बुधवार, 2 मई 2018

बाल कविता का निष्पक्ष इतिहास

बाल कविता का निष्पक्ष इतिहास
                              ■ डॉ. नागेश पांडेय 'संजय'
निरंकार देव सेवक लिखित  बाल गीत साहित्य इतिहास और समीक्षा अकेला ऐसा ग्रंथ  है जो तीन बार अलग-अलग कलेवर में संशोधित-सम्पादित होकर छपा।
1966 में सर्वप्रथम इसका प्रकाशन किताब महल, इलाहबाद से हुआ था। इसके पश्चात ही बाल साहित्य में पी-एच.डी. और समीक्षा स्तर के कार्यों की शुरुआत हुई। सेवक जी के इस ग्रंथ  में अन्य भाषाओं में रचित बाल साहित्य का  तुलनात्मक अध्ययन भी प्रस्तुत किया गया था और बड़ी बात यह कि पूरी निष्पक्षता के साथ कवियों और उनकी रचनाओं की चर्चा की गयी। 
कालांतर में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान  से प्रकाशित द्वितीय संस्करण (1983) में तो कवियों के दुर्लभ चित्र भी उपलब्ध हैं। ग्रन्थ में इतिहास के लिए अपेक्षित सन्दर्भ ग्रंथों  का भी ईमानदारी से उल्लेख्य किया गया है। 

तृतीय संस्करण 2013 में डॉ. उषा यादव के सम्पादन में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान  से ही आया, जिसकी समीक्षा यहाँ प्रस्तुत है :-



बालगीत साहित्य: इतिहास एवं समीक्षा
लेखक: निरंकार देव सेवक, संपादक: प्रो. उषा यादव
प्रकाशक : उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान
6, महात्मा गांधी मार्ग, लखनऊ-226001 (0522-2614470,2614471)
संस्करण (संशोधित) 2013 
मूल्य: 245 रुपये,  
समीक्षकः डा. नागेश पांडेय संजय


हिंदी में बाल-साहित्य आलोचना की परंपरा को लगभग सात दशकों का समय व्यतीत हो चुका है। इस कालावधि में बाल साहित्य और उसके विविध पक्षों पर बहुत महत्त्वपूर्ण कृतियां और शोध प्रबंध लिखे गए हैं। इधर कुछ वर्षों में तो बालसाहित्य की ढेरों समीक्षा पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं और इनसे बाल साहित्य का मानवर्द्धन हुआ है किंतु जब ध्यान जब एकदम शुरुआत की तरफ जाता है तो निःसंदेह निरंकार देव सेवक किसी देवदूत की तरह नजर आते हैं जिन्होंने उस जमाने में, जबकि बाल साहित्य पर आधार सामग्री थी ही नहीं या थोड़ा बहुत यदि कुछ था भी तो न के बराबर, ऐसे में 1966 में किताब महल, इलाहाबाद से प्रकाशित अनेक राहों को खोजता और बनाता ग्रंथ बालगीत साहित्यलिखा जो परवर्ती बाल साहित्य लेखकों तथा समीक्षकों के लिए प्रकाश स्तंभ सिद्ध हुआ है। विभिन्न परंपराओं का सूत्रपात करने की दृष्टि से इस बेजोड़ ग्रंथ की कालजयी महत्ता है। बाल साहित्य में तात्विक समीक्षा का कार्य हो या इतिहास-लेखन, शोध-कार्य हो या तुलनात्मक अध्ययन, इन सभी के मूल में सेवक जी का ग्रंथ ही आधार-रूप में विद्यमान रहा है।

1966 में जबकि कृष्ण विनायक फड़के की पुस्तक बालदर्शन’ (1946), श्रीमती ज्योत्स्ना द्विवेदी की कृति हिंदी किशोर साहित्य’ (1952) और डाॅ. देवेंद्रदत्त तिवारी द्वारा संपादित बाल साहित्य की मान्यताएं एवं आदर्श’ (1962)  के सिवाय कोई और समीक्षा कृति थी ही नहीं, ऐसे में उन्होंने बाल साहित्य की महत्वपूर्ण विधा कविता के स्वरूप और प्रयोजन की चर्चा करते हुए उसके मूल्यांकन की दिशा में अपनी तरह का यह पहला काम किया।  
प्रथम संस्करण 1966 
   सेवक जी की इस कृति से केवल बाल साहित्य समीक्षा के क्षेत्र में ही नहीं, वरन् विश्वविद्यालयों में भी बाल साहित्य आलोचना तथा अनुसंधान की दिशा में संभावनाओं का सूत्रपात हुआ। प्रारंभिक बाल साहित्य शोधार्थियों के लिए यह कृति गहन अंधकार में प्रखर प्रकाश जैसी सिद्ध हुई। वर्तमान शोधार्थियों तथा समीक्षकों हेतु भी यह कृति एक अपरिहार्य संदर्भ ग्रंथ की भांति अपनी प्रासंगिकता बनाए हुए है। 
किसी भी पी-एच.डी. स्तर के शोध से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण इस ग्रंथ की पांडुलिपि को देखकर उनके एक मित्र ने कहा भी था- यह तुमने बिल्कुल नए विषय पर इतना काम किया है। इस पर तो तुम्हें किसी विश्वविद्यालय से डाॅक्टरेट मिल सकती है। सेवक जी ने उक्त प्रसंग को हँसकर टाल दिया था। 
फिलहाल उनकी कृति ने हिंदी बाल साहित्य में आलोचना और अनुसंधान को दिशा दी और बहुतों को डाक्टरेटकी उपाधि मिली।

सेवक जी की कृति बालगीत साहित्य बाल साहित्य के क्षेत्र में एक ऐसी अनोखी और अकेली किताब है जो अब तक तीन बार अलग-अलग रुप और अंदाज में प्रकाशित हो चुकी है।
द्वित्य संस्करण 
दूसरी बार यह कृति
1983 में बालगीत साहित्य: इतिहास एवं समीक्षा नाम से स्वयं सेवक जी के द्वारा ही संशोधित और परिवर्द्धित होकर उ.प्र. हिंदी संस्थान से प्रकाशित हुई थी. खास बात यह कि इस संशोधित और परिवर्द्धित संस्करण में प्रो. उषा यादव ने भरपूर श्रम किया है और इस ग्रंथ को अद्यतन बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, इसके बाद भी पुस्तक की मूल भावना या संवेदना कहीं पर से प्रभावित नहीं हुई है। बड़ी बात यह भी कि उषा  जी ने बिना किसी पूर्वाग्रह या पक्षपात के उच्चकोटि की बाल कविताओं को ससम्मान उद्धृत किया है, वहीं बाल कविताओं के नाम पर खिलबाड़ जैसी लचर रचनाओं को आड़े हाथों लेकर अभूतपूर्व साहस का परिचय भी दिया है। 
प्रो. उषा यादव द्वारा संपादित यह ग्रंथ 524 पृष्ठों में कुल 14 अध्याय स्वयं में समेटे है जो कि इस प्रकार हैं-1. बाल स्वभव 2. बडों की कविता और बाल गीत 3. अलिखित बालगीत 4. शिशु गीत साहित्य 5. चांद तारों के बाल गीत 6. लोरियां, प्रभाती और पालने के गीत 7. हिंदी बालगीतो  का वर्गीकरण 8. हिंदी बालगीत साहित्य के इतिहास की भूमिका 9. हिंदी बालगीत साहित्य का इतिहास 10. हिंदी के राष्ट्रीय बालगीत 11. बालगीतो की शिक्षा एवं रचना  शिक्षा 12. लोकगीतों में बालगीत 13. हिंदी और अंग्रेजी बालगीत 14. भारती भाषाओं में बालगीत साहित्य 
उपर्युक्त अध्यायों के शीर्षकों से एक बात मोेटे तौर पर स्पष्ट हो जाती है कि बाल कविता के समूचे परिदृश्य को संजीदगी से समझनें के लिए यह एक बहुत ही जरुरी पुस्तक है। सेवक जी एक ऐसे समर्थ रचनाकार थे जिनकी कविताएं स्वयं मानक हैं। उनके कथन परिभाषा हैं। वे मानते थे कि बाल साहित्य बच्चों के मनोभावों, जिज्ञासाओं और कल्पनाओं के अनुरूप हो। जो बच्चों का मनोरंजन कर सके और  मनोरंजन भी वह जो स्वस्थ और स्वाभाविक हो। जो बच्चों को बड़ों जैसा बनाने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें अपने अनुसार-अपने जैसा बनाने में सहायक हो।
उनकी सोच व्यापक थी, यही कारण है कि उक्त ग्रंथ की रचना करते समय उन्होंने बाल कविता के विस्तृत फलक को अपने अध्ययन का विषय बनाया। कविताओं की चर्चा करते समय किसी मित्रवाद या क्षेत्रवाद के वशीभूत नहीं हुए। न जाने कितने लोंगों से पत्राचार किया। दिग्गज से दिग्गज, नए से नए और गुमनाम: सभी से उनका  संपर्क था। इसीलिए चाहे बालक अमिताभ बच्चन के लिए उनके कवि पिता हरिवंश  राय द्वारा बाल कविता लिखने की बात हो या स्वर्ण सहोदर की प्रकाशन समस्या की पीड़ा। सब कुछ उनकी किताब में सहज मुखरित हुआ। यही कारण था कि उनकी यह कृति केवल बाल कविताओं का ही नहीं, बाल कवियों के अनुभवों और रचना प्रक्रिया का भी दस्तावेज बनी।  
 बता दें कि सेवक जी द्वारा पुनर्प्रस्तुत तथा संस्थान से 1983 में प्रकाशित संस्करण में 17 अध्याय थे लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि नए संस्करण में उषा जी ने किसी अध्याय को समाप्त किया गया हो। हां, आवश्यकतानुसार उन्हें कम-ज्यादा अवश्य  किया गया है। जैसे सेवक जी ने सूरदास पर अलग से सातवां अध्याय लिखा था जिसे उषा जी ने आठवें अध्याय में बहुत ही संक्षेप में लिया है। ऐसे ही सेवक जी ने बालगीतो की  शिक्षा और बालगीत रचना शिक्षा दो अलग अध्याय शामिल किए थे जिन्हें उषा जी ने एक ही अध्याय में समाहित कर दिया है। सेवक जी द्वारा अंग्रेजी की तरह बंगाली बालगीत पर भी अलग से अध्याय था किंतु उषा जी ने इसे अंतिम अध्याय भारती भाषाओं में बालगीत साहित्य में स्थान दिया है। साथ ही पूर्णता की दृष्टि से राजस्थानी, वोडो, मणिपुरी, कोंकणी के बालगीतों पर भी यथासंभव चर्चा की है। 
हां, एक प्रश्न बार-बार  अवश्य  मन में कौंधता है कि द्वितीय संस्करण की भांति इस बार कवियों के दुर्लभ चित्रों को प्रकाशित क्यों नहीं किया गया ? क्योंकि सेवक जी के जमाने में, जबकि आफसेट प्रिंटिग की व्यवस्था नहीं थी, तब कितनी कठिनाइयों के साथ कवियों के चित्र एकत्र किए गए होंगे। उनके ब्लाक बनवाए गए होंगे। अब तो यह सब सहज संभव है। गए और नए जमाने के कवियों के चित्रों को एक स्थान पर देखना पाठकों के लिए प्रभावकारी तो होता ही, यह ग्रंथ पहले की भांति एक सचित्र कोश का भी काम करता। एक बात और ग्रंथ को अद्यतन बनाने की कोशिस में संपादक ने कदाचित लेखकों से उनके बायोडाटा मंगाकर भी काम चलाया होगा या किसी परिचय कोश का सहारा लिया होगा, जो कि स्वाभाविक था किंतु इससे कुछ एक कवियों के बारे में भ्रामक सूचनाएं संकलित हो गई हैं। जैसे एक कवि ने कई बाल कवियों के संकलन 'मूछे ताने पहुचे थाने' को अपनी ही निजी पुस्तक बता दिया है। निश्चय ही इस दिशा में अतिरिक्त सतर्कता अपेक्षित थी।  
बहरहाल अमीर खुसरो से लेकर भारतेंदु और फिर स्वतंत्रता से पूर्व तथा पश्चात की बाल कविताओं का यह श्रमसाध्य इतिहास अनुपमेय है। प्रो. उषा यादव की आधुनिक समीक्षा दृष्टि ने पुनः इसे एक लंबे समय के लिए संग्रहणीय और पठनीय बना दिया है। बाल साहित्य को ऐसी अनमोल कृति देने वाले सेवक जी की पुण्यात्मा को बारंबार नमन करते हुए सफल संपादक प्रो. उषा यादव के साथ-साथ सामयिक प्रकाशन के लिए उ.प्र. हिंदी संस्थान को भी हार्दिक बधाई। 

--------------------------------------------------------------------------------


निरंकारदेव सेवक बाल साहित्य के एक ऐसे युगपुरुष है  जिन्होंने बाल कविता
को नए मुहावरे दिए। सच्ची बाल कविता ही वह है जिसमें बच्चों के होठों से
दोस्ती करने की ताकत हो। सेवक जी की कविताएं ऐसी ही जादुई बाल कविताएँ
हैं जो बालको के मन को सहज रीझती हैं और उनके सच्चे दोस्त की तरह अपना
रंग जमाने का दम-ख़म रखती हैं।
मानक बाल कविता क्या होती है, यह देखने-समझने के लिए सेवक जी की कालजयी
बाल कविताएँ सदैव ठोस उदहारण के रूप में उद्धृत की जाती रहेंगी।
सेवक जी को बाल साहित्य का भगीरथ कहा जाना चाहिए। वे भारत के पहले ऐसे
व्यक्ति थे जिन्होंने न केवल सचिंत भाव से उत्तम बालसाहित्य की सर्जना
की, बल्कि बाल साहित्य के मौलिक अनुसन्धान और समीक्षा के क्षेत्र में
पहलकदमी की। हिंदी में उन्होंने पहली बार बालसाहित्य की आलोचना का मार्ग
प्रशस्त किया। वे बाल साहित्य के आदि आलोचक थे।
1966 में प्रकाशित उनके अनन्य ग्रन्थ 'बाल गीत साहित्य', जिसमे बाल कविता
के इतिहास और समीक्षा को पूर्ण मनोयोग और प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत
किया गया और वह भी उस ज़माने में, जबकि बाल साहित्य के क्षेत्र में
आलोचनात्मक सामग्री का ही सर्वथा अभाव था। कितने लुप्त प्राय: नामों को
उन्होंने पुनर्जीवित ही नही, अमर कर दिया। अपने सीमित संसाधनों के बाबजूद
बाल कविता के अथाह सागर से चुन चुन कर उन्होंने रत्न निकाले और उन्हें
करीने से सजाया-संवारा। यह उनका ऐसा प्रदेय है जिसके लिए साहित्य समाज
सदैव उनका ऋणी रहेगा।
निरंकार देव सेवक को बालसाहित्य सेवक सही ही कहा जाता था ।
बाल साहित्य सेवक को मेरा सर झुकाकर नमन और अशेष श्रद्धांजलि।

8 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय निरंकार देव सेवक अपनेआप में एक बालसाहित्य का इतिहास समेटे हुए हैं. इतिहास में ऐसा व्यक्ति कभीकभी ही पैदा होता हैं. इन की यह पुस्तक सभी बालसहित्यकारों के लिए काम का ग्रन्थ हैं. बधाई.

    जवाब देंहटाएं
  2. भाई नागेश पांडेय संजय जी, आपको हार्दिक बधाई की निरंकार देव सेवक जी की कृति से हमारा परिचय करवाया।आदरणीय सेवक जी ने बाल साहित्य को एक नई दिशा देते हुए इसके उन्नयन और प्रतिष्ठा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। आपके उनके व्यक्तित्व एवम् कृतित्व पर पर उम्दा प्रकाश डाला है। इस महनीय सृजन से बाल साहित्य संसार को उत्कृष्ट दिशा मिलेगी। हमारा यह मानना है कि इस तरह की पुस्तकें पाठकों, शोधार्थियों व बाल साहित्य शोध केंद्रों तक पहुंचनी चाहिए। हम भी एक छोटा सा प्रयास इस दिशा के कर रहे हैं।
    पुनः आपको बधाई।
    *राजकुमार जैन राजन, आकोला-312205 (राजस्थान)

    जवाब देंहटाएं
  3. ऐसी समीक्षा पढ़कर पुस्तक पढ़ने को मन लालायित हो उठा।

    जहां कलमकार अन्य कलमकारों के रचनाकर्म पर समुचित टीका टिप्पणी करें और उसे अपेक्षित मान दें; वहीं समीक्षा और आलोचना जैसी विधाएं उसी परंपरा का उत्सव रूप होती हैं।

    डॉ उषा यादव जी का निरंकार देव सेवक जी की आलोचना पुस्तक को अपने संपादकत्व में नये ‌आवरण, नयी वर्गीकृत सामग्री के साथ पाठकों को सौंपना, उनके प्रति गहन आदर भाव को इंगित करता है।

    सोने पे सुहागा डॉ नागेश जी की त्रुटि अन्वेषी समीक्षा है जो अत्यंत सावधानी से किए आलोचन कर्म को भी सतर्क रहने को चेताती है। जहां दूरद्रष्टा 'संजय' बैठे हों वहां
    नवोदित रचनाधर्मी लोग स्वान्त:सुखाय लेखन में भी सावधान हो जाते हैं।

    अंतिम बात, बाल साहित्य आप जैसे विद्वान और विदूषियों से ही गरिमापूर्ण स्थिति को बरकरार रखे है। ये सोचकर ही नतमस्तक हूं।

    जवाब देंहटाएं
  4. निस्संदेह सेवक जी को उनका वो दाय नहीं मिल सका जिसके वे अधिकारी थे।अब हमारी पीढ़ी की यह जिम्मेदारी है कि हम उनके इन उल्लेखनीय कार्यों को समाज के पटल पर लाएंं...

    जवाब देंहटाएं
  5. नागेन्द्र सर को हार्दिक बधाई। सेवक जी की पुस्तक समीक्षा काबिल ऐ तारीफ है। साहित्यकारों के लिए बहुत ही उपयोगी सिद्ध होगी। यह पुस्तक मैं कैसे प्राप्त कर सकती हूं

    जवाब देंहटाएं
  6. आपने समीक्षा बेहतर ढंग से की है । इससे यह पुस्तक पढ़ने के लिये अन्य लोग भी प्रेरित होंगे ।

    जवाब देंहटाएं
  7. मैंने समीक्षा पढ़ी। ग्रंथ का नया संस्करण नहीं देख पाया हूँ। मौका लगते ही पढूंगा। जानकारी मिली कि इस संस्करण में कवियों के चित्र नहीं हैं। जब द्वितीय संस्करण आ रहा था, तब सेवक जी को मैंने कई नए-पुराने कवियों के चित्र उपलब्ध कराए थे। जो पुस्तक में प्रकाशित हुए थे। उषा यादव द्वारा किया गया यह कार्य सराहनीय है।

    जवाब देंहटाएं
  8. हम नव बालसाहित्य लेखकों के लिए बाल साहित्य के इतिहास से परिचित होना अत्यावश्यक है। इस लेख ने मेरी जिज्ञासा को बढ़ाया है। शीघ्र ही पूज्य सेवक जी की उक्त पुस्तक को खरीदकर पढ़ना चाहूँगा।

    जवाब देंहटाएं