बुधवार, 29 अप्रैल 2020

आलेख : बाल साहित्य के जादूगर: डा. राष्ट्रबंधु

आलेख
बाल साहित्य के जादूगर: डा. राष्ट्रबंधु
- डा. नागेश  पांडेय ‘संजय’

2 मार्च,2015
आसमान में काले-काले मेघ और बिजली की तेज गड़गड़ाहट। बारिस थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। 
मैं हरिद्वार में था। अमृतसर से चलकर सुबह साढ़े आठ के आसपास वहां पहुंचा था। कुछ देर वेटिंगरूम में बैठा रहा मगर जब बादलों की मंषा स्पष्ट हो गई कि वे रुकने वाले नहीं तो बैग सामानघर में जमा किया, दस रुपये की एक प्लास्टिक-पन्नी खरीदी और उसे ओढ़कर हर की पेड़ी के लिए निकल पड़ा।
हहर हहर। गंगाजी पूरे वेग में थीं। जिसे जहां जगह मिली, दुबका खड़ा था। कम ही साहसी थे जो स्नान कर रहे थे। मैं कुछ निर्णय नहीं कर पा रहा था। पहली बार ऐसा हुआ है कि गंगा स्नान के लिए कोई एक घंटे इधर-उधर भटका हूं। हार मान कर भीगते हुए ही नहाया। पुल के नीचे कपड़े बदले। तर्पण करने आए कुछ लोग भी वहां पर थे। मेरे मन में अजीब-सी बेचैनी हुई। वहां से चल दिया। पुल पर आया तो बारिस कुछ धीमी हो गई। गलियां पानी से लबालब थीं। जैसे-तैसे एक चाय की दूकान पर पहुंचा। अचानक बारिस फिर तेज हो गई।
मुझे डा. राष्ट्रबंधु जी याद आए। राष्ट्रबंधु जी क्या, उनकी कविता याद आई। हां, वही....काले मेघा पानी दे। इस गजब की कविता को उनके सुरीले सुर में जाने कितनी बार सुना है। जब भी सुना है, झूम उठा हूं। मैं क्या, जिसने भी सुना होगा, कविता की लय के साथ-साथ उसकी तालियां बजी होंगी। जब भी बरसात होती है, यह कविता मेरे मन में तैर उठती है मगर मन में तो आज षिकायत जैसी थी ...उफ कितना पानी? मन विनोद के मूड में आ गया। मैंने राष्ट्रबंधु जी को फोन मिला दिया। यही कहने के लिए कि हरिद्वार में आज काले मेघा क्या झमाझम पानी दे रहे हैं। फोन तुरंत रिसीव हुआ लेकिन आवाज षषि षुक्ला की गूंजी, परेषान-सी बोलीं-‘भैया, दादा की तबियत बहुत खराब है।‘
मैंने कहा, बात करा दीजिए तो उन्होंने कहा, बात नहीं हो पाएगी। फिर बोलीं कि हम घर पहुंचकर आपसे बात करंेगे। मन अनहोनी आषंकाओं से भर उठा। मैंने पूछा, ‘क्या हो गया उन्हें?’
उन्होंने बताया,‘सांस बहुत फूल रही है। सुबह सीढ़ी चढ़ते हुए गिर गए थे। दो अनजान लड़कों ने उन्हें कोच तक पहुंचाया। हम और विनोद त्रिपाठी उनके साथ हैं। भैया, बहुत डर लग रहा है, क्या होगा?’
1 मार्च को सुबह पटियाला में जब उनके पैर छुए तो छूटते ही बोले थे, ‘मैं चला जााऊँगा, बालसाहित्य तुम लोग सँभालोगे।’ षषि जी भी वहां थीं। मैं तो चुपचाप उन्हें देखता रह गया था लेकिन षषि जी ने तुरंत पूछा था, ‘दादा, कहां चले जाओगे?’
रोबदार आवाज में बोले थे, ‘अरे! ऊपर चला जाऊंगा, और कहां?’
समझ नहीं आता कि ऐसा अकाट्य कथन उनके मुख से क्यों निकल गया? क्या उन्हें आसन्न मृत्यु का पूर्वाभास हो गया था?
...
पटियाला की बाल साहित्य संगोष्ठी उनके जीवन की अंतिम संगोष्ठी हो जाएगी, किसने सोचा था? सब हंसते-चहकते साथ थे। ठहाके गूंज रहे थे। खा-पी रहे थे। योजनाएं बन रही थीं। 1 मार्च को पटियाला से बस से अमृतसर के लिए निकले तो सामान्य थे। रास्ते में दुर्गा सप्तशती और सुंदरकांड का पाठ किया। फतहगढ़ साहिब गुरुद्वारा में मत्था टेका। लंगर छका। अमृतसर पहुंचते-पहुंचते देर हो गई थी। 4 बज गए थे।
तांगे पर बैठकर हम स्वर्णमंदिर के द्वार तक साथ गए। वहां उनके साथ फोटो खिंचाया। क्या खबर थी कि वह फोटो, फोटो क्या ....वह साथ, वह बात, वह यात्रा - सब कुछ ....आखिरी था।
बस में ही उन्होंने डा. दर्शन सिंह आषट से कह दिया था, ‘मैं अब कहीं नहीं जाता। तुस्सी मैंनंू किथ्थों बिठा देना। मैं तो अब बाहेगुरु दा जाप करंगा।’
आषट जी ने स्वर्णमंदिर परिसर में ही गंगा निवास में ठहरने की व्यवस्था की थी। मगर वे उसे खोज नहीं पा रहे थे। थोड़ी असहजता महसूस हो रही थी।
मैं राष्ट्रबंधु जी का हाथ पकड़े धीमें-धीमें चल रहा था। हल्की-हल्की बूंदें पड़ रही थीं। वे भीग रहे थे। पैदल चलने से थक भी रहे थे। इन्हें कुछ विश्राम मिल जाए, यह सोचकर मैंने उनसे पूछा, ‘दादा आप दूध या चाय कुछ लेंगे?’ मगर उन्होंने मना कर दिया। आषट जी ने परिस्थिति को भांप लिया। एक दूकानदार से आग्रह कर उनके लिए कुर्सी मांगी। कहा, ‘आप बैठिए। हम लोग सामान रखकर आपको ले जाएंगे।’
गंगा निवास में सबको षिफ्ट कर आषट जी उन्हें ले आए। मेरी ट्रेन रात में 10 बजे थी। राजीव सक्सेना और सृजन के साथ भीगते-भागते मंदिर और जलियांवाला बाग देखा। लंगर छका।
गंगा निवास पहुंचा। उनसे औपचारिक बातें हुईं। कुछ परेषान से थे। बोले, ‘मैं कल क्या करुंगा? मुझे पता नहीं कि मेरी सीट कन्फर्म हुई या नहीं। जिनके पास मेरी टिकट है, उनका फोन नहीं उठ रहा।’ फिर कहा, ‘कल सफर में खाने के लिए कुछ नहीं है। मेरे पास पेपर सोप भी नहीं है।’
षषि जी उन्हें समझाने लगीं, ‘आप परेषान क्यों हो रहे हैं? हम लोग हैं तो। सब इंतजाम करेंगे।’
राजीव जी बोले, ‘बताओ दादा। आपको क्या मंगाना है?’
बोले, ‘कुछ बिस्किट और ब्रेड ला दो। हां, पापड़ और मिठौरी मशहूर हैं यहां। वे भी ले आना। घर ले जाऊँगा।’
फिर मुझसे 500 का चेंज मांगा। मेरे पास अतिरिक्त पेपर सोप था। मैंने उनकी सदरी में डाल दिया।
राजीव जी बहुत जल्दी सारा सामान ले आए। मैंने पूछा, ‘आप भोजन करने जाएंगे?’ तो मना कर दिया। कोई साढ़े आठ बजे मैंने पैर छूते हुए कहा, ‘आज्ञा दीजिए। मैं चलता हूं। मौसम ठीक नहीं, स्टेषन पर जाकर बैठूंगा।’
सहज भाव से बोले, ‘ठीक है। प्रसन्न रहिए। अपने माता-पिता को मेरा प्रणाम कहना। समीक्षा और सृष्टि को मेरा प्यार कहना।’ फिर मेरी ओर बड़ी स्निग्धता से देखने लगे। कुछ रुककर बोले, ‘चलो मैं भी तुम्हारे साथ नीचे चलता हूं। मुझे स्वर्ण मंदिर मत्था टेकने जाना है और अब मैं खाना भी खाऊंगा।’
शशि जी तैयार हो रही थीं। उनसे बोले, ‘बिटिया, तुम नीचे आ जाना।’ फिर मेरे साथ लिफ्ट से नीचे आ गए। कुछ औपचारिक बातें हुई और मैं पुनः उनके चरण स्पर्ष कर स्टेषन चला आया।
इस बात से बेखबर कि अब उनसे कभी मिलना न होगा।
....
हरिद्वार में मन बेचैन था। बस, उनके स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना करता रहा। रहा नहीं गया तो उनके संस्थान के मंत्री षर्मा जी, जो उसी ट्रेन में एसी कोच में यात्रा कर रहे थे, से उनकी तबियत के बारे मे पूछा। फिर भी संतुष्टि नहीं हुई तो मैंने उनके पौत्र ऋषि तिवारी को फोन किया। पता चला कि तबियत ठीक नहीं है। बाबा को पानीपत स्टेषन पर उतारा जा रहा था लेकिन वे नहीं माने। कहा कि वे कानपुर जाना चाहते हैं।
ऋषि ने कहा, ‘चाचा, आते ही हम उन्हें सीधे अस्पताल ले जाएंगे।‘
आम्रपाली एक्सप्रेस को रात 10 बजे कानपुर पहुंचना था मगर वह लेट होती गई। हरिद्वार से षाहजहांपुर मैं रात 11 बजे पहुंचा। मैंने उनके पुत्र भारत से बात की। पता चला ट्रेन 1 बजे आएगी। होते-होते ट्रेन रात 3 बजे पहुंची। व्हील चेयर की व्यवस्था पहले से थी। उसे पकड़ कर ले जाने के लिए कुली की भी। किंतु उस पर जाने वाला दुनियां को अलविदा कह चुका था। देह षीत थी, निष्वास। कुली ने स्थिति को समझ पहले आनाकानी की फिर उन्हें बाहर छोड़ आया। उसने पैसे भी नहीं लिए।
किसी एक किरण की आस लिए पुत्र भारत और पौत्र पुष्कर-ऋषि उन्हें अस्पताल लेकर भागे। मगर ....
यात्रा महायात्रा बन गई। यात्री महायात्री हो गया। सबको जगाने वाला सो गया।
बहू उनका कमरा साफ किए प्रतीक्षारत थी। नयी चादर बिछाई थी। ...पिताजी आ रहे हैं।
उतते कोउ न आवई, जासे पूछूं धाय।
इतते ही सब जात हैं, भार लदाय-लदाय।
...लेकिन वह महायायावर भार नहीं, आभार लेकर गया है। बाल साहित्य का कोना-कोना उसका आभारी है। डा. हरिकृष्ण देवसरे उन्हें बाल साहित्य का कबीर कहते थे। जयप्रकाष भारती के अनुसार वे बाल साहित्य के चैधरी थे। उनकी एक आवाज पर मजमा लग जाता था। वे जादूगर थे, बाल साहित्य के जादूगर। बाल साहित्यकारों के लिए माली थे वे। सबको एक सूत्र में पिरो रखा था। सबकी खोज-सबकी खबर। सबसे मिलना-जुलना उनकी आदत में षुमार में था। सबके सुख-दुख में षामिल होते थे। यायावरी में निर्विकल्प। फलां बालसाहित्यकार के बेटे या बेटी का विवाह है। महाषय का झोला तैयार है। अमुक बालसाहित्यकार नहीं रहा। महाषय का पहुंचना तय है। कहीं भी बाल साहित्य का आयोजन हो, किराया मिले न मिले। रिजर्वेषन हो या न हो। पंडित जी ए टू जेड रेडी। अभी दिसंबर,2014 में नांदेड़,महाराष्ट्र में 24 को कार्यक्रम था और 26 को राजसमंद,राजस्थान में। जिजमान दोनों जगह पहुंचे। वाह! बाल साहित्य के बेजोड़ खिलाड़ी। बेजोड़ तुम्हारी चाईं-माईं।
न जाने किस अंतप्र्रेरणा से मैं पटियाला में उनके अंतिम काव्य पाठ का वीडियो बना बैठा। मैंने उसे यू ट्यूब पर  पोस्ट किया है।
चिरपरिचित अंदाज में उन्होंने यह कविता सुनाई थी-
बैठे हो तुम क्यों? हो गुमसुम क्यों? कभी पिटाई, कभी मिठाई दीदी से कह दो,पापड़ न बेलो। ....तुमने क्या खाया? क्या-क्या मंगाया? चूरन की गोलियां, कंपट की गोलियां। ताके न कोई, बांट-बांट ले लो। चाईं माईं खेलो। चाईं माईं खेलो। 
उनके अंतिम भाषण का वीडियो भी बनाया था। अंतिम भाषण का विस्तृत वीडियो भी यूट्यूब पर अपलोड है।
...
3 मार्च को मुझे रात चार बजे उनके पुत्र भारत का फोन आया। मैं समझ गया था कि वे क्या कहनेवाले हैं फिर भी मन एक  कल्पना संजोए था कि वे कहें, पिताजी अब ठीक हैं।
भारत जी ने कहा, ‘नागेष जी, पिताजी चले गए।’ फिर जैसे कान सुन्न हो गए। एक रोज पहले उनका हाथ पकड़े मैं उन्हें स्वर्ण मंदिर के द्वार तक ले गया था। रात में मेरे प्रस्थान के समय वे लिफ्ट से नीचे तक साथ आए थे। सब कुछ स्वप्न हो गया। आकस्मिक वज्रपात...वह भी अनभ्र !
...
अभी 14 फरवरी को मैं इलाहाबाद गया था। षाहजहांपुर के लिए ट्रेन रात में थी तो कानपुर उनके घर चला गया। ट्रेन लेट हो गई। मुझे बहुत संकोच। बार-बार उनका फोन आ रहा था। बोले, ‘मैं भी आपका इंतजार कर रहा हूं और भोजन भी।’ रात 11 बजे पहुंचा। जागते मिले।
सुबह चलने को हुआ तो मुझे पटियाला आने के लिए राजी कर लिया। वापसी में रिजर्वेषन नहीं था। मुझे मजबूरन अमृतसर से वाया हरिद्वार का टिकट बनवाना पड़ा। अब सोचता हूं, विधि के विधान में कितनी षक्ति है। उनका कहा न मानता तो आजन्म पष्चात्ताप करता।
अलख जगाने में उनका जबाव न था। सारे देष में बाल साहित्य के आयोजनों में उनकी मुख्य भूमिका रहती थी। प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति भवन तक और देष-विदेष में बाल साहित्य का परचम फहराने के लिए वे बार-बार याद आएंगे। कोई भी आयोजन बगैर उनके बहुत अधूरा-सा लगेगा। कहीं भी आयोजन होता। एक पुनरुक्ति तो कानों में गूंजती ही रहती थी, जो भी आता-‘राष्ट्रबंधु जी किधर हैं?’
अब वह चेहरा कहां दिखेगा?
...
उनके निधन के बाद कानपुर दो बार हो आया हूं। बड़ा कचोटता-सा लगा कानपुर। उनकी अनुपस्थिति में मैं दो-तीन बार ही कानपुर गया हूं। पता चलता था कि यात्रा में हैं। अब तो वे महायात्रा पर हैं। कभी न लौटेंगे।
1994 में उनसे पहली मुलाकात हुई थी, उ.प्र. हिंदी संस्थान के सर्वभाषा बाल साहित्य समारोह में। वक्तव्य में उन्होंने कहा था,‘कविता आंखों का नहीं, कानों का विषय है।’ फिर उन्होंने यह लोरी सुनाई थी-सच कहता हूं, उनका मुरीद हो गया था। लोरियां बहुतेरी लिखी गईं पर ऐसी...? मुझे लगता है ऐसी रचनाएं लिखी नहीं जातीं, लिख जाती हैं। कोई अदृष्य षक्ति लिखा जाती है। आष्चर्य होता है, जब कुछ स्वनामधन्य यह मषवरा देते हैं कि काष! अमुक ने ऐसी रचनाएं और लिखी होतीं। उत्कृष्ट सृजन सप्रयास नहीं, अनायास होता है। आप यह कर्णप्रिय लोरी देखिए, इसमें जो कुछ भी नव्य-भव्य है-स्वाभाविक है। किसी झरने-सा निनाद करता हुआ प्रवाह। और जिसने भी उनके मुख से यह लोरी सुनी होगी, एक चमत्कारिक आनंद में जा डूबा होगा।
कंतक थैंया धुनूं मनइयां, चंदा भागा लइयां पइयां। यह चंदा हलवाहा है, नीले-नीले खेत में । सचमुच सेंत मेंत में, रत्नों भरे खेत में, किधर भागता लइयां-पइयां। कंतक थैंया धुनूं मनइयां
ऐसे ही उनकी कविता मामा खासी चर्चित हुई। इसे सुनते ही बच्चे सहज ही उनके भांजे बन जाते थे-उल्टा पहन पजामा जी, आए मेरे मामा जी। बने सुदामा घूमते, खूब बचाते नामा जी। होशियार हैं मामा जी
दरअसल इस नये जमाने में टी. वी. से चिपके रहने वाले और मां-बाप के स्वाभाविक स्नेह से दूर-मजबूर बच्चे बाल साहित्य से जुड़ ही कहां पाते हैं? रेडियो, जिस पर हर रविवार बाल कविताएं प्रसारित होती थीं, का चलन नहीं रहा। टी. वी. पर बाल कविताएं भला रखी कहां? ...और अब जो बाल साहित्यकार सम्मेलन होते भी हैं, उनमें बच्चा नदारत होता है। राष्ट्रबंधु जी कहा करते थे बिन पानी के नाव मत चलाओ। बच्चे बाल साहित्य के परीक्षक हैं। बाल साहित्य को उनके बीच प्रस्तुत करिए तब आपको पता चलेगा कि आप कितने पानी में हैं? कानपुर और अनेक स्थानों के कितने विद्यालयों में उन्होंने बाल कवि सम्मेलन कराए। हिंदी के दिग्गज बाल साहित्यकारों नें वहां कविता-पाठ किया। महाराष्ट्र के सानेगुरु की तर्ज पर उन्होंने बालकथा पाठ के भी कार्यक्रम रखे। बाल साहित्य को लोकप्रियता दिलाने का यही सबसे कारगर उपाय हो सकता है। आज यह परंपरा क्षीण होती जा रही है।
राष्ट्रबंधु जी से मेरा परिचय 1989 में हुआ था। मेरी पहली बाल कविता ‘खेल’ उन्होंने ही अपनी पत्रिका बाल साहित्य समीक्षा, जून, 1989 में प्रकाषित की थी।
1995 में उन्होंने मुझसे खुटार में बालकवि सम्मेलन करने को कहा। मैंने एक संस्था बनाई- बाल साहित्य प्रसार संस्थान। आए दिन आयोजन होने लगे। वे भी वहां दो बार आए। उनके कहने पर ठेठ देहात पोहकरपुर में मैंने कार्यक्रम रखा। वे टेªक्टर पर बैठकर गए। बहुत खुष हुए। ढेरों कविताएं सुनाईं। जिनमें एक यह भी थी-काले मेघा पानी दे, पानी दे गुड़धानी दे। लड्डू बरसें खेत में,बच्चे हरषें रेत में। मेघों की अगवानी में, उछलें कूदें पानी में। सबको नाना नानी दे, हर दिन एक कहानी दे। सिक्कों की निगरानी दे, रानी को हैरानी दे। कंजूसों को दानी दे, घरघर मच्छरदानी दे। उनकी यह कविता सुनकर बच्चे क्या, बड़े तक उनके जादुई सम्मोहन में आ गए। खूब खातिर हुई। कोई गन्ने का रस ले आया। कोई छाछ। पारिवारिकता का दुर्लभ परिवेष बनते देर न लगी।
एसी में बैठकर सारे देष के बच्चों के आनंद और उनके भविष्य की कोरी-कोरी बातें करने वाले तो बहुत हैं लेकिन गांव के बच्चों के बीच जाकर बाल साहित्य को इस तरह प्रचारित करने के दुर्लभ उदाहरण कम ही देखने को मिलते हैं।
बाल साहित्य की अनेक संस्थाएं/पुरस्कार-सम्मान और षोध केंद्र उन्होंने स्थापित कराए। देवपुत्र का अनूठा बाल साहित्य षोध संस्थान उनके ही आग्रह का सुपरिणाम है।   
वे एक कुषल संयोजक थे। काम करना और कराना उन्हें आता था। एक तरह से उनकी नियति थी- बाल काज कीन्हें बिना, मोंहिं कहां विश्राम।
  बाल साहित्य के लिए आजन्म लगे रहे। गए तो भी बाल साहित्य के ही नाम पर। सब उनसे कहते थे, अब यात्राएं मत करिए। घर वाले तो खासतौर पर। मगर चुपके से कब उनका टिकट बन जाता था, बहू-बेटे को इसकी खबर भी न होती थी। बाल साहित्य के लिए एक जुनून था उनके सिर। ऐसा जुनून जो अब षायद ही कहीं देखने को मिले।
1971 में उन्हें बाल साहित्य का मनोवैज्ञानिक अध्ययन विषय पर पी-एच.डी. उपाधि मिली थी। एक खास बात, उनकी थीसिस रहस्यमय ढंग से चोरी हो गई थी, अन्यथा यह उपाधि उन्हें और पहले मिल जाती। उनकी थीसिस प्रकाषित नहीं हो सकी। वे कहते थे, मेरी थीसिस प्रौढ़कुमारी हो गई है।
1977 में उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी थी। ‘बालसाहित्य समीक्षा’ पत्रिका निकाली। घर फूंक तमाषा देखा। संस्था बनाई- भारतीय बाल कल्याण संस्थान तो अपने षहर और प्रदेष की सीमाएं लांघकर कहां-कहां कार्यक्रम कर डाले। अपने लिए तो हर कोई करता है, उन्होंने तो सारे देष को अपना बना लिया था। बाल साहित्य के लिए वे अपने खर्चे पर विष्व हिंदी सम्मेलन में भाग लेने लंदन गए।
   उनकी पहली पुस्तक ‘चेतना’ जनवरी,1951 में रामधनी सिंह कानपुर ने प्रकाषित की थी। 16 पृष्ठों की इस कृति में किसानों और मजदूरों पर कविताएं थीं। अब तक उनकी 80 के लगभग किताबें आ चुकी हैं। प्रायः सभी विधाओं में लिखा। प्रभूत मात्रा में लिखा। उस पर विस्तृत चर्चा फिर कभी...! हां, यह अवष्य कहूंगा कि उनका बहुतेरा उत्कृष्ट सृजन आलोचकों की दृष्टिपथ से नहीं गुजरा। अन्यथा वे यह न लिखते कि काष! राष्ट्रबंधु जी ने ऐसी कविताएं और लिखी होतीं। मैं कहना चाहूंगा कि काष! उन आलोचकों ने उनकी ऐसी कविताएं और पढ़ी होतीं...!
दरअसल यह आलोचक की बहुत बड़ी सीमा या कहिए कि विवषता होती है कि वे सहज उपलब्ध रचनाओं के आधार पर ही सारा परीक्षाफल घोषित कर देते हैं, वनस्पति कुछ और खोजने-खंगालने के। खैर...उन्होंने सारा कुछ न्यारा ही लिखा हो, ऐसा नहीं है। उनका पुराना लेखन जितना अनोखा-चोखा है, नये में से बहुतेरे को देखकर धोखा होता है कि अरे यह भी उनका ही लिखा हुआ है। ठीक यही स्थिति बाल साहित्य समीक्षा पत्रिका को लेकर भी है। उसके पुराने अंकों में इतनी दुर्लभ सामग्री प्रकाषित हुई है कि काष! यदि वह संपादित होेकर आ जाए तो बाल साहित्य की छवि में चार नहीं, आठ-दस चांद लग जाए। मगर इधर के उसके अधिकांष अंक ... जिस तरह से छुटभैयों के वकालतनामें जैसे छप गए, उससे बाल साहित्य के स्वरूप को भी धक्का लगा। कई अंक ऐसे आए, जो न आते तो बाल साहित्य पर उपकार होता। मैं बहुधा सोचा करता हूं कि ऐसी कौन सी मजबूरी होती थी कि उनके जैसे सजग, निर्भीक और सचेतक संपादक को इधर समझौता करना पड़ जाता था। क्या अत्यधिक यात्राओं के कारण समयाभाव ? और इस नाते समय पर पत्रिका निकालने के फेर में-जो मिले, उसे छाप दो-की नीति। या फिर उनका अति सरल होता स्वभाव? जिसका लाभ लोगबाग जमकर उठाने में लगे थे। इन मामलों में मेरी उनसे जमकर असहमति रही। मैंने अपने कई आलेखों में खुलकर लिखा भी। फिर भी वे नाराज नहीं हुए, यह उनका देवत्व था। यही बात उनकी इधर की रचनाओं को लेकर भी है, अन्यथा टेसू राजा, डिंग डांग, नए कृष्ण सुदामा, चूहे बेइमान, चलो अखाड़े, गधे का गणतंत्र, कविता-वविता, फोटो से बातें, भतीजावाद, यह मत सोचो, अक्ल की खोज, जयसियाराम, सूरज सोया तानकर, टिली लिली, नयी डायरी, तोंदियल, तितली, बिल्ली मौसी, भुक्खड़ जैसी न जाने कितनी कविताएं हैं जो उनके बेजोड़ लेखन का उदाहरण हैं। टेसू राजा के बहाने भारत के राज्यों पर उनकी बेहतरीन काव्यकृति है- टेसू की भारत यात्रा (2004), इसकी हर कविता के अंत से पहले की पंक्ति बोले-‘मैं तो यहीं अड़ा।’ के क्या कहने। बाल पाठक का मन उस राज्य के प्रति पूरे अपनत्व से भर उठता है और वह भी पूरे जोष के साथ-टेसू जी पहुंचे मद्रास, तमिलनाडु में किया प्रवास। थिरू, वणक्कम सीख गए, लुंगी में आमोद नए। ...बोले-‘मैं तो यहीं अड़ा, लहर गिनूंगा खड़ा-खड़ा।’ (तमिलनाडु) ऐसे ही मणिपुर के बारे में उनका अंदाजेबयां देखिए- मणिपुर में पहुंचे इंफाल, थके-थके थे धीमी चाल। सुनी बांसुरी लगी भली, नृत्य मणिपुरी गली-गली। जंगल देख लुभाया मन, पर्वत, नदियां देख मगन। बोले-‘मैं तो यहीं अड़ा, पर्वत पर ज्यों रत्न जड़ा।’
टेसू पर छोटे मीटर की उनकी एक बहुत प्यारी कविता है, जिसके वाचन का आनंद ही कुछ और है-खिल्ली, गिल्ली, पिल्ला-पिल्ली, काली बिल्ली ला, राजा दिल्ली जा, टेसू राजा आ। रटना,हटना,घटना सटना, झटपट पटना जा, बढ़िया खाना खा। टेसू राजा आ। थक अलबत्ता, चल कलकत्ता, छक रसगुल्ले खा, फिर खुष होकर गा- टेसू राजा आ।
कविता वविता भी इसी षैली की रचना है, जिसकी ध्वन्यात्मकता का जवाब नहीं- पानी वानी नाना नानी, आनाकानी ना। हा हा ही ही हे हे हो हो, हां हां हां हां गा ।
  1968 में प्रकाषित पुस्तक ‘हंसी के बालगीत’ में नामानुरूप उनकी रोचक कविताएं संकलित हैं, खासकर डिंगडांग, नए कृष्ण सुदामा, अक्ल की खोज, चलो अखाड़े, गधे का गणतंत्र, भतीजावाद और चूहे बेइमान जैसी कविताओं की अलमस्ती ही कुछ और है। यद्यपि ये अमोल रचनाएं उनके बाद के कई संकलनों में बार-बार संकलित हुई हैं। लोटपोट करने की पूरी क्षमता इनमें है- चूहे करते थे खुट खुट, कुट कुट काट रहे बिस्कुट। बिल्ली का हमला छुटपुट, डिंग डांग डिंग डांग, टुट टुट टुट।
नए कृष्ण सुदामा कविता प्रतीकात्मक हैं। आरक्षण व्यवस्था पर व्यंग्य करती ऐसी किषोर कविताएं कम ही लिखी गई हैं-हुई परीक्षा, फस्र्ट डिवीजन करके पास सुदामा अटके, कृष्ण डिवीजन थर्ड पा सके, नहीं नौकरी करने भटके।
अक्ल की खोज में बाल सुलभ जिज्ञासा है तो चलो अखाड़े में सुस्वास्थ की प्रेरणा, मगर स्टाइल से। टवर्ग के वर्णों ने कविता के हास्य के ओजपूर्ण कर दिया है-चलो अखाड़े पेलो दंड। वीर मांग सकता है न्याय, वीर मिटा सकता अन्याय। युग-युग से है यही उपाय, यही षांति का मंत्र अखंड। धनुष बाण रखते हैं राम, चक्र सुदर्षन रखते ष्याम। महावीर की गदा अनूप, मां रणचंडी रौरव रूप। सभी देव हैं संडमुसंड। चलो अखाड़े पेलो दंड।
वे बाल-किषारों के सच्चे सखा थे। उनका लेखन जोष भरता है। उम्मीदें जगाता है। निराषा भगाता है। वे युग के भगवानों के अंधभक्त बनने की बात नहीं करते बल्कि विवेकानंद की भांति उत्तिष्ठ जाग्रत का मंत्र फूंकते हैं-जिनके पूजे चरण आज जाते हैं, जो युग के भगवान कहे जाते हैं। उनके भी तो नाक चुआ करती थी, और कुटम्मस खूब हुआ करती थी। ...यह मत सोचो तुम गरीब हो, पढ़ न सकोगे, बदनसीब हो।
भतीजावाद कविता में चाचा नेहरू जी को याद करने का अंदाज अनोखा है-हम साहस के बेटे हैं, खाना खाकर लेटे हैं। षक्ति हमारी माता है, लड़ना-भिड़ना भाता है। चाचा नेहरू आते याद, जिंदाबाद भतीजाबाद। वैसे नेहरू जी पर उनकी एक कविता और है-‘नेहरू की याद’, अत्यंत मार्मिक। उनके निधन के पष्चात एक बालक के मनोभाव को व्यक्त करते हुए जैसे वे बिल्कुल डूब से गए हों- चाचा नेहरू नहीं मिल सके और नही अब मिल सकते हैं, अपने इस दुख को झुठलाने, कैसे हंस-हंस खिल सकते हैं। इसीलिए हम हाथ जोड़कर, फोटो को ही शीस झुकाते। फिर भारत के मानचित्र पर, हम गुलाब के फूल चढ़ाते।
गधे का गणतंत्र में गधा मंहगाई भत्ता मांगता है तो चूहे बेइमान का रिद्म गजब का है, एकदम लोकषैली में। बाल साहित्य में चूहों की षरारत पर लिखी गई उनकी नटखट कविता चूहे बेइमान अप्रतिम है, जिसमें बेइमानी और नाकारापन पर करारे व्यंग्य के साथ बालोचित आकांक्षा और पष्चात्ताप को इस ढंग से अभिव्यक्त किया गया है कि उनकी कल्पनाषीलता विमुग्ध कर देती है- चूहे बेइमान मेरा टोस ले गए, टोस ले गए, संतोष ले गए। ना उनके खेती, ना उनके पाती, चूल्हा बिना फूंके खाते चपाती। पुस्तक नहीं कुंजी कोष ले गए। ...मेरी दवाई जल्दी से खाते, बाबा  की लाठी चाहे छिपाते। नाना की ऐनक छोड़ क्यों गए?
डायरी पर एकदम मौलिक और संभवतः अकेली कविता रचने का श्रेय भी उनको जाता है, जहां बाल स्वभाव एकदम स्वच्छंद रूप में मुखरित हुआ है-नयी डायरी मुझे मिली है। कार्टून हैं मुझे बनाने, हस्ताक्षर करने मनमाने। आप अगर रुपये देंगे तो, बन जाएंगे जाने माने। भेंट दीजिए, कलम हिली है।
टिली लिली कविता की उड़ान के क्या कहने। बच्चे तो मन के राजा होते ही हैं। यहां वह राजसी कल्पना सर चढ़कर बोल और डोल ही नहीं रही, बल्कि एक अधिकार भाव से पूरी मस्ती कविता में घोल रही है- मुझे अचानक परी मिली, आसमान मे जुही खिली। टिली लिली है टिली लिली। मैं जाऊंगा पंख बिना, ताक धिना धिन ताक धिना।
कल्पना की अथाह पूंजी के साथ-साथ वे आत्मविष्वास के भी धनी थे। विल पावर से लवरेज। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हारते न थे। न दैन्यं न पलायनम। उनका जीवन असुविधाओं और संघर्षों से पूर्ण था किंतु षायद ही किसी ने उन्हें कभी अरण्यरोदन करते देखा हो। षायद यही वजह थी कि जीवन के अंत तक उनके चेहरे पर कोई षिकन न आई। कम ही लोग जानते होंगे कि वे कभी डाकिया भी रहे। पोस्टमैनी करते हुए उन्होंने बी.ए. की पढ़ाई की। और अपनी लगन के बल पर हिंदी और अंग्रेजी में एम.ए. के बाद बी.एड. और पी-एच. डी. तक की डिग्रियां हासिल कीं।
गोडवाना की लोकधुन इंगोवाय इंगो पर आधारित उनका एक गीत है, उनके ही ओजस्वी व्यक्तित्व को बयान करता है- भाग्य तुम्हारा यौवन है, देश तुम्हारा जीवन है। रखो मौत को दांव पर, परेशानियां झेलो। रेलो रेलो रेलो
ऐसी न जाने कितनी कविताएं हैं जो कहीं न कहीं उनके जीवन की बांकी-बांकी झांकी हैं और जिनकी चर्चा खत्म होने का नाम ही न लेगी। अनंत में जाने वाले उस पथिक की गाथा भी अनंत है। उनके व्यक्तित्व-कृतित्व पर दो ग्रंथ प्रकाषित हुए हैं- राष्ट्रबंधुः व्यक्तित्व एवं कर्तत्व (संपादक-डा. प्रतीक मिश्र) और डा. राष्ट्रबंधु के बाल साहित्य का मूल्यांकन (संपादक-डा. षकुंतला कालरा)। इनसे उनके जीवन को आंका जा सकता है।
उनकी एक कहानी है- फा। मुझे तो वह उनके ही जीवन की फिल्म सी लगती है। उनकी कहानी फटी षर्ट पर देविका फिल्मस्, मुंबई से फिल्म बन चुकी है। जय सियाराम पुस्तक पर संगीतबद्ध कैसेट तैयार की गई है। आकाषवाणी लखनऊ से धारावाहिक रूप में इसका प्रसारण हो चुका है।
तपती रेत पर नाम से उनकी आत्मकथा छप चुकी है। वे इसका दूसरा भाग लिखना चाहते थे। वह स्वप्न अधूरा रह गया। वे चाहते थे कि जून, 2013 से बंद पड़ी उनकी पत्रिका ‘बाल साहित्य समीक्षा’ फिर षुरू करने वाला कोई कर्णधार मिल जाए। उनका मन था कि बालसाहित्यकारों को राज्यसभा/विधान परिषद में नामित किया जाए। वे प्रयत्नषील थे कि बाल साहित्यकारों को निषुल्क बसयात्रा की सुविधा मिले। उनकी चाहत थी कि बाल साहित्य उच्च कक्षाओं में पढ़ाया जाए। बाल साहित्य समीक्षा के पुराने अंक पलटने पड़ेंगे। उनके संपादकीय देखने होंगे। उनमें ढेरों पथ दिखेंगे, जिन पर चलकर हम उनके अधूरे स्वप्न ही पूरे नहीं करेंगे, वरन् बाल साहित्य की मषाल को और अधिक उष्मा प्रदान कर सकेंगे। आषा की जानी चाहिए कि ऐसा होगा। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। यही सच्चा तर्पण। 
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बाल साहित्य जगत में वे अद्वितीय थे। न उन जैसा कोई था और न होगा। वे अपनी जगह अकेले थे। सबको अपना बनाकर, उनके लिए जीने वाले इस बालमना साधु को नमन और अशेष श्रद्धांजलि !

(यह आलेख मेरी पुस्तक 'बाल साहित्य के प्रतिमान', प्रकाशक : अनंत  प्रकाशन,लखनऊ के  पृष्ठ 88 पर प्रकाशित है. सर्वप्रथम यह आलेख  बाल वाटिका, मासिक के अप्रैल 2015 अंक में पृष्ठ पर प्रकाशित हुआ था.)

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