गुरुवार, 2 मई 2024

हिंदी बाल कहानियों में गाँव/ डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’

आलेख

हिंदी बाल कहानियों में गाँव

डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’

भारत गाँवों का देश है। कहते हैं कि राष्ट्र की आत्मा गाँव में बसती है। ऐसा शायद इसलिए भी कहते हैं क्योंकि राष्ट्र की प्रगति का हर रास्ता गाँवों से होकर जाता है। यदि किसान फसलें न उगाए तो? अन्न, दूध, दही, घी सारी चीजें हमें गाँव के भोले-भाले लोगों की मेहनत के बदौलत ही मिलती है। बावजूद इसके गाँव के लोगों के समक्ष बड़ी समस्याएँ हैं। जब बड़ों के साथ समस्याएँ हैं तो उनके बच्चे भी उनसे रूबरू होते ही हैं। इसके बाद भी गाँव के बच्चे अपनी लगन, अपने उत्साह, और अपने परिश्रम के बल पर बढ़ रहे हैं। नाम कमा रहे हैं l

 अनेक महापुरुष मूल रूप से गाँव के ही थे किन्तु उन्होंने अपने-अपने क्षेत्रों में अद्भुत सफलता प्राप्त की। सच बात तो यह है कि गाँव का विस्तृत और विकसित रूप ही शहर है। यहां पर एक बात और, एक शब्द है 'गँवार', हम उसे इस अर्थ में लेते हैं कि कोई अशिक्षित, असभ्य या असंस्कारी व्यक्ति। ऐसा नहीं है, गँवार शब्द 'ग्राम्यार' शब्द का परिवर्तित रूप है, जिसका अर्थ है गाँव में रहने वाला। खैर... बात तो गाँव की हो रही थी तो हमें गाँव और उसके लोगों के प्रति आभारी होना चाहिए जिनकी अनुकंपा से हम फलीभूत होते हैं। 

हिंदी में आज ऐसी ढेरों बाल कहानियाँ हैं जिनमें गाँव की उल्लेखनीय उपस्थिति है l यह अलग बात है कि अधिसंख्य अर्थात गाँव के बच्चों के लिए अलग से साहित्य, लिखने की कोई व्यवस्थित परम्परा कभी नहीं रही l  पत्र-पत्रिकाओं ने भी इस दिशा में अलग से चिंतन का परिवेश निर्मित करने की दिशा में कोई पहल नहीं की l पत्र पत्रिकाओ में भी गाँव के बच्चों की जो कहानियाँ प्रकाशित हुईं, प्राय : उनके लेखक ग्रामीण परिवेश से अनभिज्ञ थे l उनके लिए कहानी में गाँव की उपस्थिति का अर्थ बस इतना भर था कि गाँव का कोई बालक शहर जाकर, किताबों की दुनिया से जुड़कर या वहा की भौतिक प्रगति से परिचित होकर सफल और सभ्य हो गया l जबकि ऐसा नहीं है, गाँव संस्कारों की धरा है l प्रो. वासुदेव शरण अग्रवाल राष्ट्र के स्वरुप की कल्पना करते हुए जिस जन, भूमि और संस्कृति की बात करते हैं, वह संस्कृति गाँव की अधिवासिनी है l शहर के बच्चों को भी गाँव से बहुत कुछ सीखना हैl 

बहरहाल अभी भी, जब शहर गाँव की ओर अपने पैर तेजी से बढ़ा रहा है, बहुतेरे गाँव हैं जिन्हें शहरीकरण की जरा भी हवा नहीं लगी हैl उन बच्चो के लिए लिखते समय बाल कथाकार ग्राम्य संवेदना से जुड़ना होगा l जिस प्रकार पानी का चित्र देखकर प्यास नहीं बुझ  सकती, वैसे गाँव के गलियारों और खेतो की पगडंडियों पर विचरण किए बिना, वहां के बच्चो से मिले और बतियाए बिना एक रोचक और सफल ग्रामीण बाल कहानी की सर्जना असंभव है l अनुभूति और सहानुभूति में अंतर होता है l लमही गाँव के कथा सम्राट प्रेमचंद की कहानी ईदगाह में हामिद के चिमटे के बहाने ग्राम्य परिवेश की पूरी अनुभूति विद्यमान है l छायावाद के चर्चित शिकार कथा लेखक श्रीराम शर्मा की स्मृति कहानी को याद कीजिए जिसमें मक्खनपुर गाँव के डाकघर में बड़े भाई की चिट्ठी डालने गए लेखक की सांप से मुठभेड़ की रोमांचक आपबीती को पढ़ते हुए रोंगटे खड़े हो जाते हैं l  

हिंदी में ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियों के अभाव और उसकी आवश्यकता को देखते हुए मैंने एक संकलन सम्पादित किया था : ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियां (2016) l उस संकलन में डॉ० उषा यादव (दादी अम्मा का खजाना, अगिया बैताल की कथा), गोविंद शर्मा (अपना काम करेंगे, मेहनत का मंत्र), डॉ० जाकिर अली रजनीश (सेमरा का शेर, सपनों का गाँव), डॉ० दिविक रमेश (किस्स्सा चाचा तरकीबू राम का), डॉ० नागेश पांडेय 'संजय' (गौतर, मन का डर), प्रकाश मनु (तुम भी पढ़ोगे जस्सू, जमुना दादी), मुरलीधर वैष्णव (हबपब टोली), डॉ० मोहम्मद अरशद खान (हजार आँखों की प्रतीक्षा, बुद्ध काका और मनफेर ताऊ), डॉ० मोहम्मद साजिद खान (बैल खुल गए, बरगदी गाँव), रमाशंकर (शर्तों के सहारे-आई बहारें, कायाकल्प), रावेंद्र कुमार 'रवि' (मिल गई माँ), डॉ० श्रीप्रसाद (काला हाथ, यह सच है), संजीव जायसवाल 'संजय' (लोहार का बेटा), डॉ० सुनीता (सींक वाली ताई, करमू चाचा का ताँगा), डॉ० हेमन्त कुमार (आलस्य का फल) जैसे समकालीन लेखकों की गाँव के इर्द गिर्द घूमती बाल कहानियाँ थीं l गाँव के बच्चों की सोच, उनके जीवन और चिंतन को उद्घाटित करने का प्रयास इन कहानियों में था । शहर के नजरिए से भी गाँव को देखने-समझने की कोशिश थी। मेरी भावना थी कि गाँव और शहर के बच्चे परस्पर जुड़ें l गाँव के बच्चे तो शहर और उसके बच्चों के बारे में जानते हैं लेकिन शहर के बच्चे भी गाँव को समझें l इस तरह से दोनों में एक संवाद स्थापित करने की चेष्टा इसमें थी। 

समकालीन बाल साहित्य लेखकों की कहानियों में गाँव की बहुरंगी छवियां मिल ही जाती हैं l कुछ रचनाकारों ने तो शहर में बसकर भी अपने भीतर का गंवईपन बचाकर रखा है l उनकी कहानियों में ग्राम्य संवेदनाएं उफान मारती चलती हैं l ऐसा उफान कि पाठक का मन भीग जाएl मोहम्मद अरशद खान की एक लाजवाब और बेमिसाल कहानी है ‘गुल्लक’, इसे जरुर पढ़ा जाना चाहिए l मैने न जाने कितनी बार उसे पढ़ा है और जब भी पढ़ा, आँसू रोक नहीं पाया हूँ। आत्मा को छू लेने वाली अद्भुत कहानी। अरशद का नाम आते ही यह कहानी मेरे मस्तिष्क में तैर उठती है। मेरा मन भीग जाता है। गाँव में निलमिया जैसी कितनी ही कर्मठ और माँ-बाप के लिए त्याग से लबरेज बेटियाँ हैं जिनका सच्चा प्रतिनिधित्व इस कहानी में देखा जा सकता है। (बालिकाओं की श्रेष्ठ कहानियां, पृ. 114)

पद्मश्री प्रो. उषा यादव की ‘दादी अम्मा का खजाना’ कहानी में गाँव के हर व्यक्ति को कुतूहल है कि उस खजाने में क्या है ? एक ठग उनके खजाने की फ़िराक में नकली परपोता बनकर उनसे मिलने आता हैl भोली दादी उसकी खूब खातिर करती हैं l ठग जब मीठी-मीठी बातों से उनके खजाने की जानकारी कर लेता है तो उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है l इस कहानी में पुरानी चीजों को सहेज कर रखने की बुजुर्गों की आदत का बड़ा ही संवेदनशील वर्णन है l (ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियाँ, पृ.9 )

मुझे याद है अपनी माता जी के निधन के बहुत दिनों के बाद, जब उनका बक्सा खोलकर देखा गया था तो उसमे मेरे जन्मकाल से दो-तीन वर्ष तक की अवस्था के वर्षों पुराने कपड़े रखे मिले थे l मेरी करधनी, कड़ा, गले की माला सब कुछ उस खजाने में सुरक्षित था जिसे देख, मैं फूट-फूटकर रोया था और तब अवचेतन में उषा जी की इस कहानी की दादी भी मुझे उद्वेलित कर रही थींl 

डॉ. दिविक रमेश की कहानी ‘किस्सा चाचा तरकीबूराम का’ बच्चों में लोकप्रिय चाचा की कहानी है जिनके किस्से बड़े ही मजेदार हैं और उससे भी मजेदार है लेखक की कहन शैली l कहानी का अंत देखिए, ‘मुझे एक और किस्सा याद हो आया तुम भी क्या कहोगे कि चाचा तरकीबूराम के ही किस्से सुनाने पर लग गएl अब तुम अपने कोर्स की किताब पढ़ लो l शायद तुम्हें यह नहीं मालूम कि चाचा तरकीबूराम यह कभी नहीं चाहते कि उनके किस्से सुनने पढ़ने वाले बच्चे अपने स्कूल की पढ़ाई में फिसड्डी रहें l उन्होंने खास तौर पर कहा था कि उनके किस्से उन्हीं बच्चों को बताए जाएँ जो खूब मन लगाकर पढ़ते हो l (ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियाँ, पृ. 46)

डॉ. श्रीप्रसाद की कहानी ‘यह सच है’ के पंडित रामदीन पूरे गांव में लोकप्रिय हैं l वे अचानक गायब हो जाते हैं l उनके वापस न आने पर गांव में उन्हें मृत मानकर, उनकी आत्मा की शांति के लिए तेरहवी की दावत रखी जाती है लेकिन अनायास रामदीन पंडित प्रकट हो जाते हैं l लोग उन्हें भूत समझकर भयभीत होते हैं l सच, अगर वह अकेले में किसी को मिलते तो शायद उसकी हृदय गति भी बंद हो जाती l मजेदार बात यह कि हारे थके रामदीन जब यह कहते हैं, ‘मेरे मरने की बात कैसे सोच ली ? .... मुझे भी भूख लगी है l मैं भी बैठता हूँ l’ तो खुद की तेरहवी की दावत खाने की यह सच्ची घटना पाठक को हंसाती ही नहीं, चमत्कृत भी कर देती है l  ((ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियाँ, पृ. 123)

मौन साधक विनायक जी वैसे तो वन्य जीवन के विशेषज्ञ लेखक हैं लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से उनकी कहानियों में गाँव की जीती-जागती तस्वीर देख सकते हैं l हाल ही में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘माँ की महक तथा अन्य कहानियाँ’ में मानवेतर पात्र सियारू का गाँव-कसबे और उसके वाशिंदों को लेकर किया गया चिंतन तो बाल साहित्य में एकदम नया है l विनायक जी की चित्रोपम शैली भी ताजगी भरी होती है l पाठक जैसे पढ़ नहीं, कोई फिल्म सी देख रहा होता है l उनकी कलम से सियारू का वर्णन देखिए : और अब समय आगे बढ़ गया है। माँ के चुंबन तथा उसके पीछे लगे रहने वाला सान्निध्य, सब वक्त के प्रवाह में बह गए हैं। सियारू अब जंगल में हैं। एकदम अकेले। लेकिन कस्बे के साए में बिताए हुए दिनों में उन्हें जो खट्टे-मीठे व जीभ जला देने वाले, तिक्त, अनुभव हुए हैं, उन्हें वे भूले नहीं हैं। वे आज भी उनकी दुम पकड़े लटके हुए हैं। एक तो सियारू का कोमल मन आज तक इस गुत्थी को सुलझा नहीं पाया कि मनुष्य क्यों कुछ जानवरों को इतना लाड़ देता है और क्यों कुछ के पीछे ही पड़ा रहता है। कभी-कभी तो जान ले लेने तक। और कुछ नहीं तो पीछे कुत्ते ही छोड़ देता है। जानवर के पीछे जानवर। खूँखार। पक्के दुश्मन बनाए हुए। आखिर ऐसा क्यों? और इसी भारी-भरकम 'क्यों' का उत्तर सियारू आज तक नहीं खोज पाए। अब इसी दो मुँहे इंसानी व्यवहार से ही तो आजिज आ कर सियारू इतने परेशान हुए कि वयस्कता की दहलीज चूमते ही वानप्रस्थी हो गए। कस्बे के आस-पास पल रहे मोटे चूहों तथा इधर-उधर पड़े, मनलुभावने खाद्य-पदार्थों का मोह त्याग उन्होंने जंगल का रुख कर लिया। और अब उन्होंने कस्बे के मुर्गे-मुर्गी चुराने और हर समय जान जोखिम में डालने वाले जीवन से मुक्ति पा ली थी।

भगवती प्रसाद द्विवेदी की पुस्तक ‘मेरी प्रिय बाल कहानियां’ की कहानियाँ किसी-न-किसी रूप से गांव से जुड़ी हुई हैं। इनके कथानक और परिवेश तो ग्रामीण जीवन के हैं ही,लोक की खुशबू भी इनमें महसूस की जा सकती है।  'नकली महात्मा',जिसका नायक सीतू गांव की मित्र-मंडली के साथ कबड्डी खेल रहा होता है, तभी मैदान में एक मजमा लगाए महात्मा को देख सभी वहां जा पहुंचते हैं। महात्मा जब पानी पर तैरते चमत्कारी पत्थर को दिखाकर ग्रामीणों को मूर्ख बना रुपये ऐंठना चाहते हैं तो सीतू आगे बढ़कर वैज्ञानिक तरीके से सच का पर्दाफाश करता है और नकली महात्मा की पोल खोलता हैl

गाँव में अशिक्षा के चलते अनेकानेक अन्धविश्वास प्रभावी रहते हैं l भोले भाले गाँव के लोग इस कारण धूर्तों की चालबाजी के भी शिकार हो जाते हैं l अखिलेश श्रीवास्तव चमन की  ‘जंतर मंतर’ कहानी में लुटेरे ज्योतिषी बनकर आते हैं और गृह नक्षत्रों का भय दिखाकर तंत्र मंत्र की बात करते हैंl (बाल किलकारी,  जून 2019)

इन पंक्तियों के लेखक (डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’) की कहानी ‘गौंतर’ में गाँव का परिवेश ही नहीं, भाषा भी रची-पगी है l मेहुल एक विशेष कारण से मामा के गाँव नहीं जाता l मामा पूछ पूछ कर थक जाते है तब जाकर अंत में रहस्य खुलता है कि उनके यहाँ शौचालय नहीं है l सब  खुले में जाते हैं l मामा का जवाब देखिए : 'बचुआ, अब बहु जमाना गओ। गाँव मां हर बखरी... मतलब मकान के सामने सरकार ने शउचालय बनवाय दय हयिं।... हमने तउ खुदइ बनवाइ लओ रहयि। अब तुम्हई कोई दिक्कत नाहि हुयहयि। तुमने पहिले काहि नाहिं कही ?' (बाल वाणी, जुलाई 2016, पृ. 18 )

मनोहर चमोली मनु की सच्ची हास्य कहानी  ‘कहीं संतला न आ जाए’ की नायिका संतला पहाड़ी गाँव में रहती है जिसका मुर्गा चोरी हो जाता है l वह एक हाथ में लानटेन और चिमटा लिए हर घर के चूल्हों पर चढ़े बर्तन चेक करती है l वह जिस घर से निकलती, कोई न कोई बच्चा उसके साथ हो लेता l इससे एक रेल सी बन गई और इस रेल का स्टेशन था हर घर की रसोई l उसे विश्वास है कि वह खुशबू से ही अपने मुर्गे को पहचान लेगी l मजा तो तब आता है जब मुर्गा उसके ही घर में छिपा मिलता है (साइकिल दिसंबर-जनवरी 2020, पृ. 51)

बाल साहित्य आलोचना को आगे बढाने वाले डॉ. प्रकाश मनु की कहानी ‘जमुना दादी’ के भी क्या कहने l वे बच्चों को कहानियां सुनाती हैं l जामुन खिलाती हैं लेकिन उनके जाने के बाद वह जामुन का पेड़ बहुत उदास नजर आता थाl जैसे जमुना दादी को याद कर वह पेड़ भी रो रहा हो l जामुन तोड़कर खाने का ख्याल मन में नहीं आता था l  (ग्रामीण परिवेश की बाल कहानियाँ, पृ.67)

इन दिनों बालगीत के क्षेत्र में महारत प्राप्त प्रभुदयाल श्रीवास्तव ने अच्छी बाल कहानियां भी लिखी हैं l गाँव से जुडी उनकी कहानी बिजली या विज्ञान के अन्य चमत्कारों से सतर्क और सावधान रहने की प्रेरणा देती हैl (दादाजी का पद्दू,पृ. 46)

नए रचनाकार निश्चल की ‘कंचों की चमक’ विक्कू और उसके आनंद सर की मनोवैज्ञानिक कहानी है l सरल-सहज और स्वाभाविक भाषा में लेखक ने एक बालक के जीवन में परामर्श और निर्देशन की ज़रूरत को उकेरा हैं l गाँव में तो इसकी विशेष रूप से आवश्यकता है l (कंचों की चमक, पृष्ठ 27)

डॉ. राकेश चक्र की कहानी ‘कुटवारिन दादी’ में गाँव में विद्यमान अस्पृश्यता के निवारण में दादी की प्रणम्य भूमिका का वर्णन है l सामाजिक समरसता की दृष्टि से ऐसी रचनाओं की सदैव आवश्यकता है l (लजीज पुलाव, पृष्ठ 8) 

राजा चौरसिया ग्रामीण अंचल में जीवन यापन करने वाले समर्थ कवि हैं l उनकी कहानी ‘श्यामू की सोच’ नवीनता के साथ साथ पुरातनता के संरक्षण का भी पक्ष उद्घाटित करती है l यह प्रतीकात्मक कहानी हैl नया भी कभी पुराना होगा इसलिए हमें अपने बुजुर्गों के प्रति भी निष्ठावान रहना चाहिएl (गाँव की पूजा, पृष्ठ 18)

रजनीकांत शुक्ल ने वीर बच्चों की सच्ची कहानियां लिखी हैं l उनकी पुस्तक बहादुरी की प्रेरक घटनाएँ (2015) में ज्यादातर गाँव के ही बच्चे हैं l गाँव के बच्चों का अदम्य साहस देखने के लिए शुक्ल जी की ये कहानियाँ सदैव अपना महत्त्व परिलक्षित करती रहेंगी l 

दयाराम मौर्य रतन की कहानी ‘भूत’ गाँव में प्राय: विद्यमान अंधविश्वास पर केन्द्रित हैl इसमें शिक्षा का महत्त्व भी सरलता से वर्णित है l (परीलोक का भ्रमण, पृ. 29)

डॉ. बानो सरताज की गीतों भरी कहानी की पुस्तक ‘कुछ तुम बोलो कुछ हम’ में संकलित शिक्षाप्रद कहानी ‘अब काहे के सौ’, में गांव के गोविंदा के संवाद रीझ लेते हैं : दस  में खरीदी आल्टी-बाल्टी, दस में खरीदी रस्सीl  अब काहे के अस्सी ? (पृ. 64)

डॉ. शशि गोयल की कहानी ‘सलोनी’ में दादी के प्रति बच्चों के संवेदित प्रेम की झलक है और गांव की अलमस्ती का आनंद भी l  (सींग वाले शैतान, पृ. 24)

शुभदा पांडे की कहानी ‘जोडागाछ के सहचर’ में तूफान के बाद गांव में मची तबाही का क्या मार्मिक वर्णन है ! ऐसी कहानियाँ रोमांचक तो होती ही हैं, विषम परिस्थितियों से जूझने का जज्बा भी परोसती हैंl पुस्तक (इंदुपरी का पत्र, पृ. 27)

डॉ. अमिता दुबे की कहानी ‘अनोखी छुट्टियां’ में दादी के बीमार होने की सूचना पर पापा के साथ गांव पहुंचे क्षितिज का वापस आने का मन ही नहीं करता l बच्चों को अपनी जड़ों से जोड़ने और उन्हें अपनी थाती से परिचित कराने का भी जिम्मा हमारा ही है l शहर में बस चुके महानुभावों को इस दिशा में सोचना होगा (नंदन, मई 2016 , पृष्ठ 48)

बाल साहित्य आलोचना के क्षेत्र में विशेष सक्रिय डॉ. शकुंतला कालरा की कहानी ‘नंदू की सूझबूझ’ में नंदू गांव से अपने मां के साथ दिल्ली का विश्व पुस्तक मेला देखने आता हैl कहानी का विषय एकदम नया है l बच्चों को अधुनातन जानकारी दिलाना भी लेखकों का दायित्व है और इस दृष्टि से यह कहानी अत्यंत उपयोगी हैl ( (माँ का उपहार, पृ. 29)

प्रभात गुप्त की एक कहानी ‘बंदरों की निर्मम हत्या’ मे गाँव बेला के लोग बंदरों के आतंक से पीड़ित होने के कारण उन्हें पीट-पीट कर मारना शुरू कर देते हैं l यह कहानी वन्यजीवों के प्रति दया भाव  के सन्देश के साथ साथ ऐसे अमानुषिक लोगों पर वैधानिक प्रक्रिया की भी शिक्षा देती है (पृ. 46)

डॉ. सत्य नारायण सत्य की कहानी काले काले तेज उजाले  कस्बानुमा गांव की कहानी है जिसमें अंधेरे में रहने वाले बच्चों की परिस्थितियों का वर्णन हैl कहानी में सहज हास्य भी विद्यमान है : अँधेरा कायम रहे l (शिविरा, सितंबर 2023, पृ. 69) 

डॉ. मोहम्मद साजिद खान ने ग्राम्य परिवेश के अनुभवी और परिपक्व लेखक हैं l उनकी ‘होली कुछ ऐसी भी’ कहानी साम्प्रदायिक सद्भाव की प्रेरक कहानी है l गाँवों के डेलखेड़ा भवानीपुर, कल्यानपुर, चमकनी, पैदापुर और गिरगिचा जैसे नाम कहानी को यथार्थ से जोड़ देते हैं l कहानी का अभीष्ट हमारे धर्म निरपेक्ष देश की असली ताकत को बयां करता है l दृष्टव्य : मियाँ को सारी वस्तु- स्थिति समझने में देर न लगी। उन्होंने बात संभालते हुए धीरे से मिट्ठू के कान में कहा -"गुलाल है रे l मिट्टू यह बात सुन अचरज से बोल उठा- "मियाँ तुम और गुलाल...??" 

मियाँ ने जमीला चाची की ओर देखा। जमीला चची ने उनकी आँखें पढ़ लीं- "हाँ-हाँ, क्यों नहीं! रंगों की कोई जाति या धर्म नहीं होता...!" उनके इतना कहते ही मुट्ठी-मुट्ठी गुलाल से पूरा आसमान रंग गया। सभी सराबोर हो गए। वातावरण फिर से चुहल, हुल्लड़ और उल्लास में बदल गया।  (बाल वाटिका, मार्च 2022, पृष्ठ 22)

गाँव से जुडी कहानियाँ तो इतनी हैं कि अनेक शोध प्रबंध लिखे जा सकते हैं l शोधकर्ताओं के लिए यह एक नया विषय होगा तथापि गाँव में शहर (डॉ. राष्ट्रबंधु), घमंडी बढई (डॉ. रोहिताश्व अस्थाना), हीरा मुझे माफ़ करना (डॉ. भैरूंलाल गर्ग ), बल्दू का छोटा भाई किशन (इंदरमन साहू), जंगल का भूत (हूंदराज बलवाणी), एक था गोलू (रूप सिंह चंदेल), मदन का भाई नंदू (कमल चोपड़ा), सुक्खो का भूत (कमलेश भट्ट कमल), गांव की सैर (दिनेश पाठक शशि), जल उठे दिए (नीलम राकेश), बैक वार्ड या स्मार्ट (शिखरचन्द्र जैन), तीन शिकारी (चित्रेश), लाट साहबों का पानी (गोविन्द शर्मा), बात की कीमत (रतन सिंह किरमोलिया), मिट्ठू चाचा (पवन कुमार वर्मा), कला का सम्मान (रमेश चन्द्र पन्त) जैसी ढेर सारी कहानियाँ हैं, जहाँ गाँव का पसारा है l जहाँ गाँव के विविध स्वरूप हैं l जी हाँ, उस प्रणम्य गाँव के, जहाँ सहजता है, सरलता है, मौलिकता है l नैसर्गिकता है l प्रकृति का वैभव है l जिजीविषा है l आस है l आत्मविश्वास है l ...और सबसे बड़ी बात कि हमारी थाती है जो याद दिलाती है कि हम कितने भी अधुनातन क्यों न हो जाएँ, हमारी जड़ें गाँव में हैं क्योंकि हमारे पुरखों ने यहीँ अपना जीवन बिताया है l यहां के खेतो की मिटटी में उनका पसीना बरसा है और अंत में उनके शरीर की राख भी इसी मिटटी में मिल खप गई है l इस मिटटी का ऋण कभी चुकता न होगा l अपने गाँव की इस मिटटी को नमन करने के लिए हम इससे जुड़े रहें और अपने बच्चों को जोड़े रहें l

बाल कहानियों में जब गाँव ध्वनित होता है तो वह बच्चों में संवेदनाएं भी जगाता है l इस बहाने अपनों लगाव बना रहेगा l रिश्ते बचे रहेंगे l प्रेम बचा रहेगा l प्रेम है तो वास्तविक जीवन है अन्यथा हम मशीन तो बनते ही जा रहे हैं l  

आइए, जीवन की तलाश में गाँव की सोंधी महक वाली बाल कहानियों का स्वागत करें l 

■ डॉ. नागेश पांडेय ‘संजय’, 237, सुभाष नगर, शाहजहांपुर-242 001 (उत्तर प्रदेश) 

(बाल वाटिका, मई 2024 अंक में प्रकाशित)

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