद्यतन बनाने की कोशिस में संपादक ने कदाचित लेखकों से उनके बायोडाटा मंगाकर भी काम चलाया होगा या किसी परिचय कोश का सहारा लिया होगा, जो कि स्वाभाविक था किंतु इससे कुछ एक कवियों के बारे में भ्रामक सूचनाएं संकलित हो गई हैं। जैसे एक कवि ने कई बाल कवियों के संकलन 'मूछे ताने पहुचे थाने' को अपनी ही निजी पुस्तक बता दिया है। निश्चय ही इस दिशा में अतिरिक्त सतर्कता अपेक्षित थी।  
बहरहाल अमीर खुसरो से लेकर भारतेंदु और फिर स्वतंत्रता से पूर्व तथा पश्चात की बाल कविताओं का यह श्रमसाध्य इतिहास अनुपमेय है। प्रो. उषा यादव की आधुनिक समीक्षा दृष्टि ने पुनः इसे एक लंबे समय के लिए संग्रहणीय और पठनीय बना दिया है। बाल साहित्य को ऐसी अनमोल कृति देने वाले सेवक जी की पुण्यात्मा को बारंबार नमन करते हुए सफल संपादक प्रो. उषा यादव के साथ-साथ सामयिक प्रकाशन के लिए उ.प्र. हिंदी संस्थान को भी हार्दिक बधाई। 

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निरंकारदेव सेवक बाल साहित्य के एक ऐसे युगपुरुष है  जिन्होंने बाल कविता
को नए मुहावरे दिए। सच्ची बाल कविता ही वह है जिसमें बच्चों के होठों से
दोस्ती करने की ताकत हो। सेवक जी की कविताएं ऐसी ही जादुई बाल कविताएँ
हैं जो बालको के मन को सहज रीझती हैं और उनके सच्चे दोस्त की तरह अपना
रंग जमाने का दम-ख़म रखती हैं।
मानक बाल कविता क्या होती है, यह देखने-समझने के लिए सेवक जी की कालजयी
बाल कविताएँ सदैव ठोस उदहारण के रूप में उद्धृत की जाती रहेंगी।
सेवक जी को बाल साहित्य का भगीरथ कहा जाना चाहिए। वे भारत के पहले ऐसे
व्यक्ति थे जिन्होंने न केवल सचिंत भाव से उत्तम बालसाहित्य की सर्जना
की, बल्कि बाल साहित्य के मौलिक अनुसन्धान और समीक्षा के क्षेत्र में
पहलकदमी की। हिंदी में उन्होंने पहली बार बालसाहित्य की आलोचना का मार्ग
प्रशस्त किया। वे बाल साहित्य के आदि आलोचक थे।
1966 में प्रकाशित उनके अनन्य ग्रन्थ 'बाल गीत साहित्य', जिसमे बाल कविता
के इतिहास और समीक्षा को पूर्ण मनोयोग और प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत
किया गया और वह भी उस ज़माने में, जबकि बाल साहित्य के क्षेत्र में
आलोचनात्मक सामग्री का ही सर्वथा अभाव था। कितने लुप्त प्राय: नामों को
उन्होंने पुनर्जीवित ही नही, अमर कर दिया। अपने सीमित संसाधनों के बाबजूद
बाल कविता के अथाह सागर से चुन चुन कर उन्होंने रत्न निकाले और उन्हें
करीने से सजाया-संवारा। यह उनका ऐसा प्रदेय है जिसके लिए साहित्य समाज
सदैव उनका ऋणी रहेगा।
निरंकार देव सेवक को बालसाहित्य सेवक सही ही कहा जाता था ।
बाल साहित्य सेवक को मेरा सर झुकाकर नमन और अशेष श्रद्धांजलि।