बुधवार, 29 अप्रैल 2020

आलेख : बाल साहित्य के जादूगर: डा. राष्ट्रबंधु

आलेख
बाल साहित्य के जादूगर: डा. राष्ट्रबंधु
- डा. नागेश  पांडेय ‘संजय’

2 मार्च,2015
आसमान में काले-काले मेघ और बिजली की तेज गड़गड़ाहट। बारिस थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। 
मैं हरिद्वार में था। अमृतसर से चलकर सुबह साढ़े आठ के आसपास वहां पहुंचा था। कुछ देर वेटिंगरूम में बैठा रहा मगर जब बादलों की मंषा स्पष्ट हो गई कि वे रुकने वाले नहीं तो बैग सामानघर में जमा किया, दस रुपये की एक प्लास्टिक-पन्नी खरीदी और उसे ओढ़कर हर की पेड़ी के लिए निकल पड़ा।
हहर हहर। गंगाजी पूरे वेग में थीं। जिसे जहां जगह मिली, दुबका खड़ा था। कम ही साहसी थे जो स्नान कर रहे थे। मैं कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा था। पहली बार ऐसा हुआ है कि गंगा स्नान के लिए कोई एक घंटे इधर-उधर भटका हूं। हार मान कर भीगते हुए ही नहाया। पुल के नीचे कपड़े बदले। तर्पण करने आए कुछ लोग भी वहां पर थे। मेरे मन में अजीब-सी बेचैनी हुई। वहां से चल दिया। पुल पर आया तो बारिस कुछ धीमी हो गई। गलियां पानी से लबालब थीं। जैसे-तैसे एक चाय की दूकान पर पहुंचा। अचानक बारिस फिर तेज हो गई।
मुझे डा. राष्ट्रबंधु जी याद आए। राष्ट्रबंधु जी क्या, उनकी कविता याद आई। हां, वही....काले मेघा पानी दे। इस गजब की कविता को उनके सुरीले सुर में जाने कितनी बार सुना है। जब भी सुना है, झूम उठा हूं। मैं क्या, जिसने भी सुना होगा, कविता की लय के साथ-साथ उसकी तालियां बजी होंगी। जब भी बरसात होती है, यह कविता मेरे मन में तैर उठती है मगर मन में तो आज षिकायत जैसी थी ...उफ कितना पानी? मन विनोद के मूड में आ गया। मैंने राष्ट्रबंधु जी को फोन मिला दिया। यही कहने के लिए कि हरिद्वार में आज काले मेघा क्या झमाझम पानी दे रहे हैं। फोन तुरंत रिसीव हुआ लेकिन आवाज षषि षुक्ला की गूंजी, परेषान-सी बोलीं-‘भैया, दादा की तबियत बहुत खराब है।‘
मैंने कहा, बात करा दीजिए तो उन्होंने कहा, बात नहीं हो पाएगी। फिर बोलीं कि हम घर पहुंचकर आपसे बात करंेगे। मन अनहोनी आषंकाओं से भर उठा। मैंने पूछा, ‘क्या हो गया उन्हें?’
उन्होंने बताया,‘सांस बहुत फूल रही है। सुबह सीढ़ी चढ़ते हुए गिर गए थे। दो अनजान लड़कों ने उन्हें कोच तक पहुंचाया। हम और विनोद त्रिपाठी उनके साथ हैं। भैया, बहुत डर लग रहा है, क्या होगा?’
1 मार्च को सुबह पटियाला में जब उनके पैर छुए तो छूटते ही बोले थे, ‘मैं चला जााऊँगा, बालसाहित्य तुम लोग सँभालोगे।’ षषि जी भी वहां थीं। मैं तो चुपचाप उन्हें देखता रह गया था लेकिन षषि जी ने तुरंत पूछा था, ‘दादा, कहां चले जाओगे?’
रोबदार आवाज में बोले थे, ‘अरे! ऊपर चला जाऊंगा, और कहां?’
समझ नहीं आता कि ऐसा अकाट्य कथन उनके मुख से क्यों निकल गया? क्या उन्हें आसन्न मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था?
...
पटियाला की बाल साहित्य संगोष्ठी उनके जीवन की अंतिम संगोष्ठी हो जाएगी, किसने सोचा था? सब हंसते-चहकते साथ थे। ठहाके गूंज रहे थे। खा-पी रहे थे। योजनाएं बन रही थीं। 1 मार्च को पटियाला से बस से अमृतसर के लिए निकले तो सामान्य थे। रास्ते में दुर्गा सप्तशती और सुंदरकांड का पाठ किया। फतहगढ़ साहिब गुरुद्वारा में मत्था टेका। लंगर छका। अमृतसर पहुंचते-पहुंचते देर हो गई थी। 4 बज गए थे।
तांगे पर बैठकर हम स्वर्णमंदिर के द्वार तक साथ गए। वहां उनके साथ फोटो खिंचाया। क्या खबर थी कि वह फोटो, फोटो क्या ....वह साथ, वह बात, वह यात्रा - सब कुछ ....आखिरी था।
बस में ही उन्होंने डा. दर्शन सिंह आषट से कह दिया था, ‘मैं अब कहीं नहीं जाता। तुस्सी मैंनंू किथ्थों बिठा देना। मैं तो अब बाहेगुरु दा जाप करंगा।’
आषट जी ने स्वर्णमंदिर परिसर में ही गंगा निवास में ठहरने की व्यवस्था की थी। मगर वे उसे खोज नहीं पा रहे थे। थोड़ी असहजता महसूस हो रही थी।
मैं राष्ट्रबंधु जी का हाथ पकड़े धीमें-धीमें चल रहा था। हल्की-हल्की बूंदें पड़ रही थीं। वे भीग रहे थे। पैदल चलने से थक भी रहे थे। इन्हें कुछ विश्राम मिल जाए, यह सोचकर मैंने उनसे पूछा, ‘दादा आप दूध या चाय कुछ लेंगे?’ मगर उन्होंने मना कर दिया। आषट जी ने परिस्थिति को भांप लिया। एक दूकानदार से आग्रह कर उनके लिए कुर्सी मांगी। कहा, ‘आप बैठिए। हम लोग सामान रखकर आपको ले जाएंगे।’
गंगा निवास में सबको षिफ्ट कर आषट जी उन्हें ले आए। मेरी ट्रेन रात में 10 बजे थी। राजीव सक्सेना और सृजन के साथ भीगते-भागते मंदिर और जलियांवाला बाग देखा। लंगर छका।
गंगा निवास पहुंचा। उनसे औपचारिक बातें हुईं। कुछ परेषान से थे। बोले, ‘मैं कल क्या करुंगा? मुझे पता नहीं कि मेरी सीट कन्फर्म हुई या नहीं। जिनके पास मेरी टिकट है, उनका फोन नहीं उठ रहा।’ फिर कहा, ‘कल सफर में खाने के लिए कुछ नहीं है। मेरे पास पेपर सोप भी नहीं है।’
षषि जी उन्हें समझाने लगीं, ‘आप परेषान क्यों हो रहे हैं? हम लोग हैं तो। सब इंतजाम करेंगे।’
राजीव जी बोले, ‘बताओ दादा। आपको क्या मंगाना है?’
बोले, ‘कुछ बिस्किट और ब्रेड ला दो। हां, पापड़ और मिठौरी मशहूर हैं यहां। वे भी ले आना। घर ले जाऊँगा।’
फिर मुझसे 500 का चेंज मांगा। मेरे पास अतिरिक्त पेपर सोप था। मैंने उनकी सदरी में डाल दिया।
राजीव जी बहुत जल्दी सारा सामान ले आए। मैंने पूछा, ‘आप भोजन करने जाएंगे?’ तो मना कर दिया। कोई साढ़े आठ बजे मैंने पैर छूते हुए कहा, ‘आज्ञा दीजिए। मैं चलता हूं। मौसम ठीक नहीं, स्टेषन पर जाकर बैठूंगा।’
सहज भाव से बोले, ‘ठीक है। प्रसन्न रहिए। अपने माता-पिता को मेरा प्रणाम कहना। समीक्षा और सृष्टि को मेरा प्यार कहना।’ फिर मेरी ओर बड़ी स्निग्धता से देखने लगे। कुछ रुककर बोले, ‘चलो मैं भी तुम्हारे साथ नीचे चलता हूं। मुझे स्वर्ण मंदिर मत्था टेकने जाना है और अब मैं खाना भी खाऊंगा।’
शशि जी तैयार हो रही थीं। उनसे बोले, ‘बिटिया, तुम नीचे आ जाना।’ फिर मेरे साथ लिफ्ट से नीचे आ गए। कुछ औपचारिक बातें हुई और मैं पुनः उनके चरण स्पर्ष कर स्टेषन चला आया।
इस बात से बेखबर कि अब उनसे कभी मिलना न होगा।
....
हरिद्वार में मन बेचैन था। बस, उनके स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करता रहा। रहा नहीं गया तो उनके संस्थान के मंत्री षर्मा जी, जो उसी ट्रेन में एसी कोच में यात्रा कर रहे थे, से उनकी तबियत के बारे मे पूछा। फिर भी संतुष्टि नहीं हुई तो मैंने उनके पौत्र ऋषि तिवारी को फोन किया। पता चला कि तबियत ठीक नहीं है। बाबा को पानीपत स्टेषन पर उतारा जा रहा था लेकिन वे नहीं माने। कहा कि वे कानपुर जाना चाहते हैं।
ऋषि ने कहा, ‘चाचा, आते ही हम उन्हें सीधे अस्पताल ले जाएंगे।‘
आम्रपाली एक्सप्रेस को रात 10 बजे कानपुर पहुंचना था मगर वह लेट होती गई। हरिद्वार से षाहजहांपुर मैं रात 11 बजे पहुंचा। मैंने उनके पुत्र भारत से बात की। पता चला ट्रेन 1 बजे आएगी। होते-होते ट्रेन रात 3 बजे पहुंची। व्हील चेयर की व्यवस्था पहले से थी। उसे पकड़ कर ले जाने के लिए कुली की भी। किंतु उस पर जाने वाला दुनियां को अलविदा कह चुका था। देह षीत थी, निष्वास। कुली ने स्थिति को समझ पहले आनाकानी की फिर उन्हें बाहर छोड़ आया। उसने पैसे भी नहीं लिए।
किसी एक किरण की आस लिए पुत्र भारत और पौत्र पुष्कर-ऋषि उन्हें अस्पताल लेकर भागे। मगर ....
यात्रा महायात्रा बन गई। यात्री महायात्री हो गया। सबको जगाने वाला सो गया।
बहू उनका कमरा साफ किए प्रतीक्षारत थी। नयी चादर बिछाई थी। ...पिताजी आ रहे हैं।
उतते कोउ न आवई, जासे पूछूं धाय।
इतते ही सब जात हैं, भार लदाय-लदाय।
...लेकिन वह महायायावर भार नहीं, आभार लेकर गया है। बाल साहित्य का कोना-कोना उसका आभारी है। डा. हरिकृष्ण देवसरे उन्हें बाल साहित्य का कबीर कहते थे। जयप्रकाष भारती के अनुसार वे बाल साहित्य के चैधरी थे। उनकी एक आवाज पर मजमा लग जाता था। वे जादूगर थे, बाल साहित्य के जादूगर। बाल साहित्यकारों के लिए माली थे वे। सबको एक सूत्र में पिरो रखा था। सबकी खोज-सबकी खबर। सबसे मिलना-जुलना उनकी आदत में षुमार में था। सबके सुख-दुख में षामिल होते थे। यायावरी में निर्विकल्प। फलां बालसाहित्यकार के बेटे या बेटी का विवाह है। महाषय का झोला तैयार है। अमुक बालसाहित्यकार नहीं रहा। महाषय का पहुंचना तय है। कहीं भी बाल साहित्य का आयोजन हो, किराया मिले न मिले। रिजर्वेषन हो या न हो। पंडित जी ए टू जेड रेडी। अभी दिसंबर,2014 में नांदेड़,महाराष्ट्र में 24 को कार्यक्रम था और 26 को राजसमंद,राजस्थान में। जिजमान दोनों जगह पहुंचे। वाह! बाल साहित्य के बेजोड़ खिलाड़ी। बेजोड़ तुम्हारी चाईं-माईं।
न जाने किस अंतप्र्रेरणा से मैं पटियाला में उनके अंतिम काव्य पाठ का वीडियो बना बैठा। मैंने उसे यू ट्यूब पर  पोस्ट किया है।
चिरपरिचित अंदाज में उन्होंने यह कविता सुनाई थी-
बैठे हो तुम क्यों? हो गुमसुम क्यों? कभी पिटाई, कभी मिठाई दीदी से कह दो,पापड़ न बेलो। ....तुमने क्या खाया? क्या-क्या मंगाया? चूरन की गोलियां, कंपट की गोलियां। ताके न कोई, बांट-बांट ले लो। चाईं माईं खेलो। चाईं माईं खेलो। 
उनके अंतिम भाषण का वीडियो भी बनाया था। अंतिम भाषण का विस्तृत वीडियो भी यूट्यूब पर अपलोड है।
...
3 मार्च को मुझे रात चार बजे उनके पुत्र भारत का फोन आया। मैं समझ गया था कि वे क्या कहनेवाले हैं फिर भी मन एक  कल्पना संजोए था कि वे कहें, पिताजी अब ठीक हैं।
भारत जी ने कहा, ‘नागेष जी, पिताजी चले गए।’ फिर जैसे कान सुन्न हो गए। एक रोज पहले उनका हाथ पकड़े मैं उन्हें स्वर्ण मंदिर के द्वार तक ले गया था। रात में मेरे प्रस्थान के समय वे लिफ्ट से नीचे तक साथ आए थे। सब कुछ स्वप्न हो गया। आकस्मिक वज्रपात...वह भी अनभ्र !
...
अभी 14 फरवरी को मैं इलाहाबाद गया था। षाहजहांपुर के लिए ट्रेन रात में थी तो कानपुर उनके घर चला गया। ट्रेन लेट हो गई। मुझे बहुत संकोच। बार-बार उनका फोन आ रहा था। बोले, ‘मैं भी आपका इंतजार कर रहा हूं और भोजन भी।’ रात 11 बजे पहुंचा। जागते मिले।
सुबह चलने को हुआ तो मुझे पटियाला आने के लिए राजी कर लिया। वापसी में रिजर्वेषन नहीं था। मुझे मजबूरन अमृतसर से वाया हरिद्वार का टिकट बनवाना पड़ा। अब सोचता हूं, विधि के विधान में कितनी षक्ति है। उनका कहा न मानता तो आजन्म पष्चात्ताप करता।
अलख जगाने में उनका जबाव न था। सारे देष में बाल साहित्य के आयोजनों में उनकी मुख्य भूमिका रहती थी। प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति भवन तक और देष-विदेष में बाल साहित्य का परचम फहराने के लिए वे बार-बार याद आएंगे। कोई भी आयोजन बगैर उनके बहुत अधूरा-सा लगेगा। कहीं भी आयोजन होता। एक पुनरुक्ति तो कानों में गूंजती ही रहती थी, जो भी आता-‘राष्ट्रबंधु जी किधर हैं?’
अब वह चेहरा कहां दिखेगा?
...
उनके निधन के बाद कानपुर दो बार हो आया हूं। बड़ा कचोटता-सा लगा कानपुर। उनकी अनुपस्थिति में मैं दो-तीन बार ही कानपुर गया हूं। पता चलता था कि यात्रा में हैं। अब तो वे महायात्रा पर हैं। कभी न लौटेंगे।
1994 में उनसे पहली मुलाकात हुई थी, उ.प्र. हिंदी संस्थान के सर्वभाषा बाल साहित्य समारोह में। वक्तव्य में उन्होंने कहा था,‘कविता आंखों का नहीं, कानों का विषय है।’ फिर उन्होंने यह लोरी सुनाई थी-सच कहता हूं, उनका मुरीद हो गया था। लोरियां बहुतेरी लिखी गईं पर ऐसी...? मुझे लगता है ऐसी रचनाएं लिखी नहीं जातीं, लिख जाती हैं। कोई अदृष्य षक्ति लिखा जाती है। आष्चर्य होता है, जब कुछ स्वनामधन्य यह मषवरा देते हैं कि काष! अमुक ने ऐसी रचनाएं और लिखी होतीं। उत्कृष्ट सृजन सप्रयास नहीं, अनायास होता है। आप यह कर्णप्रिय लोरी देखिए, इसमें जो कुछ भी नव्य-भव्य है-स्वाभाविक है। किसी झरने-सा निनाद करता हुआ प्रवाह। और जिसने भी उनके मुख से यह लोरी सुनी होगी, एक चमत्कारिक आनंद में जा डूबा होगा।
कंतक थैंया धुनूं मनइयां, चंदा भागा लइयां पइयां। यह चंदा हलवाहा है, नीले-नीले खेत में । सचमुच सेंत मेंत में, रत्नों भरे खेत में, किधर भागता लइयां-पइयां। कंतक थैंया धुनूं मनइयां
ऐसे ही उनकी कविता मामा खासी चर्चित हुई। इसे सुनते ही बच्चे सहज ही उनके भांजे बन जाते थे-उल्टा पहन पजामा जी, आए मेरे मामा जी। बने सुदामा घूमते, खूब बचाते नामा जी। होशियार हैं मामा जी
दरअसल इस नये जमाने में टी. वी. से चिपके रहने वाले और मां-बाप के स्वाभाविक स्नेह से दूर-मजबूर बच्चे बाल साहित्य से जुड़ ही कहां पाते हैं? रेडियो, जिस पर हर रविवार बाल कविताएं प्रसारित होती थीं, का चलन नहीं रहा। टी. वी. पर बाल कविताएं भला रखी कहां? ...और अब जो बाल साहित्यकार सम्मेलन होते भी हैं, उनमें बच्चा नदारत होता है। राष्ट्रबंधु जी कहा करते थे बिन पानी के नाव मत चलाओ। बच्चे बाल साहित्य के परीक्षक हैं। बाल साहित्य को उनके बीच प्रस्तुत करिए तब आपको पता चलेगा कि आप कितने पानी में हैं? कानपुर और अनेक स्थानों के कितने विद्यालयों में उन्होंने बाल कवि सम्मेलन कराए। हिंदी के दिग्गज बाल साहित्यकारों नें वहां कविता-पाठ किया। महाराष्ट्र के सानेगुरु की तर्ज पर उन्होंने बालकथा पाठ के भी कार्यक्रम रखे। बाल साहित्य को लोकप्रियता दिलाने का यही सबसे कारगर उपाय हो सकता है। आज यह परंपरा क्षीण होती जा रही है।
राष्ट्रबंधु जी से मेरा परिचय 1989 में हुआ था। मेरी पहली बाल कविता ‘खेल’ उन्होंने ही अपनी पत्रिका बाल साहित्य समीक्षा, जून, 1989 में प्रकाषित की थी।
1995 में उन्होंने मुझसे खुटार में बालकवि सम्मेलन करने को कहा। मैंने एक संस्था बनाई- बाल साहित्य प्रसार संस्थान। आए दिन आयोजन होने लगे। वे भी वहां दो बार आए। उनके कहने पर ठेठ देहात पोहकरपुर में मैंने कार्यक्रम रखा। वे टेªक्टर पर बैठकर गए। बहुत खुष हुए। ढेरों कविताएं सुनाईं। जिनमें एक यह भी थी-काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़धानी दे। लड्डू बरसें खेत में,बच्चे हरषें रेत में। मेघों की अगवानी में, उछलें कूदें पानी में। सबको नाना नानी दे, हर दिन एक कहानी दे। सिक्कों की निगरानी दे, रानी को हैरानी दे। कंजूसों को दानी दे, घरघर मच्छरदानी दे। उनकी यह कविता सुनकर बच्चे क्या, बड़े तक उनके जादुई सम्मोहन में आ गए। खूब खातिर हुई। कोई गन्ने का रस ले आया। कोई छाछ। पारिवारिकता का दुर्लभ परिवेष बनते देर न लगी।
एसी में बैठकर सारे देष के बच्चों के आनंद और उनके भविष्य की कोरी-कोरी बातें करने वाले तो बहुत हैं लेकिन गांव के बच्चों के बीच जाकर बाल साहित्य को इस तरह प्रचारित करने के दुर्लभ उदाहरण कम ही देखने को मिलते हैं।
बाल साहित्य की अनेक संस्थाएं/पुरस्कार-सम्मान और षोध केंद्र उन्होंने स्थापित कराए। देवपुत्र का अनूठा बाल साहित्य षोध संस्थान उनके ही आग्रह का सुपरिणाम है।   
वे एक कुषल संयोजक थे। काम करना और कराना उन्हें आता था। एक तरह से उनकी नियति थी- बाल काज कीन्हें बिना, मोंहिं कहां विश्राम।
  बाल साहित्य के लिए आजन्म लगे रहे। गए तो भी बाल साहित्य के ही नाम पर। सब उनसे कहते थे, अब यात्राएं मत करिए। घर वाले तो खासतौर पर। मगर चुपके से कब उनका टिकट बन जाता था, बहू-बेटे को इसकी खबर भी न होती थी। बाल साहित्य के लिए एक जुनून था उनके सिर। ऐसा जुनून जो अब षायद ही कहीं देखने को मिले।
1971 में उन्हें बाल साहित्य का मनोवैज्ञानिक अध्ययन विषय पर पी-एच.डी. उपाधि मिली थी। एक खास बात, उनकी थीसिस रहस्यमय ढंग से चोरी हो गई थी, अन्यथा यह उपाधि उन्हें और पहले मिल जाती। उनकी थीसिस प्रकाषित नहीं हो सकी। वे कहते थे, मेरी थीसिस प्रौढ़कुमारी हो गई है।
1977 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी थी। ‘बालसाहित्य समीक्षा’ पत्रिका निकाली। घर फूंक तमाषा देखा। संस्था बनाई- भारतीय बाल कल्याण संस्थान तो अपने षहर और प्रदेष की सीमाएं लांघकर कहां-कहां कार्यक्रम कर डाले। अपने लिए तो हर कोई करता है, उन्होंने तो सारे देष को अपना बना लिया था। बाल साहित्य के लिए वे अपने खर्चे पर विष्व हिंदी सम्मेलन में भाग लेने लंदन गए।
   उनकी पहली पुस्तक ‘चेतना’ जनवरी,1951 में रामधनी सिंह कानपुर ने प्रकाषित की थी। 16 पृष्ठों की इस कृति में किसानों और मजदूरों पर कविताएं थीं। अब तक उनकी 80 के लगभग किताबें आ चुकी हैं। प्रायः सभी विधाओं में लिखा। प्रभूत मात्रा में लिखा। उस पर विस्तृत चर्चा फिर कभी...! हां, यह अवष्य कहूंगा कि उनका बहुतेरा उत्कृष्ट सृजन आलोचकों की दृष्टिपथ से नहीं गुजरा। अन्यथा वे यह न लिखते कि काष! राष्ट्रबंधु जी ने ऐसी कविताएं और लिखी होतीं। मैं कहना चाहूंगा कि काष! उन आलोचकों ने उनकी ऐसी कविताएं और पढ़ी होतीं...!
दरअसल यह आलोचक की बहुत बड़ी सीमा या कहिए कि विवषता होती है कि वे सहज उपलब्ध रचनाओं के आधार पर ही सारा परीक्षाफल घोषित कर देते हैं, वनस्पति कुछ और खोजने-खंगालने के। खैर...उन्होंने सारा कुछ न्यारा ही लिखा हो, ऐसा नहीं है। उनका पुराना लेखन जितना अनोखा-चोखा है, नये में से बहुतेरे को देखकर धोखा होता है कि अरे यह भी उनका ही लिखा हुआ है। ठीक यही स्थिति बाल साहित्य समीक्षा पत्रिका को लेकर भी है। उसके पुराने अंकों में इतनी दुर्लभ सामग्री प्रकाषित हुई है कि काष! यदि वह संपादित होेकर आ जाए तो बाल साहित्य की छवि में चार नहीं, आठ-दस चांद लग जाए। मगर इधर के उसके अधिकांष अंक ... जिस तरह से छुटभैयों के वकालतनामें जैसे छप गए, उससे बाल साहित्य के स्वरूप को भी धक्का लगा। कई अंक ऐसे आए, जो न आते तो बाल साहित्य पर उपकार होता। मैं बहुधा सोचा करता हूं कि ऐसी कौन सी मजबूरी होती थी कि उनके जैसे सजग, निर्भीक और सचेतक संपादक को इधर समझौता करना पड़ जाता था। क्या अत्यधिक यात्राओं के कारण समयाभाव ? और इस नाते समय पर पत्रिका निकालने के फेर में-जो मिले, उसे छाप दो-की नीति। या फिर उनका अति सरल होता स्वभाव? जिसका लाभ लोगबाग जमकर उठाने में लगे थे। इन मामलों में मेरी उनसे जमकर असहमति रही। मैंने अपने कई आलेखों में खुलकर लिखा भी। फिर भी वे नाराज नहीं हुए, यह उनका देवत्व था। यही बात उनकी इधर की रचनाओं को लेकर भी है, अन्यथा टेसू राजा, डिंग डांग, नए कृष्ण सुदामा, चूहे बेइमान, चलो अखाड़े, गधे का गणतंत्र, कविता-वविता, फोटो से बातें, भतीजावाद, यह मत सोचो, अक्ल की खोज, जयसियाराम, सूरज सोया तानकर, टिली लिली, नयी डायरी, तोंदियल, तितली, बिल्ली मौसी, भुक्खड़ जैसी न जाने कितनी कविताएं हैं जो उनके बेजोड़ लेखन का उदाहरण हैं। टेसू राजा के बहाने भारत के राज्यों पर उनकी बेहतरीन काव्यकृति है- टेसू की भारत यात्रा (2004), इसकी हर कविता के अंत से पहले की पंक्ति बोले-‘मैं तो यहीं अड़ा।’ के क्या कहने। बाल पाठक का मन उस राज्य के प्रति पूरे अपनत्व से भर उठता है और वह भी पूरे जोष के साथ-टेसू जी पहुंचे मद्रास, तमिलनाडु में किया प्रवास। थिरू, वणक्कम सीख गए, लुंगी में आमोद नए। ...बोले-‘मैं तो यहीं अड़ा, लहर गिनूंगा खड़ा-खड़ा।’ (तमिलनाडु) ऐसे ही मणिपुर के बारे में उनका अंदाजेबयां देखिए- मणिपुर में पहुंचे इंफाल, थके-थके थे धीमी चाल। सुनी बांसुरी लगी भली, नृत्य मणिपुरी गली-गली। जंगल देख लुभाया मन, पर्वत, नदियां देख मगन। बोले-‘मैं तो यहीं अड़ा, पर्वत पर ज्यों रत्न जड़ा।’
टेसू पर छोटे मीटर की उनकी एक बहुत प्यारी कविता है, जिसके वाचन का आनंद ही कुछ और है-खिल्ली, गिल्ली, पिल्ला-पिल्ली, काली बिल्ली ला, राजा दिल्ली जा, टेसू राजा आ। रटना,हटना,घटना सटना, झटपट पटना जा, बढ़िया खाना खा। टेसू राजा आ। थक अलबत्ता, चल कलकत्ता, छक रसगुल्ले खा, फिर खुष होकर गा- टेसू राजा आ।
कविता वविता भी इसी षैली की रचना है, जिसकी ध्वन्यात्मकता का जवाब नहीं- पानी वानी नाना नानी, आनाकानी ना। हा हा ही ही हे हे हो हो, हां हां हां हां गा ।
  1968 में प्रकाषित पुस्तक ‘हंसी के बालगीत’ में नामानुरूप उनकी रोचक कविताएं संकलित हैं, खासकर डिंगडांग, नए कृष्ण सुदामा, अक्ल की खोज, चलो अखाड़े, गधे का गणतंत्र, भतीजावाद और चूहे बेइमान जैसी कविताओं की अलमस्ती ही कुछ और है। यद्यपि ये अमोल रचनाएं उनके बाद के कई संकलनों में बार-बार संकलित हुई हैं। लोटपोट करने की पूरी क्षमता इनमें है- चूहे करते थे खुट खुट, कुट कुट काट रहे बिस्कुट। बिल्ली का हमला छुटपुट, डिंग डांग डिंग डांग, टुट टुट टुट।
नए कृष्ण सुदामा कविता प्रतीकात्मक हैं। आरक्षण व्यवस्था पर व्यंग्य करती ऐसी किषोर कविताएं कम ही लिखी गई हैं-हुई परीक्षा, फस्र्ट डिवीजन करके पास सुदामा अटके, कृष्ण डिवीजन थर्ड पा सके, नहीं नौकरी करने भटके।
अक्ल की खोज में बाल सुलभ जिज्ञासा है तो चलो अखाड़े में सुस्वास्थ की प्रेरणा, मगर स्टाइल से। टवर्ग के वर्णों ने कविता के हास्य के ओजपूर्ण कर दिया है-चलो अखाड़े पेलो दंड। वीर मांग सकता है न्याय, वीर मिटा सकता अन्याय। युग-युग से है यही उपाय, यही षांति का मंत्र अखंड। धनुष बाण रखते हैं राम, चक्र सुदर्षन रखते ष्याम। महावीर की गदा अनूप, मां रणचंडी रौरव रूप। सभी देव हैं संडमुसंड। चलो अखाड़े पेलो दंड।
वे बाल-किषारों के सच्चे सखा थे। उनका लेखन जोष भरता है। उम्मीदें जगाता है। निराषा भगाता है। वे युग के भगवानों के अंधभक्त बनने की बात नहीं करते बल्कि विवेकानंद की भांति उत्तिष्ठ जाग्रत का मंत्र फूंकते हैं-जिनके पूजे चरण आज जाते हैं, जो युग के भगवान कहे जाते हैं। उनके भी तो नाक चुआ करती थी, और कुटम्मस खूब हुआ करती थी। ...यह मत सोचो तुम गरीब हो, पढ़ न सकोगे, बदनसीब हो।
भतीजावाद कविता में चाचा नेहरू जी को याद करने का अंदाज अनोखा है-हम साहस के बेटे हैं, खाना खाकर लेटे हैं। षक्ति हमारी माता है, लड़ना-भिड़ना भाता है। चाचा नेहरू आते याद, जिंदाबाद भतीजाबाद। वैसे नेहरू जी पर उनकी एक कविता और है-‘नेहरू की याद’, अत्यंत मार्मिक। उनके निधन के पष्चात एक बालक के मनोभाव को व्यक्त करते हुए जैसे वे बिल्कुल डूब से गए हों- चाचा नेहरू नहीं मिल सके और नही अब मिल सकते हैं, अपने इस दुख को झुठलाने, कैसे हंस-हंस खिल सकते हैं। इसीलिए हम हाथ जोड़कर, फोटो को ही शीस झुकाते। फिर भारत के मानचित्र पर, हम गुलाब के फूल चढ़ाते।
गधे का गणतंत्र में गधा मंहगाई भत्ता मांगता है तो चूहे बेइमान का रिद्म गजब का है, एकदम लोकषैली में। बाल साहित्य में चूहों की षरारत पर लिखी गई उनकी नटखट कविता चूहे बेइमान अप्रतिम है, जिसमें बेइमानी और नाकारापन पर करारे व्यंग्य के साथ बालोचित आकांक्षा और पष्चात्ताप को इस ढंग से अभिव्यक्त किया गया है कि उनकी कल्पनाषीलता विमुग्ध कर देती है- चूहे बेइमान मेरा टोस ले गए, टोस ले गए, संतोष ले गए। ना उनके खेती, ना उनके पाती, चूल्हा बिना फूंके खाते चपाती। पुस्तक नहीं कुंजी कोष ले गए। ...मेरी दवाई जल्दी से खाते, बाबा  की लाठी चाहे छिपाते। नाना की ऐनक छोड़ क्यों गए?
डायरी पर एकदम मौलिक और संभवतः अकेली कविता रचने का श्रेय भी उनको जाता है, जहां बाल स्वभाव एकदम स्वच्छंद रूप में मुखरित हुआ है-नयी डायरी मुझे मिली है। कार्टून हैं मुझे बनाने, हस्ताक्षर करने मनमाने। आप अगर रुपये देंगे तो, बन जाएंगे जाने माने। भेंट दीजिए, कलम हिली है।
टिली लिली कविता की उड़ान के क्या कहने। बच्चे तो मन के राजा होते ही हैं। यहां वह राजसी कल्पना सर चढ़कर बोल और डोल ही नहीं रही, बल्कि एक अधिकार भाव से पूरी मस्ती कविता में घोल रही है- मुझे अचानक परी मिली, आसमान मे जुही खिली। टिली लिली है टिली लिली। मैं जाऊंगा पंख बिना, ताक धिना धिन ताक धिना।
कल्पना की अथाह पूंजी के साथ-साथ वे आत्मविष्वास के भी धनी थे। विल पावर से लवरेज। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हारते न थे। न दैन्यं न पलायनम। उनका जीवन असुविधाओं और संघर्षों से पूर्ण था किंतु षायद ही किसी ने उन्हें कभी अरण्यरोदन करते देखा हो। षायद यही वजह थी कि जीवन के अंत तक उनके चेहरे पर कोई षिकन न आई। कम ही लोग जानते होंगे कि वे कभी डाकिया भी रहे। पोस्टमैनी करते हुए उन्होंने बी.ए. की पढ़ाई की। और अपनी लगन के बल पर हिंदी और अंग्रेजी में एम.ए. के बाद बी.एड. और पी-एच. डी. तक की डिग्रियां हासिल कीं।
गोडवाना की लोकधुन इंगोवाय इंगो पर आधारित उनका एक गीत है, उनके ही ओजस्वी व्यक्तित्व को बयान करता है- भाग्य तुम्हारा यौवन है, देश तुम्हारा जीवन है। रखो मौत को दांव पर, परेशानियां झेलो। रेलो रेलो रेलो
ऐसी न जाने कितनी कविताएं हैं जो कहीं न कहीं उनके जीवन की बांकी-बांकी झांकी हैं और जिनकी चर्चा खत्म होने का नाम ही न लेगी। अनंत में जाने वाले उस पथिक की गाथा भी अनंत है। उनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर दो ग्रंथ प्रकाषित हुए हैं- राष्ट्रबंधुः व्यक्तित्व एवं कर्तत्व (संपादक-डा. प्रतीक मिश्र) और डा. राष्ट्रबंधु के बाल साहित्य का मूल्यांकन (संपादक-डा. षकुंतला कालरा)। इनसे उनके जीवन को आंका जा सकता है।
उनकी एक कहानी है- फा। मुझे तो वह उनके ही जीवन की फिल्म सी लगती है। उनकी कहानी फटी षर्ट पर देविका फिल्मस्, मुंबई से फिल्म बन चुकी है। जय सियाराम पुस्तक पर संगीतबद्ध कैसेट तैयार की गई है। आकाषवाणी लखनऊ से धारावाहिक रूप में इसका प्रसारण हो चुका है।
तपती रेत पर नाम से उनकी आत्मकथा छप चुकी है। वे इसका दूसरा भाग लिखना चाहते थे। वह स्वप्न अधूरा रह गया। वे चाहते थे कि जून, 2013 से बंद पड़ी उनकी पत्रिका ‘बाल साहित्य समीक्षा’ फिर षुरू करने वाला कोई कर्णधार मिल जाए। उनका मन था कि बालसाहित्यकारों को राज्यसभा/विधान परिषद में नामित किया जाए। वे प्रयत्नषील थे कि बाल साहित्यकारों को निषुल्क बसयात्रा की सुविधा मिले। उनकी चाहत थी कि बाल साहित्य उच्च कक्षाओं में पढ़ाया जाए। बाल साहित्य समीक्षा के पुराने अंक पलटने पड़ेंगे। उनके संपादकीय देखने होंगे। उनमें ढेरों पथ दिखेंगे, जिन पर चलकर हम उनके अधूरे स्वप्न ही पूरे नहीं करेंगे, वरन् बाल साहित्य की मषाल को और अधिक उष्मा प्रदान कर सकेंगे। आषा की जानी चाहिए कि ऐसा होगा। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। यही सच्चा तर्पण। 
...
बाल साहित्य जगत में वे अद्वितीय थे। न उन जैसा कोई था और न होगा। वे अपनी जगह अकेले थे। सबको अपना बनाकर, उनके लिए जीने वाले इस बालमना साधु को नमन और अशेष श्रद्धांजलि !

(यह आलेख मेरी पुस्तक 'बाल साहित्य के प्रतिमान', प्रकाशक : अनंत  प्रकाशन,लखनऊ के  पृष्ठ 88 पर प्रकाशित है. सर्वप्रथम यह आलेख  बाल वाटिका, मासिक के अप्रैल 2015 अंक में पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था.)

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

बाल साहित्य के लेखक और आलोचक : डॉ. रत्नलाल शर्मा

डॉ. रत्नलाल शर्मा बाल साहित्य के प्रति गहरी निष्ठा रखते थे। उन्होंने बच्चों के लिए सुंदर कहानियां लिखीं। 'समकालीन बाल साहित्य की दिशा' आलोचना ग्रन्थ लिखा। तत्कालीन समय मे बाल साहित्य पर सबसे बड़ी राशि का निजी पुरस्कार 'रत्न शर्मा स्मृति बाल साहित्य पुरस्कार' उनकी ही देन थी। बच्चों के लिए हिमांक रत्न पत्रिका भी निकाली थी।प्रस्तुत है उनके विषय में 'बाल साहित्य समीक्षा' में जनवरी, 2002 में प्रकाशित आलेख
मैंने 'किशोरों की श्रेष्ठ कहानियाँ' संकलन में उनकी कहानी को सादर सम्मिलित किया था। अपनी पुस्तक बाल साहित्य के प्रतिमान  में भी उनकी ससम्मान चर्चा की है।





रविवार, 19 अप्रैल 2020

किशोरों के लिए कहानी संग्रह 'यस सर! नो सर' के कन्नड़ अनुवाद की समीक्षा

यस सर ! नो सर !(किशोरों के लिए कहानी संग्रह)  के कन्नड़ अनुवाद की समीक्षा
समीक्षक : आनन्द पाटिल
Yes Sir, No Sir
A story collection in Hindi, by a noted writer Dr. nagesh pandey ‘Sanjay’ is now in kannada. It has been brought into Kannada  by  D. Sujaladevi, an enthusiastic writer, being head of a school(she herself runs the school)she is with children most of the time, takes lot of interest in children’s literature. This is her first translation, got published.
Dr. nagesh Pandey is a wellknown name in Hindi belt. Along with a creative writer, he is scholar in chidlren’s literature. He has done Ph. D on principles that guide the genor of children’s literature. An essay collection on different aspects of chidlren’s literature has also been at his credit. He has brought seven story collections and two poetry works. He has edited three collections of stories also. Such an active person is being introduced into kannada with a bundle of his stories.
    As for as translation is considered, sujaladevi has rendered sincere work and brought in a easy flowing, with all weightyness, with required disposition and involvement. The stories are made to reach the kannada children, retaining the cultural background of Uttarpradesh, which the original writer hails from.  As such a new rendering of stories for children, in some aspects definitely has been to view here. So to say an encouraging effort has been here by Sujaladevi.
    All these stories show a trend of getting relieved of old stuff of imaginative folk world and more and more getting  revolved around the present situations of chidren. In all the stories voices of children are heard prominently and all the plots go around the child psychology, that too evolved at the background of  cultural set up. Of cource middle class atmosphere is predominantly seen here. Situations get plotted with rural and semi urban areas. Children with poor economic background, or with less resources are usually visualized. It seems the usual trend in modern children stories in India, as along with English, most of the regional languages carry such a stuff , might it be the begining face in children literature towards with modern concepts. As such the writers with middle class background, as they predominate, naturally  bring fourth the stuff of their experience, of cource with  all modern days’ progressive thoughts.  Nagesh Pandey’s stories are to be placed inveriably among this kind.
    Usually a sort of Satvika Bhava, an atmosphere of virtuous conduct prevails in all the stories. It does not go in any situation, so to say to fall in the  track of preaching. Children go with all distracts, bad influences, undesired ways, but they themselves come to  repentance, or realising  of the right conducts. They will be put into ambiguity in a number of situations, and fell prey to false attractions, but one or the other situation brings a turn in their life and set them into progress. This is inverialbly found in all his stories, not a single story ends in dismay. Of cource as these children come from almost middle class background, or little less to it, never experience hard truths of life, that are found in downtrodden, cast based, discriminative social situations. In Kannada such situations were brought to children stories by Dr. R. V. Bhandari , in his two novels. Both the novels chose protagonist characters from scheduled casts and brought out all the traumas they face, to make up their ways of life, but to be arriving at an contended end was sort at. Being a teacher by profession, he use to say it should be in children stories as a positive motivation. It is to be informed here that he use to be in the front line of rebelling  leftist movements, and he himself came from such social condition. But this is not the situation with upcoming new writers like Ganesh Nador in Kannada, who are earnestly desiring to bring prevailing truths as they are.
    Nagesh’s stories are marked with simple narrative in all naturalistic way, bringing the situation in a very usual manner, as to be one among our daytoday happenings. His narration always goes with some sort of conversation with the readers, connecting them with the plot as if it is one in their surroundings. Almost every time he stands with elderly eyes and sets his plots before the children. We may say it is an extension of story telling tradition with new requirements, with new approaches. We come across a veriety of behaviors put in different situations. A boy with hesitation in all his approaches, lags behind in many ways. Once during holidays hesitantly he goes to village area trying to avoide swimming in the pool. But when he is going riding behind his elder brother he puts to astonish, when his brother , listening to a cry from the midst of waters below a bridge, at once stops the two wheeler and jumps into the water without any second thought and rushes to the rescue of a lady, fallen in the river. The boy experiences this with all awe and wonder, and decides he should also make his mind to do something, to learn swimming, riding and should come over his secured mindedness., and thus returns into a new born boy. In another story a boy, a son of  police, feels short when his classmates talk of corrupt practices of police. He even falls suspicious, observing a situation of his father, receiving some amount from an unknowing person. But to his surprise he comes to realize that his father has not at all involved in any untoward act and is a sinscere person, and feels proud of him. He tells before his mother that he will also become a police like father . Another boy named shamkrishna, who is known for his studiousness, sinscerity, good behavior, once gets  caught  by the examiner while copying. It becomes a big issue whether he should be punished or not. Nobody feels taking risk at it. But at last the headmaster takes bold step and debars him of that year’s exams. A poor boy who is very fond of games, faces every time hinderances from his father and gets reduced mentally, but stops not in his efforts, tries to push himself in whatever possible way, and gets shined as a painter. Father realizes his earnestness  and he himself gets changed and sets his mind for providing all facility whatever possible. A group of poor children once plan to steal fire crackers from a rich house during Deepavali, as they were unable to purchase, and enjoy the festival. But at the time of escaping during night time they hit the watchman with a sizable stone in night dark. But very next day when they hear the news that he is admitted to hospital, they fell in duality and start repenting, by the evening they decide to appolizise.  Neha a girl, every time finds inferior listening to the deeds of her elder sister. But when, during her marriage, she gets astonished to see her sister, boldly resisting the money demanding goonda group, in the form of dowry, and shots at them without hesitation. Then the little mind realizes what really is her sister and tears into sobs as she is departing from her. In all such stories we find a realization is reached at the end a progressive thinking, guided by morality  is channalised.
Anand Patil

बुधवार, 23 अक्तूबर 2019

आलेख : समकालीन बाल कहानियों में मूल्यपरक शिक्षा डा. नागेश पांडेय ‘संजय’

समकालीन बाल कहानियों में मूल्यपरक शिक्षा

डा. नागेश पांडेय ‘संजय’

अत्याधुनिकता के एक ऐसे समय में, जब ऐन केन प्रकारेण अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की होड़ मची हो, मूल्य शिक्षा की बात थोड़ी अजीब भले ही लगती हो किंतु सच बात यह भी है कि कभी विश्वगुरु कहा जाने वाला हमारा देश जब आवहि संतोष धन, सब धन धूरि समान की परंपरा का देश है। राष्ट्र की रक्षा हेतु यह दधीचि के हंसते-हसते अपनी हड्डियां गला देने का देश है। गुरु की आज्ञा पर यह अपना अंगूठा काट कर अर्पित कर देने वाला देश है।  सत्य के नाम पर यह हरिष्चंद्र के अपना राजपाट और सर्वस्व न्योछावर कर देने का देश है।
सच पूछिए तो यह त्याग, दया, उदारता, करुणा, क्षमा, सहनशीलता और समर्पण जैसे अन्यान्य मूल्यों का देष है। इन मूल्यों से रची पगी कितनी कहानियां हमारे चतुर्दिक बिखरी पड़ी हैं। इन्हीं मूल्यपरक कहानियों के बल पर हमारी अक्षुण्ण संस्कृति सदियों से प्रवहमान है। कभी दादी-नानी के द्वारा, जिन्हें अप्रत्यक्ष रूप से मूल्य शिक्षा का जीता जागता विष्वविद्यालय कहा जा सकता है, संस्कारदात्री कहानियां अपनी वरेण्य भूमिका का निर्वाह करती रही हैं। कालांतर में दादी नानी का विकल्प पत्र-पत्रिकाएं और पुस्तकें बन गई तथापि मूल्य षिक्षा उसका अभिन्न अंग बनी रही। रामायण, महाभारत, कथा सरितसागर, सिंहासन बत्तीसी, पंचतंत्र, हितोपदेष की पारंपरिक कहानियों के अतिरिक्त बाल साहित्य लेखकों ने भी ऐसी कहानियों का बहुतायत से सृजन किया है। आज हिंदी बाल साहित्य भले ही कितने भी परिवर्तनों से गुजर रहा हो, नैतिकता की प्राथमिकता उसमें कल भी विद्यमान थी, आज भी है और आगे भी रहेगी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 1986 के बिंदु 8.4 में लिखा है कि जीवन के आवश्यक मूल्यों का हृास हो रहा है और लोगों का विश्वास उठ रहा है, अतः शिक्षण क्रम में ऐसे परिवर्तन की जरूरत है कि सामाजिक और नैतिक मूल्य के विकास में शिक्षा एक सशक्त साधन बन सके।
निसंदेह कह सकते हैं कि मूल्यपरक षिक्षा की आज सर्वाधिक आवष्यकता है। हमें यह नहीं भूलना है कि विश्व में जितने भी महान व्यक्ति हुए हैं, उन्होंने बाल्यावस्था में उच्चकोटि का बाल साहित्य पढ़ा था। बाल साहित्य का मूल्य शिक्षा से अंतरंग संबंध है। कौन नहीं जानता कि विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र की रचना उच्छ्रंखल बालकों के परिष्कार हेतु ही की थी। बाल साहित्य बालकों को नई सोच और स्वस्थ दिशा प्रदान करता है। इसके माध्यम से बालकों में नैतिकता, सद्भावना, पारस्परिक प्रेम और एकता के मानवीय अंकुर उपजते हैं। वे राष्ट्र की संस्कृति, उसकी अस्मिता और प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए सजग प्रहरी के रूप में तैयार होते हैं।
       हिंदी में मूल्यपरक षिक्षा से ओतप्रोत कहानियां निरंतर लिखी जा रही है। पर पीड़ा सम नहीं अधमाई के उच्च संस्कार को उद्घाटित करती बानो सरताज की कहानी कोयल और कोटर उनकी मौलिक कल्पना का चमत्कार है। हमेशा दूसरे के घोसले को अपने प्रयोग में लाने वाली कोयल को अपना घोंसला बनाते देख बरबस ही मन श्रद्धा से भर उठता है। (पुस्तक: 21 बाल कहानियां,पृष्ठ 49)     
सफलता का भेद फकीरचंद शुक्ल की प्रेरक कहानी है जो करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान संदेष को ध्वनित करती है। (नई सुबह, पृ.19) 
 किरण घोडके की पुस्तक सितारों वाली गुल्लक में संकलित कहानी डिब्बी कछुआ सभी प्राणियों से प्रेम के संदेष के बहाने वसुधैव कुटुंबकम का भाव जगाती है।   
  प्यार की बातें मनोहर चमोली की छोटी सी कहानी है जो प्रेम का वास्तविक अर्थ बताती है। (अंतरिक्ष से आगे बचपन, पृ. 23)
   मुरलीधर वैष्णव ने तो चरित्र विकास की बाल कहानियां नामक एक संकलन ही तैयार किया है जिसके पृ. 43 पर प्रकाषित कहानी सच से बड़ा झूठ सत्यम ब्रूयात प्रियं ब्रूयात मां ब्रूयात सत्यमप्रियम के दार्षनिक पहलू को उजागर करता है। ऐसे सच से वह झूठ ज्यादा बेहतर है जो किसी का दिल न दुखा रहा हो।
ऐसे ही पुस्तक बच्चों को सीख देने वाली 51 कहानियां (2012) प्रकाश मनु की लेखनी का चमत्कार है। इसमें जीवनोपयोगी कहानियां हैं। कहानी चार फुदनों वाली टोपी दूसरों के उपालंभ से व्यथित होकर तात्कालिक निर्णय न लेने की प्रेरणा देती है। ऐसी ही एक चर्चित कहानी गिजूभाई की भी है सात पूछों वाला चूहा, जो इस कहानी के पात्र द्वारा टोपी का एक एक फुंदना कटवाने की तरह एक एक पूछ कटाता जाता है। 
   आत्मविश्वास हो तो रमाशंकर की प्यारी कहानी है,जहां  अपनी लगन और आत्मबल के सहारे दीपक सफलता की सीढ़ियां चढ़ता जाता है। (जस्सी और अन्य कहानियां, 73)   
एकता में बल निर्मला सिंह की छोटी सी कहानी है जो पारस्परिक सद्भाव की प्रेरणा देती है।
रजनीकांत शुक्ल बालसाहित्य साहसिक कहानियों के सृजन हेतु लोकप्रिय हैं। उनकी अनेक कहानियां पुस्तक  साहसी घटनाएं में संग्रहीत हैं। पृ. 63 पर प्रकाषित कहानी आग से मुकाबला में असल जिंदगी का हीरो शुभम बैन में फंसी लड़की को आग से बचाता है। ऐसी ही एक कहानी है लपटों के बीच, जिसमें लेखक रमेश चंद्र पंत ने बालमन में साहस और आत्मबल के साथ साथ प्रत्युत्पन्नमति की मनोरम छटाएं उंकेरी है। (बालमन की प्रतिनिधि कहानियां, पृ. 88) 
 पिछले दिनों पढ़ी राकेश चक्र की श्रेष्ठ कहानियां पुस्तक में पृ. 67 पर छपी कहानी पूरा इंसान भी दिल को छू गई। यह कहानी जातीयता और विद्वेष के भाव से मुक्त कर मानवता की ओर सत्प्रेरित करती है। दो अलग जातियों के इंसानों के खून से प्राण बचने पर पात्र की यह मार्मिक अभिव्यक्ति कि मेरे अंदर आज तीन तरह के इंसानों का खून मिल गया है, मन को ही नहीं, आत्मा को भी विगलित कर देती है। 
पुस्तक बावन गांव इनाम में कर पृ. 58 पर प्रकाषित कहानी फटी शर्ट राष्ट्रबंधु की बहुचर्चित कहानी है, जो परिवार के प्रति बालकों को दायित्वबोध से जोड़ती है। पिछले दिनों देविका फिल्मस्, मुंबई से इस कहानी पर बनी बालफिल्म देखकर आंखे भीग गईं। ऐसी बाल फिल्में और भी बनती रहें और उनका अधिकाधिक प्रसारण भी हो तो जीवन मूल्यों के स्थापन की दृष्टि से यह एक कारगर कदम हो सकता है। दिनेश पाठक शशि की कहानी प्रधानाचार्य की कुर्सी (बालहंस, अक्टूबर द्वितीय 1999, पृष्ठ 53) भी बड़ों के प्रति सम्मान का भाव जागृत करती है और उनकी परिस्थितियों से अवगत रहने की प्रेरणा देती है।
 मां का उपहार पुस्तक में संकलित अपना घर(पृ. 16) डॉक्टर शकुंतला कालरा की मनोवैज्ञानिक कहानी है, जो घर से भागे हुए बच्चे षैल के बहाने पलायनवादी प्रवृत्ति का परिष्कार करती है।
 शेर चिड़िया की दोस्ती गोविंद शर्मा की मजेदार कहानी है। घमंड न करने और पड़ोसी धर्म की शिक्षा से रची पगी यह रचना उनकी चर्चित पुस्तक कांचू की टोपी की श्रेष्ठतम कहानियों में से एक है।
दिविक रमेश की कहानी किस्सा चाचा तरकीबूराम का मजेदार है जो हंसाते गुदगुदाते अचौर्य की सहज षिक्षा भी दे जाती है। 

 जब आवहि संतोष धन, सब धन धूरि समान के आदर्ष से अनुप्राणित अमिता दुबे की कहानी संतुष्टि का सपना भी अनूठी है। (पुस्तक: राह मिल गई, 21)
  वन्य जीवन पर चुटीले लेखन के लिए सुचर्चित विनायक की लंबी कहानी जिंदा अजायबघर, प्राणिमात्र के प्रति बालोत्सुकता को शांत कर उनके प्रति प्रेम भी जागृत करती है।
मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है, इस मूल्य को सुधा भार्गव ने कुषल बुनकर की तरह बुना है अपनी कहानी भग्गू बन गया भगवान में, इसे उनकी पुस्तक अंगूठा चूस के पृ. 23 पर पढ़ा जा सकता है। भूखे को भोजन देना और असहाय की सहायता करने की सहज शिक्षा देने की दृष्टि से भी यह एक अच्छी कहानी है।  खिलौने वाली शंकर सुल्तानपुरी की अप्रतिम रचना है जो लोक ऋण से मुक्ति के भाव से जोड़ती है। एक गरीब बच्चे को मुफ्त में मिट्टी का खिलौना सिपाही देकर खिलौनेवाली उसकी दुनियां ही बदल देती है। वह बच्चा उस खिलौने को देखकर सिपाही बनने की प्रेरणा ही नहीं लेता वरन सिपाही बनकर दिखाता है। लेकिन उससे भी बड़ी बात यह कि यह ऋण वह भूलता नहीं। कालांतर में एक धर्मपुत्र की भांति वह उस खिलौनेवाली से मिलने आता है। निश्चित रूप से सहृदय पाठक की आंखें उस दृश्य की कल्पना कर बरबस ही भीग जाएंगी।
बाल वाटिका में छपी साजिद खान की षबीना अंकल नए मिजाज की उम्दा कहानी है जो करुणा को विस्तार देते हुए, मार्मिकता की तह तक जाकर बच्चों को नए संस्कारों की ओर मोड़ती है।

नंदन सितंबर 19 में छपी अनिल जायसवाल की कहानी बैकबेंचर सकारात्मक प्रेरणा से ओतप्रोत है। हीन भावना से ग्रस्त बच्चों को यदि आत्ममूल्यांकन की सुप्रेरणा देने का कौषल हो तो उन्हें उच्च शिखर पर पहुंचाने में देर न लगेगी।
पराग अक्टूबर 1989 में छपी पदमा चौगांवकर की कहानी छोटी सी भूल घर की तरह देष के प्रति भी समान भाव जाग्रत करने का आवाहन करती है। हरिभूमि, 18 मई 2017 में प्रकाशित घमंडीलाल अग्रवाल की कहानी अनोखा जन्मदिन भारतीय संस्कृति के विविध पक्षों का बोध कराती है।
पवनकुमार वर्मा इधर खूब लिख छप रहे हैं। बच्चों का देश, अगस्त 2019 में आई उनकी कहानी भाई बहन का प्रेम पारिवारिकता के आत्मीय स्वर को बुलंद करती है।
नीलम राकेश की कहानी और वे मित्र बन गए (देवपुत्र सितंबर 19, पृष्ठ 5) आडंबर से दूर रहकर जीवनयापन का संदेष देती है। यहां पर विमला भंडारी की चित्रकथा मां ने कहा था (बाल भास्कर 3 मई 2019) का भी खासतौर पर उल्लेख्य करना चाहूंगा।  एकाग्रता, आज्ञाकारिता और बड़ों के अनुभव का महत्व दर्शाती ऐसी कहानियां तो जरूरी हैं ही लेकिन मूल्यों को जगाती ऐसी कहानियां काष ! चित्रकथाओं के रूप में सुलभ हो सकें तो मूल्य षिक्षा की राह को रोचकता के आवरण में आसान किया जा सकता है।
कहानियाँ और भी हैं किन्तु विस्तार भय से उनकी चर्चा यहां सम्भव नहीं है। ऐसी कहानियों की रचना करते समय अतिरिक्त लेखकीय सजगता अत्यापेक्षित है। मूल्य संस्थापन के प्रयास कहानी का मूल तत्व मनोरंजन नष्ट नहीं होना चाहिए। रोचकता तो आद्यंत अपेक्षित है। कहानी विशुद्ध रूप से उपदेशात्मक होकर न रह जाए, यह ध्यान रखना होगा।
बाल कहानियां में मूल्य शिक्षा  की विविधरंगी छटा मनोहारी है और उसका महत्व सर्वकालिक है। पत्र पत्रिकाओं में तो ऐसी कहानियों को स्थान मिले ही, उनका वृहद संचयन भी प्रकाशित होना चाहिए।
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डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

रविवार, 6 मई 2018

सदाबहार फूलों-सी बाल कहानियां/ डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'

(बाल वाटिका में प्रकाशित बाल कहानियों  पर आधारित आलेख )

बाल वाटिका के बाइसवें वर्ष के सारे अंक मेरे सामने हैं। इनमें प्रकाशित कुल सतहत्तर कहानियों को एक बार फिर से पढ़ना मेरे लिए सुखकर तो है ही, उतना ही विस्मयकारी भी है। कितने रंग? कितने आस्वाद। कितनी छवियां और मनोरम आभाओं के तो कहने ही क्या! रसलोभी पाठकों के लिए तो यहां अवसर ही अवसर है। उनका मन तो महकेगा ही, आत्मा भी स्निग्ध हो उठेगी। अच्छी बाल कहानियों की यही विषेषता भी है कि वे पाठक को भीतर तक छू लें और सफल संपादक की यही पहचान कि वह पाठकों की भिन्न रुचियों को समझते हुए कहानियों के अनेकवर्णी रूपों को समान महत्त्व दे। कभी बाल साहित्य के क्षेत्र में पारंपरिक और आधुनिक धाराओं  की कहानियों को लेकर खूब वाक्युद्ध चलते रहे और इस द्वंद्व के कारण अनेक समर्थकगण वस्तुतः स्वयं को ही छलते रहे। क्योंकि बाल पाठक तो आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति से सर्वथा पृथक रहते हुए बस...अपने आनंद के लिए कहानियां पढ़ता रहा। चहकता रहा। ...और उनको महत्त्व देने वाली पत्र-पत्रिकाएं भी पूरी दमक के साथ प्रकाषित होती रहीं। कहना गलत न होगा कि आज का बालपाठक लेखक से कहीं ज्यादा समझदार है। कहानी, बस... कहानी है, यह वह जानता है। कहानी कहां तक जीवन का सच हो सकती है, यह भी उसे पता है। कहानी से कितना उसे ग्रहण करना है? इसका भी उसे बखूबी बोध है। बच्चों का बच्चा समझनेवाले दरअसल खुद बचकानेपन के षिकार है। समय बदलता है तो स्थितियां बदलती हैं। परिस्थितियां बदलती हैं। उसी के साथ कहानी भी बदलती रहती है। समय सापेक्ष रचनाओं का सृजन लेखकीय धर्म है लेकिन फिर भी यह याद रखना चाहिए कि कहानी के असली समीक्षक बच्चे हैं। वे कहानी के निहितार्थों को अपने अनुसार ढाल ही लेते हैं। इसलिए यह मगजमारी कि कहानियों का स्वरूप क्या हो? उनकी विषयवस्तु क्या हो? प्रकृति की दृष्टि से कहानियों के औचित्य को हम अपने बौद्धिक अनुभव के आधार पर तय करने की बजाय बालपाठक पर छोड़ दें तो ज्यादा बेहतर होगा। बालकों को कहानियों के विविध रूप सुलभ होंगे तो वे जीवन और परिवेष की विविध छटाओं का आनंद ले सकेंगे। अच्छी कहानियां वही हैं जो अधिसंख्य वर्ग का प्रतिनिधित्व करें। बालक की सोच में भी व्यापकता तभी आ सकेगी और उसके अनुभव का फलक भी विस्तार पा सकेगा। यह सही है कि आज विज्ञान का युग है लेकिन क्या तब हम साहित्य को बस...कंप्यूटर और तकनीकी के संदर्भों से ही भर दे? ग्लोबलाइजेशन के इस युग में क्या संवेदनाओं से अनुप्राणित प्रसंगों का कोई महत्त्व नहीं रह जाता? हम उस देष के निवासी है जहां आज भी जाने बच्चे कंप्यूटर की पहुंच से कोसों दूर है। गांवों में घंटों बिजली नहीं आती। बच्चों ने षहर नहीं देखा। अभिभावकों के दैन्य और संघर्ष में वे बराबर के सहभागी है तो क्या साहित्य की आवष्यकता ऐसे बच्चों के लिए नहीं है? ऐसे में साहित्य में बस मार्डन एप्रोच की वकालत करना वस्तुतः विद्ववता नहीं, बड़बोलापन है। हर परिवेष के बच्चों को ध्यान रखते हुए लिखना होगा। पारंपरिक विषयों को भी एक सिरे से खारिज कर देने की प्रवृत्ति कतई उचित नहीं है।
पिछले दिनों स्वयं को अत्यंत आधुनिक समझ का समझने वाले एक लेखक ने साहित्य में नएपन की वकालत करते हुए लिखा कि उसने दसियों वर्षों से कोई गुब्बारेवाला नहीं देखा। उसके इर्द-गिर्द मंडराते बच्चे नहीं देखे। फिर भला आज ऐसी रचनाओं की क्या दरकार? और अगर ऐसी रचनाएं पूर्व में लिखी गईं हैं तो उनको भी अब सर माथे लेने की क्या जरूरत है। यह ठीक है कि चकाचौंध  के शिकार उस लेखक की अनेक सीमाएं हो सकती हैं लेकिन प्रतिनिधि साहित्य पर तो हर  बच्चे का हक है। साहित्य और पाठ्यक्रम के लिए साहित्य में अंतर भी है, अस्तु, हर जगह शैक्षिक रूपरेखा का उदाहरण देते हुए साहित्य की प्रासंगिकता का आकलन करना भी अव्यावहारिक ही है। मनोरंजनधर्मी साहित्य की अपनी दरकार है और उसे नकारा नहीं जा सकता।
आज भी विकास की दौड़ में भागते देश  के अनेक क्षेत्र अभी भी शैशवावस्था में हैं। वहां आज भी गुब्बारेवाले हैं। मिट्टी के खिलौनेवाले हैं। और यही नहीं...टूटी साइकिल पर अपने बच्चे को बिठाकर गांव से षहर मेले में सींको से बने तोता, सांप, पपीहरी, झुनझुना जैसे खिलौने बेचने की ललक लिए नन्हीं बच्ची कजली के ठेठ ग्रामीण बाबूजी भी है।
क्या नये जमाने में साहित्य में ये परिदृश्य  अब गए जमाने की बातें हैं? क्या साहित्य में यह गंवईपन नहीं होना चाहिए? क्या देष के अधिसंख्य वर्ग के बच्चों की सहज अनुभूतियों को प्रतिबिंबित करता साहित्य नहीं रचा जाना चाहिए?
डा. भैरूंलाल गर्ग की सराहना करनी होगी कि बाल वाटिका के बहाने बालपाठकों के भिन्न परिवेषों और भिन्न रुचियों का  पूरा ध्यान रखते हुए वे प्रतिनिधि कहानियों को प्राथमिकता देते हैं।
जैसा कि मैंने प्रारंभ में ही लिखा था कि बारह अंकों में कुल सतहत्तर कहानियों के फूलों से मह-मह महकती उनकी बाल वाटिका में विचरना किसी के लिए भी सौभाग्य हो सकता है।
  बाल वाटिका में प्रकाशित कहानियां कल, आज और कल की कहानियां हैं। इन कहानियों में गांव की माटी हैं, शहरों की विकासोन्मुखता है। महानगर की अट्टालिकाएं हैं और आनेवाले कल का आभासीय प्रतिबिंब भी। और यही नहीं, विज्ञान लेखन के ऐसे अनूठे प्रयोग भी उपलब्ध रहते हैं जो स्वयं को बड़ी मानने वाली पत्रिकाओं में भी दुर्लभ रहते हैं।
यह भी बड़ी बात है कि बाल वाटिका को हिंदी के स्वनामधन्य बालकथाकारों का सहज सहयोग प्राप्त है। हिंदी के मूर्धन्य बालकथाकारों की अच्छी कहानियों के प्रति भी संपादक का श्रद्धाभाव पाठको के लिए सुखद है
कई लेखक तो समर्पित भाव से बाल वाटिका के लिए लिख रहे हैं। मसलन कुल सतहत्तर कहानियों में लगभग आधी कहानियां तो बस प्रकाश मनु, सुनीता, राजीव सक्सेना, देवेंद्र कुमार, विनायक, मंजूरानी जैन, साजिद खान और अरशद खान आदि आठ लेखकों की ही हैं।
मोहम्मद साजिद खान के पास गजब की शिल्प सामथ्र्य है। ग्राम्य परिवेष की गहरी समझ उन्हें अन्य कथाकारों से अलग करती है। अक्टूबर 2017 में प्रकाषित उनकी मार्मिक कहानी कजली मुझे बाल वाटिका में प्रकाषित ढेरों कहानियों में अनूठी लगी। गांव के गंवईपन को जिस अनोखे अंदाज में उन्होने अभिव्यक्ति दी है और वह भी बहुत ही कम षब्दों में... अपनी बात कहने का उनका यह हुनर जैसे उनको भाषाई जादूगर सिद्ध करता है। यह उन अन्य कथाकारों के लिए एक दिशाबोधक संकेत भी है जो बच्चों के लिए लंबी-लंबी कहानी लिखते समय यह भूल जाते हैं कि बच्चे का पास न तो इतना समय है और न ही धैर्य। बच्चे क्या, बड़े भी ऐसी कहानियों को देखकर प्रायः पन्ने ही पलटते देखे गए हैं। 
इस कहानी में आधुनिकता के नाम पर लोकशैलियों पर कुठाराघात को लेकर करारा व्यंग्य है। गांव में सेठे से निकलनेवाले सीकों से बने पारंपरिक खिलौनों को षहर के मेले बेचने की असफल कवायद के बहाने एक-एक कर बेबसी की खुलती पर्तें इतनी मार्मिक है कि मन भीग जाता है। चाइना माल के आगे भला उसके इन सीेकों के खिलौनों की क्या बिसात लेकिन खाली हाथ हताष लौटने और इसलिए साथ गई कजली को कुछ न दिला पाने से मन पर चढ़े भारी बोझ का वर्णन इतना सजीव है कि लगता ही नहीं कि हम  कहानी पढ़ रहे हैं या कोई फिल्म सामने चल रही है।
उनकी अन्य प्रकाशित कहानियों में आग और हरियाली (मार्च 2017), ढाबेवाला महेश  (जुलाई 2017), लेटर बाक्स ने पढ़ी चिट्ठियां (दिसंबर 2017), पेड़ों का वसंतोत्सव (फरवरी 2018) भी एक से बढ़कर एक हैं।
राजीव सक्सेना विज्ञान के समर्थ लेखक है। इन अंकों में उनकी सर्वाधिक सात कहानियां प्रकाषित हुई हैं। चाकलेट के चोर (मई 2017) एक अच्छी विज्ञान गल्प तो है ही, पर्यावरण के प्रति सजगता उत्पन्न करने की दृष्टि से भी उल्लेखनीय हैं।
सुपर हीरो (दिसंबर 2017),बिजूका (सितंबर 2017), ड्रीम टेबलेट (जनवरी 2018),स्टोरी मशीन (जून 2017), पापा प्लांट (जुलाई 2017), वर्चुअल गेम (नवंबर 2017)  में भी कल्पना की विविध छटाएं हैं जो विज्ञान से जुड़कर बच्चों को समय से बहुत आगे ले जाने का दम खम रखती हैं।
डा. प्रकाश  मनु बाल साहित्य के तपस्वी मनस्वी हैं। उनकी कहानियोें को पढ़ना जैसे बाल साहित्य के मानकों से अवगत होने जैसा है। कभी किस्सागोई तो कभी संस्मरण शैली में रची उनकी कहानियों में कथारस छलकता चलता है। और उनके छींटे बहुत देर तक अपनी गंध बनाए रहते हैं। उनकी कहानियों में सब्जीपुर के चार मजेदार किस्से (अप्रैल 2017),मन्ना रे मत तोड़ो फूल (जून 2017), अमर गाथा जसोदा बाबू की (सितंबर 2017), गोपी की फिरोजी टोपी (नवंबर 2017), शहीद हरनाम गली (जनवरी 2018) भले ही आकार में लंबी हैं लेकिन एक बार पढ़ना आरंभ कर आप रुक नहीं सकते। कहन की अनूठी शैली के चलते उनकी कहानियां चित्रकथा जैसा आनंद देती चलती हैं।
सुनीता जी की संस्मरणत्मक कहानी ऐसी खेली होली (मार्च 2017) खासी दिलचस्प है जिसमें होली के बहाने आत्मीयता के अनेक रंग मौजूद हैं। किशोरों के लिए उनकी कहानी लापलांग की पुकार (फरवरी 2018) में लोककथा का आस्वाद है। लापलांग की मृत्यु और शि कारियों के पश्चाताप  की इस कहानी का अंत अत्यंत कारुणिक है।
देवेंद्र कुमार बाल साहित्य के पुराने साधक-आराधक हैं। आओ नाष्ता करें (जुलाई 2017) उनकी विशिष्ट कहानी है जो बुजुर्गों के प्रति बच्चों के रागात्मक पक्षों की सुंदर अभिव्यक्ति करती है।  बप्पा बाहर गए हैं (अप्रैल 2017), मिठास (नवंबर 2017),कभी नहीं (फरवरी 2018) भी उनकी ऐसी कहानियां हैं जिनमें बच्चा अपनी परिपक्व समझ के साथ मौजूद है।
विनायक की कहानी चुटकी भर फागुन (मार्च 2017) का षीर्षक जितना रोचक है, उसकी भाषा बच्चों की दृष्टि से उतनी ही कठिन। जून 2017 में प्रकाषित उनकी कहानी तुम यों नहीं जा सकती में पारस्परिक मित्रता जैसे सरल विषय को कथानक बनाया गया है किंतु जलप्लावित, अस्फुट, अवतरित, उदरपूर्ति जैसे कठिन शब्दों ने इसे भी दुरूह बना दिया है। पाठ्यक्रम की दृष्टि से ही ऐसी कहानियां उपयोगी हो सकती हैं। पुट्टन की पिटाई और नजारा (सितंबर 2017), मोहनी अम्मा (नवंबर 2017), षैतान सारे जहान के (फरवरी 2018) उनकी रोचक और मार्मिक कहानियां हैं।
मंजूरानी जैन को सृजन के गुर जैसे विरासत में प्राप्त हुए हैं। वे पराग के आदि संपादक आनंदप्रकाश  जैन की बेटी हैं। अगस्त 2017 में आई उनकी कहानी गुड्डे का ब्याह उनकी मौलिक कल्पना का चमत्कार है। पारस्परिक सौहार्द की दृष्टि से भी यह कहानी लाख टके की है। बच्चों का गंगा-जमुनी तहजीब सिखाती यह कहानी अच्छी बालिका कथाओं के अभाव की पूर्ति भी करती है। मंजू जी जैसे संस्कृति के विरल पक्षों को कहानी में पिरोने में सिद्धहस्त हैं। बड़े दिन का तोहफा (दिसंबर 2017) भी उनकी बेजोड़ रचना है जिसमें संवादों के माध्यम से कथा का सहज विस्तार देखते ही बनता है और इसमे समाया उत्सवी आमोद भी देखते ही बनता है। माली काका (अप्रैल 2017) भी उनकी एक अच्छी कहानियों में शुमार की जा सकती है।
  मोहम्मद अरशद खान कुशल कथाकार हैं। कहानी में जैसे जान लगा देते हैं। डूब कर लिखते हैं। उनकी कहानियां आदमखोर (अगस्त 2017), बिस्किटवाली बुआ (सितंबर 2017), अब तुम्हारे हवाले (नवंबर 2017) मुकम्मल कहानियां हैं। बिस्किटवाली बुआ में निहित ग्राम्य संवेदना और खासकर उसका तानाबाना यह भी दर्षाता है कि एक अच्छी कहानी कैसी होनी चाहिए। स्थितियों-परिस्थितियों से भरा पूरा पारिवारिक परिवेष इस कहानी के माध्यम से जीवंत हो उठा है। 
कहानी को बुनने में माहिर ओमप्रकाष कष्यप कम लेकिन गजब का लिखते हैं। अक्टूबर 2017 में प्रकाशित उनकी कहानी सबसे अच्छा सबसे अलग कुछ अलग अंदाज में षैक्षिक परिवेष को समेटने में सफल हुई है। कहानी के बहाने निबंध की सृजन यात्रा का उनका प्रयोग भी अलग ही है।
पुराने कथाकार श्रीनाथ सिंह की कहानियों का आस्वाद बच्चों का सहज प्रमुदित तो करेगा ही, हतप्रभ भी करेगा कि गए जमाने में भी कितना कुछ उनके नए जमाने जैसा ही था। तुम बड़े होकर क्या बनोगे उनकी शिक्षाप्रद कहानी है जो परिश्रम के महत्त्व को सहज प्रतिपादित करती है। अक्टूबर 2017 में छपी उनकी कहानी चमेली अपने घर कैसे पहुंची दादी-नानी की षैली को याद दिलाती है जिसमें मनगढ़ंत किस्सों के माध्यम से बच्चों को कल्पना के पंखों से उड़ान भरवाने की कोषिष छिपी होती थी।
बाल साहित्य में प्रारंभिक आलोचना को दिशा  देने वाले मनोहर वर्मा की किषोर कहानी ठंडे पानी की बिक्री (मई 2017) का संदेष कोई काम छोटा नहीं होता बड़े ही रोचक घटनाक्रम के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है।
पराग के संपादक मंडल के अनुभवी सदस्य महावीर प्रसाद जैन की कहानियों के क्या कहने। अपराधी मैं हूं (मई 2017),वापसी (सितंबर 2017), मुसीबत के साथी (जुलाई 2017) एक से बढ़कर एक हैं। वापसी में जहां कामचोरों के लिए सबक है, वहीं मुसीबत के साथी में पारस्परिक सहयोग का बखान है।
देंवेंद्र मेवाड़ी विज्ञान के अग्रणी लेखक हैं। कहानी कहने की उनकी कला प्रषंस्य है। अप्रैल 2017 में आई उनकी कथा कबूतर कभी कहानी,कभी संस्मरण तो कभी निबंध जैसी लगती है लेकिन अंत तक पहुंचते पहुंचते बड़ी ही साफगोई से प्रकृति के सहचरों के प्रति हमारे संवेदनात्मक पहलुओं का दर्षन एकदम षीसे के मानिंद साफ कर जाती है।
बालमन की चितेरी लेखिका रेनू चैहान की पशु पक्षी कथा घमंडी पेड़ (नवंबर 2017) में वन्य जीवन की बाँकी झांकी देखने को मिली। पेड़ का मानवीकरण देखते ही बनता है। कहानी के छोटे-छोटे वाक्य पाठकों के औत्सुक्यवर्धन में सहायक हैं।
गोविंद शर्मा कल्पना और शैली दोनों ही दृष्टि से समर्थ हैं। कहानी का उनका अंदाजे बयाँ अलग ही होता है। मजे की बात यह कि वे शैली में व्यंग्य के पुट का भी अद्भुत समन्वय स्थापित करते हैं और यही कारण है कि पाठक हंसते-चहकते जाने-अनजाने में उनकी कहानी में छिपे सन्देश को भी ग्रहण कर लेता है। ऐसे ही नवम्बर 2017 में प्रकाशित कहानी नहीं छोड़ेंगे में स्वच्छता का लक्ष्य साधने में उनको सहज सफलता मिली है।
शिवचरण सिरोहा बाल साहित्य में तेजी से स्थापित हुए हैं। उनकी कहानी छोटा सांताक्लाज (दिसंबर 2017) अत्यंत भावप्रवण कहानी है। एक संवेदनशील बच्चा किस तरह परिवार में अपने दायित्वबोध को अनुभव करते हुए कर्तव्य निभा सकटा है, यही इस कथा का प्रतिपाद्य है। नए कोट को लेकर पिता की दमित आकांक्षा और फिर बेटे की ओर से अपने प्रयासों से उनके लिए वही उपहार देने का प्रसंग कितना मार्मिक है कि यह कारुणिक कथा आँखे भिगो देती है। भौतिकवाद की आधुनिक सभ्यता, जिसमे स्वहित अधिक महत्वपूर्ण है, में ऐसे भावुक बच्चों की उपस्थिति कितनी गौरवपूर्ण है। उन्हें सैल्यूट करने को जी चाहता है।
विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी ने लो हो गई मेरी शादी (दिसंबर 2017) कहानी के बहाने साक्षात्कार शैली में बच्चों को वैज्ञानिक तथ्यों से जोड़ने की सफल कोशिश  की है।यह प्रयोग यह भी सिद्ध करता है कि विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में कहानिया किस कदर अपनी भूमिका निभा सकती हैं।
लोकबोलियों पर अपने गम्भीर शोधकार्य के लिए चर्चित सुधा गुप्ता की कहानी  एक थी मीशा (फरवरी 2018) अंक की उपलब्धि है। प्रिय शिक्षिका होने के नाते वे बच्चों के अधिक निकट रही हैं, फलस्वरूप संवाद शैली में दादी-पोती की अंतरंगता जिस नटखट अंदाज में इस कहानी में व्यक्त हुई है, उसे देखकर सुखद विस्मय होता है- वह खिलखिलाकर हंसने लगी और हंसती रही, हंसती ही रही।
मैंने कहा अरे, अब इतना क्यों हंस रही हो ?
मीशा दोनों नन्ही हथेली से ताली बजाकर बोली- क्या बताऊँ? मेरी तो हंसी ही नहीं रुक रही।
अन्य रोचक और उल्लेखनीय कहानियों में  ब्रजेष कृष्ण की साहसिक कथा शंभू और कुक्कू (फरवरी 2018), निर्मला सिंह की बालिका कथा मयूरी (दिसंबर 2017), शील कौषिक की श्रेया और आन्या (जनवरी 2018),स्ंजीव जायसवाल की कहानी देश  के बेटे (जनवरी 2018),पवित्रा अग्रवाल की मिर्ची के पकौड़े (फरवरी 2018), सुकीर्ति भटनागर की कहानियां पोहे वाली दादी (अप्रैल 2017), मन की बात (अगस्त 2017), सूर्यनाथ सिंह धमकीबाज को धमकी (अगस्त 2017), रष्मि गौड़ की बिग ब्रदर (अप्रैल 2017), राजा चौरसिया वाह मुनमुन बेटी (अप्रैल 2017), डा. फकीर चंद शुक्ल की झूठ के पांव (सितम्बर 2017), लक्ष्मी खन्ना सुमन की जंगल में परियां (सितंबर 2017) भी उल्लेखनीय हैं। विस्तार भय से भले ही उनकी चर्चा यहां पर संभव न हो सकी हो लेकिन उनका सार्वकालिक महत्त्व नकारा नहीं जा सकता।
सदाबहार फूलों सी ये कहानियां निसंदेह बाल साहित्य की अनुपम निधि हैं। इनकी महक देर तक और दूर तक अपनी पहुंच बरकरार रखने में समर्थ है। इन फूलों को बाल वाटिका में पुष्पित-पल्लवित-संरक्षित करने वाले सजग माली डा. भैरूंलाल गर्ग को जितनी भी बधाई दी जाए, कम है।
- डा. नागेश पांडेय 'संजय'



















(बाल वाटिका, मार्च 2018 में प्रकाशित आलेख)

बुधवार, 2 मई 2018

बाल कविता का निष्पक्ष इतिहास

बाल कविता का निष्पक्ष इतिहास
                              ■ डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
निरंकार देव सेवक लिखित  बाल गीत साहित्य इतिहास और समीक्षा अकेला ऐसा ग्रंथ  है जो तीन बार अलग-अलग कलेवर में संशोधित-सम्पादित होकर छपा।
1966 में सर्वप्रथम इसका प्रकाशन किताब महल, इलाहबाद से हुआ था। इसके पश्चात ही बाल साहित्य में पी-एच.डी. और समीक्षा स्तर के कार्यों की शुरुआत हुई। सेवक जी के इस ग्रंथ  में अन्य भाषाओं में रचित बाल साहित्य का  तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत किया गया था और बड़ी बात यह कि पूरी निष्पक्षता के साथ कवियों और उनकी रचनाओं की चर्चा की गयी। 
कालांतर में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान  से प्रकाशित द्वितीय संस्करण (1983) में तो कवियों के दुर्लभ चित्र भी उपलब्ध हैं। ग्रन्थ में इतिहास के लिए अपेक्षित सन्दर्भ ग्रंथों  का भी ईमानदारी से उल्लेख्य किया गया है। 

तृतीय संस्करण 2013 में डॉ. उषा यादव के सम्पादन में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान  से ही आया, जिसकी समीक्षा यहाँ प्रस्तुत है :-



बालगीत साहित्य: इतिहास एवं समीक्षा
लेखक: निरंकार देव सेवक, संपादक: प्रो. उषा यादव
प्रकाशक : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान
6, महात्मा गांधी मार्ग, लखनऊ-226001 (0522-2614470,2614471)
संस्करण (संशोधित) 2013 
मूल्य: 245 रुपये,  
समीक्षकः डा. नागेश पांडेय संजय


हिंदी में बाल-साहित्य आलोचना की परंपरा को लगभग सात दशकों का समय व्यतीत हो चुका है। इस कालावधि में बाल साहित्य और उसके विविध पक्षों पर बहुत महत्त्वपूर्ण कृतियां और शोध प्रबंध लिखे गए हैं। इधर कुछ वर्षों में तो बालसाहित्य की ढेरों समीक्षा पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और इनसे बाल साहित्य का मानवर्द्धन हुआ है किंतु जब ध्यान जब एकदम शुरुआत की तरफ जाता है तो निःसंदेह निरंकार देव सेवक किसी देवदूत की तरह नजर आते हैं जिन्होंने उस जमाने में, जबकि बाल साहित्य पर आधार सामग्री थी ही नहीं या थोड़ा बहुत यदि कुछ था भी तो न के बराबर, ऐसे में 1966 में किताब महल, इलाहाबाद से प्रकाशित अनेक राहों को खोजता और बनाता ग्रंथ बालगीत साहित्यलिखा जो परवर्ती बाल साहित्य लेखकों तथा समीक्षकों के लिए प्रकाश स्तंभ सिद्ध हुआ है। विभिन्न परंपराओं का सूत्रपात करने की दृष्टि से इस बेजोड़ ग्रंथ की कालजयी महत्ता है। बाल साहित्य में तात्विक समीक्षा का कार्य हो या इतिहास-लेखन, शोध-कार्य हो या तुलनात्मक अध्ययन, इन सभी के मूल में सेवक जी का ग्रंथ ही आधार-रूप में विद्यमान रहा है।

1966 में जबकि कृष्ण विनायक फड़के की पुस्तक बालदर्शन’ (1946), श्रीमती ज्योत्स्ना द्विवेदी की कृति हिंदी किशोर साहित्य’ (1952) और डाॅ. देवेंद्रदत्त तिवारी द्वारा संपादित बाल साहित्य की मान्यताएं एवं आदर्श’ (1962)  के सिवाय कोई और समीक्षा कृति थी ही नहीं, ऐसे में उन्होंने बाल साहित्य की महत्वपूर्ण विधा कविता के स्वरूप और प्रयोजन की चर्चा करते हुए उसके मूल्यांकन की दिशा में अपनी तरह का यह पहला काम किया।  
प्रथम संस्करण 1966 
   सेवक जी की इस कृति से केवल बाल साहित्य समीक्षा के क्षेत्र में ही नहीं, वरन् विश्वविद्यालयों में भी बाल साहित्य आलोचना तथा अनुसंधान की दिशा में संभावनाओं का सूत्रपात हुआ। प्रारंभिक बाल साहित्य शोधार्थियों के लिए यह कृति गहन अंधकार में प्रखर प्रकाश जैसी सिद्ध हुई। वर्तमान शोधार्थियों तथा समीक्षकों हेतु भी यह कृति एक अपरिहार्य संदर्भ ग्रंथ की भांति अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है। 
किसी भी पी-एच.डी. स्तर के शोध से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण इस ग्रंथ की पांडुलिपि को देखकर उनके एक मित्र ने कहा भी था- यह तुमने बिल्कुल नए विषय पर इतना काम किया है। इस पर तो तुम्हें किसी विश्वविद्यालय से डाॅक्टरेट मिल सकती है। सेवक जी ने उक्त प्रसंग को हँसकर टाल दिया था। 
फिलहाल उनकी कृति ने हिंदी बाल साहित्य में आलोचना और अनुसंधान को दिशा दी और बहुतों को डाक्टरेटकी उपाधि मिली।

सेवक जी की कृति बालगीत साहित्य बाल साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसी अनोखी और अकेली किताब है जो अब तक तीन बार अलग-अलग रुप और अंदाज में प्रकाशित हो चुकी है।
द्वित्य संस्करण 
दूसरी बार यह कृति
1983 में बालगीत साहित्य: इतिहास एवं समीक्षा नाम से स्वयं सेवक जी के द्वारा ही संशोधित और परिवर्द्धित होकर उ.प्र. हिंदी संस्थान से प्रकाशित हुई थी. खास बात यह कि इस संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण में प्रो. उषा यादव ने भरपूर श्रम किया है और इस ग्रंथ को अद्यतन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, इसके बाद भी पुस्तक की मूल भावना या संवेदना कहीं पर से प्रभावित नहीं हुई है। बड़ी बात यह भी कि उषा  जी ने बिना किसी पूर्वाग्रह या पक्षपात के उच्चकोटि की बाल कविताओं को ससम्मान उद्धृत किया है, वहीं बाल कविताओं के नाम पर खिलबाड़ जैसी लचर रचनाओं को आड़े हाथों लेकर अभूतपूर्व साहस का परिचय भी दिया है। 
प्रो. उषा यादव द्वारा संपादित यह ग्रंथ 524 पृष्ठों में कुल 14 अध्याय स्वयं में समेटे है जो कि इस प्रकार हैं-1. बाल स्वभव 2. बडों की कविता और बाल गीत 3. अलिखित बालगीत 4. शिशु गीत साहित्य 5. चांद तारों के बाल गीत 6. लोरियां, प्रभाती और पालने के गीत 7. हिंदी बालगीतो  का वर्गीकरण 8. हिंदी बालगीत साहित्य के इतिहास की भूमिका 9. हिंदी बालगीत साहित्य का इतिहास 10. हिंदी के राष्ट्रीय बालगीत 11. बालगीतो की शिक्षा एवं रचना  शिक्षा 12. लोकगीतों में बालगीत 13. हिंदी और अंग्रेजी बालगीत 14. भारती भाषाओं में बालगीत साहित्य 
उपर्युक्त अध्यायों के शीर्षकों से एक बात मोेटे तौर पर स्पष्ट हो जाती है कि बाल कविता के समूचे परिदृश्य को संजीदगी से समझनें के लिए यह एक बहुत ही जरुरी पुस्तक है। सेवक जी एक ऐसे समर्थ रचनाकार थे जिनकी कविताएं स्वयं मानक हैं। उनके कथन परिभाषा हैं। वे मानते थे कि बाल साहित्य बच्चों के मनोभावों, जिज्ञासाओं और कल्पनाओं के अनुरूप हो। जो बच्चों का मनोरंजन कर सके और  मनोरंजन भी वह जो स्वस्थ और स्वाभाविक हो। जो बच्चों को बड़ों जैसा बनाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें अपने अनुसार-अपने जैसा बनाने में सहायक हो।
उनकी सोच व्यापक थी, यही कारण है कि उक्त ग्रंथ की रचना करते समय उन्होंने बाल कविता के विस्तृत फलक को अपने अध्ययन का विषय बनाया। कविताओं की चर्चा करते समय किसी मित्रवाद या क्षेत्रवाद के वशीभूत नहीं हुए। न जाने कितने लोंगों से पत्राचार किया। दिग्गज से दिग्गज, नए से नए और गुमनाम: सभी से उनका  संपर्क था। इसीलिए चाहे बालक अमिताभ बच्चन के लिए उनके कवि पिता हरिवंश  राय द्वारा बाल कविता लिखने की बात हो या स्वर्ण सहोदर की प्रकाशन समस्या की पीड़ा। सब कुछ उनकी किताब में सहज मुखरित हुआ। यही कारण था कि उनकी यह कृति केवल बाल कविताओं का ही नहीं, बाल कवियों के अनुभवों और रचना प्रक्रिया का भी दस्तावेज बनी।  
 बता दें कि सेवक जी द्वारा पुनर्प्रस्तुत तथा संस्थान से 1983 में प्रकाशित संस्करण में 17 अध्याय थे लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि नए संस्करण में उषा जी ने किसी अध्याय को समाप्त किया गया हो। हां, आवश्यकतानुसार उन्हें कम-ज्यादा अवश्य  किया गया है। जैसे सेवक जी ने सूरदास पर अलग से सातवां अध्याय लिखा था जिसे उषा जी ने आठवें अध्याय में बहुत ही संक्षेप में लिया है। ऐसे ही सेवक जी ने बालगीतो की  शिक्षा और बालगीत रचना शिक्षा दो अलग अध्याय शामिल किए थे जिन्हें उषा जी ने एक ही अध्याय में समाहित कर दिया है। सेवक जी द्वारा अंग्रेजी की तरह बंगाली बालगीत पर भी अलग से अध्याय था किंतु उषा जी ने इसे अंतिम अध्याय भारती भाषाओं में बालगीत साहित्य में स्थान दिया है। साथ ही पूर्णता की दृष्टि से राजस्थानी, वोडो, मणिपुरी, कोंकणी के बालगीतों पर भी यथासंभव चर्चा की है। 
हां, एक प्रश्न बार-बार  अवश्य  मन में कौंधता है कि द्वितीय संस्करण की भांति इस बार कवियों के दुर्लभ चित्रों को प्रकाशित क्यों नहीं किया गया ? क्योंकि सेवक जी के जमाने में, जबकि आफसेट प्रिंटिग की व्यवस्था नहीं थी, तब कितनी कठिनाइयों के साथ कवियों के चित्र एकत्र किए गए होंगे। उनके ब्लाक बनवाए गए होंगे। अब तो यह सब सहज संभव है। गए और नए जमाने के कवियों के चित्रों को एक स्थान पर देखना पाठकों के लिए प्रभावकारी तो होता ही, यह ग्रंथ पहले की भांति एक सचित्र कोश का भी काम करता। एक बात और ग्रंथ को अद्यतन बनाने की कोशिस में संपादक ने कदाचित लेखकों से उनके बायोडाटा मंगाकर भी काम चलाया होगा या किसी परिचय कोश का सहारा लिया होगा, जो कि स्वाभाविक था किंतु इससे कुछ एक कवियों के बारे में भ्रामक सूचनाएं संकलित हो गई हैं। जैसे एक कवि ने कई बाल कवियों के संकलन 'मूछे ताने पहुचे थाने' को अपनी ही निजी पुस्तक बता दिया है। निश्चय ही इस दिशा में अतिरिक्त सतर्कता अपेक्षित थी।  
बहरहाल अमीर खुसरो से लेकर भारतेंदु और फिर स्वतंत्रता से पूर्व तथा पश्चात की बाल कविताओं का यह श्रमसाध्य इतिहास अनुपमेय है। प्रो. उषा यादव की आधुनिक समीक्षा दृष्टि ने पुनः इसे एक लंबे समय के लिए संग्रहणीय और पठनीय बना दिया है। बाल साहित्य को ऐसी अनमोल कृति देने वाले सेवक जी की पुण्यात्मा को बारंबार नमन करते हुए सफल संपादक प्रो. उषा यादव के साथ-साथ सामयिक प्रकाशन के लिए उ.प्र. हिंदी संस्थान को भी हार्दिक बधाई। 

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निरंकारदेव सेवक बाल साहित्य के एक ऐसे युगपुरुष है  जिन्होंने बाल कविता
को नए मुहावरे दिए। सच्ची बाल कविता ही वह है जिसमें बच्चों के होठों से
दोस्ती करने की ताकत हो। सेवक जी की कविताएं ऐसी ही जादुई बाल कविताएँ
हैं जो बालको के मन को सहज रीझती हैं और उनके सच्चे दोस्त की तरह अपना
रंग जमाने का दम-ख़म रखती हैं।
मानक बाल कविता क्या होती है, यह देखने-समझने के लिए सेवक जी की कालजयी
बाल कविताएँ सदैव ठोस उदहारण के रूप में उद्धृत की जाती रहेंगी।
सेवक जी को बाल साहित्य का भगीरथ कहा जाना चाहिए। वे भारत के पहले ऐसे
व्यक्ति थे जिन्होंने न केवल सचिंत भाव से उत्तम बालसाहित्य की सर्जना
की, बल्कि बाल साहित्य के मौलिक अनुसन्धान और समीक्षा के क्षेत्र में
पहलकदमी की। हिंदी में उन्होंने पहली बार बालसाहित्य की आलोचना का मार्ग
प्रशस्त किया। वे बाल साहित्य के आदि आलोचक थे।
1966 में प्रकाशित उनके अनन्य ग्रन्थ 'बाल गीत साहित्य', जिसमे बाल कविता
के इतिहास और समीक्षा को पूर्ण मनोयोग और प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत
किया गया और वह भी उस ज़माने में, जबकि बाल साहित्य के क्षेत्र में
आलोचनात्मक सामग्री का ही सर्वथा अभाव था। कितने लुप्त प्राय: नामों को
उन्होंने पुनर्जीवित ही नही, अमर कर दिया। अपने सीमित संसाधनों के बाबजूद
बाल कविता के अथाह सागर से चुन चुन कर उन्होंने रत्न निकाले और उन्हें
करीने से सजाया-संवारा। यह उनका ऐसा प्रदेय है जिसके लिए साहित्य समाज
सदैव उनका ऋणी रहेगा।
निरंकार देव सेवक को बालसाहित्य सेवक सही ही कहा जाता था ।
बाल साहित्य सेवक को मेरा सर झुकाकर नमन और अशेष श्रद्धांजलि।